साहित्य का दायित्व है कि वह हर विचार की पड़ताल समाज और समय के सन्दर्भ में करे। कई बार विरोध अन्धविरोध होता है, कई बार समर्थन अन्धसमर्थन होता है। यह जरूरी नहीं है कि लेखक की बात से सहमत हुआ जाए, पर यह जरूरी है कि बहस होती रहे। प्रचण्ड प्रवीर की नई कहानी हमारे वर्तमान राजनैतिक समझ पर प्रश्न खड़े करती है। क्या गालियों की स्वीकार्यता हमारे समय का सच है? क्या हमारी लोकतंत्र की समझ भीड़तंत्र में बदल चुकी है? आइए पढ़ते हैं, जानकीपुल पर विचारोत्तेजक कहानी – ग्रीन मैंगो मोर- मॉडरेटर
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ग्रीन मैङ्गो मोर
मैँ एक निर्भीक पत्रकार हूँ। मुझे उन लोग मेँ न गिना जाय जो पत्रकार होने के साथ-साथ विचारक, समाज-सुधारक, संस्कृति-विशेषज्ञ, कला-मर्मज्ञ और राजनीतिक विश्लेषक होने का दावा करते हैँ। तथ्य को निःसङ्कोच स्वीकार करना पत्रकार होने का अनिवार्य लक्षण है, भले ही पर्याप्त न हो। जो तथ्य को न स्वीकारे वह राजनेता हो सकता है, कवि हो सकता है, चतुर-चालबाज हो सकता है किन्तु पत्रकार कदापि नहीँ हो सकता। पत्रकारिता का प्राथमिक लक्ष्य सोये हुए लोग को जगाना, जागे हुए लोग को झिझोँड़ना, चलते-फिरते लोग को चौँकाना, किशोरोँ व युवाओँ मेँ अप्रत्याशित आशा का सञ्चार करना और वृद्धोँ मेँ वर्तमान काल के लिए तिरस्कार उत्पन्न करना है।
मैँ ध्यान दिलाना चाहूँगा कि यह विचार मात्र नहीँ है, अपितु तथ्य है। मैँ हर तथ्य से सत्य के निस्सरण और नियमन का दावा नहीँ करता। नीत्शे के उद्घोष – कोई तथ्य नहीँ होता तथा जिसे तथ्य कहते हैँ वह बोध है, व्याख्या है या समझ है – से भी मेरा कोई विरोध नहीँ है। हमारे युग मेँ जब सभी पत्रकार या तो चाटुकारिता मेँ निष्णात हुए या चाकरी मेँ मस्त हुए या कान पकड़ कर संस्थानोँ बाहर कर दिये गये, इस अन्तिम दुर्दशा का कारण मैँ पत्रकारिता के मूल सिद्धान्त से विचलन मेँ देखता हूँ। आज की पत्रकारिता अनिवार्य रूप से पक्षपाती है। समाचार आते हैँ – ‘बहादुर अलाना ने बड़बोले फलाना की बोलती बन्द कर दी’। पक्षपाती समाचार मेँ शुचिता-अशुचिता, शोषक-शोषित का द्वैत स्पष्ट रहता है। पक्षपात सत्य की जटिलताओँ को अपर्याप्त तथ्योँ से ढँकने का प्रयास करता है। यदि पत्रकारिता अपने निष्पक्ष स्वरूप को बनाए रखती और वह यह नहीँ बताती कि अमुक राजनैतिक दल के नेता भ्रष्ट हैँ, बल्कि यह बताती कि अमुक दल के अमुक नेता पर भारतीय न्याय संहिता से इतनी-इतनी धाराओँ के इतने-इतने आरोप लगे हैँ, तब क्या उस स्थिति मेँ श्रोता-दर्शक-पाठक स्वयम् निर्णय नहीँ ले पाते? क्या हम दर्शकोँ-पाठकोँ को मूर्ख समझते हैँ?
मेरे मित्र चिन्मय, जो दो दशकोँ से टीवी चैनल मेँ अनवरत संपादन का काम कर रहे हैँ, उनका मानना था कि दरअसल पत्रकारिता का मौलिक उद्देश्य जागरूकता है, जो कि ज्ञान की शक्ति सम्बन्धित मौलिक अवधारणा से सम्बद्ध है। चिन्मय का मानना है कि तथ्य, ज्ञान के साधारण घटक से परिचय मात्र कराता है। पत्रकारोँ को कर्त्तव्य है कि उस तथ्य का अलङ्करण भूतकाल के अनुसार करे या दूसरे शब्दोँ मेँ स्मृति से परिपुष्ट करे। नवीन तथ्योँ को भूले-बिसरे घटनाओँ-तथ्योँ के आलोक मेँ ही समझा जाय। लेकिन इतने से ही न रुका जाय, बल्कि अधिकांश अनपढ़ और अपने मेँ खोयी जनता, जिनकी अपोहन शक्ति कुन्द है, उनके सामने तात्कालिक तथ्योँ के अपोहन से पक्ष निर्धारित कर परोसने से आपाततः कुन्द तथ्य कुन्दन सत्य मेँ परिवर्तित हो जाता है। जिसे मैँ पक्षपात कह कर बचना चाहता हूँ, चिन्मय उसे सारे जमाने के चलन मानकर ‘वरेण्य मूल्य’ समझाने का प्रयास करते हैँ।
चिन्मय की उपर्युक्त स्पष्ट वैचारिक विलोमता का परिणाम यह है कि वह जमाने के साथ सफलता से चल रहा था। मैँ जमाने के साथ नहीँ चल सका और कई समाचार संस्थानोँ से, समाचार पत्रोँ से धकिया कर निकाल दिया गया। मैँने यूट्यूब चैनल चलाने का भी प्रयास किया, पर वहाँ आमदनी अठ्न्नी और खर्चा रुपैय्या। हर दूसरा जानकार आदमी आपको अपना अनुसरणकर्ता, चेला, दर्शक, श्रोता बनाने को आतुर है। तुम मुझे लाइक करो, मैँ तुम्हेँ सबस्क्राइब करूँगा। मसीहाई भी इतनी सस्ती होगी, हमेँ मालूम न था। हम पे ऐसी भी पड़ेगी, हमेँ मालूम न था।
लौट के बुद्धू घर को आये। अपने पैतृक नगर मेँ लौट कर मैँने स्थानीय चैनल की फटेहाल नौकरी पकड़ ली। हाथी कितना भी बैठे, गधे से ऊँचा ही होता है। कहीँ न कहीँ, किसी ने किसी के पास कामगार की आवश्यकता होती है। अन्धे को क्या चाहिये, दो आँखेँ। मेरे दिमाग मेँ अजब-सा कीड़ा कुलबुला रहा था। मेरी नजर रोजमर्रा की हकीकत – बलात्कार, हत्या, बेवफाई, चोरी, तस्करी – आदि मेँ कदापि नहीँ रही। चूँकि मेरा आदर्श निष्पक्ष बने रहना है, इन घटनाओँ मेँ निष्पक्षता कुछ नहीँ देती। सभी एकमत से बलात्कारी, हत्यारे, बेवफा, चोर, तस्कर आदि के विरुद्ध ही मत रखते हैँ। इसमेँ निष्पक्षता अनिवार्य ही नहीँ पर्याप्त भी है। वहीँ पक्षपात के मौके पर निष्पक्ष बना रहना ही बड़ी चुनौती है।
