अनुवाद में क्या-क्या छूट जाता है: कोरियाई साहित्य के बहाने

आज अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस है। अनुवाद ने साहित्यिक परिदृश्य को बदल कर रख दिया है। अनुवाद के इसी बदले परिदृश्य को लेकर, विशेषकर कोरियाई साहित्य और अनुवाद के परिदृश्य को लेकर यह लेख लिखा है रोहिणी कुमारी ने। रोहिणी ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से कोरियाई भाषा में पीएचडी किया और अनुवाद उनकी विशेषज्ञता है- मॉडरेटर 

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पिछले कुछ सालों में दुनिया की दिलचस्पी उन भाषाओं के साहित्य में भी बढ़ी है, जिन्हें पहले मुख्यधारा में बहुत कम जगह मिलती थी। चीनी, कोरियाई, अरबी और तुर्की जैसी भाषाओं की किताबें अब पहले से अधिक अनूदित और पढ़ी जा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों ने भी इस साहित्य को नए पाठकों तक पहुँचाया है।

इसका सबसे चर्चित उदाहरण दक्षिण कोरियाई लेखिका हान कांग हैं। उनके उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ को 2016 में मैन बुकर इंटरनेशनल पुरस्कार मिला था। यहाँ गौर करने वाली बात यह है कि हान  कांग की इस किताब को यह पुरस्कार इसके मूल और अनुवाद दोनों के लिए दिया गया है। डेबोराह स्मिथ को ‘वेजिटेरियन’ के अनुवाद के लिए मिलने वाले पुरस्कार की खबर के बाद अंतर्राष्ट्रीय साहित्य जगत में अनुवाद की गुणवत्ता को लेकर बहस फिर तेज़ हो गई। जहाँ इस अनुवाद की खूब सराहना हुई, वहीं इसकी स्वतंत्रता को लेकर सवाल भी उठे। कुछ आलोचकों ने इसे मूल से बहुत दूर बताया, तो कुछ ने इसे लगभग एक नई कृति की तरह देखा।

“द गार्जियन” ने इस अनुवाद को “(मिस) ट्रांसलेशन” कहकर इसकी आलोचना की थी। आलोचकों के एक समूह ने ‘द वेजिटेरियन’ के अंग्रेज़ी अनुवाद को लगभग एक नई कृति बताया। इसके जवाब में डेबोराह स्मिथ का तर्क था कि कोई भी अनुवाद पूरी तरह शाब्दिक नहीं हो सकता। दो भाषाओं का व्याकरण, शब्द-संसार और विराम-चिह्न तक एक जैसे नहीं होते; इसलिए हर अनुवाद में कुछ-न-कुछ रचनात्मकता शामिल होती है। इन सारी बहसों के बीच लेखिका हान कांग ने अपने उपन्यास के अंग्रेजी अनुवाद को स्वीकार किया और डेबोराह स्मिथ के साथ खड़ी रहीं। इस विवाद के बावजूद एक महत्त्वपूर्ण बात हुई, अनुवादक को मूल लेखक के साथ बराबर का सम्मान मिला। इसने साहित्यिक अनुवाद को देखने का नज़रिया बदल दिया। हान कांग की साहित्यिक यात्रा का अगला बड़ा पड़ाव 2024 में आया, जब उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। इस सम्मान ने न केवल उनकी वैश्विक पहचान को नई ऊँचाई दी, बल्कि कोरियाई साहित्य की ओर दुनिया का ध्यान भी पहले से अधिक खींचा।

इसी तरह हिंदी में अगर विश्व साहित्य की उपलब्धता पर बात करें तो यह सच्चाई है कि पिछले दशक में भारत में हिंदी भाषा में बड़े पैमाने पर अनुवाद हुए हैं। हिंदी के बहुत-से पाठक विश्व साहित्य को अपनी भाषा में पढ़ना चाहते हैं। प्रकाशकों ने भी इस बढ़ती हुई रुचि को पहचाना है। पिछले तीन दशकों में हिंदी में अलग-अलग विषयों की अनूदित किताबों का बाज़ार भी तेज़ी से बढ़ा है।

