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  • फ़िल्मकार अरण्य सहाय से आशुतोष कुमार ठाकुर की बातचीत

    अरण्य सहाय फिल्मकारों की उस नई पीढ़ी से आते हैं, जो आज की ज़िंदगी को चलाने वाली उन अदृश्य व्यवस्थाओं पर सवाल उठाती है, जिन्हें हम अक्सर देख नहीं पाते। उनकी फ़िल्म ‘ह्यूमन्स इन द लूप’ कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल ढाँचों को चलाने वाले छिपे हुए मानवीय श्रम की ओर ध्यान खींचती है और तकनीक, शोषण तथा इस तथाकथित सहज आधुनिक जीवन की वास्तविक कीमत जैसे कठिन सवाल सामने रखती है।

    यह फ़िल्म अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में अपनी ठोस पहचान बना चुकी है। इसका पहला प्रदर्शन मुंबई के मामी फ़िल्म समारोह में हुआ, जहाँ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, श्रम और आदिवासी जीवन जैसे विषयों को बेबाकी से उठाने के कारण इसने शुरुआत में ही लोगों का ध्यान खींचा। इसके बाद इसे केरल अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह, लॉस एंजेलिस भारतीय फ़िल्म समारोह और न्यूयॉर्क भारतीय फ़िल्म समारोह में भी दिखाया गया, जिससे इसके ज़रूरी सवाल दुनिया भर के दर्शकों तक पहुँचे।

    फ़िल्म को लॉस एंजेलिस भारतीय फ़िल्म समारोह में सर्वश्रेष्ठ पहली फ़िल्म का सम्मान मिला, जबकि बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में इसे सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म के लिए ग्रैंड ज्यूरी पुरस्कार दिया गया। अपने इस सफर के चलते यह फ़िल्म हाल के समय की उन स्वतंत्र भारतीय फ़िल्मों में गिनी जाने लगी है, जो तकनीक, श्रम, पर्यावरण और नैतिकता की राजनीति पर गंभीर और असरदार बातचीत करती हैं।

    आशुतोष कुमार ठाकुर ने हाल ही में अरण्य सहाय से उनकी फ़िल्म, उसकी राजनीति और उन बेचैनियों के बारे में बात की, जो उनके सिनेमा को आकार देती हैं। यह बातचीत मूलतः अंग्रेज़ी भाषा में की गई और इसका मूल रूप ‘डाउन टू अर्थ’ में प्रकाशित हुआ। उसका हिंदी अनुवाद ‘डाउन टू अर्थ’ से साभार प्रस्तुत है- मॉडरेटर

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    आशुतोष कुमार ठाकुर: ‘ह्यूमन्स इन द लूप’ उन स्वचालित व्यवस्थाओं के पीछे काम करने वाले इंसानी श्रम को सामने लाती है। आपको सबसे पहले इस विषय की ओर किस चीज़ ने खींचा?

    अरण्य सहाय: करिश्मा मेहरोत्रा के एक लेख (‘ह्यूमन टच’) ने इस विषय की ओर पहली बार मेरा ध्यान खींचा। लगभग तुरंत ही मुझे लगा कि इसमें एक बेहद दमदार कहानी छिपी है। लेकिन फ़िल्म निर्माण में अक्सर कहा जाता है कि एक शानदार विचार कभी-कभी अभिशाप भी बन जाता है। फ़िल्म सिर्फ़ किसी मुद्दे पर रोशनी डालने तक सीमित होकर ठहर सकती है। असली चुनौती यह होती है कि उस विचार के लिए एक कहानी कैसे बनाई जाए। इस कहानी को समझने और गढ़ने में मुझे लगभग एक साल लगा।

    जब मैं इस विचार से जूझ रहा था, तब मुझे एहसास हुआ कि डेटा लेबलिंग का काम कुछ हद तक माता-पिता की भूमिका जैसा है। जैसे बार-बार किसी कुर्सी या मेज़ को पहचान देकर चिन्हित करना, वैसा ही कुछ हम बच्चों के साथ करते हैं। जब बच्चे बड़े हो रहे होते हैं, तो हम उन्हें रंगों और चीज़ों में फर्क करना सिखाते हैं, और फिर अपनी नैतिक सोच भी उन पर थोपते हैं।

    जब मुझे लगा कि यह काम पालन-पोषण जैसा है, तो मेरे मन में तुरंत सवाल उठा- क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता को एक बच्चे की तरह देखा जा सकता है? और इसी सवाल से इस फ़िल्म की कहानी धीरे-धीरे साफ़ होने लगी।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: यह फ़िल्म कृत्रिम बुद्धिमत्ता को किसी अमूर्त विचार की तरह नहीं, बल्कि हमारे जीते-जागते जीवन की सच्चाई की तरह सामने लाती है। आपने इतने तकनीकी विषय को आम इंसानी अनुभव से कैसे जोड़ा?

