एआई और उसके प्रयोगों, अकादमिक जगत पर उसके प्रभावों को लेकर युवा लेखक आकाश ने यह लेख लिखा है। इस लेख से हमें एआई की कार्यविधि समझ आती है और यह भी कि उसके कारण किस हद तक कृत्रिमता का प्रसार हो रहा है। आकाश ने एमए की पढ़ाई बीएचयू से की है। इन दिनों वे गोरखपुर विश्वविद्यालय से शमशेर बहादुर सिंह और पाब्लो नेरुदा की कविताओं पर शोध कर रहे हैं- मॉडरेटर
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बहुत सारी रंगीन कागज़ी पत्तियाँ, उस पेड़ की जिन्दा पत्तियों की जगह ले ली हैं। अरोमा की खूशबू फूलों पर तैर रही है। ये कितनी भयंकर त्रासदी है कि एक अधूरी सदी ढह रही है। यदि आपकी कल्पना में सजीवता है। रमणीयता है। किसी घटना को ध्यान में रखकर पूरी पटकथा देख लेने की क्षमता है, तो आप याद कीजिये वाल्मीकि का वह प्रभात स्नान, देखिये उस क्रौंच के शरीर को जो खून से लथपथ कराह रहा है। अब दृश्य बदलते हैं। द्रोपदी की साड़ी खींची जा रही है। सिद्धार्थ के सामने से एक शव करुण कंधों पर जा रहा है। उधर देखो, भर्तृहरि राजसी भाग्यों का त्याग कर भागे जा रहे हैं। अभी शकुन्तला ने दुष्यंत को याद किया, उसने अभी अपने वल्कल बदले हैं। शंकराचार्य, भारती से शास्त्रार्थ में पराजित हुये। अभी-अभी एक सभ्यता नदी के प्रवाह में धँस गयी। अब मातृगुप्त रो रहे हैं, नहीं मातृगुप्त नहीं हैं, ध्यान से देखो, अभी भी नहीं पहचान पाये न, रुको मैं बताता हूँ। वे हारे हुए कालिदास हैं। आल्बेयर कामू का सिसिफ़स थक गया है। स्टीव ओब्लोस्की की बहन के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। इन सबके अलावा भी आपके पास कला जगत के जितने भी संदर्भ हों, उनको वर्तमान में खींच लाइये। उनके महीन धागों को स्पर्श करके एक इतिहास बुन दीजिये। जिसे कई सदियाँ धारण करें।
अब आप एक बार फिर से सोचिये कालिदास अपने आवास पर हैं। उनके पास आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का वार्षिक सब्सक्रिप्शन है। कालिदास ने लेटेस्ट AI टूल्स पर घटनाओं और पात्रों का ब्यौरा डाला और कहा कि जल्दी इनसे पाँच अंकों में एक नाटक लिख दीजिए। कृत्रिम मेधा ने तुरंत विक्रमोर्वशीयम् तैयार कर दिया। उन्होंने इसे जल्दी से ताड़ पत्रों पर कॉपी-पेस्ट कर दिया।
वाल्मीकि तमसा नदी की ओर जाते हुये बीच रास्ते से लौट आये हैं। वे अपना लैपटॉप चार्जिंग में लगाना भूल गये थे। चार्जिंग पर लगाते हुये उन्हें व्हाट्सएप मैसेंजर पर किसी संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में व्याख्यान देने का निमंत्रण मिला हुआ था। उन्होंने नोटिफिकेशन पर संदेश पढ़े और जल्दबाज़ी न दिखाते हुये, नहाने चले गये। लौटने पर उन्होंने अत्यधिक विनम्रतापूर्वक निमंत्रण स्वीकार करते हुये जवाब लिखा, साथ ही, उन्होंने संयोजक महोदय को ये भी लिखा कि मेरी एक किताब पब्लिशर से आयी है, अगर उसका विमोचन