कुछ कवि ऐसे होते हैं जिनको न ईनाम-इकराम मिलते हैं, न कविगण उनको अपनी जमात का मानते हैं, लेकिन इससे…
प्रेमचंद का ख़त सज्जाद जहीर के नाम
प्रेमचंद का यह पत्र सज्जाद ज़हीर के नाम है जिसमें प्रगतिशील लेखक संघ की बातें हो रही हैं. इसे हिंदी…
भारतीय दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र
युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर ने विश्व सिनेमा पर यह श्रृंखला शुरू की है. विश्व सिनेमा को समझने-समझाने की कोशिश में.…
राकेश तिवारी की कहानी ‘अंजन बाबू हँसते क्यों हैं’
80-90 के दशक में जब दिल्ली विश्वविद्यालय में पढता था तो जिन कथाकारों की कहानियां पढने में आनंद आता था…
साहित्यकरवा सब फ्रॉड है!
शीर्षक से कुछ और मत समझ लीजियेगा. असल में यह एक मारक व्यंग्य लेख है. संजीव कुमार को आलोचक, लेखक…
गाँठ जीवन से जितनी जल्दी निकले उतना अच्छा
ब्रेस्ट कैंसर को लेकर हमने पहले भी कई कवितायेँ पढ़ी हैं, उन कविताओं को लेकर लम्बी-लम्बी बहसों की भी आपको…
यह हिंदी प्रकाशन जगत में नए दौर की शुरुआत है!
वाणी प्रकाशन की स्थापना के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं. इस मौके पर 26 जुलाई को वाणी फाउन्डेशन(न्यास) की स्थापना…
राहुल सिंह का ‘लंचबॉक्स’
युवा आलोचक राहुल सिंह कई विधाओं में अच्छी दखल रखते हैं, सिनेमा भी उनमें एक है. कुछ अरसे पहले आई…
सवाल ये है कि ‘नीला स्कार्फ’ है क्या?
इस समय वह हिंदी की एक बड़ी परिघटना है- नीला स्कार्फ. प्री-लांच यानी किताब छपने से पहले इस किताब की…
हृषीकेश सुलभ की कहानी ‘हबि डार्लिंग’
हृषीकेश सुलभ बिहार की धरती के सम्भवतः सबसे मौलिक इस रचनाकार ने अपने नाटकों में लोक के रंग को जीवित किया…