हिंदी में अनुवाद अब केवल साहित्य तक सीमित नहीं है। तकनीक, इतिहास, अर्थशास्त्र, आत्मकथा और लोकप्रिय ज्ञान की किताबें भी बड़ी संख्या में हिंदी में आ रही हैं। पिछले दिनों हिंदी में अनुवाद की गई किताबों में माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नडेला द्वारा लिखित तकनीक आधारित किताब “हिट रिफ्रेश”,  रघुराम राजन की अर्थशास्त्र पर लिखी गई किताब “आई डू व्हाट आई डू” शामिल है। युवाल नोआह हरारी की किताब “सेपियंस”, अमेरिका की भूतपूर्व प्रथम महिला मिशेल ओबामा की आत्मकथा “बिकमिंग” का हिंदी अनुवाद सालों भर चर्चा में बना रहा और पाठकों ने इसे हाथों-हाथ लिया। ज़रूरी नहीं है कि ये अनुवाद केवल अंग्रेज़ी भाषा की किताबों के किए गए हों, बल्कि अंग्रेज़ी के माध्यम से दूसरी योरोपीय और एशियाई भाषाओं की अनेक महत्वपूर्ण किताबों के अनुवाद भी हिंदी में हुए हैं, कुछ अनुवाद मूल भाषाओं से भी हुए हैं, लेकिन उनकी संख्या कम है।

मूल भाषा से किए गए अनुवादों के कुछ उल्लेखनीय उदाहरण भी हैं। आलोक राय ने कोरियाई उपन्यास ‘ख्वांगजांग’ का हिंदी अनुवाद ‘रंगमंच’ नाम से किया, जबकि सोन्या सुरभि गुप्ता ने मार्केज के उपन्यास One Hundred Years of Solitude का स्पेनिश से सीधा हिंदी अनुवाद ‘एकांत के सौ वर्ष’ नाम से किया।

फ्रेंच, स्पेनिश और कोरियाई जैसी भाषाओं से सीधे हिंदी में हुए अनुवादों के आधार पर कहा जा सकता है कि अनुवादक का मूल भाषा को जानना जितना ज़रूरी है, उतनी ही गहरी पकड़ उस भाषा पर भी होनी चाहिए जिसमें वह अनुवाद कर रहा है।

कई अनुवाद मूल के अर्थ को बचा लेते हैं, लेकिन हिंदी में सहज नहीं हो पाते। पाठक को बार-बार महसूस होता है कि वह मूल रचना नहीं, किसी दूसरी भाषा की बनावट पढ़ रहा है। जैसे 2014 के नोबेल पुरस्कार विजेता पाट्रिक मोदियानो के अंतर्राष्ट्रीय बेस्टसेलर उपन्यास “So You Don’t Get Lost in the Neighbourhood” का हिंदी अनुवाद “कहीं तुम भटक न जाओ” के नाम से किया गया है। इस उपन्यास को पढ़ते हुए कई बार ऐसा महसूस होता है जैसे अनुवादक ने भावानुवाद के बजाय शाब्दिक अनुवाद को प्राथमिकता दी है।“निष्कपट”, “टंकित” और “वाहिनी” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो किताब की सहजता और पठनीयता को प्रभावित करते हैं। साहित्यिक अनुवाद में ऐसे शब्द कथा के प्रवाह को रोकते हैं और पाठक को भाषा के प्रति जरूरत से अधिक सचेत कर देते हैं। किसी भी साहित्यिक कृति ख़ासकर उपन्यास में अगर निष्कपट के बदले मासूम शब्द का इस्तेमाल किया जाये तो वह ज्यादा उपयुक्त होगा। पाट्रिक मोदियानो के एक अन्य उपन्यास Accident Nocturne का हिंदी अनुवाद ‘नीली फिएट कार’ नाम से हुआ है। उसमें भी कई फ्रांसीसी मुहावरे हिंदी में स्वाभाविक नहीं लगते।

