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  • प्रभात रंजन की कविताएँ

     

    ये मेरी कविताएँ नहीं हैं, बल्कि ६०-७० के दशक के प्रसिद्ध कवि प्रभात रंजन की कविताएँ हैं. मेरे जन्म के समय ये इतने प्रसिद्ध थे कि कहते मेरे दादाजी ने उनके नाम पर ही मेरा नाम रखा था. हालांकि परिवार में इस बात को लेकर मतभेद है, क्योंकि मेरे पापा का कहना है कि मेरे दादा ने मेरा नाम आनंद मार्ग के प्रवर्तक प्रभात रंजन सरकार के नाम पर रखा था. खैर, अपने हमनाम पूर्वज कवि की कविताएँ. उनकी कोई तस्वीर नहीं मिली. पुरानी पत्रिकाओं में बहुत ढूंढने पर भी- जानकी पुल.
    =======================================================
     
    १.
    जीवन की प्यास
     
    हत आस्था
    लहू में लथपथ
    पराजित सैनिक की

    कुहनियों के बल, श्लथ
    मृतवत साँप-सी रेंगन
    दो बूंदों की हँपहँपाती प्यास-

    जीवन की,
    जिजीविषु की,
    ऎसी जिजीविषा !
    २.
    द्विधा विवशता और प्रेम
     
    आज मैं 
    श्वेत कमल की 
    एक कली तोड़कर लाया था 

    सोचा
    तुम्हारी राह में रख दूँ,
    तुम स्नेह से उठा लोगी।

    फिर सोचा
    अगर कुचल दो तो-
    फिर मैंने तुम्हारी राह में कमल नहीं रखा।

    मेरा 
    हृदय ही जानता है,
    मैं तुम्हें कितना चाहता हूँ;
    पर मैं 
    इस पवित्र कमल को
    कुचला हुआ नहीं देख सकता।

    मेरी 
    इस विवशता को
    क्षमा करना।
    ३.
    प्यार: बीसवीं सदी-१
     
    एक प्यार यह कि जो
    उमगता,
    पढ़-पढ़
    उपन्यास, कहानी, कविता।
    सजे हुए ड्राइंग रूम,
    नए माडल की कार
    होटल और बार
    ओह कपूर,
    व्हाट ए वन्डरफ़ुल शाट
    शानदार।

    -‘मास्टर जी
    कैसे लिख लेते हैं
    कविता इतनी सुन्दर?
    (मास्टर जी-
    ग़रीब विद्यार्थी,
    भावुक आदर्शों में पले।)
    मगर स्वप्न नहीं पूरे हुए
    बहक चले,
    मास्टर जी
    चलें वहाँ
    मिलते हों अलग रहकर जहाँ
    ज़मीं और आस्माँ…

    भाग गई बेटी
    है अख़बारों की सुर्ख़ी
    लेकर गहने-कपड़े
    नगदी
    कई हज़ार !
    कहते हैं लोग-बाग
    कारण था महज प्यार।

    (पर…
    बेटी फिर वापस
    मास्टर जी गिरफ़्तार
    बहकाता है
    शरीफ़ों की बहू-बेटियों को
    सूअर, नालायक, मक्कार‘…)
    ४.
    प्यार: बीसवीं सदी-२
     
    प्यार-
    पाए हैं आज़ाद विचार
    माँ-बाप ढूंढ़ते हैं किसी रियासत का राजकुमार,
    या आई०ए०एस०
    बेटी करती है शापिंग, बोटिंग
    देखती है सैकिन्ड शो
    ओह डैडी तुम कितने अच्छे हो
    (डैडी हैं कर्ज़दार
    कोठी, बावर्ची, माली, सोफ़ा, कार)
    घूमती है बेबी (?)
    बिगड़े रईसों के संग
    मसलन-
    (भूतपूर्व)राजा सूर्य प्रताप परमार

    (कुछ दिन चला यूँ ही
    कुछ-कुछ मीठा,
    तीखा, कुछ तीता
    मज़ा, लज्जत…)
    फिर,
    आशंका, भय…
    (…एबार्शन या आत्मघात)
    प्यार-
     
     
    ५.
    प्यार: बीसवीं सदी-३
     
    मुंशी रामाधार
    काम क्लर्की
    तनख़्वाह दस-दस, दस बार
    बच्चों की संख्या छह-सात
    पत्नी कृष, जर्जर, चिड़चिड़ाती,
    घर ज्यों नरक का द्वार,
    बच्चे बीमार,
    दिन-भर चीख़ोपुकार,
    माँ, लगी है भूख
    आ खा ले मुझे
    कट जाए
    भवधार

    मुंशी रामाधार-
    तीन बेटियाँ
    यौवनवती, सुन्दरी
    हीरे की ज्यों मुंदरी
    ज्यों घूरे पर पन्नियाँ…

    विवाह के लिए तैयार
    दहेज़ पन्द्रह-बीस हज़ार
    (इन्तज़ार, इन्तज़ार, इन्तज़ार।)

    बगल के रईसजादे-
    (शानदार)
    सिनेमा के गाने
    फिर ताँक-झाँक-
    बिटिया रमो
    उम्र अट्ठाइस साल-
    (तिल-तिल जला हुआ, झँवराया चेहरा}

    पहले तो चन्द दिन
    माता जी से
    हुआ परिचय
    फिर बहिन जी से बातचीत
    किस्से-कहानी की क़िताबों का आदान-प्रदान,
    ख़तोक़िताबत।
    फिर…फिर…फिर…-

    रमा बाई-
    कोठरी नम्बर अट्ठाइस
    खाँसी…
    घुटती धुएँ की दीवार।-

    यह नहीं कि प्यार मर गया है
    या सब-कुछ बदल गया है।
    प्यार ज़िन्दा है।
    बहुत-कुछ वह,
    जो कहा नहीं जाता।
    घुटता है आदमी इतना
    कि
    सहा नहीं जाता
    पर तब भी प्यार कहा नहीं जाता…
    ये आधी गिरती,
    आधी सम्भली दीवारें
    यह समाज-
    इसके मूल्य,
    इसकी व्यवस्थाएँ,
    आस्थाएँ…
    अर्द्ध-सत्य के धुएँ-भरे कुएँ से
    घुटता, चीख़ता, कराहता समाज।

    हमसे, तुमसे, सबसे
    बना हुआ समाज
    यहाँ प्यार नहीं-
    केवल व्यभिचार।

    9 thoughts on “प्रभात रंजन की कविताएँ

    1. मुंशी रामाधार
      काम क्लर्की
      तनख़्वाह दस-दस, दस बार
      बच्चों की संख्या छह-सात
      पत्नी कृष, जर्जर, चिड़चिड़ाती,
      घर ज्यों नरक का द्वार,
      बच्चे बीमार,
      दिन-भर चीख़ोपुकार,
      'माँ, लगी है भूख'
      'आ खा ले मुझे
      कट जाए
      भवधार'…गजब

    2. वाकई उस जमाने के लिहाज से बहुत आगे की कविताएं हैं… आभार आपका कि अपने ही नामधारी एक बड़े और महत्‍वपूर्ण कवि की कविताओं से परिचय करवाया…

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