किसी उस्ताद का कहना था कि सफल पत्रकारिता के लिये पत्रकार मेँ पल-प्रतिपल समाचार की ललक होनी चाहिए। कान खड़े होने चाहिए। यही पत्रकार के होने का अनिवार्य गुण है। अमरीका मेँ पुल्तिजर पुरस्कार कई बार छोटी-मोटी घटनाओँ को प्रकाश लाने पर दे दिया जाता है। मैँने कभी ऐसा मामला न देखा था जैसा कि ‘मेहुल कुमार बनाम सैम डिसिल्वा’ का हुआ। यह भारतीय दण्ड संहिता मेँ चलने वाला ‘अमुक बनाम विमुक’ की तरह लम्बा और ऊबाऊ केस नहीँ था। यह था मीडिया मेँ चलने वाला अभूतपूर्व मुकदमा। इस क्रान्तिकारी घटना के पीछे थे आधुनिक समाज के प्रिय सिद्धान्त – स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व – जो कि फ्रांसिसी क्रान्ति की देन है। इसे अधकचरा कहना या वरेण्य कहना भी पक्षपात होगा, अतः मेरा आग्रह है इनकी मीमांसा की जाय। मीमांसा की संरचना को लेकर आग्रह का प्रारूप पश्चिमी या कहेँ यूनानी है – ‘अनिवार्य कारण’ तथा ‘पर्याप्त कारण’।
स्वतन्त्रता
क्या किसी को तड़प-तड़प कर मर जाने का हक नहीँ है? विधि की दृष्टि से आत्महत्या अपराध है। लेकिन जो यह काम गुजर जाते हैँ उन्हेँ ससम्मान अग्नि के या पृथिवी के हवाले कर दिया जाता है। जो यह काम कर गुजरने मेँ असमर्थ रहते हैँ, उनके लिये ही सांसारिक कठिनाइयाँ है। विधि के अनुसार आत्महत्या का प्रयास भी अपराध है। इतना ही नहीँ आत्महत्या के लिये उकसाना भी अपराध है। महान् कवि गेटे को जीवन भर ‘द सॉरोज़ ऑफ़ यंग वर्दर’ (१७७४) लिखने का अफसोस रहा। यह कहना चाहिए कि तत्कालीन जर्मन कानून की असफलता थी कि उन पर मुकदमा नहीँ चलाया गया। खैर, मैँ आमरण अनशन यानी भूख हड़ताल को भी आत्महत्या का प्रयास समझता हूँ तथा मेरी दृष्टि मेँ ऐसा प्रयास आवश्यक रूप से दण्डनीय है। लेकिन दण्ड की पर्याप्तता पर सदैव सन्देह बना रहता है।
मेरी बात कौन सुनता है?
जब मेहुल कुमार ने नगर के व्यस्त चौक पर आमरण अनशन का बैनर लगाया तब कुछ लोग भागे-भागे इस आशा मेँ आये कि उनके राजनैतिक महत्त्वाकाङ्क्षाओँ को पर लग जाएँगे। बाद मेँ पता चला कि मेहुल कुमार का यह अनशन सैम डिसिल्वा द्वारा उनकी पत्नी सोफिया डिसिल्वा के प्रति अत्याचार के विरोध मेँ किया जा रहा है। मेहुल कुमार यह नहीँ चाहते थे कि किसी तरह का कोई न्यायिक हस्तक्षेप या पुलिसिया कार्रवाई की जाय, बल्कि यह सैम डिसिल्वा के अन्तरात्मा को जगाने हेतु एक पवित्र पुकार थी। यह पुकार सोफिया डिसिल्वा के दिल पर भी दस्तक दे, जो अपने पति के अन्याय के विरुद्ध खड़ी होँ और अपनी बेचारगी, अपनी लाचारी, अपनी बेबसी की मजबूत जन्जीरेँ तोड़ कर ‘स्वतन्त्रता’ को अपना लेँ। साथ ही मेहुल कुमार भी अपनी पत्नी जोर-जुल्म बन्द करके उसे पूरी तरह स्वतन्त्र कर देँ। आमरण अनशन की पवित्रता के लिये उन्होँने बैनर मेँ ‘फ्रान्ज काफ्का’ का पोस्टर लगाया था और खुद को हंगरी से प्रशिक्षित ‘हंगर आर्टिस्ट’ बताया था। मेहुल कुमार का दावा था कि वे जतीन्द्रनाथ दास की तरह ६३ दिनोँ का उपवास कर सकते हैँ।
मैँ निष्पक्ष पत्रकार हूँ। मैँने तथ्योँ की जाँच पड़ताल की। मेरे द्वारा अन्वेषित पूर्णतः निष्पक्ष तथ्य निम्नलिखित थे :–
- सैम डिसिल्वा की पत्नी सोफिया डिसिल्वा बेपनाह हुस्न की मलिका है।
- सोफिया डिसिल्वा चालीस को पहुँचने को है, वहीँ सैम उनसे तीन साल बड़े हैँ।
- एक बेटी की माँ होने पर भी उनके छरहरे बदन, सुनहरे घुँघराले लहराते बाल, तीखी नाक और आहार्य सम्बन्धी सौन्दर्यबोध का मुकाबला दूर-दूर तक नहीँ है।
- सैम डिसिल्वा एक मँझोला व्यापारी हैँ, जिसकी शहर मेँ तीन बरतन-भाण्डे की दुकाने हैँ।
- सैम डिसिल्वा की सालाना आय करोड़ोँ मेँ है पर जहाँ तक सम्भव है, वे टैक्स की अनिवार्य धाँधली करते हैँ।
- लगभग सभी व्यापारी और कॉरपोरेट टैक्स की चोरी करते हैँ।
- कुछ अर्थशास्त्रियोँ का मानना है कि टैक्स की चोरी-धाँधली को अपराध नहीँ कहना चाहिए।
- सैम डिसिल्वा ने कभी अपनी पत्नी या बच्ची पर हाथ उठाया हो या ऊँची आवाज मेँ बात की हो, ऐसी कोई घटना उनके पड़ोसियोँ को नहीँ पता।
- सैम डिसिल्वा के कोई विवाहेतर सम्बन्ध हैँ या नहीँ, इसकी पुष्टि नहीँ की जा सकी है।
- सैम डिसिल्वा और सोफिया डिसिल्वा की आठ वर्षीय पुत्री मेरी डिसिल्वा है। (अतः उन दोनोँ का वैवाहिक जीवन असफल नहीँ हो सकता।)
- सैम डिसिल्वा अपनी पत्नी और बच्ची को साल-दो साल मेँ कहीँ न कहीँ घुमाने अवश्य ले जाते हैँ।
मैँने सैम डिसिल्वा को फोन करके मुलाकात का समय माँगा। जब दुकान पर बैठे-बैठे सैम डिसिल्वा को आन्दोलन का पता चला तो उसे बड़ी हँसी आयी। उसने हँसी मेँ बात उड़ाते हुए कहा, “ग्रीन मैङ्गो मोर! मेहुल कुमार की ये मजाल। करने दो उसको आमरण अनशन!”
मुझे यह देख बेहद आश्चर्य हुआ कि एक नागरिक होने पर भी सैम डिसिल्वा के अन्दर किसी आन्दोलन या आमरण अनशन के प्रति कोई भाव नहीँ उमड़ा। मुझे उसके अलोकतान्त्रिक और उपेक्षापूर्ण रवैय्ये से घोर निराशा हुई। मैँने उससे बहुत से प्रश्न और प्रतिप्रश्न किए। ये सभी तथ्यात्मक रूप से शुद्ध हैँ और निम्नलिखित हैँ:–
प्रश्न: श्रीमान् सैम डिसिल्वा, आप पर यह आरोप लगाया गया है कि आपने अपनी पत्नी सोफिया डिसिल्वा पर अत्याचार किये हैँ?
सैम डिसिल्वा: कौन-सा अत्याचार?