इन उपन्यासों के हिंदी अनुवाद को पढ़ते हुए एक और समस्या वाक्य-विन्यास की असहजता है। संभव है ऐसा अनुवादक द्वारा मूल भाषा में लिखी लम्बी और जटिल पंक्तियों का हिंदी अनुवाद ज्यों का त्यों करने के कारण हुआ हो। अनुवादक को किसी भी साहित्यिक कृति का अनुवाद करते समय रचनात्मकता पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि साहित्यिक अनुवाद केवल शब्दों को बदलने का काम नहीं है। उसमें अनुवादक की रचनात्मक समझ भी शामिल होती है।

साहित्यिक अनुवाद को सबसे जटिल अनुवादों में गिना जाता है। साहित्यिक अनुवाद में केवल शब्दों का अर्थ पर्याप्त नहीं होता। अनुवादक को यह भी समझना पड़ता है कि कोई शब्द उस संस्कृति, रिश्ते और प्रसंग के भीतर किस तरह काम करता है। इसलिए उसे स्रोत और लक्ष्य, दोनों भाषाओं की सामाजिक और सांस्कृतिक दुनिया की समझ होनी चाहिए। मार्केज ने अपने उपन्यास One Hundred Years of Solitude के अंग्रेज़ी अनुवाद के बारे में कहा था कि अनुवाद मूल कृति से बेहतर है। यह टिप्पणी बताती है कि एक अच्छा अनुवाद किसी रचना के साहित्यिक जीवन को कितना विस्तार दे सकता है।

हिंदी में अंग्रेज़ी से इतर किसी विदेशी भाषा से सीधे अनुवाद करना आसान नहीं है। ऐसे अनुवादों की जाँच और संपादन के लिए संबंधित भाषा जानने वाले लोग भी बहुत कम उपलब्ध हैं। कोरियाई से हिंदी अनुवाद के संदर्भ में यह मुश्किल और स्पष्ट दिखाई देती है।

कोरियाई साहित्य की भारत में उपलब्धता पर एक नजर डालें तो हम पाते हैं कि कोरिया में भारतीय साहित्य की उपलब्धता की तुलना में भारत में कोरियाई साहित्य का दखल न के बराबर है। 50 से भी अधिक वर्षों के राजनयिक संबंध और हाल्यू (कोरियाई लहर) के कारण कोरियाई व्यंजनों, ड्रामा, टीवी धारावाहिक, फैशन और संगीत ने तो भारत में अपनी पकड़ मजबूत बनाई है लेकिन साहित्य के क्षेत्र में इसका कुछ ख़ास प्रभाव नहीं दिखता है। लेकिन विगत वर्षों में कोरियाई साहित्य का अच्छा हिंदी अनुवाद देखने को मिला है जिनमें ‘रंगमंच’, ‘पहाड़ों में फूल और अन्य कवितायें’, ‘माँ का ध्यान रखना’, ‘खलनायक’, ‘कुत्ता जिसने सपने देखने की हिम्मत की’ जैसी किताबें शामिल हैं। ये सभी कृतियाँ कोरियाई साहित्य के सर्वश्रेष्ठ और लोकप्रिय किताबों की सूची में शामिल हैं लेकिन भारतीय पाठकों के बीच अपनी जगह बना पाने में सफल नहीं हो पाई। इसके कई कारण हो सकते हैं। मेरे विचार से इसकी एक वजह दोनों भाषाओं के पाठकीय संसार का अलग होना भी है। दक्षिण कोरिया और भारत संस्कृति और इतिहास की दृष्टि से एक दूसरे के करीबी माने जाते हैं और नजदीक से देखने पर दोनों  देशों की परंपरा, लोगों की सोच और जीवन शैली एक दूसरे से बहुत ज्यादा अलग नहीं दिखाई पड़ते हैं। लेकिन इन समानताओं के बावजूद भी दोनों देशों के साहित्य पढने एवाले पाठकों कि रूचि में अंतर महसूस होता है। शायद यही वजह है कि हिंदी में उपलब्ध अच्छी कोरियाई कृतियाँ भी व्यापक पाठक-वर्ग तक नहीं पहुँच सकीं।

