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  • मछली मरी हुई से The Dead Fish तक

    1960 के दशक में राजकमल चौधरी का उपन्यास मछली मरी हुई प्रकाशित हुआ था। अपने समय से बहुत आगे का उपन्यास था। अभी हाल में उसका अंग्रेज़ी अनुवाद आया है- The Dead Fish नाम से। महुआ सेन द्वारा किए गए इस अनुवाद पर यह टिप्पणी लिखी है युवा लेखक  आकृति विज्ञा ‘अर्पण‘ ने। रूपा से प्रकाशित इस अनुवाद पर यह टिप्पणी आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

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    कभी-कभी साहित्य में कोई किताब अपने समय से आगे निकल जाती है. वह अपने समय के पाठकों को पूरी तरह समझ में नहीं आती, बल्कि उनके भीतर एक तरह की असुविधा छोड़ जाती है. समय गुजरता है. समाज बदलता है. और वही किताब अचानक फिर से पढ़ी जाने लगती है, जैसे उसमें छिपी हुई कोई बात देर से खुल रही हो.

    राजकमल चौधरी का उपन्यास मछली मरी हुई कुछ ऐसी ही कृतियों में है. हिंदी साहित्य के इतिहास में यह उपन्यास हमेशा चर्चा और विवाद दोनों के साथ मौजूद रहा है. अब जब इसका अंग्रेजी अनुवाद The Dead Fish के रूप में सामने आया है, तो यह केवल एक अनुवाद की घटना नहीं रह जाती. यह एक तरह से हिंदी साहित्य के एक जटिल क्षण का पुनर्पाठ भी बन जाती है. महुआ सेन का यह अनुवाद हिंदी साहित्य की उस बेचैन और विद्रोही परंपरा को वैश्विक पाठकों तक पहुंचाता है, जो लंबे समय तक भाषाई सीमाओं में बंद रही.

    भारतीय साहित्य का एक बड़ा संकट यह रहा है कि उसकी भाषाएं अक्सर एक-दूसरे से अलग दुनिया की तरह रहती हैं. हिंदी, बांग्ला, असमिया, मैथिली, कन्नड़, तमिल, मलयालम या मराठी में लिखी गई महान रचनाएं प्रायः अपनी भाषाई सीमाओं के भीतर ही घूमती रहती हैं. अंग्रेजी के पाठक तक वे बहुत देर से पहुंचती हैं, या कभी-कभी पहुंचती ही नहीं. वास्तव में अनुवाद कभी-कभी वही काम करता है जो समय भी नहीं कर पाता. वह अलग-अलग भाषाओं के बीच की दूरी को अचानक कम कर देता है. हिंदी साहित्य का एक साहसी उपन्यास अब एक नई भाषा में सांस ले रहा है, और उसकी गंध अब केवल एक भाषा तक सीमित नहीं रही. महुआ सेन द्वारा अनूदित The Dead Fish उसी परंपरा की एक नई कड़ी है.

    एक बेचैन लेखक की विरासत

    राजकमल चौधरी हिंदी और मैथिली साहित्य के उन रचनाकारों में हैं जिनकी प्रतिभा का विस्तार असाधारण है. 1929 में जन्मे और केवल अड़तीस वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त हुए इस लेखक ने बहुत कम समय में जो लेखन किया, वह मात्रा और महत्व दोनों में उल्लेखनीय है. उनकी रचनाओं में एक बेचैन ऊर्जा दिखाई देती है. वे अपने समय की सामाजिक नैतिकताओं से लगातार असहमति दर्ज करते हैं. उनके हिंदी उपन्यासों में मछली मरी हुई, देहगाथा, नदी बहती थी, अग्निस्नान, शहर था शहर नहीं था  और ताश के पत्तों का शहर   प्रमुख हैं. इन रचनाओं में आधुनिक जीवन की विडंबनाएं और मनुष्य के भीतर की उलझनें बार-बार सामने आती हैं.

    ताश के पत्तों का शहर  में शहर एक प्रतीक की तरह उभरता है. आधुनिक जीवन वहां एक कृत्रिम संरचना की तरह दिखाई देता है. जैसे ताश के पत्तों से बना घर, जो किसी भी क्षण ढह सकता है. राजकमल चौधरी की कविताओं में भी प्रयोगधर्मिता दिखाई देती है. उन्होंने भाषा और विषय दोनों स्तरों पर जोखिम उठाए.