प्रतिप्रश्न: ऐसा प्रतीत होता है आपने सोफिया पर इतने अत्याचार किये हैँ कि आप भूल गये हैँ कि कौन-सा! क्या यह सम्भव है कि आपने पूरे वैवाहिक जीवन मेँ आपने सोफिया पर कोई अत्याचार न किया हो?
सैम डिसिल्वा: सम्भव है। अगर जाने-अनजाने मेँ मुझसे कोई भूल हुई है तो मैँ अपनी पत्नी ‘सोफिया डिसिल्वा’ से दोनोँ हाथ जोड़ कर क्षमा माँगता हूँ।
प्रश्न: बात यहाँ खत्म नहीँ हो जाती। आप भूल रहे हैँ कि यह दो व्यक्तियोँ की बात नहीँ रही, बल्कि समाज की बात है। इसी के लिये श्री मेहुल कुमार आमरण अनशन पर बैठे हैँ। आपको सिलसिलेवार अपनी ज्यादतियोँ का ब्योरा देना होगा। यह आपके तरफ से सोफिया डिसिल्वा के प्रति क्षमा-याचना न हो कर, पुरुषोँ का महिलाओँ के प्रति ‘कन्फेशन’ (अपराध स्वीकार) करना होगा।
सैम डिसिल्वा: आप कैसी उल्टी-सीधी बातेँ कर रहे हैँ? अगर मैँने कोई अत्याचार किया तो क्या सोफिया ने कोई मुझ पर अत्याचार नहीँ किया?
प्रश्न: मुझे आपको समझाना पड़ेगा कि आपकी न्याय की समझ बेहद कम है। जॉन रॉल्स की ‘अ थ्योरी ऑफ जस्टिस’ (१९७१) मेँ यह प्रतिपादित किया है कि समाज की न्यायपूर्ण व्यवस्था हेतु सभी नागरिकोँ को एक ऑरिजनल पोजिशन (मूल स्थान) पर लाना चाहिए। आपकी और सोफिया की बराबरी कदापि नहीँ हो सकती। चूँकि वह स्त्री है अतः वह शोषित है। अतः वह जन्म से ही दबाई-कुचली गयी है। हमेँ आपका ‘अपोलॉजिया’ (आत्मसमर्थन) स्वीकार नहीँ। आपके ‘कन्फेशन’ से कुछ कम पर मेहुल कुमार राजी न होँगे।
सैम डिसिल्वा: आपका दिमाग खराब हो गया है। मेरी पत्नी अमीर घर की पढ़ी-लिखी लड़की है। हमारा प्रेम विवाह हुआ है। हम दोनोँ बहुत खुश हैँ।
प्रश्न: यह तो आप कह रहे हैँ। क्या आपकी पत्नी सोफिया डिसिल्वा भी यह कहती है?
सैम डिसिल्वा: भाड़ मेँ जाइए आप। मेरी पत्नी ऐसे उल-जलूल सवालोँ का जवाब क्योँ देगी। निकलिए आप।
प्रश्न: आप जो भी कह रहे हैँ, वह सब कैमरे पर रिकार्ड हो रहा है। आप को पत्रकारोँ से तमीज से बात करनी चाहिए।
सैम डिसिल्वा (लाल पीला होते हुए): निकल बाहर! एक ग्रीन मैङ्गो मोर के कहने पर दिमाग चाटने चला आया। भाग यहाँ से!
मेरी निष्पक्षता पर किसी भी तरह का प्रश्नचिह्न उठा कर मेरे ब्योरे की गरिमा को न गिराया जाय। यह तथ्य था कि सैम डिसिल्वा ने मेरा अपमान किया था। उक्त घटना के जो श्रोता-पाठक-दर्शक होँगे, वे स्वयम् यह अनुमान लगा सकते हैँ कि यह पूरी पत्रकारिता का अपमान था। आये दिन कोई न कोई बेवजह पत्रकारोँ की शक्ति से चिढ़ कर थप्पड़ मारता है या गालियाँ बकता है। मैँ इसे ‘व्यावासायिक जोखिम’ या प्रोफेशनल हजार्ड कहता हूँ।
निष्पक्षता के नाते मुझे चौक पर बैठे मेहुल कुमार से भी बातचीत करनी पड़ी। उस पूरी बातचीत का निष्पक्ष ब्योरा मैँ दे रहा हूँ:–
प्रश्न: आपने यह आमरण अनशन क्योँ कर रहे हैँ?
मेहुल कुमार: पीछे लगे बैनर मेँ साफ-साफ लिखा है। यह आमरण अनशन सैम डिसिल्वा द्वारा उनकी पत्नी सोफिया डिसिल्वा के प्रति अत्याचार के विरोध मेँ किया जा रहा है।
प्रश्न: जहाँ आज हर कोई रील्स बना कर फेमस हो रहा है, आपने किसी राजनैतिक मुद्दा या साम्प्रदायिक मुद्दा उठाने के बजाय एक व्यक्ति के निजी जीवन के विरुद्ध आन्दोलन करने का क्या मतलब है? अगर आपको लगता है कि श्रीमती सोफिया डिसिल्वा पर कोई अत्याचार हो रहा है तो आप पुलिस मेँ रिपोर्ट क्योँ नहीँ करते?
मेहुल कुमार: कानून क्या कर सकता है? अधिक से अधिक दण्ड या पुरस्कार दे सकता है। मैँ यह अनशन सैम डिसिल्वा की अन्तरात्मा के बदलाव हेतु कर रहा हूँ। यही अहिंसक राजनीति का सच्चा स्वरूप है। व्यक्ति मेँ परिवर्तन ही अभीष्ट है।
प्रश्न: लेकिन सैम डिसिल्वा का कहना है कि वे और उनकी पत्नी दोनोँ ही अपने वैवाहिक जीवन मेँ प्रसन्न हैँ।
मेहुल कुमार: कमाल हैँ आप? क्या कोई अपराधी यूँ ही अपना अपराध स्वीकार करता है? आप यह देखिए कि मेरे आन्दोलन का तरीका पूरी तरह अहिंसक है।
प्रश्न: आपके इस व्यक्तिपरक आन्दोलन मेँ आप अकेले हैँ। इस बारे मेँ आप क्या कहना चाहेँगे?
मेहुल कुमार: जब जनता को मूल समस्या समझ मेँ आएगी तो सभी मेरे साथ हो जाएँगे।
प्रश्न: आपके अनुसार मूल समस्या क्या है?
मेहुल कुमार: मूल समस्या इस बात मेँ है कि सोफिया डिसिल्वा को स्वतन्त्रता नहीँ मिल रही। उन्हेँ चारदीवारियोँ मेँ कैद रखा गया है।
प्रश्न: लेकिन श्रीमती सोफिया क्या स्वतन्त्रता चाहती हैँ?
मेहुल कुमार: उन्हेँ ऐसा ही चाहना चाहिए, क्योँकि स्वतन्त्रता आधारभूत मूल्य है।
प्रश्न: आप ये क्योँ कहते हैँ कि स्वतन्त्रता आधारभूत मूल्य है? क्या जिजिविषा आधारभूत मूल्य नहीँ है?
मेहुल कुमार: स्वामी विवेकानन्द ने ऐसा ही कहा था। हम ऐसा मानते हैँ। हर आदमी अपनी इच्छा से रहना चाहता है, और इस छूट का न मिल पाना ही व्यक्ति के प्रति किया गया मौलिक अपराध है। एक सभ्य समाज मेँ इसकी कोई जगह नहीँ।
प्रश्न: यदि स्वतन्त्रता आधारभूत मूल्य है तो बताइए कि श्रीमती सोफिया डिसिल्वा स्वतन्त्रता का करेँगी क्या?
