जाने-माने पत्रकार और लेखक विवेक शुक्ला की किताब आई है ‘1947- विभाजन के शेष सवाल’। इस किताब में उन्होंने इस बात पर भी विचार किया है कि महात्मा गांधी की भारत में इसलिए हत्या की गई क्योंकि हत्यारा यह समझता था कि गांधी मुसलमानों और पाकिस्तान का पक्ष ले रहे थे। विडंबना यह है कि लेकिन पाकिस्तान की इतिहास की किताबों में उनको मुस्लिम विरोधी हिंदू नेता के रूप में दिखाया गया। आइये गांधी जयंती के दिन पढ़ते हैं इस पुस्तक का एक संपादित अंश- मॉडरेटर
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अगर 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या न हुई होती, तो वे कुछ ही दिनों बाद पाकिस्तान जाने वाले थे। लाहौर, रावलपिंडी और कराची जाने की उनकी स्पष्ट इच्छा थी। 23 सितंबर 1947 की प्रार्थना सभा में उन्होंने कहा था- “मैं लाहौर जाना चाहता हूं। मैं पुलिस या फौज की सुरक्षा लेकर नहीं जाना चाहता। मैं वहां के मुसलमानों पर भरोसा करके जाना चाहता हूं। वे चाहें तो मुझे मार सकते हैं। सरकार अगर रोकना चाहे तो रोक सकती है, पर रोक कैसे लगाएगी? रोकने के लिए उसे मुझे मारना पड़ेगा।” (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, खंड 96, 7 जुलाई 1947–26 सितंबर 1947, पृ. 410–412)
प्रख्यात लेखक और गांधी जी के पौत्र राजमोहन गांधी के अनुसार, 27 जनवरी 1948 तक यह तय हो चुका था कि गांधीजी 8 या 9 फरवरी को पाकिस्तान पहुंचेंगे। यात्रा का उद्देश्य बंटवारे के बाद फैली भीषण हिंसा के बाद दोनों देशों में थोड़ा-सा सौहार्द लौटाना था।
पाकिस्तान में गांधीजी को लेकर मोटे तौर पर दो धाराएं दिखती हैं। पंजाब- जो सियासत और सेना दोनों में सबसे प्रभावशाली सूबा है की पाठ्यपुस्तकों में वे अक्सर कांग्रेस के औसत, और कभी-कभी मुसलमानों के हितैषी न माने जाने वाले, हिंदू नेता के रूप सामने आते हैं। वहां सरकारों ने अधूरी या एकतरफा जानकारी के आधार पर ही उनकी छवि गढ़ी। बता दें कि 2020 में पाकिस्तान के पंजाब सूबे के करिकुलम एंड टेक्स्टबुक बोर्ड ने करीब सौ किताबों पर रोक लगाई। वजह थी कि इनमें गांधीजी के उद्धरण या सम्मानजनक उल्लेख शामिल थे। पाकिस्तान के चोटी के पत्रकार-लेखक हारून खालिद कहते हैं कि गांधी की उजली छवि पाकिस्तान के स्कूल या कॉलेज के पाठ्यक्रम में स्वीकार्य नहीं है।
विडंबना यह है कि गांधीजी को इसलिए मारा गया क्योंकि हत्यारों को लगता था कि वे मुसलमानों और पाकिस्तान के हित में खड़े हैं। फिर भी पाकिस्तान के बहुत से इतिहास-लेखन में उन्हें मुस्लिम-विरोधी हिंदू नेता बना दिया गया। वही गांधी हत्या से तीन दिन पहले, 27 जनवरी 1948 को, दिल्ली की कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह गए थे। दिल्ली में 27 जनवरी,1948 को कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी। कई दिनों से सूरज देवता भी कुछ देर के लिए ही दर्शन देने के बाद ओझल हो रहे थे। इसके बावजूद गांधी जी सुबह साढ़े आठ बजे के आसपास अलबुर्कर रोड (अब तीस जनवरी मार्ग) पर स्थित बिड़ला हाउस से अपने कुछ सहयोगियों के साथ महरौली की तरफ निकले। वे महरौली में कुतुबउद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह जा रहे थे। वे इससे पहले सन् 1915 की अपनी पहली दिल्ली यात्रा के समय महरौली में कुतुब मीनार को देखने गए थे। पर इस बार मामला गंभीर था।