    मैथिली साहित्य में भी उनकी उपस्थिति उतनी ही महत्वपूर्ण है. आंदोलन, आदिकथा  और पाथर फूल जैसे उपन्यास और अनेक कहानियां उनकी बहुभाषिक रचनात्मकता का प्रमाण हैं. मैथिली में उन्होंने लगभग सौ कविताएं, कई कहानियां और नाटकीय रचनाएं लिखीं. इस तरह वे उन दुर्लभ भारतीय लेखकों में हैं जिनकी रचनात्मकता दो भाषाओं में समान तीव्रता के साथ दिखाई देती है. उन्होंने सुविख्यात बांग्ला लेखक शंकर के प्रसिद्ध उपन्यास चौरंगी  का हिंदी में भी उल्लेखनीय अनुवाद किया था. यह तथ्य बताता है कि वे स्वयं भी भाषाओं के बीच संवाद के महत्व को समझते थे.

    उपन्यास का असहज संसार

    मछली मरी हुई   को हिंदी साहित्य के सबसे साहसी उपन्यासों में गिना जाता है. इसका कारण केवल इसका विषय नहीं बल्कि उसकी प्रस्तुति भी हैयह उपन्यास अपने समय की सामाजिक नैतिकताओं और मान्यताओं को सीधे चुनौती देता दिखाई देता है. इसकी कथा मुख्यतः उस समय के कलकत्ता शहर की पृष्ठभूमि में विकसित होती है, जहाँ महानगरीय जीवन की भागदौड़, अकेलापन और नैतिक अस्थिरता पात्रों के जीवन में गहरे उतरती दिखाई देती है.

    उपन्यास का केंद्रीय पात्र निर्मल पद्मावत है. वह एक सफल व्यापारी है, लेकिन भीतर से अस्थिर और विखंडित. उसके जीवन में संबंध हैं, लेकिन वे स्थिर नहीं हैं. उपन्यास की वास्तविक शक्ति उसके महिला पात्रों में दिखाई देती है. कल्याणी, शिरीन और प्रिया. ये तीनों पात्र केवल कथा के हिस्से नहीं हैं. वे उस भावनात्मक और मानसिक परिदृश्य का निर्माण करती हैं जिसमें पूरा उपन्यास घटित होता है.

    कल्याणी निर्मल के जीवन की एक जटिल स्मृति है. प्रेम और अपमान के बीच झूलता हुआ एक रिश्ता. शिरीन उपन्यास की सबसे जटिल पात्रों में से है. उसकी यौनिकता, उसका भय और उसका अकेलापन उसे एक गहरे मानवीय चरित्र में बदल देते हैं. प्रिया, जो कल्याणी की बेटी है, इस पूरे भावनात्मक ताने-बाने में एक नए आयाम जोड़ती है. इन पात्रों के माध्यम से राजकमल चौधरी आधुनिक शहरों की उस अदृश्य मानसिक थकान और भीतर जमा होती खामोशी को प्रत्यक्ष करते हैं, जो बाहर से चमकते जीवन के भीतर धीरे-धीरे जमती रहती है और जिसे हम अक्सर पहचानना नहीं चाहते.

    शिल्प और संरचना

    इस उपन्यास का महत्व उसके विषय से आगे जाकर उसके शिल्प में भी दिखाई देता है. कथा यहां रैखिक ढंग से आगे नहीं बढ़ती. स्मृतियां, इच्छाएं और अपराधबोध लगातार एक दूसरे में घुलते रहते हैं. यह संरचना उपन्यास को मनोवैज्ञानिक विवेक देती है. राजकमल चौधरी की भाषा छविमय है और कई जगह तीखी भी. वे छोटे वाक्यों में भी जटिल भावनात्मक स्थितियां रच देते हैं. उपन्यास में बार-बार लौटने वाला रूपक है मरी हुई मछली की गंध. यह गंध केवल एक दृश्यात्मक तत्व नहीं है. यह पूरे सामाजिक वातावरण की नैतिक सड़ांध का प्रतीक बन जाती है. महुआ सेन का अनुवाद इस रूपक की तीव्रता को अंग्रेजी में भी सुरक्षित रखता है.