मेहुल कुमार: ये उनको तय करना होगा।
प्रश्न: अगर उन्होँने सैम डिसिल्वा के साथ रहना तय किया है, उसमेँ आपको क्या आपत्ति है?
मेहुल कुमार: क्योँकि वे स्वतन्त्र नहीँ हैँ। यह उनकी इच्छा के विपरीत है।
प्रश्न: यह आप कैसे जानते हैँ कि यह उनकी इच्छा के विपरीत है।
मेहुल कुमार: मैँ जानता हूँ।
प्रश्न: कैसे?
मेहुल कुमार: समय आने पर इसका खुलासा किया जाएगा।
प्रश्न: किस पर?
मेहुल कुमार: इस क्रान्तिवीर जनता पर जो सैम डिसिल्वा के घर का दरवाजा तोड़ कर सोफिया डिसिल्वा को बाहर ले आएगी। उसे गुलामी के बेड़ियोँ से आजाद कर देगी, तब।
प्रश्न: अगर सोफिया डिसिल्वा ने यह बयान दिया कि वह स्वतन्त्र हैँ तब क्या आप आमरण अनशन तोड़ देँगे।
मेहुल कुमार: हम उनकी भलाई चाहते हैँ, यह प्रारम्भ मेँ ही स्पष्ट कर दिया जा चुका है।
प्रश्न: यह आप बताएँ कि स्वतन्त्रा आधारभूत मूल्य है या साध्य मूल्य है? यदि यह आधारभूत मूल्य है तो स्वतन्त्रता अपने आप मेँ कुछ नहीँ है, बल्कि स्वेच्छाचार है। उस दृष्टि से स्वतन्त्रता अनिवार्य है किन्तु पर्याप्त नहीँ। किन्तु यदि यह साध्य है, तभी स्वतन्त्रता पर्याप्त कही जा सकती है।
मेहुल कुमार: आप भाषा जाल मेँ फँसा कर वाग्विलास करना चाहते हैँ। दरअसल आप जैसे पत्रकार ही जनशत्रु हैँ।
प्रश्न: सैम डिसिल्वा ने आपको ‘ग्रीन मैङ्गो मोर’ कहा है, इस सम्बन्ध मेँ आप क्या कहना चाहेँगे?
मेहुल कुमार: सैम डिसिल्वा ने मोर को कभी ठीक से नहीँ देखा है। मोर ‘ग्रीन’ पङ्ख के साथ-साथ ‘ब्लू’ गरदन वाला भी होता है। हमारे नगर मेँ पाये जाने वाले मोर के ‘ग्रीन’ पङ्खोँ मेँ नैचुरली ब्लू बैकग्राउण्ड पर ग्रीन मैङ्गो की आकृति बनी होती है। अतः हमेँ ‘ग्रीन मैङ्गो मोर’ कहलाने मेँ कोई आपत्ति नहीँ। यह भी सुन लिया जाय कि आने वाले दिनोँ मेँ जनता बताएगी कि केवल मैँ ही नहीँ, नगर के सभी बुद्धिजीवी ‘ग्रीन मैङ्गो मोर’ हैँ। यदि बात स्वतन्त्रता की माँग करने की है, तो हम सभी ‘ग्रीन मैङ्गो मोर’ हैँ।
यह पूरी खबर मैँने दिल्ली बैठे चिन्मय को फोन पर बतायी। खबरेँ कितनी दूर तक जा सकती हैँ, इसका सटीक आकलन कर पाना ही पत्रकार होने का पर्याप्त गुण है। चिन्मय सच्चा पत्रकार था। इसलिये उसने इस खबर मेँ गहरी दिलचस्पी दिखायी। उसने मेरी प्रशंसा की लेकिन वह मेरे इस सवाल पर बहुत चिढ़ा कि मैँ किस तरह से ‘स्वतन्त्रता’ पर प्रश्नचिह्न लगा सकता हूँ। मैँ कहता रहा कि स्वतन्त्रता वस्तुतः मनुष्य की सामाजिक भूमिका मेँ एक मूल्य बन सकता है, किन्तु व्यक्तिनिष्ठ भूमिका मेँ कदापि नहीँ। स्वेच्छाचार ही स्वतन्त्रता का अनिवार्य गुण है, वहीँ हमारे संसार मेँ स्वतन्त्रता का कोई पर्याप्त गुण नहीँ है। इतना ही नहीँ सामाजिक भूमिका मेँ ही स्वतन्त्रता न कभी आधारभूत मूल्य है, न ही कभी साध्य मूल्य है। दोनोँ ही स्थिति मेँ पूर्ण स्वतन्त्रता हेय मानी जाएगी। फिर भी विडम्बना है कि स्वतन्त्रता आधुनिक लोकतन्त्र के मौलिक मूल्य मेँ गिनी जाती है, जबकि स्वतन्त्रता सत्य की सिद्धि हेतु एक अनिवार्यतः सहायक मूल्य है।
यह सुन कर चिन्मय ने अपना सिर ठोँक लिया। मैँ छाती पीटते हुए चिल्ला पड़ा कि यदि स्वतन्त्रता मौलिक मूल्य नहीँ है तो इसका अर्थ यह नहीँ होता कि मैँ दासता या परतन्त्रता का समर्थन करता हूँ।
समानता
आमरण अनशन मेँ पहले पाँच-दस दिनोँ मेँ कोई नहीँ पूछता। वैसे किसी के मर जाने पर भी कोई नहीँ पूछेगा। कितने लोग विना ईलाज के और विना दवा के तड़प के मर जाते हैँ, यदि वे सभी आमरण अनशन का बैनर लगा भी देँ तो क्या कोई उनके आँसू पूछने आएगा। दर्द से मेरे है तुझ को बे-क़रारी हाय हाय, क्या हुई ज़ालिम तिरी ग़फलत-शि`आरी हाय हाय? बात यह है कि जालिम को रुस्वाई का डर लगेगा तो पूछने भी आयेगा। वरना कौन पूछने आएगा? दूसरी बात है अभी तक आमरण अनशन सामाजिक मुद्दा नहीँ बन पाया था कि विपक्ष मेहुल कुमार का साथ दे या फिर कोई सरकार के सामने आँखेँ दिखाये! अभी तक मेहुल कुमार तो सैम डिसिल्वा की अन्तरात्मा की आवाज के लिए अनशन कर रहे थे। भरे चौक पर न कोई उन्हेँ देख रहा था न सुन रहा था। कुछ लोग का कहना था कि मेहुल कुमार बाथरूम जाने के बहाने कोने मेँ कुछ खा-पीकर वापस आकर अनशन पर बैठ रहे हैँ। लेकिन इस मत की पुष्टि न हो सकी इसलिए इसे तथ्य कैसे कहा जाय? चूँकि यह तथ्य नहीँ तो निष्पक्ष पत्रकार रिपोर्ट भी कैसे करे?