    अरण्य सहाय: डेटा लेबलिंग का काम खुद रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जुड़ा हुआ है। इसके कामकाज के हिस्से खेती-बाड़ी, बिना चालक चलने वाली गाड़ियाँ और भीड़ प्रबंधन जैसी चीज़ों पर आधारित होते हैं।

    मुझे लगता है कि मशीन लर्निंग तक पहुँचाने वाले इसी काम को आधार बनाने से यह विषय किसी अमूर्त विचार की तरह नहीं लगा, बल्कि बहुत वास्तविक बना रहा।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: क्या आप इस फ़िल्म को तकनीकी व्यवस्थाओं की आलोचना मानते हैं, या उन्हें लोगों के लिए अधिक समझने योग्य बनाने की कोशिश?

    अरण्य सहाय: मुझे लगता है कि यह फ़िल्म तकनीक, खासकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, को कुछ गिनी-चुनी तकनीकी कंपनियों के हाथों से निकालकर समाज के सामूहिक हाथों में वापस रखने की कोशिश है।

    खास तौर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता सिर्फ़ एक और तकनीक नहीं है। यह एक बहुत बड़ा बदलाव है, जो तय करेगा कि हमारी सभ्यता आगे किस तरह बनेगी और चलेगी। बहुत जल्द यह हमारी अर्थव्यवस्था और राजनीति की दिशा तय करने लगेगी। ऐसे में क्या हम इसकी दिशा तय करने का अधिकार सिर्फ़ कुछ कृत्रिम बुद्धिमत्ता कंपनियों के हाथों में छोड़ सकते हैं?

    आशुतोष कुमार ठाकुर: इस फ़िल्म में डिजिटल श्रम का अदृश्य रह जाना एक बड़ा मुद्दा है। आपके हिसाब से ये कामगार मुख्यधारा की कहानियों से बाहर क्यों रह जाते हैं?

    अरण्य सहाय: इसकी एक वजह यह है कि जिन व्यवस्थाओं को ये लोग चलाते हैं, उन्हें इस तरह बनाया गया है कि सब कुछ बिना किसी रुकावट के, बहुत सहज दिखाई दे। अगर इन कामगारों की मौजूदगी सामने आ जाए, तो यह भ्रम टूट जाता है।

    दूसरी वजह यह है कि इतिहास में भी कुछ तरह के काम, खासकर जो बार-बार दोहराए जाने वाले हों, टुकड़ों में बँटे हों या बहुत दूर-दराज़ जगहों पर किए जाते हों, उन्हें तरक़्क़ी की मुख्य कहानियों में जगह नहीं मिलती।

    डिजिटल श्रम के मामले में एक और परत है। यह काम अक्सर ऐसे मंचों के ज़रिए होता है, जहाँ काम करने वाला इंसान लगभग पूरी तरह ओझल हो जाता है। सामने सिर्फ़ नतीजा दिखाई देता है, काम करने की प्रक्रिया नहीं, और निश्चित ही वह व्यक्ति भी नहीं जिसने यह काम किया है।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: क्या आपके शोध के दौरान ऐसी कोई बात सामने आई, जिसने स्वचालन और तथाकथित “स्मार्ट” व्यवस्थाओं को लेकर आपकी अपनी समझ बदल दी?

