अभी हाल में ही सुषमा गुप्ता का उपन्यास आया है ‘तलब’। स्मृतियों के रेशे से बुने गए इस उपन्यास पर यह टिप्पणी पढ़ने लायक़ है। लिखा है यतीश कुमार ने। हिन्द युग्म से प्रकाशित इस उपन्यास की समीक्षा आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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“बचपन कोई भूलना चाहे, तब भी भूल नहीं सकता”- ऐसा निर्मल वर्मा कहते हैं:
लेखक अपने बचपन की स्मृतियों से कभी पूरी तरह बाहर नहीं आ पाते, बल्कि उनका पूरा रचनात्मक संसार उसी शुरुआती अनुभव और संवेदना के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। वहीं ग्राहम ग्रीन कहते हैं कि बचपन लेखक का बैंक बैलेंस होता है। यही बात मैंने उदय प्रकाश से भी सुनी है।
इस किताब का लेखक भी बचपन को याद करते हुए अपनी कथा की शुरुआत करता है, लेकिन यह याद करना महज अतीत की ओर लौटना नहीं है। वह अपने ढंग से उस बचपन को फिर से जीता हुआ-सा लगता है। दर्ज घटनाएँ मुझे भी मेरे बचपन की ओर ले जाती हैं और बार-बार यह सवाल उठता है कि यह सब यहाँ कैसे दर्ज है। क्या कई बच्चों के बचपन की दुनिया एक जैसी होती है?
बहरहाल, अब किताब की ओर लौटते हैं।
जब अनुभव में दिए गए चुभते नाम उगने लगें, तो रातों की नींद गायब हो जाती है। जब नींद गायब होती है, तो लेखक किरदारों को और बेचैनी से याद करता है। ऐसी यादें, जो आपके ज़हन को दो टुकड़ों में विभाजित कर दें, यहाँ दर्ज हैं। इस किताब को पढ़ते हुए ‘बोरसी भर आँच’ का चीकू, दुरंगा का मोहना और फिर गौतम बनता जा रहा है।
माएँ अक्सर हँसते हुए बात शुरू करती हैं और रोते हुए अंत करती हैं। पता ही नहीं चलता कि खुशी में हँस रही हैं या दुःख में रो रही हैं। दरअसल, माँ रोती भी ऐसे है, जैसे हँस रही हो। इस किताब की माँ भी वही आम माँ ही है। मोहना की माँ, चीकू की माँ। शायद माँ की यही सबसे बड़ी विडंबना है। वह अपने भीतर कितना कुछ छिपाकर भी हमारे सामने सामान्य बनी रहती है। यह भी सच है कि कुछ साथ तब होता है, जब कोई साथ नहीं होता।
माँ, बाप, कलह, कलेश, बचपन, यौन शोषण, सब पढ़ते हुए रील बनकर आँखों के सामने से गुजरते रहते हैं, जैसे जंगल में चिड़ियाँ उड़ती हैं- ढेर सारी, बिल्कुल सामने से, चारों ओर। उस सबके बीच माँ का मुरझाना सबसे ज्यादा चुभता है। माँ, जिसे आप सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं, उसे हर रोज़ मुरझाते हुए देखना कितना तकलीफ़देह है।
कुछ अच्छी पंक्तियों को स्मिता ने और मैंने अंडरलाइन किया, इसे पढ़ते हुए। वे इस प्रकार हैं:
“यादें, न धुँधली होती हैं, न पुरानी। वो गाढ़ी होती हैं लहू-सी। कायम रहती हैं सीने में साँस-सी।”
“जब आप लंबे समय तक अपने दुःख से जूझ रहे होते हैं तो दूसरों के दुःख के प्रति तटस्थ हो जाते हैं”
“आपका अपना घड़ा छलक-छलक जा रहा है। आपके पास एक बूंद भी गुंजाइश नहीं बची है दुःख समाने की।”
“कुछ लोग शापित होते हैं। वो जहाँ होते हैं, वहाँ के दरअसल कभी नहीं हो पाते”
“डरना कोई शर्मिंदा होने की बात नहीं है”