भी इसी कार्यक्रम में हो जाता तो बहुत अच्छा होता। संयोजक महोदय ने बधाई दिया और कहा जरूर। इतनी देर में वाल्मीकि जी का लैपटाप चार्ज हो चुका था। फिर वे भी चैट जीपीटी के Pro. Version पर पात्रों और घटनाओं का ब्यौरा दिया और कहा संस्कृत में एक महाकाव्य तैयार कर दीजिये। फिर कुछ ही देर में पूरा महाकाव्य (रामायण) उनके सामने तैयार मिला। वह उसे व्यवस्थित कर प्रकाशक को भेजते हुये बोले कि अगले सप्ताह के पहले ही इसकी प्रतियां मिल जाती तो बेहतर होता। क्योंकि इस मूर्त तारीख को इसका विमोचन है।
मैं जानता हूँ, उपर्युक्त दोनों संदर्भ बहुत सम्मानीय हैं। जब भी कलावाद की बात होती है। जब भी मनुष्य के साहित्य की अवधारणाएं और परिभाषाएं लिखी जाती हैं, उनके ठोस व्याकरणों का पहला पाठ बिना इनके शुरू नहीं होता है। आप विचार कीजिये, उस समय आपकी मनोदशा क्या होगी? जब पता चलेगा कि पाश्चात्य संसार में होमर, हेसियड, होरेस, सुकरात, प्लेटो, अरस्तु से लेकर दान्ते, ज़ोला, डे कास्ट्र, हीगेल, तॉल्सताय से होते हुये मार्क्स, डब्ल्यू. के. विम्सट, नेरुदा, लोर्का, रिचर्ड, इलियट और प्राच्य संसार में वाल्मीकि, कालिदास, गोरखनाथ, कबीर, तुलसी, मुक्तिबोध, भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद, वली दकनी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, सुब्रमण्यम भारती, माइकल मधुसूदन दत्त, रवींद्रनाथ टैगोर, नारायण सुर्वे, अक्क महादेवी और अन्य लोगों की रचनाओं का प्रशिक्षित पाठ स्वभाविक बौद्धिकता की उपज न होकर किसी साफ्टवेयर बौद्धिकता की सिंथेटिक क्रियेटिव हैं।
मैं जानता हूँ और दावा करता हूँ कि आपकी कारयित्री-भावयित्री प्रतिभा इस पूरे प्रकरण को बेहद संजीदा रूप से नकार देगी। वह क्षण कितनी विरक्तियों से भरा होगा, जब आपको पता चलेगा (पहले पैराग्राफ को लेकर) सदी के उपन्यास सम्राट प्रेमचंद के रंगभूमि में सूर की झोपड़ी जलाने वाला भैरो के मस्तिष्क में सूर की विनम्रता को लेकर कोई कुंठा नहीं थी। प्रसाद का मनु का जल विप्लवन के बाद हताश होने के पीछे उसकी मन: स्थिति नहीं थी। रसखान का कृष्ण के प्रति धर्मनिरपेक्ष भाव उनके मन की उपज नहीं थी। मुक्तिबोध का मन मध्यवर्गीय विक्षोभों से नहीं टकरा रहा था। आचार्य रामचंद्र शुक्ल का निबंध ‘कविता क्या है? के हरेक संशोधित पाठ दो दशकों तक होना भी उनकी चेतना की उपज नहीं थी बल्कि इन सबके पीछे केवल एक मस्तिष्क था। वह था कृत्रिम मस्तिष्क, तकनीकी दुनिया का सबसे क्रूरतम दौर जब मनुष्य की बौद्धिकता पर घनीभूत अँधेरा छा रहा है।
इधर के दिनों में कई ऐसे लोगों पर ध्यान गया, जो सिनॉप्सिस, रिसर्च पेपर, आलेख और किसी पुस्तक की समीक्षा तक लिखने में इस टूल्स का धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं। सबसे जरूरी बात प्रयोग तक रही तो ठीक लेकिन उसके टीले पर बैठकर, जिराफ़ की तरह गर्दन ऊँचीं करके चल रहे हैं। क्या ये दिन आ गये? भारतीय बुद्धिजीवियों के कि मेधा भी हम कृत्रिम लेकर इतरा रहे हैं।