मङ्गलवार की शाम को जब मैँ महावीर मन्दिर मेँ लड्डू चढ़ा कर लौट रहा था कि मैँने मेहुल कुमार के बदले हुए बैनर को देखा। बैनर पर लिखा था – ‘ग्रीन मैङ्गो मोर की एक ही पुकार, सैम डिसिल्वा बन्द करे अत्याचार।’
बढ़ी दाढ़ी और अलसायी आँखोँ वाले मेहुल कुमार ने सफेद कुर्ता पायजामा त्याग कर नये जमाने को अपील करने के लिए मैली-कुचैली टी-शर्ट जीन्स पहन ली थी। सिर पर गान्धी टोपी तिरछी टिका रखी थी जिसमेँ लिखा था – ‘ग्रीन मैङ्गो मोर’। देखने वाली बात थी कि दो-चार और व्यक्तियोँ ने भी ऐसी टोपी पहन ली थी। सभी अपने हाथोँ मेँ मोबाइल फोन लेकर रील्स देखने-बनाने मेँ व्यस्त थे। बहुतोँ ने एआई से ‘सोफिया डिसिल्वा’ की मनभावन विडियो बना रखी थी जिसमेँ जन्जीरोँ मेँ जकड़ी कराहती सोफिया अपने घर से बाहर निकल आती और बाहर आते ही उसकी सारी जन्जीरेँ खुल जाती हैँ।
पितृसत्ता, हाय, हाय।
सैम डिसिल्वा हाय, हाय।
मैँ भी ग्रीन मैङ्गो मोर!
एक अठारह साल का लड़का मोर की वेशभूषा पहन कर नृत्य करने मेँ मशगूल था। मेहुल कुमार का आन्दोलन जोर पकड़ रहा था। मैँने वहाँ एकत्रित व्यक्तियोँ से प्रश्न-प्रतिप्रश्न किए। मैँ निष्पक्षता का निर्वाहन करते हुए उन प्रश्नोँ का ब्योरा नीचे दे रहा हूँ: –
प्रश्न: आप यहाँ किसलिए इकट्ठे हैँ?
उत्तर: हम यहाँ समानता के लिये एकत्रित हुए हैँ।
प्रश्न: समानता का अर्थ आप क्या समझते हैँ?
उत्तर: हम यहाँ इन्टरव्यू देने नहीँ आएँ हैँ।
अन्य उत्तर: इसका अर्थ है सभी के पास समान धन हो। अमीर-गरीब न हो।
अन्य उत्तर: समानता का अर्थ है कि सभी के प्रति समान आदर, समान गरिमापूर्ण व्यवहार, समान अवसर प्रदान करना।
अन्य उत्तर: समानता का अर्थ है सभी के पास समान मानसिक या शारीरिक क्षमता न होते हुए भी किसी तरह सांस्थानिक या सामाजिक या विधिपरक भेदभाव न होना।
प्रश्न: यदि आप भेदभाव के विरुद्ध हैँ तो आप ‘गैर-भेदभाव’ या ‘नॉन-डिस्क्रिमिनेशन’ शब्द का प्रयोग क्योँ नहीँ करते?
उत्तर: समानता का अर्थ है असमान क्षमता के बावजूद कम क्षमता वाले को सरल या अधिक अवसर प्रदान करना।
प्रश्न: क्या यह है समानता के नाम पर अन्तर्निहित भेदभाव नहीँ है?
उत्तर: इसे भेदभाव न कह करे ‘सार्थक क्रिया’ कहना चाहिए।
प्रश्न: यह आन्दोलन मेँ किस तरह प्रयुक्त है?
उत्तर: देखिए, हमारे नेता मेहुल कुमार जी तलाकशुदा व्यक्ति हैँ। जीवन मेँ अकेले हैँ। यह समाजसेवी हैँ। इनसे सोफिया जी का दुःखदर्द नहीँ देखा जा रहा है। यह सोफिया जी के दु:ख को समाप्त करने के लिये समर्पित हैँ।
प्रश्न: लेकिन इससे समानता का क्या सम्बन्ध?
उत्तर: सोफिया डिसिल्वा जो अत्यन्त सुन्दर है, क्या वह सभी को समान रूप से उपलब्ध होनी चाहिए या नहीँ?
प्रश्न: यह कैसी बात हुई? क्या सौन्दर्य पाने के लिये कोई मनाही है?
मेहुल कुमार (टोकते हुए): आप भूले जा रहे हैँ कि आप पितृसत्ता के पैरोकार हैँ। स्त्रियोँ की यौनिकता को पति की सम्पत्ति मानना या सड़े-गले रीति-रिवाजोँ के अधीन रखना ही पितृसत्ता है।
प्रश्न: लेकिन यह आप कैसे कह सकते हैँ कि सोफिया डिसिल्वा की यौनिकता पर सैम डिसिल्वा ने कोई बन्धन लगा रखा है?
मेहुल कुमार: सेक्स एक स्वच्छन्द क्रिया होती है। यह सारा नगर जानता है कि सोफिया डिसिल्वा ने सैम के अलावा किसी और को नहीँ देखा।
प्रश्न: यह सोफिया की प्रेमनिष्ठा और पति परायणता कही जा सकती है। वह ‘सैम’ मेँ ‘पर’ नहीँ देखती।
मेहुल कुमार (उत्तेजित हो कर): पितृसत्ता की आड़ मेँ आप यह देख नहीँ पा रहे हैँ कि इन मूल्योँ का कोई अर्थ नहीँ। मनुष्य का पशु से विकसित होने के क्रम मेँ सभी मूल्य वस्तुतः सम्पत्ति के अधिकार और स्त्रियोँ को भेड़-बकरी की तरह सम्पत्ति मानने से बनी हैँ। इसके लिये मैँ आपको पश्चिम की पच्चीस किताबेँ गिना सकता हूँ। आप पहले जाकर उनको पढ़िए तब हमसे बात करने आइए।
प्रतिप्रश्न: क्या आप मेरी द्वारा सुझाये गये भारतीय ग्रन्थोँ को पढ़ेँगे?
मेहुल कुमार: आप यह तय करने वाले कौन पैदा हो गये हैँ कि मैँ क्या पढूँ और क्या न पढूँ? संविधान सभी को स्वतन्त्रता और समानता की गारण्टी देता है। आप खुद को ज्यादा पढ़ा-लिखा जता कर हमारी समानता को कम करना चाहते हैँ। है कि नहीँ?
प्रश्न: मैँ केवल प्रश्न कर रहा हूँ। बहरहाल एक वाक्य मेँ आपकी माँग क्या है?
मेहुल कुमार: सोफिया डिसिल्वा का सान्निध्य इन नगर मेँ सभी को समान रूप से उपलब्ध होँ।
प्रश्न: ऐसा क्योँ?
मेहुल कुमार: यह समानता की माँग है।
प्रश्न: क्या इसके लिए आप जोर-जबरदस्ती करेँगे?
मेहुल कुमार: यह माँग अब सैम डिसिल्वा की अन्तरात्मा को जगाने के पुकार तक नहीँ रही। समानता की यह पुकार अब जन आन्दोलन मेँ बदल रही है। देखिए, हमारी इस माँग का समर्थन अतीत का गुणगान करने वाले राष्ट्रवादी भी करेँगे क्योँकि भारत मेँ नगरवधुओँ की प्राचीन परम्परा थी। आम्रपाली ने नगरवधू होकर भी गौतम बुद्ध को अपने सङ्घ मेँ स्त्रियोँ को प्रवेश दिलाने पर विवश कर दिया। क्या कारण हो सकता है कि आज नगरवधुएँ न होँ? हमारी इस माँग का वामपन्थी यदि समर्थन न करेँ तो वह वामपन्थी नहीँ हो सकते क्योँकि वे पितृसत्ता, स्त्री यौनिकता, समानता और अधिक से अधिक भोग के लिए अधिकार सुनिश्चित करना चाहते हैँ। यदि पक्ष और विपक्ष मेँ एकता है तो आप कौन होते हैँ सवाल करने वाले?
प्रश्न: आप मीडिया के माध्यम से सैम डिसिल्वा को क्या सन्देश देना चाहेँगे?