    अरण्य सहाय: मेरे लिए सबसे बड़ी बात यह समझना था कि ये व्यवस्थाएँ उतनी स्वतः चलने वाली नहीं हैं, जितना हम मानते हैं। ये लगातार इंसानी दखल पर टिकी होती हैं — सुधार, पहचान तय करना, निगरानी और नियंत्रण जैसे कामों पर। यहाँ बुद्धिमत्ता किसी एक जगह नहीं होती, बल्कि कई अदृश्य लोगों के बीच बंटी होती है।

    इस फ़िल्म पर काम करने से पहले मैं भी सोचता था कि एल्गोरिद्म अपने-आप सीखते हैं। मेरा मानना है कि आज भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता को लेकर लोगों की यही आम समझ है।

    एक और बात जवाबदेही को लेकर समझ में आई। अगर इन व्यवस्थाओं को बनाने में इतने लोगों का सामूहिक योगदान है, और इनके असर भी सब पर पड़ते हैं, तो फिर इन पर मालिकाना हक़ भी सामूहिक क्यों नहीं होना चाहिए?

    आशुतोष कुमार ठाकुर: भारत जैसे देशों के संदर्भ में आप तकनीकी विकास और असुरक्षित होते श्रम के रिश्ते को आगे कैसे देखते हैं?

    अरण्य सहाय: इसमें एक विरोधाभास है। तकनीकी विकास को अक्सर अवसरों का रास्ता बताया जाता है, और कई मायनों में यह सच भी है। लेकिन इसके साथ ही यह काम की दुनिया को इस तरह बदल देता है कि काम और ज़्यादा बिखरा हुआ और कम सुरक्षित हो जाता है।

    भारत जैसे देशों में, जहाँ पहले से ही असंगठित श्रम की बड़ी व्यवस्था मौजूद है, डिजिटल व्यवस्थाएँ एक तरफ़ लोगों को काम दे सकती हैं, तो दूसरी तरफ़ उनकी असुरक्षा को और बढ़ा भी सकती हैं। असली सवाल यह नहीं है कि तकनीक आगे बढ़ेगी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या श्रम, गरिमा और सुरक्षा से जुड़े नियम-कायदे भी उसके साथ बदलेंगे या नहीं।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: इस फ़िल्म की दुनिया को रचने के लिए आपने किस तरह का शोध और फ़ील्ड वर्क किया?

    अरण्य सहाय: इस फ़िल्म के लिए मेरा शोध औपचारिक भी था, देखने-समझने पर आधारित भी, और बहुत हद तक लोगों के अनुभवों और किस्सों से भी जुड़ा था। पहले मैं दूसरे फ़िल्मकारों के लिए भी शोध कर चुका हूँ, और सामाजिक विज्ञान की पृष्ठभूमि से आने के कारण मुझे हमेशा से शोध की प्रक्रिया बहुत संतोष देने वाली लगी है। शायद संपादन के बाद, यही काम मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है।

    मैं आमतौर पर सबसे पहले बुनियादी ढाँचे और औपचारिक व्यवस्थाओं को समझने से शुरुआत करता हूँ। जैसे कितनी जनजातियाँ हैं? वहाँ की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति कैसी है? इस चरण में शिक्षाविदों, पत्रकारों और नीति-निर्माताओं से बातचीत बहुत काम आती है।

    इसके बाद मैं लोगों के अनुभवों और व्यक्तिगत किस्सों की तरफ़ बढ़ता हूँ। मेरा अनुभव रहा है कि कलाकारों से बातचीत कई बार वह बातें खोल देती है, जो औपचारिक शोध से सामने नहीं आतीं। इस सफर की शुरुआत में मुझे नृवंशीय फ़िल्मकार बीजू टोप्पो को जानने का मौका मिला। उनके ज़रिए मेरी मुलाकात कई कलाकारों से हुई, जिनकी सोच ने मेरी समझ को गहराई से प्रभावित किया।

    ‘ह्यूमन्स इन द लूप’ के लिए शोध का सबसे अर्थपूर्ण हिस्सा लगभग एक दर्जन आदिवासी महिलाओं से बातचीत करना था। आदिवासी दर्शन को लेकर उनकी सहज और गहरी समझ इस फ़िल्म की बुनियाद का अहम हिस्सा बन गई।

    इसके साथ-साथ, डेटा लेबलिंग करने वाले लोगों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में काम करने वालों से बातचीत भी बहुत ज़रूरी थी, क्योंकि इसी से फ़िल्म उन लोगों की असली ज़िंदगी और अनुभवों से जुड़ी रह सकी, जो इन व्यवस्थाओं के भीतर काम करते हैं।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: इस फ़िल्म की दृश्य भाषा बहुत संयमित है। आपके सौंदर्य संबंधी चुनावों को किस चीज़ ने दिशा दी?