अभी बीते महीने समालोचन के वेबपोर्टल पर ‘जावेद-नामा जदीद’ के नाम से ‘अशअर नज्मी’ का ख़ालिद जावेद की रचनाओं का पोस्टमार्टम करता हुआ आलेख प्रकाश में आया था। पोस्टमार्टम इस संदर्भ में कि ख़ालिद जावेद की रचनाओं पर नेटफ्लिक्स के सीरीज़, थॉमस बर्नहार्ड (Thomas Bernhard, एमिल जोला और कई पाश्चात्य जगत के आख्यानों का नकल कहा गया। ख़ालिद जावेद समकालीन उर्दू साहित्य के जानेमाने कथाकार और अनुवादक हैं। जिन्हें कई रचनाओं के लिये महत्वपूर्ण पुरस्कार मिले हैं।
इस प्रसंग को लेकर फ़ेसबुकीय आलोचना-आलोचकों में दो मत दिखे, एक मत जो पूरी तरह से ख़ालिद जावेद के पक्ष में था और दूसरा पक्ष अशअर नज़्मी के। इन मतो के बीच से ये बात भी निकलकर आयी कि इन दोनों के बीच कई तरह के आपसी मतभेद और मन भेद भी हैं। जैसे इंडिया टुडे के वर्तमान एडिटर और हिन्दवी पर संगत के लिये काम कर चुके अंजुम शर्मा ने कहा कि “मुझे याद है, खालिद साहब को मैंने फ़ोन किया था कि अशअर नज्मी के उपन्यास पर आप कुछ लिख दीजिए। उन्होंने बताया कि दोनों में कुछ मन-मुटाव हुआ है जिसके चलते उनका लिखना उचित नहीं है। अगर कहीं पढ़ते हुए कोई बात मन में आई तो कृति के साथ न्याय नहीं हो पाएगा। और यह सामान्य प्रवृत्ति है कि जब कुछ ठीक न चल रहा हो तो पढ़ते हुए आप बायस्ड न हों, यह बहुत रेयर है।“ अब आप सोचेंगे कि इसमें कृत्रिम मेधा की जगह कहाँ है? लेकिन जगह है। खालिद जावेद के और शुभचिन्तकों, साहित्य पारखियों ने इस पूरे आलेख को खारिज करते हुये कहा, यह आलेख AI से अंतर करवाते हुये लिखा कहा गया है। जैसे अंजुम शर्मा के पोस्ट पर भारतीय भाषा केंद्र JNU की प्रोफेसर गरिमा श्रीवास्तव की टिप्पणी है “ये AI की तकनीक से दुश्मनी सेटल करने का एक उदाहरण है। AI से पूछियेगा कि विश्व में किसान जीवन पर लिखे उपन्यासों के बारे में बताइये तो कहीं न कहीं किसी तरह प्रेमचंद के गोदान पर भी इसी तरह के आरोप लग सकते हैं। यह लेख ही सस्ती लोकप्रियता हेतु लिखा गया है। इससे ख़ालिद जी की रचनात्मकता, पाठकों की संख्या और स्वयं उनपर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। वे बेहतरीन लेखक हैं और रहेंगे।”
ख़ालिद जावेद के पक्ष में एक और युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश ने भी इसे निजी खुन्नस और आपसी मन भेद के कारण इस आलेख को तीखी प्रतिक्रिया का नाम देते हुये कहा “इसमें व्यक्तिगत खुन्नस अधिक दिखाई दी। ऐसा लगा आलोचक पहले से ही निर्णय पर पहुँच गया है, बस तर्क गढ़ना बाक़ी है। यह आलोचना की ख़तरनाक उलटबाँसी है।” यह तो रही जावेद जी के पक्ष में कही हुई बातें।