    भारतीय साहित्य में समलैंगिकता का प्रश्न

    भारतीय साहित्य में लंबे समय तक समलैंगिकता का विषय लगभग अनुपस्थित रहा है. बीसवीं सदी के मध्य तक हिंदी उपन्यासों में प्रेम लगभग हमेशा विषमलैंगिक संबंधों के रूप में ही सामने आता था. ऐसे समय में राजकमल चौधरी का यह उपन्यास एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप की तरह सामने आया. इसमें शिरीन और प्रिया के बीच समलैंगिक आकर्षण और स्त्री इच्छाओं की जटिलता को दिखाया गया. यह उस समय के हिंदी साहित्य के लिए अत्यंत साहसी कदम था. महत्वपूर्ण यह भी है कि लेखक इसे किसी सनसनीखेज प्रसंग की तरह नहीं प्रस्तुत करते. यह पात्रों की भावनात्मक दुनिया का स्वाभाविक हिस्सा बनकर सामने आता है. इसी कारण आज जब LGBTQ+ पहचान और अधिकारों पर खुली चर्चा हो रही है, तब यह उपन्यास और अधिक प्रासंगिक दिखाई देता है.

    अनुवाद और उसका महत्व

    महुआ सेन का अनुवाद इस उपन्यास को नई भाषा में जीवित करता है. राजकमल चौधरी की भाषा का तीखापन और उसकी मनोवैज्ञानिक जटिलता अनुवाद के लिए आसान नहीं है. फिर भी यह अनुवाद मूल की बेचैनी को काफी हद तक सुरक्षित रखता है. उन्होंने राजकमल चौधरी की छविमय भाषा को अंग्रेजी में रूपांतरित करने की कठिन चुनौती स्वीकार की है.

    शहर की नमी, कमरों की घुटन और पात्रों की मानसिक उलझन अंग्रेजी पाठक तक भी पहुंचती है.

    इस तरह The Dead Fish केवल एक अनूदित पुस्तक नहीं रह जाती. यह हिंदी साहित्य को एक व्यापक साहित्यिक संवाद में शामिल करती है.

    पुनर्पाठ की आवश्यकता

    राजकमल चौधरी हिंदी और मैथिली साहित्य के उन लेखकों में हैं जिन्होंने साहित्य को कभी आरामदेह जगह नहीं बनने दिया. उन्होंने मनुष्य की इच्छाओं, भय और विफलताओं को उसी रूप में लिखा, जिसमें समाज अक्सर उन्हें देखना नहीं चाहता. मछली मरी हुई / The Dead Fish  इसी साहस की उपज है.

    फिर भी इस उपन्यास के साथ एक आलोचनात्मक असहजता बनी रहती है. लेखक ने भूमिका में समलैंगिकता को एक रोग की तरह देखने की बात कही है और कथा में उसे ‘ठीक’ करने का जो तरीका सामने आता है, वह आज के दृष्टिकोण से विवादास्पद प्रतीत हो सकता है. यह हमें याद दिलाता है कि साहित्य अपने समय की सीमाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं होता.

    लेकिन इन आपत्तियों के बावजूद इस उपन्यास की साहित्यिक शक्ति कम नहीं होती. बल्कि यही विरोधाभास इसे और दिलचस्प बनाता है, क्योंकि यह हमें उस दौर की सामाजिक मानसिकता और उसके भीतर उभरती विद्रोही आवाज़ दोनों को एक साथ देखने का अवसर देता है.

    महुआ सेन का अनुवाद The Dead Fish इस जटिल और साहसी कृति को एक नई भाषा में जीवित करता है.  आज इस उपन्यास और उसके अनुवाद को पढ़ना इसलिए भी जरूरी है कि यह हमें आधुनिक भारतीय समाज की उन जटिलताओं से रूबरू कराता है, जहाँ इच्छाएँ, नैतिकताएँ और भीतर जमा खामोशियाँ एक-दूसरे में उलझी हुई दिखाई देती हैं.

    शायद अनुवाद का सबसे बड़ा चमत्कार यही है कि वह भाषाओं के बीच फैले लंबे मौन को थोड़ा कम कर देता है. एक भाषा में जन्मी कथा दूसरी भाषा में पहुँचकर नया जीवन पाती है और साहित्य धीरे-धीरे सीमाओं से बाहर निकलकर एक साझा मानवीय अनुभव में बदलने लगता है.

    मछली मरी हुई से The Dead Fish तक की यह यात्रा केवल एक उपन्यास की यात्रा नहीं है, बल्कि भारतीय भाषाओं के बीच संवाद की उस संभावना की भी याद दिलाती है, जहाँ साहित्य अंततः मनुष्यता की एक ही कथा बन जाता है.

    पुस्तक : The Dead Fish
    लेखक : राजकमल चौधरी
    अनुवाद : महुआ सेन
    प्रकाशक : रूपा एंड कंपनी

    मूल्य : रु. 495

     

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