• पुस्तक अंश
  • दिव्या विजय की डायरी ‘दराज़ो में बंद ज़िंदगी’ का एक अंश

    युवा लेखिका दिव्या विजय की कहानियाँ तो हम पढ़ते ही आये हैं। अक्सर ही उनकी कहानियाँ बिना किसी अतिरिक्त शोर के महत्त्वपूर्ण और ज़रूरी बातें कह देने में सफल होती रही हैं। आज अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर पढ़िए उनकी डायरी ‘दराज़ो में बन्द ज़िन्दगी‘ का एक अंश, और सोचिए कि वास्तव में ज़मीनी स्तर पर महिलाओं के लिए कुछ बदला है या बदलने की सूरत नज़र आती है। यह किताब राजपाल एंड संस से प्रकाशित हुई है। – कुमारी रोहिणी

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    कल तय हुआ था, सब सिनेमा देखने जाएँगे। मैं जल्दी उठकर तैयार हो गयी बाहर आयी तो कल के कार्यक्रम पर बहस-मुबाहिसा चल रहा था। इस बीच उनका ध्यान मुझ पर गया तो सहसा उनकी बातों का केंद्रबिंदु मैं हो गयी। गह साँस भरकर उन्होंने कहा था कि मैं तो हू-ब-हू वैसी ही हूँ जैसी बरसों पहले थी। मैं ग्लानि से भर गयी। गोया मैंने अकेले ही अक्षत सौंदर्य के उस फल को चख लिया हो जिस पर सब सतृष्ण दीठ लगाए थीं। मैं जानती थी कि मैं ठीक वैसी नहीं हूँ। मेरे अंदर कितना कुछ बदला है, बाहर भी धीरे-धीरे बदल रहा है यह मैं लक्षित कर सकती हूँ पर मैंने उस बदलाव के तले में धँसने की बजाय, ऊपर की ओर रुख़ कर लिया, मीठा उजास जहाँ है। ऐसा नहीं कि नम अँधेरे ने मुझे पुकारने की कोशिश नहीं की। बार-बार की। अपनी मरमरी पुकार का पा‍श मेरे ऊपर कई-कई बार फेंका। भीतर दबे रहने की अलसायी ईप्सा मुझे भी थी
    पर वहाँ अन्ततः मृत्यु थी… मृत्यु यहाँ भी है, पर जीवन के बाद ।
    मैं उनकी बातें सुनती रही इस पसोपेश के साथ कि मुझे उन बातों पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए। तभी एक फुसफुसाहट कोने से उभरी-
    “सुनो! मेरे कॉलेज के दोस्तों ने गेट टुगैदर रखा है। आज रात को सब मिल रहे हैं। मैं भी थोड़ी देर जाऊँगी।”
    “दिमाग ख़राब है तुम्हारा? यहाँ सब लोगों के बीच से निकल कर जाना मुमकिन है क्या ? बोलने से पहले सोच तो लिया करो ?”
    “नहीं, यहाँ किसी को परेशानी नहीं होगी। थोड़ी देर की ही तो बात है।”
    “बच्चों को कौन रखेगा इतनी देर ?”
    “इतने लोग तो हैं… खेलते रहेंगे।”
    ‘नहीं, अपने बच्चों को इधर-उधर छोड़ना मुझे पसंद नहीं।”
    “शादी के बाद पहली बार मौका मिला है… प्लीज़। तुम तो जानते हो कितने वक़्त से मैं उन लोगों से नहीं मिली।”
    “अपनी प्रायऑरिटीज समझो। शादी हो गयी है तुम्हारी। उन लोगों से कोई बहाना बना देना। और हाँ आज रात को मेरे एक दोस्त ने पार्टी रखी है। सुबह हो जाएगी आने में।”
    आवाज़ें शांत हो गयी थीं।
    मैंने उन सबको देखा। शांति के बीच अनायास एक बात चल उठी, ऐसी बात जो पैर के सो जाने पर ज़बरदस्ती उठ कर चलने की कोशिश करती है पर उसकी लँगड़ाहट नहीं छिपती। सब अपनी-अपनी कह रहे थे कि उनके पति उनसे कितना प्रेम करते हैं, कि उन्हें कहीं अकेले नहीं जाने देते, कि घर पर हमेशा अपने सामने देखना चाहते हैं। वे गर्व से बता रही थीं कि घर पर वे न हों तो किसी का काम नहीं चलता। हठात् मुझे बोनसाई की याद आ गयी जो फलदार भले ही हों पर जिनका विस्तार एक उथला-सा गमला होता है।

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