ऐसा भी नहीं है कि अशअर नज्मी के पक्ष में बातें नहीं हुई। इनके आलेख से प्रभावित होते हुये समकालीन हिन्दी के उभरते युवा आलोचक संतोष अर्श ने अपने फीड पर कहा “जिन्हें ऐसा लगता है कि यह मज़मून निजी खुन्नस, ईर्ष्या इत्यादि के अतिरिक्त कुछ भी सामने नहीं लाता, वे ख़ालिद जावेद के उपन्यासों के बचाव में इससे बेहतर आलेख लेकर सामने आ सकते हैं और नज़्मी साहब की स्थापनाओं को ख़ारिज कर सकते हैं।” इस तरह से उर्दू के दोनों समकालीन लेखकों के पक्ष में लोगों की सक्रियता दिखी थी। एक के पक्ष में दूसरे के आलेख को, उसमें आये संदर्भों को AI की खोज कहा गया।
वाराणसी के अमर उजाला में मई में हिमांशु अस्थाना की रिपोर्ट से जानकारी मिली कि बनारस विश्वविद्यालय के 75 प्रोफेसरों द्वारा AI की मदद से तैयार रिसर्च पेपर इंटरनेशनल जर्नल से बाहर हुये। ये अकादमिक जगत के कुछ ऐसे मामले हैं, जो किसी न किसी रूप में दर्ज़ हो जा रहे हैं। यकीन मानिये विश्वविद्यालय में सिनॉप्सिस से लेकर, रिसर्च पेपर और थीसिस तक की राइटिंग इसी टूल्स से हो रहे हैं।
मैंने जावेद-नामा-जदीद आलेख और ख़ालिद जावेद के भी कुछेक रचनाओं को पढ़ा है। और जब से समकालीनता से मेरा परिचय हुआ है। इन खास तरह की परिस्थितियों में रचनाकार और उसकी रचनाधर्मिता के बारे में जानकारी मिलती रहती है। मैं दोनों लेखकों के पक्ष–विपक्ष में कोई बात रखने की जल्दबाज़ी नहीं करूंगा। दोनों लेखक एक दौर में अच्छे मित्र रहे हैं। इस तरह की ध्वंसात्मक आलोचना के बाद वह मित्रता कितनी बची है, इसका भी मैं कोई मूल्यांकन नहीं करूंगा। मेरा मूल उद्देश्य यही है कि किसी लेख-आलेख के शब्द चयन, वाक्य विन्यास और भाषा तक में जब AI का वजूद प्रवेश करता है, तब उसकी पारिस्थितिकीय स्थिति कितनी बदल जाती है। इस संदर्भ में बात कृत्रिमता (Artificial) से शुरू करता हूँ। इस स्थिति को पहले व्यवहारिक तरीके देखना चाहिए।
सिन्थेटिक-नॉनसिन्थेटिक की भाव-वस्तु कोई व्यक्ति सहज अनुभूतियों से स्वयं मालूम कर लेता है। एक कमरे में गुलदस्ता रखा है। उस गुलदस्ते में उपस्थित सभी फूलों में प्राकृतिक सुंदरता है, उससे आती हुई खूशबू में आपके मस्तिष्क में बड़बड़ाये तमाम संत्रासों को दूर या शान्त करने की क्षमता और सजीवता है। वहीं पर दूसरे कमरे में प्लास्टिक फूलों का गुलदस्ता रखा है। और हो सकता है आप पहली दफा उसे देखकर उसके प्रति अधिक आकर्षित हों, लेकिन अगले ही क्षण आपको उसकी वास्तविकता ज्ञात होने पर आप ठहर जायेंगे। कुछ पल के लिए आप यकीन कर लीजिये कि उस कमरे की हवा में उन फूलों के सुगंध शामिल हैं। लेकिन उनमें टेरपीन्स (Terpenes), बेंजेनॉइड्स (Benzenoids) आदि हानिकारक रसायनों की अधिकता है। यह सुगंधित विकल्प आपके मन को शान्त न करके, बल्कि एक अलग तरह की एंक्ज़ायटी की ओर ढकेल रही है। उसके प्रभाव से आपके फेफड़ों पर दाबव पड़ रहा है।