मेहुल कुमार (कैमरे की तरफ देखते हुए): सैम डिसिल्वा से मेरा यह कहना है कि यह ‘ग्रीन मैङ्गो मोर’ आन्दोलन समाज की करुण पुकार मेँ बदल चुका है। उनका अपनी पत्नी पर शासन करने के लिए कोई नैतिक अधिकार नहीँ बच गया है। उन्हेँ शीघ्रताशीघ्र सोफिया डिसिल्वा को यहाँ सुरक्षित पहुँचा देना चाहिए।
इस प्रश्नोत्तरी पर विचार करते हुए मैँने चिन्मय से उसके विचार पूछे। चिन्मय का कहना था कि मैँ चीजोँ को कम समझता हूँ। यदि समानता को बड़े-बड़े विद्वान अत्यन्त महत्त्व देते हैँ, फिर इस प्रश्नचिह्न लगाना ही मूर्खता है। मैँने इतना ही कहा कि मैँ असमानता का पोषक नहीँ हूँ। मेरा निवेदन मात्र इतना-सा है कि समानता के नाम पर बन्दर-बाँट न हो। समानता को मूल्य मानने का अनिवार्य गुण अक्षमता को अस्वीकार करने का कायर प्रयास है और पर्याप्त गुण अधिकारोँ की विकल याचना है।
मैँने लोकल चैनल के हवाले यह फुटेज की। शाम मेँ चिन्मय ने मुझे फोन कर के बताया कि कई विदेशी मीडिया इस घटनाक्रम मेँ असाधारण दिलचस्पी लेने लगे हैँ। यह मामला ईसाई अल्पसङ्ख्यक से जुड़ा है, इसलिए वहाँ विचारधारा मेँ मतभेद प्रकट हो चुका है। एक धड़ा इसे ईसाई अल्पसङ्ख्योँ पर अत्याचार बता रहा है, दूसरा धड़ा इसे लोकतन्त्र की अभिव्यक्ति बताकर समर्थन कर रहा है। विचारोँ मेँ कोई समानता न रही। चूँकि मामला बहुत बढ़ गया है वह स्वयम् हवाई जहाज पकड़ कर मुझसे मिलने आयेगा। अगला कदम होगा कि सोफिया डिसिल्वा का इन्टरव्यू लेना।
बन्धुत्व
चिन्मय जब अगली सुबह मेरे साथ चाय पी रहा था, तब मैँने उससे कहा, “यार चिन्मय, आज से पन्द्रह साल पहले मैँने एक सच्ची कहानी सुनी थी। मेरे एक दोस्त ने सुनायी थी कि उसके दोस्त भूषण के साथ ऐसा हुआ। कहानी ऐसी अजीब है कि मैँ इस पर न यकीन कर पाया और न ही इसे भुला पाया। इस कहानी ने मुझ पर ऐसा असर किया है कि मैँ क्या बताऊँ।”
चिन्मय के पूछने पर मैँने बताया, “भूषण एक आइटी कम्पनी मेँ काम करता था। उसने अपने साथ कम्पनी ने काम करने वाली लड़की से प्रेम-विवाह किया। विवाह के छह महीने बाद दोनोँ को ‘ऑनसाइट’ काम से तीस दिन के लिए सऊदी अरब जाना पड़ा। वहाँ जिस कम्पनी के लिए काम करते थे, उसी मेँ काम करने वाले सफेद चोगा पहनने वाले एक स्थानीय शेख से उसकी दोस्ती हो गयी। शेख बहुत अच्छे से बातेँ करता था। जब जाने का समय आया, तब शेख ने उन दोनोँ को अपने घर बुलाया। दोनोँ पति-पत्नी शेख के व्यवहार से बड़े प्रसन्न थे। जाने से ठीक एक दिन पहल भाईचारे मेँ दोनोँ वहाँ पहुँचे। जैसे उसके घर पहुँचे, शेख की बीवी ने भूषण की पत्नी घर के अन्दर बुला लिया। वह चली गयी। बैठक मेँ मर्दोँ के खाने का दौर चला। खाने के बाद भूषण ने जाने की इजाजत माँगी तब शेख बोला कि ठीक है भाई, अब तुम जाओ। भूषण ने कहा कि मेरी पत्नी को बुला दीजिए। शेख अचम्भे से बोला, ‘तुम तो अकेले आये थे। तुम्हारी पत्नी तो यहाँ आयी ही नहीँ थी।’ भूषण के हाथ-पाँव फूल गये। उसने बड़ी मिन्नतेँ की। लेकिन शेख ने उसके खुदा का वास्ता दिया। अपनी भाईचारे की कसम खायी और यकीन दिलाता रहा कि भूषण वहाँ अकेला ही आया था। भूषण ने घर की तलाशी लेनी चाही, तब शेख ने कहा कि भाईचारे की सीमा होती है। बुरकानशीन औरतोँ के कमरे मेँ जाने थोड़े दिया जा सकता है। भूषण ने बाहर आकर सऊदी अरब पुलिस मेँ रिपोर्ट लिखवायी। वहाँ के पुलिस ने रिपोर्ट उसकी पत्नी की गुमशुदगी की लिखी। पुलिस का कहना था कि उसकी पत्नी आखिरी बार होटल से बाहर निकलती हुई देखी गयी थी। शक के दायरे मेँ भूषण भी आता है। जो कुछ वह कह रहा है वह संदिग्ध है।”
चिन्मय ने पूछा, “फिर क्या हुआ?”
मैँने बताया, “जब मैँने यह कहानी सुनी थी, तब तक उसकी पत्नी नहीँ मिली थी। भूषण को भारत आना पड़ा था। उसके मित्रोँ ने उसे यह दिलासा दिया कि शेख भाईचारे वाला आदमी थी। जरूर उसकी पत्नी ही शेख के साथ रहना चाहती होगी, वरना क्या वह शोर नहीँ मचाती? जो लड़की स्वतन्त्र होकर प्रेम-विवाह कर सकती है, जो समानता के लिए पति के साथ हर कदम से कदम मिला कर चलती हो, क्या वह बन्धुत्व को नहीँ पहचान सकी होगी? निश्चय ही पहचानती होगी। आज की नारी को कोई दबा के रख सकता है क्या? अगर कोई यह सोचता है कि उसकी पत्नी के साथ कुछ अनुचित या इच्छा के विरुद्ध हुआ होगा, निश्चय ही वह पितृसत्ता का पोषक होगा।”
चिन्मय ने कहा, “इस कहानी पर यकीन नहीँ किया जा सकता। वैसे भी न तुम कभी भूषण से मिले न ही तुमने मिलने की कोशिश की। यह कहानी सऊदी अरब की छवि बदनाम करने की है। वैसे एक जरूरी बात का खुलासा करना चाहता हूँ, लेकिन तुम कहीँ यह न समझो कि मैँ साम्प्रदायिक हूँ। मेहुल कुमार का मूल नाम कुछ और था। वह दूसरे अल्पसङ्ख्यक समुदाय से सम्बन्धित है। यह शोहदा किसी समय सोफिया के साथ कॉलेज मेँ पढ़ता था। सोफिया उसे तब न मिली। यहाँ दो सम्भावनाएँ हो सकती हैँ। पहली यह कि मेहुल कुमार सोफिया से बदला लेना चाहता है। वह अपनी पुरानी बेइज्जती अभी तक न भूला होगा।”
“ग्रीन मैङ्गो मोर कहीँ का। दूसरी सम्भावना?”