“अपनी उदासी के साथ कोई इतना खूबसूरत कैसे हो सकता है”
“हम खड़े रहते हैं अक्सर किसी आत्मीय रिश्ते की चिता पर, जब तक आखिरी चिंगारी भी भभककर बुझ नहीं जाती”
“बेसिकली तुम कुत्ते हो और तुम्हें अपने ज़ख्म चाटने में मजा आता है”
“मैं मोहब्बत की तस्वीर में चटक रंग था। आँख में चुभ गया और नजर से उतर गया”
“मेरा होना मेरे भीतर से ऐसे घट रहा था, जैसे कोई आहिस्ता-आहिस्ता किसी शार्पनर में पेंसिल घुसाकर छीलता है”
“तुम मेरे देह की नमी हो, तुमसे छूटा तो झुलस जाऊँगा”
इन पंक्तियों को अलग से दर्ज करने का मन इसलिए हुआ कि ये केवल किताब की भाषा की खूबसूरती नहीं बतातीं, बल्कि उसके भीतर धड़कती मनःस्थितियों का भी पता देती हैं। कुछ वाक्य पढ़कर लगता है कि लेखक ने शब्द नहीं चुने हैं, बल्कि किसी अनुभव की ठीक वही जगह पकड़ ली है जहाँ वह सबसे ज्यादा चुभता है। लोग छूट जायेंगे इसलिए नजदीकियाँ न बने, यह भी एक सिंड्रोम है। हममें से कई इससे कुछ न कुछ समय संक्रमित होते ही रहते हैं।
दोज़ ह्यू रेमंड, ‘पियानो टीचर’ और किम की डुक की कोरियन फिल्में अब देखूँगा, जिसका जिक्र जिस तरह इस किताब में है, उस भावना के नेपथ्य को और समझने के लिए। इस किताब को पढ़ते हुए आप दर्शनीय सिनेमा की लम्बी फ़ेहरिस्त बना सकते हैं। साफ दिखता है कि लेखक ने अपनी इस मजबूत पकड़ का बखूबी घटनाक्रम के साथ इस्तेमाल किया है।
लड़की की कहानी पाठक के पास एक दोहराव की तरह आती है । थोड़ा मन पन्नों को जल्दी पलट देने का करता है। अब तक इतने ध्यान से पढ़ता आया मन रोड क्रॉस करने वाले उस युवक-सा हो जाता है, जिसे उस पार जाने की जल्दी है। हालाँकि कुछ पन्नों बाद जब पढ़ा तो मन यूँ अटका कि शब्द गुम होने लगे, तो फिर से वही एकाग्रता वापस आ मिली जैसे कोई गई प्रेमिका वापस मिल गई हो।
लेखक किरदार का पैरहन पहनकर जब रचता है तो ऐसा ही रचता है। फिल्म और फिल्म के किरदार के संदर्भ आपसी बातचीत में यूँ ही हिस्सा नहीं बने होंगे। किताब ने साहित्य, सिनेमा, कला के महत्व को यूँ बरता है कि उसकी खुशबू पन्ने दर पन्ने छन कर आती रहती है और कथ्य का मर्म आपके दिल में उतरता रहता है।
सिनेमा और किरदारों पर बातचीत इस किताब का सबल पक्ष भी है, पर कहीं-कहीं पठनीयता की धार कमजोर करता है। पाठक को मुख्य किरदार के किस्से में दिलचस्पी होती है, इसलिए उनकी यह महत्वपूर्ण बातचीत, जिसमें उपयुक्त दर्शन का जुड़ाव भी है, उसे स्किप कर देने का मन करता है। लेकिन फिर ठहरकर जब उसे इस भाव से पढ़ते हैं कि इससे उस सिनेमा को देखने की अपनी समझ और गहरी होगी, तो वही पाठक थोड़ी देर के लिए उस सिनेमाई दुनिया में विचरण करने लगता है। यह भी उन दोनों के जुड़ाव का हिस्सा है, इसे भी समझने की जरूरत है। फिल्मों पर इतनी गहन चर्चा मैंने अक्सर कुमार अंबुज के आलेख में पढ़ी है। जब ‘400 ब्लोज’ की चर्चा पढ़ी तो लगा इस किताब को कुमार अंबुज जी को भेंट करूंगा। उन्हें जरूर पसंद आएगी।
“क्या कभी भी किसी भी दुःख का किसी के साथ तुलनात्मक दृश्य बनाया जा सकता है? क्या यह वर्गीकरण इतना आसान है?”