महात्मा गांधी यहां 9 सितंबर, 1947 को नोआखाली और कलकत्ता में दंगों को शांत करवाकर आए थे। वे शाहदरा रेलवे स्टेशन पर उतरे थे। तब दिल्ली में सरहद पार से हिन्दू- सिख शरणार्थी आ रहे थे, यहां से बहुत से मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे। करोल बाग, पहाड़गंज, दरियागंज, महरौली में मारकाट मची हुई थी। वे दंगाग्रस्त क्षेत्रों का बार-बार दौरा कर रहे थे। पर बात नहीं बन रही थी। इस बीच कुतुबउदीन बख्तियार काकी की दरगाह के बाहरी हिस्से को भी दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई। इस घटना से बापू दुखी थे। उन्हें 12 जनवरी 1948 को खबर मिली थी कि कुतुबउदीन बख्तियार काकी की दरगाह के बाहरी हिस्से को दंगाइयों ने क्षति पहुँचाई है। ये सुनने के बाद उन्होंने अगले ही दिन से उपवास पर जाने का निर्णय लिया।
गांधी जी ने 13 जनवरी 1948 को प्रात: साढ़े दस बजे बिड़ला हाउस (अब गांधी स्मृति) में अपना उपवास शुरू किया। उस वक्त पंडित नेहरू, सरदार पटेल, बापू के निजी सचिव प्यारे लाल नैयर वगैरह वहाँ थे। बापू से अपना उपवास तोड़ने का आग्रह करने के लिए सैकड़ों हिन्दू, मुसलमान और सिख भी पहुँच रहे थे। उनकी निजी चिकित्सक डॉ. सुशीला नैयर उनके गिरते स्वास्थ्य पर नजर रख रही थीं। आकाशवाणी बापू की सेहत पर बुलेटिन प्रसारित कर रहा था। उनके उपवास का असर दिखने लगा। दिल्ली में दंगे रुक गए। तब बापू ने 18 जनवरी को अपना उपवास तोड़ा। उन्हें नेहरू जी और मौलाना आजाद ने ताजा फलों का रस पिलाया। इस तरह 78 साल के बापू ने हिंसा को अपने उपवास से मात दी।
इसके बाद वे 27 जनवरी की दरगाह पहुंचते हैं। तब तक महरौली बिल्कुल जंगल सी रही होगी। आबादी तो बहुत कम रही होगी आज की तुलना में। वे बिड़ला हाउस से जब महरौली के लिए निकले होंगे तो उन्हें सबसे पहली बस्ती युसुफ सराय ही मिला होगा। तक तक दक्षिण दिल्ली में गांवों में ही आबादी थी। हौज खास, सर्वप्रिय विहार, सफदरजंग डवलपमेंट एरिया वगैरह तो 1950 के दशक के शुरू में बनने शुरू हुए थे।
खैर, बिड़ला हाउस से युसुफ सराय के रास्ते दरगाह तक 30 मिनट में पहुंच गए होंगे। वहां सालाना उर्स चल रहा था, पर जायरीन कम ही थे। वहां पहुँचते ही उन्होंने दरगाह के उन हिस्सों को देखा जिसे दंगाइयों ने क्षति पहुँचाई थी। उन्होंने वहाँ एकत्र हुए मुसलमानों को भरोसा दिलाया कि सरकार उन्हें सुरक्षा देगी। उन्हें पाकिस्तान जाने की जरूरत नहीं है। उन्होंने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से दरगाह की फिर से मरम्मत करने के लिए भी कहा। वे वहां मुसलमानों को भरोसा दिलाते हैं कि उन्हें भारत में ही रहना है। पर अफसोस कि अब दरगाह से जुड़े किसी खादिम को ये जानकारी नहीं है कि बापू का काकी की दरगाह से किस तरह का रिश्ता रहा है। दरगाह के आसपास कोई शिलापट्ट भी नहीं लगा है जिससे पता चल सके कि यहां कब और किसलिए राष्ट्रपिता आए थे।
महरौली से लौटने के बाद गांधी जी ने लिखा : ‘अजमेर की दरगाह के बाद देश की यह दूसरी सबसे प्रतिष्ठित (क़ुतुबउद्दीन बख़्तियार काकी) दरगाह है जहां हर साल न केवल मुसलमान, बल्कि हजारों ग़ैर-मुस्लिम भी ज़ियारत के लिए आते हैं।’ दरगाह से जाने से पहले गांधी जी ने वहाँ मौजूद लोगों से कहा, ‘मैं यहाँ एक तीर्थ यात्रा पर आया हूँ। मैं यहाँ आए मुसलमानों, हिंदुओं और सिखों से अनुरोध करता हूँ कि वे शुद्ध हृदय से यह प्रण लें कि वे कभी भी झगड़े को सिर उठाने नहीं देंगे, बल्कि मित्रता और भाईचारे के साथ रहेंगे। हमें खुद को शुद्ध करना चाहिए और अपने विरोधियों से भी प्रेम से मिलना चाहिए।’