“दूसरी यह कि हो सकता है सोफिया भी इसमेँ मिली हुई हो। इतने सालोँ से वह सैम डिसिल्वा के साथ रहते-रहते बोर हो गयी होगी।”
“तुम्हारी पास क्या यह तीसरी सम्भावना नहीँ है कि मेहुल कुमार सच मेँ सोफिया के अधिकारोँ के लिए चिन्तित है?” मैँने तन्ज किया।
“इसकी सम्भावना शून्य है। अधिकार की बात करना दरअसल जनता के बदहजमी निवारण के लिये बना फुटपथिया चूरण चटाना है। हाथोँ मेँ झुनझुना पकड़ना है। अधिकारोँ के आड़ मेँ सत्ता परिवर्तन के बड़े खेल होते हैँ। हाँ, इस खेल मेँ सभी मोहरे बन जाते हैँ। आपसी वैमनस्य से, खुन्नस से, लालच से, ईर्ष्या से, क्रोध से। यदि कोई वस्तुतः अधिकार की बात करता है तो निश्चय ही वह अत्यन्त मूर्ख है या दिवास्वप्नी है। राजनीति का आधार सार्वजनिक न हो कर समूहगत होता है। ऐसे समूह की संरचना ही बन्धुत्व है। ईसाइयोँ के लिये ईसाइयोँ से भाईचारा है। मुसलमानोँ का मुसलमानोँ के लिये भाईचारा है। जातिवादियोँ के लिये यह बन्धुत्व उनकी जाति तक सीमित है। राजनैतिक दल का बन्धुत्व समान विचारधारा के लोग की स्वार्थ सिद्धि के सहयोग मेँ निहित है। राजनैतिक व्यवस्था मेँ यह परिकल्पना की जाती है कि समूहगत चुना प्रतिनिधि सर्वजनोँ के प्रति कर्तव्य निभाएगा। विधि और प्रशासनिक व्यवस्था का दायित्व यह हो जाता है कि राज्य सम्मत सहायता के प्रति ‘अधिकार बोध’ पैदा करे। इस बोध का प्रयोग शासन के लिए किया जाना आवश्यक है। वरना मनुष्य तो कई-कई दिन उपवास कर के, सीमित संसाधनोँ मे जी कर, थोड़ा पा कर, नाच-गा कर लाखोँ साल से जीता आया है। ऐसा भी कोई प्रमाण नहीँ है कि हर युग मेँ मनुष्य अधिकार ही माँगता आया है। अधिक से अधिक न्याय की माँग की जाती है जब समाज की अवधारणा प्रकट होती है। परिस्थिति जन्य न्याय समर्थित पुरस्कार को जन्मजात ‘अधिकार’ के नाम की गारण्टी पहनाई गयी है। मनुष्य के जीने के लिए, उसके सुखित्व के लिए, जो बन्धुत्व काम आता है उसका उल्लेख करने या छोड़ देने से कोई अन्तर नहीँ पड़ता। अगर आपका मतलब विश्वबन्धुत्व से है तो दुनिया के समस्त प्राणी, पशु-पक्षी-मानव, सभी आपके करुणा के और न्याय के पात्र हैँ। ऐसा करते ही बन्धुत्व की धारणा की प्रासङ्गिकता समाप्त हो जाती है। अर्थव्यवस्था भाईचारे से नहीँ अपितु लाभ से चलती है। सवाल यह उठता है कि मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन मेँ जो सहज है, उसे सामाजिक जीवन मेँ मूल्यात्मक क्योँ बनाया गया है? उल्लू सीधा करने के लिए।”
“तुम यह कहना चाहते हो कि ग्रीन मैङ्गो मोर का आन्दोलन स्वार्थपरक है?” मैँने पूछा।
“सबसे बड़ी बात यह है कि स्वार्थ का अर्थ बदल दिया गया है। जहाँ स्वार्थ का मतलब दूसरे की असुविधा या हानि पर अपना फायदा था, अब उसका मतलब केवल नीतिसम्मत ‘अपना फायदा’ कर दिया गया है। अब यह निश्चित है कि ग्रीन मैङ्गो मोर आन्दोलन की सफलता और असफलता सोफिया डिसिल्वा के निर्णय पर करेगी।”
“मुझे नहीँ लगता है अब सोफिया डिसिल्वा के हाँ या ना कहने का कोई फरक पड़ेगा।” मैँने मायूसी से कहा।
“क्योँ?”
“क्योँकि जब से तुम्हारे सौजन्य से यह मामला राष्ट्रीय मीडिया तक पहुँचा है तब से इसमेँ लोग जुड़ते जा रहे हैँ। मेरा अनुमान है कि आज बीस हजार लोग की रैली चौक बाजार से सैम डिसिल्वा के घर तक मार्च करेगी। अभी-अभी मोबाइल पर खबर मिली है कि सुबह-सुबह सोफिया डिसिल्वा की हजारोँ तस्वीर छापी गयी है। यहाँ के मजिस्ट्रेट ने पुलिस की एक्सट्रा फोर्स मँगायी है।”
सुन कर चिन्मय के होशोहवास उड़ गये। “मामला सङ्गीन हो सकता है। हमेँ जल्दी चलना चाहिए।”
बाइक पर सवार हो कर जब तक हम चौक पहुँचे, तब तक वहाँ की हवा बदल चुकी थी। हजारोँ की पगलायी भीड़ हाथोँ मेँ लाठी-डण्डा लिये ‘सैम डिसिल्वा हाय-हाय’ के नारे लगा रही थी। मैँने चिन्मय को लेकर फौरन वहाँ से सैम डिसिल्वा की दुकान की तरफ भागा। लेकिन वहाँ पहुँच कर मैँने देखा किस तरह कुछ लोग ने इकट्ठे होकर भाईचारे मेँ दुकान का ताला तोड़ दिया और वहाँ से हँसते हुए बर्तन-भाण्डे लिये भागे जा रहे हैँ।
“ग्रीन मैङ्गो मोर।” मेरे मुँह से निकला। चिन्मय को लिये-लिये मैँ अपनी मोटरबाइक से शहर से दूर उस शान्त कोने मेँ पहुँचा जहाँ सैम डिसिल्वा का घर था। उसके आस-पड़ोस मेँ ऐसी कोई हलचल न थी। मैँ सिर पर पाँव रख जबरन उसके फूलोँ भरे अहाते को पार करते हुए बेतहाशा उसका दरवाजा खटखटाने लगा।
सैम डिसिल्वा ने बेफिक्री से दरवाजा खोला। चिन्मय और मैँने उखड़ती साँसोँ मेँ बताया कि खतरा है। उन्हेँ फौरन यहाँ से भागना चाहिए। भले ही वह मेरी मोटरबाइक ले जाएँ। तभी सोफिया डिसिल्वा बैठक मेँ आयी। सैम डिसिल्वा ने अपनी बीवी का परिचय कराते हुए कहा, “आप नाहक डर रहे हैँ। यहाँ के लोग मेरे भाई-बन्धु हैँ। वे हमारा कुछ बुरा नहीँ करेँगे। सोफिया सबको समझा देगी। ग्रीन मैङ्गो मोर की गलतफहमी दूर कर देगी।” चिन्मय ने हड़बड़ी मेँ समझाया, “आपको समझ नहीँ आ रहा है कि आपकी दुकान लूटी जा चुकी है। आपको जान प्यारी है या नहीँ?”