दूसरा मुख्य कारण अनुवाद की प्रक्रिया और उसका चुनाव है। जब कोई कोरियाई रचना पहले अंग्रेज़ी और फिर अंग्रेज़ी से हिंदी में आती है, तो हिंदी अनुवादक के सामने कोरियाई मूल नहीं, उसका अंग्रेज़ी रूप होता है। ऐसे में मूल रचना का कोई सांस्कृतिक संकेत या भाषिक बारीकी अंग्रेज़ी में बदल गई हो, तो वही बदला हुआ रूप हिंदी तक पहुँचता है। इस प्रक्रिया में हिंदी का पाठक मूल रचना की कुछ सांस्कृतिक और भाषिक बारीकियों से वंचित रह सकता है।

इस मुश्किल को शिन ग्यंग-सुक के प्रसिद्ध कोरियाई उपन्यास ‘माँ का ध्यान रखना’ के हिंदी अनुवाद से कुछ हद तक समझा जा सकता है। कोरियाई में ‘अम्मा रल बुथाक हे’ और अंग्रेज़ी में Please Look After Mom नाम से प्रकाशित इस उपन्यास का हिंदी अनुवाद कवि और अनुवादक नीलाभ ने अंग्रेज़ी के माध्यम से किया है। यहाँ उद्धृत सभी अंश इसी हिंदी अनुवाद से लिए गए हैं। उपन्यास की कथा एक ऐसी बुज़ुर्ग माँ के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका लगभग पूरा जीवन परिवार और बच्चों की देखभाल में बीत गया। सोल रेलवे स्टेशन पर उसके अचानक गुम हो जाने के बाद पति और बच्चे उसकी तलाश शुरू करते हैं। इसी तलाश के बीच उन्हें पहली बार अपने जीवन में माँ की मौजूदगी और उसकी उपेक्षा का एहसास होता है। विषय और पारिवारिक परिवेश के स्तर पर यह कथा भारतीय पाठकों के बहुत करीब दिखाई देती है। इसके बावजूद हिंदी में यह उपन्यास उतनी व्यापक चर्चा में नहीं आया, जितनी इसके अंतरराष्ट्रीय जीवन को देखते हुए अपेक्षित थी। इसके पीछे वितरण, प्रचार और कोरियाई साहित्य से हिंदी पाठकों की सीमित पहचान जैसे कई कारण हो सकते हैं। फिर भी अनुवाद की भाषा में कुछ ऐसी जगहें हैं जहाँ पाठक और कथा के बीच अनावश्यक दूरी बनती है।