    अरण्य सहाय: एक फ़िल्मकार के तौर पर मेरे लिए किसी भी दृश्य शैली को तय करने वाली सबसे अहम चीज़ पात्रों की मनःस्थिति होती है।

    यह फ़िल्म नेहमा की भीतरी दुनिया और उसके बचपन के बीच यात्रा करती है, इसलिए इसकी भाषा किसी सपने या धुँधली याद जैसी होनी चाहिए थी। कैमरे के बहुत दिखावटी या चमकदार इस्तेमाल का इस प्रक्रिया में कोई अर्थ नहीं लगा। शायद यही वजह है कि यह संयम अपने-आप आया।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: आपने कलाकारों से ऐसा अभिनय कैसे करवाया कि बार-बार दोहराए जाने वाले और अक्सर अदृश्य रह जाने वाले काम का मानसिक बोझ सामने आ सके?

    अरण्य सहाय: हमने पारंपरिक अर्थों में अभिनय पर कम और पात्र की मौजूदगी पर ज़्यादा ध्यान दिया। कोशिश यह थी कि ऐसा माहौल बने, जहाँ कलाकार भावनाओं का अभिनय करने के बजाय उन रोज़मर्रा की दिनचर्याओं को सचमुच जी सकें।

    शूटिंग से पहले हम लगातार दृश्यों का अभ्यास करते रहे, जब तक कि हर दृश्य और उसका हर छोटा उतार-चढ़ाव बिल्कुल स्वाभाविक न लगने लगे। और फिर शूटिंग के दिन कलाकारों को अपने ढंग से कुछ नया करने की पूरी आज़ादी थी।

    यहाँ दोहराव की बड़ी भूमिका है। धीरे-धीरे यही अपने भीतर एक अलग मानसिक दुनिया बना देता है- थकान, अलगाव, और बीच-बीच में आत्मचिंतन के पल। फ़िल्म इन्हीं बहुत बारीक बदलावों को ध्यान से पकड़ने की कोशिश करती है।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: हमारा प्रकाशन अक्सर विकास की पर्यावरणीय कीमत पर बात करता है। क्या आपके काम में डिजिटल ढाँचों और पर्यावरण पर पड़ने वाले असर के बीच कोई संबंध दिखाई देता है?

    अरण्य सहाय: हाँ, बिल्कुल। डिजिटल व्यवस्थाओं को अक्सर ऐसा माना जाता है जैसे उनका कोई भौतिक अस्तित्व ही नहीं है, लेकिन सच यह है कि वे गहराई से संसाधनों के दोहन से जुड़ी हुई हैं। इन्हें चलाने वाला ढाँचा-सर्वर, उपकरण, डेटा सेंटर-दुर्लभ खनिजों पर निर्भर करता है, जिनकी खुदाई अक्सर आदिवासी इलाकों में होती है और इसके गंभीर पर्यावरणीय और सामाजिक असर पड़ते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि हम तकनीक की इन छिपी हुई भौतिक बुनियादों को आलोचनात्मक नज़र से देखना शुरू करें।

    साथ ही, मुझे लगता है कि बातचीत का रुख़ उन बातों की ओर भी मोड़ना उतना ही ज़रूरी है, जिन्हें हम नज़रअंदाज़ कर देते हैं। आदिवासी समुदाय सिर्फ़ इन प्रक्रियाओं से प्रभावित होने वाले लोग नहीं हैं; उनके पास पर्यावरण संबंधी ऐसी गहरी समझ और ज्ञान-परंपराएँ हैं, जो टिकाऊ जीवन, संसाधनों के इस्तेमाल और उनकी देखभाल के बारे में सोचने के वैकल्पिक रास्ते दिखाती हैं।

    तकनीक और पर्यावरण को लेकर आज की बातचीत अक्सर सिर्फ़ दक्षता बढ़ाने या नुकसान कम करने तक सीमित रह जाती है। लेकिन अगर हमें सचमुच भविष्य के बारे में गंभीरता से सोचना है, तो इन चर्चाओं का दायरा बढ़ाना होगा और इसमें आदिवासी ज्ञान-परंपराओं को शामिल करना होगा – किसी हाशिए की चीज़ की तरह नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार तकनीकी व्यवस्थाओं की कल्पना के केंद्र में रखकर।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: तकनीक को अक्सर “साफ़-सुथरी” या बिना किसी भौतिक अस्तित्व वाली चीज़ के रूप में देखा जाता है। क्या आपकी फ़िल्म इस धारणा को चुनौती देती है?