नजाकत उनको समझ मेँ आयी। सैम डिसिल्वा, सोफिया और अपनी बच्ची को लिये-लिये बाहर दौड़े। मैँने उन्हेँ अपनी मोटरबाइक की चाभी थमायी और पटना की ओर जाने वाले रास्ते की तरफ भागने को कहा।
सैम और उनका परिवार के जाने के बीस मिनट बाद चिन्मय और मैँ किसी तरह घर मेँ ताला लगाकर बाहर खड़े थे। मैँने कहा, “सारी गलती मेरी है। मैँने इस मामले को इतना बढ़ा दिया कि बन्धुत्व का प्रदर्शन होने लगा है। याद करो रावण ने शूर्पणखा के प्रति बन्धुत्व दिखाते हुए सीता माता का अपहरण किया था। पर-स्त्री हरण त्रेता युग से चला आ रहा है।” चिन्मय ने जोड़ा, “योगवासिष्ठ मेँ काकभुशुण्डी का कहना है कि उसने कई युगोँ मेँ कई रामायण देखे। अनेक बार ऐसा हुआ कि राम-रावण युद्ध मेँ राम की हार हुई। मुझे लगता है राम की लङ्का विजय कपोल कल्पना है, ठीक वैसे ही जैसे पृथ्वीराज रासो मेँ किया गया, असहायोँ को दिलासा मात्र देने के लिये।” तब तक मन्थर गति से हुङ्कार करती भीड़ सामने सड़क तक आ गयी और हम असहाय से हो गये। चिन्मय ने बहादुरी दिखाते हुए उमड़ती भीड़ सम्बोधित किया कि हम दोनोँ पत्रकार दिल्ली से खबर लेने आये हैँ लेकिन लगता है सैम डिसिल्वा आज तड़के से ही घर पर नहीँ हैँ।
भीड़ को सैम डिसिल्वा से बहुत ज्यादा मतलब शायद नहीँ था। उनके पास बकायदा शोर करने वाला डीजे था और नाचने वाले ग्रामीण किशोर लड़के। वे सोफिया डिसिल्वा की आदमकद तस्वीर के कई वर्जित क्षेत्रोँ पर हाथ फेर-फेर कर, सोफिया का नाम ले-लेकर अश्लील गाने गा रहे थे। मेहुल कुमार चूँकि अनशन पर थे, इसलिए मेरे कन्धे पर हाथ रख कर शान्ति से बोले, “हमारा वास्तविक नारा है – स्वतन्त्रता, समानता, बन्धुत्व या मौत। बन्धुत्व के नाम पर गाँव-देहात से आये भाइयोँ की इतनी भीड़ इकट्ठी हुई है। आप पत्रकार भी समझ लेँ कि यदि आपको हमारा भाईचारा पसन्द नहीँ तो आपको जीने का हक नहीँ।”
मैँ समझ गया कि भीड़ इकट्ठा करना बन्धुत्व का अनिवार्य गुण है और बल-प्रदर्शन करना बन्धुत्व का पर्याप्त गुण है।
मौत
सन् १७९३ मेँ फ्रांसिसी क्रान्ति का नारा था – स्वतन्त्रता, समानता, बन्धुत्व या मौत। मुझे भी अनचाहे ही चौथे घटक के बारे मेँ बयान करना पड़ रहा है। मैँ निष्पक्ष पत्रकार हूँ। मैँने तथ्योँ की जाँच पड़ताल की। मेरे द्वारा अन्वेषित पूर्णतः निष्पक्ष तथ्य निम्नलिखित थे: –
- सैम डिसिल्वा, उनकी पत्नी सोफिया डिसिल्वा और बेटी मेरी डिसिल्वा नगर से दूर पटना जाने वाली सड़क के एक किनारे मृत पाये गये।
- कुछ प्रत्यक्षदर्शियोँ का दावा है कि हड़बड़ी मेँ उनकी मोटरबाइक ट्रक से टकरा गयी। उनका यह भी कहना है कि इस दुर्घटना मेँ ट्रकवाला निर्दोष था। लेकिन अभी तक वारदात के समय के आसपास किसी ट्रक या ट्रकवाले की कोई विडियो फुटेज नहीँ मिल सकी है।
- सोफिया की लाश के कपड़े फटे हुए थे और वह लगभग निर्वस्त्र थी। वहीँ सैम डिसिल्वा और मेरी डिसिल्वा का माथा फटा पाया गया।
- पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार सोफिया डिसिल्वा के आन्तरिक अङ्गोँ मेँ चोट थी।
- उसी रिपोर्ट के अनुसार सोफिया डिसिल्वा की मृत देह के साथ बहुतोँ ने यौनाचार किया। किन्तु इस तथ्य की किसी प्रत्यक्षदर्शी ने चाक्षुष प्रमाण से पुष्टि नहीँ की।
- नगर के युवा नेता मेहुल कुमार ने दम्पती की असामयिक मृत्यु पर शोक प्रकट किया है तथा मृतकोँ की आत्मा की शान्ति के लिये एक दिन का साङ्केतिक मौन रखने जा रहे हैँ।
- ग्रीन मैङ्गो मोर आन्दोलन से पितृसत्ता के विरोध मेँ ‘श्रीमान् मेहुल कुमार’ राष्ट्रीय स्तर के सशक्त युवा नेता बनकर उभरे हैँ।
- अमरीकी विश्वविद्यालयोँ मेँ ‘ग्रीन मैङ्गो मोर’ आन्दोलन के विचारोँ की मौलिकता पर ‘केस स्टडी’ की जा रही है।
- चिन्मय को ‘ग्रीन मैङ्गो मोर आन्दोलन’ की सटीक रिपोर्टिङ् करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत किये जाने की अनुशंसा की गयी है।
आखिरी पङ्क्ति तथ्य नहीँ सङ्कल्प है कि पत्रकार के रूप मेँ भले ही निष्पक्ष रहूँ किन्तु नागरिक की भूमिका मेँ मैँ पक्ष लेता हूँ। यह मेरी अन्तिम रिपोर्ट थी, अब मैँ मीडिया के लिए काम न कर सकूँगा। अपने आदर्श से इतर भी रह कर मैँ इस दुर्घटना को रोक नहीँ सकता था, बल्कि एक वाहियात व्यक्तिगत एजेण्डे को विकराल सामाजिक समस्या बना देने का दोषी मैँ खुद को मानने लगा हूँ। ग्रीन मैङ्गो मोर आन्दोलन के बाद अब व्यावसायिक जीवन मेँ निष्पक्षता का निर्वाह मुझसे सम्भव नहीँ है। अतः बदली भूमिका मेँ मुझे सामान्य नागरिक बनकर समाज मेँ बसना होगा। नागरिकता के अनिवार्य गुण को चरितार्थ करने हेतु मैँ समय-समय पर वाद-विवाद करूँगा। चीखूँगा कि स्वतन्त्रता, समानता और बन्धुत्व वस्तुतः प्रज्ञा की असामयिक मृत्यु का मार्ग है। इसके विरुद्ध लड़ने के लिये मैँ केवल सत्य का सहारा लूँगा और निश्चित ही मारा जाऊँगा। सत्य की रक्षा करते-करते मर जाना ही नागरिक होने का पर्याप्त गुण है। यही मेरी नियति है।
इति श्री
(भाद्रपद पूर्णिमा, संवत् २०८३)
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प्रचण्ड प्रवीर की अब तक उन्नीस पुस्तकेँ प्रकाशित हैँ। सन् २०२६ मेँ उनकी सात पुस्तकेँ प्रकाशित हुई हैँ – १. वर्णोच्चार विधान – भारतीय ध्वनितत्त्वशास्त्र मेँ वर्णविलास २. ऋतम्भरा – उपनिषद् आख्यायिका मञ्जरी (उपनिषदोँ पर आधारित कहानियाँ) ३. कोमल ऋषभ (लघु कथा सङ्ग्रह) ४. कोमल गान्धार (व्यङ्ग्य सङ्कलन) ५. कल की बात: मध्यम (लघु कथा सङ्ग्रह) ६. तीव्र मध्यम (दर्शन और संस्कृति चिन्तन) ७. स्वर्ण-झनक (आलोचना – अम्बुज पाण्डेय के साथ सह-लेखन मेँ)।
वेबसाइट: www.prachandpraveer.com