इस दूरी को उपन्यास के कुछ अंशों में साफ़ देखा जा सकता है।

उपन्यास में एक जगह बेटी से कहा जाता है—“पाँच बच्चों में से तीसरी होने के कारण तुम माँ के दुःख और तकलीफ़ और चिंता की गवाह रही थीं जब तुम्हारे दोनों बड़े भाई एक-एक करके घर से विदा हुए थे।” इसके बाद माँ को पिछले आँगन में रखे मिट्टी के मर्तबानों का बाहरी हिस्सा “साफ़” करते हुए दिखाया गया है। आशय समझ में आता है, लेकिन वाक्य में दुःख, तकलीफ़ और चिंता का एक साथ आना उसे अनावश्यक रूप से बोझिल बनाता है। कोरियाई मूल में प्रयुक्त क्रिया किसी वस्तु की सतह को कपड़े या हाथ से पोंछने का दृश्य बनाती है। “साफ़ करना” उसका सामान्य अर्थ तो देता है, लेकिन माँ के रोज़मर्रा के उस शारीरिक काम का दृश्य धुँधला कर देता है। यहाँ “पोंछना” मूल क्रिया के अधिक करीब पड़ता। इसे सहज हिंदी में इस तरह कहा जा सकता है—“तुम घर की तीसरी संतान थीं। अपने दोनों बड़े भाइयों के एक-एक करके घर छोड़ने के बाद तुमने माँ का दुःख बहुत करीब से देखा था। बड़े भाई के जाने के बाद माँ हर सुबह पिछले आँगन में रखे मिट्टी के मर्तबानों को पोंछती रहती थी।”

एक दूसरे प्रसंग में माँ ऑक्टोपस का टुकड़ा उठाने की कोशिश करती हैं, लेकिन वह उनके हाथ से गिर जाता है। मूल कोरियाई में वाक्य आता है—“엄마의 손은 집중력이 없어 보였다,” जिसका लगभग शाब्दिक अर्थ है, “माँ के हाथ में जैसे एकाग्रता नहीं थी।” अंग्रेज़ी में इसे “Her hand seemed unfocused” कहा गया है, जबकि हिंदी में यह “उसका हाथ जैसे काम नहीं कर पा रहा था” बन गया। हिंदी वाक्य प्रसंग का सामान्य आशय तो देता है, लेकिन मूल में हाथ के लिए प्रयुक्त “एकाग्रता” का असामान्य रूपक उसमें नहीं आ पाता। “माँ का हाथ जैसे उसका साथ नहीं दे रहा था” हिंदी में अधिक सहज हो सकता है, हालाँकि इसमें भी मूल रूपक पूरी तरह सुरक्षित नहीं रहता।

इसी प्रसंग में बेटी पहली बार अपनी माँ को “माँ” कहकर पुकारती है। यह मामूली-सा संबोधन कथा में भावनात्मक मोड़ पैदा करता है, इसलिए यहाँ भाषा की सहजता और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

माध्यम भाषा से किए गए अनुवाद में कई बार छोटी लेकिन अर्थपूर्ण जानकारियाँ भी बदल जाती हैं। कोरियाई का “사나흘” कोई अनिश्चित “कुछ दिन” नहीं, बल्कि लगभग तीन-चार दिनों की अवधि बताता है। अंग्रेज़ी माध्यम में यह समय-संकेत सामान्य हो गया और हिंदी में भी “कुछ दिन” बनकर आया। यह अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन कथा में माँ के दोबारा फ़ोन करने के बीच बीते समय को बदल देता है। जबकि “तीन-चार दिन बाद माँ ने खुद फ़ोन किया” मूल प्रसंग की समयावधि को अधिक ठीक ढंग से सामने लाता है। आगे माँ का यह कहना —“तुम पहले ऐसी नहीं थी, लेकिन तुम कैसी ठंडी हो गई हो”—भी हिंदी में कुछ असहज लगता है। “ठंडी हो गई हो” अर्थहीन नहीं है, लेकिन यहाँ अंग्रेज़ी के cold की छाया दिखाई देती है। हिंदी के घरेलू संवाद में “तुम इतनी बेरुख़ी से कैसे पेश आने लगी?” या “तुम्हारा दिल इतना कठोर कैसे हो गया?” प्रसंग के भाव को अधिक स्वाभाविक ढंग से व्यक्त कर सकता था। कहीं-कहीं समस्या केवल शब्दों की नहीं, पूरे वाक्य-विन्यास की है। मसलन, “तुम्हें लगता है कि इतनी नुक्ताचीनी की कोई ज़रूरत नहीं है जब तुम घर के बने पर्चे बना रही हो और यह किसी सरकारी दफ़्तर में पेश होने जैसा नहीं है।” यह वाक्य अर्थ तक पहुँचने से पहले पाठक को अपनी संरचना में उलझा देता है। इसे अधिक स्वाभाविक ढंग से इस तरह कहा जा सकता है – “यह पर्चा हम घर पर ही बना रहे हैं, किसी सरकारी दफ़्तर में जमा नहीं करना है। फिर हर शब्द को लेकर इतनी नुक्ताचीनी करने की क्या ज़रूरत है?”