    अरण्य सहाय: हाँ, देती है। हमारा मकसद कोई सीधा-सीधा ऐलान करना नहीं था, बल्कि इस सोच के साथ एक असहजता पैदा करना था। जीवन और देखभाल को आदिवासी नज़रिए से देखते हुए, फ़िल्म वही संवेदनशीलता और गरिमा कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक भी बढ़ाती है। अगर नेहमा एक आदिवासी महिला न होती, तो शायद वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता को जीवित चीज़ की तरह न देखती, जिसे सही परवरिश और देखभाल की ज़रूरत है।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: आज के भारत में स्वतंत्र और सामाजिक मुद्दों पर आधारित सिनेमा के लिए आप कितनी जगह देखते हैं?

    अरण्य सहाय: मेरा मानना है कि सबसे पहले सिनेमा को दर्शकों से जुड़ना चाहिए। समकालीन मुद्दों को आधार बनाने से उसे ज़मीन मिलती है, लेकिन किसी कलात्मक रचना की असली अहमियत इस बात में होती है कि उसमें रचनाकार की अपनी समझ, अपनी व्याख्या और निजी जुड़ाव कितना है।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: आप चाहते हैं कि यह फ़िल्म किस तरह की बातचीत शुरू करे, खासकर उन लोगों के बीच जो तकनीकी दुनिया में काम कर रहे हैं?

    अरण्य सहाय: मेरी उम्मीद है कि यह ज़िम्मेदारी को लेकर ज़्यादा ज़मीन से जुड़ी बातचीत शुरू करे। सिर्फ़ नतीजों के बारे में नहीं, बल्कि उन प्रक्रियाओं के बारे में भी, जो उन नतीजों तक पहुँचाती हैं।

    अगर यह फ़िल्म किसी को बस एक पल के लिए भी ठहरकर सोचने पर मजबूर कर दे – कि तकनीकी व्यवस्थाओं के पीछे भी इंसानी व्यवस्थाएँ काम करती हैं – तो मेरे लिए वही बहुत मायने रखेगा।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: क्या दर्शकों की ओर से कोई ऐसी प्रतिक्रिया मिली, जिसने आपको चौंकाया हो?

    अरण्य सहाय: हाँ, कई बार। लेकिन एक बात जिसने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया, वह यह थी कि एक व्यक्ति मेरे पास आकर बोला कि धानू को नेहमा को इतनी आसानी से माफ़ नहीं करना चाहिए था। मुझे लगा, उस प्रतिक्रिया में कुछ असाधारण रूप से गहरी और ताकतवर बात थी।

    आशुतोष कुमार ठाकुर: ऐसे समय में, जब तकनीक हमारी ज़िंदगी के हर हिस्से के बीच आकर उसे प्रभावित कर रही है, आपको क्या लगता है सिनेमा की क्या भूमिका हो सकती है?

    अरण्य सहाय: सिनेमा के पास चीज़ों की रफ्तार धीमी करने की ताकत होती है। ऐसे समय में, जब तकनीक अनुभवों को बहुत तेज़ बना रही है और हमारी ध्यान देने की क्षमता को लगातार छोटा कर रही है, सिनेमा ठहरकर सोचने की जगह बना सकता है।

    यह उन चीज़ों को भी सामने ला सकता है, जो वरना बहुत अमूर्त या अदृश्य बनी रहती हैं। और ऐसा करके यह हमें इन व्यवस्थाओं को सिर्फ़ दिमाग़ से नहीं, बल्कि भावनात्मक और नैतिक स्तर पर भी समझने और उनसे जुड़ने का मौका देता है।

    आशुतोष कुमार ठाकुर बेंगलुरु में रहने वाले प्रबंधन क्षेत्र के पेशेवर, साहित्यिक आलोचक, क्यूरेटर और द्विभाषी लेखक हैं। उनसे ईमेल के माध्यम से संपर्क किया जा सकता है।

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