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  • लेखक आख़िर लिखते कैसे हैं?

    हर लेखक के लिखने का अपना अपना अन्दाज़ होता है। लेखिका वंदना यादव ने अपना अनुभव साझा किया है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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     पिछले दिनों मैं यात्रा पर थी। रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर देखते हुए मन में कितने ही विचार बन रहे थे। उससे अधिक गति से बनते हुए विचार बिगड़ भी रहे थे। संभव है कि मेरे चेहरे के भाव भी बनते-बिगड़ते विचारों के साथ आकार बदल रहे हों। सामने वाली बर्थ पर यात्रा कर रही एक सह यात्री से कुछ देर पहले तक मेरी बातचीत हो रही थी। इसी क्रम में वह जान गई थी कि मैं लेखक हूँ। वह लगातार मुझे देख रही थी। शायद मेरे मन में आते-जाते विचारों पढ़ने का प्रयास कर रही थी। अचानक उसने पूछा, ‘आपके सोचने और लिखने की प्रक्रिया क्या है?’ इस तरह के सवाल मुझसे अक्सर पूछे जाते हैं। अमूमन सभी लेखक कभी ना कभी इस तरह के प्रश्नों का सामना करते हैं। मुझे लगता है कि इस तरह के सवाल का कभी-कोई एक जैसा जवाब नहीं हो सकता। बात यह है कि सभी लेखक एक जैसा नहीं सोचते। कहानी या उपन्यास लिखने में जब रिसर्च का ही कोई सैट पैटर्न नहीं है तब फिक्शन अथवा नॉन-फिक्शन लिखते समय विचारों का क्रमबद्ध होना बिल्कुल भी संभव नहीं होता।

    कितने ही लेखक बातों-बातों में अपने लिखने का प्रोसेस साझा करते हुए अजब-गजब विवरण देते हैं। कुछ लेखक अपनी स्टडी टेबल पर बैठकर ही लिखते हैं। कुछ कलमकार कैसे भी हालात में, कहीं भी लिख लेते हैं। कहने का तात्पर्य है कि वह भीड़ भरे इलाक़े से गुजरते हुए, यात्रा में अथवा दफ्तर के काम के बीच भी लिख लेते हैं। कुछ महिला रचनाकारों ने यह भी बताया कि कितनी ही बार वह घर के ज़रूरी काम बीच में रोककर अचानक आये आइडिया पर काम करती हैं। अलग-अलग राय होते हुए भी लगभग सभी लेखकों ने एक बात पर अपनी सहमती दी है कि कविता, कहानी या उपन्यास का आइडिया उन्हें जहाँ भी आ जाये, वह तुरंत उसे नोट कर लेते हैं। इसी तरह किसी रचना की पहली पंक्ति या कोई अन्य दमदार पंक्ति जब जेहन में आ जाये, उसे तुरंत लिखना जरूरी हो जाता है अन्यथा उसके भूल जाने की संभावना बनी रहती है। वर्तमान समय की एक चर्चित कथाकार का कहना है कि वह कहानी का आइडिया आने के बाद कथा के प्रमुख चरित्रों को मन में रच लेती है। आगे की घटनायें और चरित्र कहानी की बढ़त के साथ घटते-बढ़ते रहते हैं। चूंकि कहानी की थीम पर उनकी पकड़ रहती है इसीलिए अंत तक पहुंच कर कहानी उसी रूप में आ जाती है जैसा लेखक ने पहले तय किया था।

    एक अन्य रचनाकार ने बताया कि उनकी रचनाओं में चरित्र अक्सर लिखते-लिखते हुए बीच में ही बेकाबू हो जाते हैंं। वह बताती है कि कहानी के बीच में उनके चरित्र अपनी मनमर्जी पर उतर आते हैं। उन्होंने कहा कि पहले से सोच कर लिखना शुरू करने के बावजूद चरित्रों के अड़ियल व्यरहार के कारण उन्हें अपनी कुछ कहानियों के अंत भी बदलने पड़े। यानी लेखन का कोई तय पैमाना नहीं है।

    मेरे लिखने का तरीक़ा यह है कि पूरी की पूरी कथा मैं पहले दिमाग में लिखती हूँ। इसमें कहानी में प्रयोग होने वाले अल्प विराम अथवा पूर्ण विराम भी शामिल होते हैं। कहानी का विवरण और डायलॉग तो फिर बड़ी बात है। यानी शुरू से लेकर अंत तक पूरी की पूरी कहानी दिमाग में लिख लेती हूँ। इसके बावजूद कहानी या उपन्यास की पहली पंक्ति मेरे लिए अलग महत्व रखती है। कथा तब तक लिखित रूप में आकार लेना आरंभ नहीं करती जब तक दिमाग में पहली परफेक्ट पंक्ति ना बन जाये। इस चक्कर में कभी-कभी महीनों मैंने ड्राफ्ट बनाये और मिटाये हैं। यानी सभी कथाकारो के सोचने का कोई तय पैमाना नहीं है और एक ही विषय पर लिखी गई कहानियों के ट्रीटमेंट भी एक-समान नहीं होते।