इस हिस्से को पढ़ते हुए, इस पंक्ति तक पहुँचने से पहले मैं भी यही सोच रहा था। बतौर पाठक हम कई बातों में खुद को क्यों तलाशते रहते हैं? क्या अपने दर्द से मिलना हमें अच्छा लगता है? या यह कुछ वैसा ही है, जैसे शीशे में अपना चेहरा देखना। अपने ही भीतर की किसी अनकही चीज़ को पहचान लेना।
सुहान और कंदील की यह कहानी अपना-अपना मनोविज्ञान रचती दिखती है। इन दोनों के क्षितिज पर जो रंग उभरता है, वह दर्द का है और दर्द में रहते हुए प्रेम की तलाश का। इसलिए इस तलाश की यात्रा में वे एक-दूसरे को कहानी सुनाते रहते हैं। कभी फिल्मों की, कभी अपनी।
कुछ दृश्य बहुत ही भावुक और कलात्मक रचे गए हैं, जिनमें संवेदना की नदी बाँध तोड़ते हुए बह जाती है। लाश अपने हाथ कफ़न से बाहर यूँ लटकाए है कि जैसे वह श्मशान आने का इशारा कर रही हो। ऐसे ही दृश्यों में एक है।
चटकना, जोड़ना और फिर चटकना, क्या यह नियति है?
लेखक ने किरदारों के चटकने और जोड़ने, दोनों की आवाजों को बहुत संभालकर संवेदनात्मक शब्दों से गूँथा है। भाषा की कलात्मकता मर्म की टीस को शब्द देते हुए अतिशयोक्ति की ओर नहीं ले जाती। सुषमा गुप्ता की पहले की किताबों के हवाले से भी यह बात कही जा सकती है कि लेखिका परिस्थितियों के गुंजन को बहुत गहराई में उतर कर रचने की काबिलियत रखती हैं और हर किताब में खुद को साबित भी करती हैं। सच को इतनी सहजता से सरल कर देना सुषमा का हुनर है। जैसे एक जगह लिखा है, “दरअसल आत्महत्या मैं करना नहीं चाहता था, बस उसे फैंटसाइज करता था।” या फिर “हर सीप में मोती नहीं बनते” या फिर “हम भूलने के पहले याद पकड़ते हैं और याद रखने के समय भूले रहते हैं।”
ऐसी पंक्तियाँ पढ़कर आप थोड़ी देर को विस्मित तो जरूर होते हैं। किताब दरअसल एक यात्रा है। पढ़ते हुए अगर आप उसकी कथा के साथ अपनी अंतर्यात्रा पर भी निकल जाएँ, तो फिर क्या बात। सुषमा गुप्ता की सबसे बड़ी ताकत उनकी सधी हुई और बेहद खूबसूरत भाषा है। पारंपरिक प्रेम कहानियों से इतर, सुषमा गुप्ता प्रेम को एक काल्पनिक दुनिया के रूप में नहीं, बल्कि उसके जटिल और यथार्थ रूप में दिखाती हैं।
उनके लेखन में पात्रों के बीच होने वाली बातचीत बेहद बौद्धिक, सिनेमाई और यथार्थवादी होती है। वे इंसानी टूटन, अवसाद और स्मृतियों के दुख को बहुत उदात्त भाव से लिखती हैं। उनके ही शब्दों में कहें तो जब कोई लंबे समय तक दुख झेलता है, तो वह दूसरों के दुखों के प्रति थोड़ा तटस्थ हो जाता है। खोने का डर और खोने के बाद का जो शून्य है, उसे वे बड़ी सूक्ष्मता से अपनी किताबों के पन्नों पर उतारती हैं। आधुनिक दुनिया की तकनीकी शब्दावली, डिजिटल युग का अकेलापन और इंसानी संवेदनाएँ- लेखिका ने इन तीनों को इस तरह आपस में पिरोया है कि वे अलग-अलग दिखाई नहीं देते।
बस इस किताब में अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग कहीं-कहीं अनावश्यक लगा, जिसे उचित हिन्दी शब्दों से बदला जा सकता था। यह पूर्णतः व्यक्तिगत राय है। हो सकता है कई पाठकों को वही बात अच्छी लगे कि भाषा एकदम उस समाज से ली गई है, जिससे किरदार आते हैं।