भाषा में शब्दों की कृत्रिमता के प्रभाव भी ऐसे सहज समझे जा सकते हैं। लेकिन थोड़ी भिन्नता के साथ। पहली बात तो भाषा का प्रभाव जितना प्राकृतिक है उतना ही कृत्रिम भी। यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूँ कि भाषा में नेचुरल Customization की प्रक्रिया किसी भी तरह से कृत्रिमता को दर्ज़ नहीं करती है। एक व्यक्ति अपने मन की सभी अवस्थाओं के बीच, तमाम भाषाओं के अध्ययन से एक ऐसा प्रारूप बना सकता है। जो वास्तव में नितान्त रूप से अनोखा हो, सुंदर हो। लेकिन यही प्रारूप तैयार करने में वह LLM टूल्स का उपयोग करता है तो यकीन मानिये उस भाषा के साथ-साथ नवनिर्मित संस्करण भी बौद्धिक बेईमानी का शिकार कहलायेगी। इस बेईमानी का शिकार जाने-अजाने में जेनरेशन जेड और जेनरेशन अल्फा हो रही है। इससे पहले की पीढ़ी लगभग अधिकतर मामलों में इसके प्रयोगों से बचती रही है, या इसके प्रयोगों से अपरिचित है, फिर भी यह पुरानी पीढ़ी इसके उपयोग से बच नहीं पायी है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से लिखे आलेखों को ‘AI प्लेगरिज्म’ के अलावा और भी कई तरीकों से पहचाना जा सकता है। जैसे पहली बात उस व्यक्ति के शिक्षक, उसके परिवार का जागरूक व्यक्ति या उसका कोई मित्र जो उस व्यक्ति की चेतना से परिचित है। वह उसके लिखे लेखों को पहचान लेगा कि ये उसने लिखे हैं या कहीं से टीप लिया है।
दूसरी तरफ ऐसे कि उसके AI के प्रयोग से लिखे लेखों के अवतरणों में, एक वाक्य में ढेर सारे जॉर्गन आपकों दिखेंगे। आपको उसमें ऐसा क्राफ्ट दिखेगा कि जो बात कई अवतरणों में कहीं जानी थी, वह केवल एक पैराग्राफ़ में समेट दी गई है।
तीसरी तरह का भी विकार मैंने अनुभव किया कि किसी रिसर्च पेपर या थीसिस का जब मूल्यांकन होता है तो थीसिस, रिसर्च पेपर, आलेख संबंधित विषय लिखने वाले से आधार ग्रंथों से इतर ग्रन्थों के नाम पूछ लेने पर बड़ी मुश्किल से तीन-चार का नाम बता पाता है। जो व्यक्ति अपना पूरा काम किया है, उस पर हुये और काम उसके ध्यान में नहीं रहते हैं। इससे दो बातें सामने आती हैं। एक तो वह व्यक्ति वास्तव में बहुत बड़ा बौद्धिक है। और सीधी चाल चलकर अपना काम पूरा किया है। दूसरी बात वही जो आप समझ रहे हैं।
चौथी तरह की एक और पकड़ मैंने देखी कि आलेख में एकदम शुद्ध वाक्य विन्यास, कर्ता, कर्म, लिंग और वचन यानी व्याकरणों का शुद्ध प्रयोग। कहीं से भी कोई विराम चिह्न आदि कि अशुद्धि न दिखना लेकिन उसके समीप रहने वाला व्यक्ति उसके दैनंदिन प्रयोगों परिचित होता है। इन सबके अलावा भी उपयोग करने वाले उपयोग कर लेते हैं और बच भी जाते हैं।