    अपने लड़कपन की एक घटना याद आ रही है। उन दिनों भी कलम का साथ बना हुआ था मगर हालात आज जैसे नहीं थे। हुआ यह कि हमारे घर के सामने वाले घर तक पहुँचने के लिए चार-पाँच सीढियाँ चढ़नी होती थीं। एक दिन खुशगवार से मौसम में कहीं से एक चूजा आ कर उस घर की सीढ़ी पर बैठ गया। मैं उसे कुछ देर देखती रही। अचानक वह एक खूबसूरत-सी नन्ही परी में बदल गया। उसने सफेद शफ्फाक लंबी सी फ्रॉक पहन रखी थी जिसके पीछे तक नैट की पारदर्शी ट्रेन थी। उस परी के सुंदर पंख थे और हाथ में जादू की छड़ी थी। देर तक एक ओर टकटकी लगाए देखकर मेरी सहेली ने मुझे टोका। अब फिर से मेरे सामने वही चूजा था। इसी तरह कितनी ही बार आज़ादी की लड़ाई में मैं किसी वीरांगना के रूप में लड़ाई में अपने प्राणों की आहुति दे चुकी हूँ। एक पर्वतारोही ने जब अपने अनुभव मुझसे साझा किये, कितनी ही रातों में मैं नींद से तब हड़बड़ाहट कर जाग कर उठ बैठी जब हिमालय पर्वत पर ट्रैकिंग करते हुए किसी अनजान पर्वतारोही को गहरी खाई में गिरते हुए देखा। इसी तरह ना जाने कितनी ही बार सबके साथ होते हुए भी मैं अपनी अलग, एक अकेली यात्रा पर चल पड़ती हूँ। मुझे यक़ीन है कि सभी संवेदनशील मन के रचनाकारों के साथ ऐसा होता है।

    लेखकों के सोच-विचार और कल्पना के पीछे उनकी परवरिश का हाथ भी होता है। एक बात तय है कि बीते समय की छाया वर्तमान तक पीछा करती है कम से कम मेरे साथ तो ऐसा होता है। बात यह है कि मेरे पापा शिक्षाविद होने के साथ-साथ किसान भी थे। बचपन से मैं भी पापा के साथ खेतों में जाती थी। बीज रोपने से लेकर फसल तैयार होने तक खेत बहुत परिश्रम माँगते हैं। तैयार फसल की कटाई, दाने निकालने, उनकी छंटाई और बोरियों में उन्हें भरना, मंडी में भेजना यानी सब कड़ी मेहनत माँगते हैं। इस क्रम में सर्दियों की आहट के समय खेतों का सरसों के पीले फूलों से भरा दृश्य याद आता है। हरे गलीचे पर पीले बूटों की कढ़ाई सा कालीन का वह दृश्य भुलाए नहीं भूलता। आज भी जब किसी क्यारी में खिले फूल देखती हूँ, तब मेरे लिए वह फूल सुंदरता का पर्याय नहीं बनते। खिलखिलाते फूलों का अर्थ मेरे लिए परिश्रम का परिणाम रहा है, और हमेशा ऐसा ही रहेगा।

    लिखने के क्रम में लेखकों के सोचने-विचारने के किस्से उतने ही हैरान करने वाले हैं जितनी विविधता भरी उनकी रचनाएं होती हैं। यह बात सर्वविदित है कि जो व्यक्ति जिस क्षेत्र में काम कर रहा होता है, उसके सोचने का तरीक़ा भी धीरे-धीरे उसके चुने हुए कार्यक्षेत्र के अनुरूप होने लगता है। लेखक एकमात्र ऐसी प्रजाति है जहाँ वह अपनी मर्ज़ी की चरित्र गढ़ता है। अपने गढ़े हुए चरित्रों से वह अपनी मर्ज़ी का व्यवहार करवा लेने के लिए स्वतंत्र होता है। ऐसा करते हुए वह अपनी सोच और अनुभव से काम लेता है। यही कारण है कि अक्सर लेखक जहाँ होते हैं, वैचारिक स्तर पर वहाँ नहीं होते।

    लेखक तीन उपन्यास सहित पच्चीस पुस्तकों की लेखक है।

    संपर्क  –

    मेल आईडी  – yvandana184@gmail.com

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