बापू ने यह भी कहा, ‘यह दरगाह भीड़ के गुस्से का शिकार हुई है। पिछले 800 बरसों से आसपास रहने वाले मुसलमानों को इसे छोड़ना पड़ा। …हालांकि मुसलमान इस दरगाह से प्यार करते हैं, लेकिन आज इसके आसपास कोई मुसलमान नहीं मिलता… यह हिन्दुओं, सिखों, अधिकारियों और सरकार का कर्तव्य है कि वे इस दरगाह को फिर से खोलें और हम सब पर लगे इस दाग़ को धो डालें। …अब समय आ गया है कि भारत और पाकिस्तान दोनों को अपने-अपने देश के बहुसंख्यकों को स्पष्ट रूप से यह घोषित करना चाहिए कि वे धार्मिक स्थलों का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे, चाहे वे छोटे हों या बड़े। उन्हें दंगों के दौरान क्षतिग्रस्त हुए स्थलों की मरम्मत का भी जिम्मा उठाना चाहिए।’
(कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी, खंड 98 पृष्ठ 98-99, 27 जनवरी 1948)
खैर, बापू की प्रार्थना सभाओं में कुरआन की आयतें नियमित पढ़ी जाती थीं। फ़िलिस्तीन प्रश्न पर 26 नवंबर 1938 के हरिजन में उनका रुख साफ था। फ़िलिस्तीन अरबों का उसी अर्थ में है जिस अर्थ में इंग्लैंड अंग्रेज़ों का; यहूदियों को अरबों पर थोपना ठीक नहीं; बेहतर यह कि वे जहां जन्मे-बसे हैं वहां रहे। आज़ादी के बाद वे भारत सरकार से पाकिस्तान के हिस्से के 55 करोड़ रुपये देने की मांग भी कर रहे थे; जनवरी 1948 का उनका अंतिम उपवास इसी मांग और दिल्ली में अल्पसंख्यक सुरक्षा से जुड़ा था।
पाकिस्तान में उनकी दो मूर्तियां हैं। एक, इस्लामाबाद के पाकिस्तान मॉन्यूमेंट म्यूज़ियम में मोम की तस्वीर। इसमें सितंबर 1944 की मुंबई वार्ता का दृश्य है, जिसमें वे जिन्ना से बात करते दिखते हैं। यह सम्मान की मूर्ति कम, ऐतिहासिक दृश्य अधिक है। दूसरी, इस्लामाबाद के भारतीय हाई कमीशन परिसर में है।
पर सरकारी पाठ्यक्रम से हटकर पाकिस्तान के उदार बौद्धिक हलकों में सोच बदली है। स्वीडन में रहने वाले पाकिस्तानी मूल के विद्वान और जिन्ना के जीवनीकार प्रो. इश्तियाक अहमद गांधीजी को संत जैसी नैतिक शख्सियत मानते हैं। वे कहते है कि बंटवारे के बाद भड़के दंगों में गांधी नोआखाली, कलकत्ता, दिल्ली गए, पीड़ितों का मजहब नहीं देखा; जबकि जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे का आह्वान किया, जिसके बाद कलकत्ता से नोआखाली और बिहार तक हिंसा फैली। लाखों लोग मारे गए, करोड़ों बेघर हो गए।
जिन्ना 7 अगस्त 1947 को सफदरजंग हवाई अड्डे से दिल्ली छोड़कर कराची गए, जबकि दिल्ली के पहाड़गंज, किशनगंज, करोलबाग में दंगे चल रहे थे। उन्होंने गांधी की तरह दंगा-ग्रस्त इलाकों में व्यक्तिगत शांति-यात्राएं नहीं कीं। जिन्ना का जनवरी 1948 के कराची दंगों के बाद शरणार्थी शिविर जाने का एक उल्लेख मिलता है, पर वह गांधी जैसी व्यापक पहल नहीं थी।
गांधी-जिन्ना तुलना से गांधी को छोटा साबित करने की ज़रूरत नहीं। यह तथ्य भी कम बताया जाता है कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया गांधी के आशीर्वाद से बनी। अगस्त 1920 में ब्रिटिश शिक्षा-संस्थानों के बहिष्कार का संदेश देने के बाद 29 अक्तूबर 1920 को अलीगढ़ के कई अध्यापकों-छात्रों ने जामिया की नींव रखी। हकीम अजमल खान, जाकिर हुसैन, मुख्तार अहमद अंसारी इसमें सक्रिय रहे। ब्रिटिश शिक्षा और व्यवस्था के विरोध में अस्तित्व में आए जामिया मिल्लिया इस्लामिया को धन और संसाधनों की बहुत कमी रहती थी। रजवाड़े और पैसे वाले लोग अंग्रेज़ी हुकूमत के डर से इसकी आर्थिक मदद करने से कतराते थे। इस कारण 1925 के बाद से ही यह बड़ी आर्थिक तंगी में घिर गई।
गांधी ने कहा था कि जामिया के लिए भीख मांगनी पड़े तो मांगेंगे। उनके छोटे पुत्र देवदास गांधी ने जामिया में अध्यापन किया; हरिलाल के पुत्र रसिक ने वहां पढ़ाई भी की। ये उन दिनों की बातें हैं, जब जामिया का कैंपस करोल बाग में था। ये तथ्य आधिकारिक पाकिस्तानी आख्यान में प्रायः गायब रहते हैं।
( विवेक शुक्ला की किताब ‘1947- विभाजन के शेष सवाल’ के संपादित अंश।)