गजानन माधव मुक्तिबोध अपनी कहानी ‘क्लॉड ईथरली’ में कहते हैं कि “भारत के हर एक नगर में एक-एक अमेरिका है। जाहिर सी बात है कि मुक्तिबोध ने साठ के दशक में ये बात द्वितीय विश्वयुद्ध से हताश, भारतीय स्टेट का पूंजीपतियों से लगाव, आगामी उत्तर आधुनिकता, उत्तर पूंजीवादी संस्कृति और बिखरते हुये ग्रामीण परिवेश को ध्यान में रखकर कहा था। लेकिन आज ठीक उतने ही दशक बाद की यह स्थिति जटिल और भयानक हो गई है। आज मुक्तिबोध होते तो वह कहते भारत के ग्रामीण, नगर और महानगर में रहने वाला हर व्यक्ति अमेरिका है। हर व्यक्ति के नसों में ग्लोबल विलेज, AI विलेज का रुधिर बह रहा है। जिसने रचनात्मक अवस्थितियों का एक धुंधला स्वप्न दिखाकर अकादमिया की नैचुरल बौद्धिकता का क्षरण करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है।
अगर हम कृत्रिम बुद्धिमत्ता को अकादमिक विलेज से दूर रखकर देखें तो इसने मनुष्यता पर एक घोर संकट की तरह मँडराना शुरु कर दिया है। बड़े विकसित राष्ट्रों के बड़े विकसित AI LLM (Large Language Model) जैसे चैट जीपीटी, गूगल जैमिनी, माइक्रोसॉफ्ट कोपायलट और मेटा एआई आदि, सभी एक विभीषिका जाल बन चुके हैं। इनके प्रयोग से जितनी सक्रियता आयी है, जितने कम समय में कार्यों को कर पाने के विकल्प पैदा हुये हैं, उतने ही इसके नकारत्मक प्रभाव लोगों के मध्य उपस्थित हैं। इनसे संबंधित एक डेटा सेंटर बनाने के लिये जितना अधिक पूंजी का निवेश हो रहा है, उतना ही अधिक उस सेंटर के दीर्घ परिधि में मनुष्य के स्वास्थ्य, खान-पान, रहन-सहन एक वाक्य में कहे तो उसके जीवन के सभी आयाम ख़तरे में खड़े दिखेंगे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि यह कृत्रिम त्रासदी जलवायु परिवर्तन का बड़ा हिस्सा निभाएगी। AI की उपयोगिता का यह स्वरूप वास्तविक है। इसकी जाँच होनी चाहिए। जाँच से इतर भी लेखक की अपनी नैतिकताएं होती हैं। ऐसा भी नहीं है कि भारतीय साहित्य और ज्ञान परंपरा की सदियाँ बुद्धिहीन रही हैं। ऐसा भी नहीं है कि यहाँ का वांग्मय धरोहरों पर किसी कृत्रिमता की परत चढ़ी हुई है। ऐसा भी नहीं कि दर्शनकार, उपनिषदकार, पाणिनि, भवभूति, भरतमूनि, कौटिल्य, आर्य भट्ट और विष्णु शर्मा जैसे अन्य सभी मनीषियों ने किसी दूसरे बुद्धि का सहारा लेकर लिखा था। यह भी रचनात्मक शक्तिओं का एक दौर था। आज भी एक दौर है, जहाँ की अधिकतर बुद्धिमत्ता, पूरी तरह से कृत्रिम और बाहरी नकल पर आश्रित है। इस तरह की वैश्विक स्थितियों पर पर बात करने के अभिप्राय को कोई वैश्विक ज्ञान का विरोधी न समझ बैठे। यह स्पष्ट कर देना ठीक होगा कि यहाँ सिर्फ़ AI के झूठे और नकारात्मक प्रयोगों का प्रतिरोध है ना कि वैश्विक ज्ञान का। जिन विकल्पों से विश्व के ज्ञान का रूप हम तक पहुँचता है। उन सभी की जितनी अधिक प्रशंसा की जाये कम होगा, चाहे वह ग्लोबल गूगल आर्काइव्स हों या अंतर्राष्ट्रीय ई-जर्नल्स। विचारों और विषयों के प्रति सहमति–असहमति होना चाहिए न कि पूर्वग्रह के आधार पर विचार किये बिना ख़ारिज करने का दंभ। हम ज्ञान की उपज करने वाले लोगों की पीढ़ी हैं। हमें सचेत होना होगा। वरना हमारी प्राचीन मौलिकता क्षीण हो जायेंगी। हमारी ऐतिहासिक वांग्मय ज्ञान क्रमबद्धता बिखर जायेगी। हम बिखर जायेंगे।