इसी तरह “लेकिन तुम्हारे परिवार वालों को पता था कि इन दिनों माँ का क्या हाल था। और जानते थे कि तुम शायद उसे ढूँढ़ न पाओ” में दूसरी पंक्ति हिंदी का पूरा वाक्य नहीं बन पाती। इसे “लेकिन तुम्हारे घर वाले जानते थे कि माँ किन हालात में जी रही थीं। वे यह भी समझते थे कि शायद तुम उन्हें कभी न ढूँढ़ पाओ” लिखा जाए तो वही बात अधिक सहजता और प्रवाह के साथ सामने आती है।

इन छोटे उदाहरणों के आधार पर पूरे अनुवाद का मूल्यांकन करना मेरा उद्देश्य नहीं है। मैं केवल उन जगहों को देखना चाहती हूँ जहाँ कोरियाई मूल, अंग्रेज़ी माध्यम और हिंदी पाठ को साथ पढ़ने पर अर्थ, लहजे या वाक्य-विन्यास का अंतर साफ़ दिखाई देता है। यहाँ दिए गए वैकल्पिक वाक्य भी अंतिम या एकमात्र सही अनुवाद नहीं, बल्कि हिंदी में संभव दूसरी अभिव्यक्तियाँ हैं।

अनुवाद अपने आप में गहरे श्रम और धैर्य का काम है। किसी दूरस्थ भाषा और संस्कृति से साहित्य का अनुवाद करते समय यह चुनौती और बढ़ जाती है। एक सफल साहित्यिक अनुवाद से अपेक्षा होती है कि पाठक को मूल भाषा और संस्कृति का कुछ स्वाद भी मिले और लक्ष्य भाषा में पढ़ते हुए उसे हर वाक्य पर ठिठकना भी न पड़े। हिंदी में उपलब्ध कोरियाई साहित्य का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी के माध्यम से आया है। इस प्रक्रिया में कई बार मूल रचना की सांस्कृतिक बारीकियाँ, उसका लहजा और उसकी सहजता हिंदी तक पहुँचते-पहुँचते बदल जाती है। यह भी ज़रूरी नहीं कि एक भाषा में बेहद लोकप्रिय हुई किताब दूसरी भाषा के पाठकों को भी उसी तरह आकर्षित करे। अनुवाद के लिए किताब का चुनाव करते समय नए पाठकों के सामाजिक और सांस्कृतिक संसार को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

सीधे मूल भाषा से होने वाला हर अनुवाद अपने आप अच्छा हो, यह ज़रूरी नहीं। उसी तरह किसी माध्यम भाषा से किया गया हर अनुवाद कमजोर हो, यह भी सही नहीं है। लेकिन कोरियाई जैसी भाषा से हिंदी में अनुवाद करते समय मूल पाठ तक पहुँच होना कई छोटी-बड़ी भूलों से बचा सकता है। इससे संबोधनों, रिश्तों, सांस्कृतिक संकेतों और वाक्यों के भीतर छिपे भाव को अधिक ठीक ढंग से समझा जा सकता है। आखिर साहित्यिक अनुवाद का उद्देश्य केवल कथा को एक भाषा से दूसरी भाषा में पहुँचा देना नहीं है। उसके साथ उस भाषा की स्मृति, उसका लहजा और उसके जीवन का थोड़ा-सा ताप भी पाठक तक पहुँचना चाहिए।

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