भारत का पुरस्कार बनाम इंडिया का पुरस्कार

चित्र: सत्यानंद निरुपम

‘वनमाली कथा’ में हिंदी को मिले बुकर पुरस्कार पर मैंने यह लेख लिखा था। पत्रिका के जुलाई अंक में लेख प्रकाशित हुआ है। आप भी पढ़ सकते हैं- प्रभात रंजन

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इस साल ‘भारत’ का परिचय एक नए पुरस्कार से हुआ- इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ से। ‘इंडिया’ का बुकर पुरस्कार से पुराना परिचय रहा है। 1981 में जब बुकर पुरस्कार सलमान रूश्दी के उपन्यास ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रन’ को मिला था तो दुनिया भर में भारतीय अंग्रेज़ी लेखन की धूम मच गई थी। उसके बाद यह पुरस्कार अरुंधति रॉय के उपन्यास ‘गॉड ऑफ़ स्मॉल थिंग्स’ के लिए मिला, किरण देसाई को उनके उपन्यास ‘द इनहेरिटेंस ऑफ़ लॉस’ के लिए मिला। प्रसंगवश, किरण देसाई की माँ अनिता देसाई भी अंग्रेज़ी की प्रसिद्ध लेखिका रही हैं और बुकर पुरस्कार से उनका नाता यों रहा है कि वह भारतीय मूल की ऐसी लेखिका हैं जिनके उपन्यास इस पुरस्कार की शॉर्ट लिस्ट में सबसे अधिक बार आए लेकिन उनको बुकर एक बार भी नहीं मिला। अरविंद अडिगा के उपन्यास ‘व्हाइट टाइगर’ के लिए बुकर मिला। बल्कि जब बुकर पुरस्कार के 25 साल पूरे हुए थे तो 1993 में सलमान रूश्दी के उपन्यास  ‘मिडनाइट्स चिल्ड्रेन’ को ‘बुकर ऑफ़ बुकर्स’ पुरस्कार दिया गया था यानी 25 साल के दौरान जिन उपन्यासों को बुकर दिया गया था उनमें से भी बेस्ट। प्रसंगवश, अनिता देसाई के अलावा सलमान रूश्दी ऐसे लेखक रहे हैं जिनके उपन्यास इस पुरस्कार के लिए कई बार शॉर्टलिस्ट हुए। यह अलग बात है कि कई बार अंतिम सूची में आने के बावजूद अनिता देसाई को एक बार भी बुकर नहीं मिला लेकिन सलमान रूश्दी को बुकर के अलावा बुकर ऑफ़ बुकर्स भी मिला। बहरहाल, लेकिन ये सब ‘इंडिया’ को मिले बुकर थे यानी भारतीय अंग्रेज़ी लेखन को।

दरअसल, यहीं पर इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ और मैन बुकर प्राइज़ के अंतर को जान लेना जरूरी है। मैन बुकर प्राइज़ या बुकर प्राइज़ फ़ॉर फ़िक्शन या बुकर प्राइज़ के नाम से जिस पुरस्कार को जाना जाता है उसकी शुरुआत 1969 में हुई जिसका मक़सद था हर साल कॉमनवेल्थ देशों के किसी लेखक द्वारा अंग्रेज़ी में लिखे एक उपन्यास को उस साल के सर्वश्रेष्ठ उपन्यास के रूप में पुरस्कृत करना। 2014 से इस पुरस्कार के दायरे का विस्तार किया गया और अब यह पुरस्कार मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखित और इंग्लैंड में प्रकाशित किसी भी किताब को दिया जा सकता है। यह पुरस्कार आधी सदी से अधिक आयु का हो चुका है जिस किताब को बुकर प्राइज़ मिल जाता है दुनिया भर में उसको उस साल के एक जरूरी उपन्यास के रूप में पढ़ा जाता है।

गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘रेत समाधि’ के अनुवाद ‘द टुंब ऑफ़ सैंड’ के लिए लेखिका गीतांजलि श्री और उपन्यास की अंग्रेज़ी अनुवादिका डेज़ी रॉकवेल को जो बुकर प्राइज़ मिला है उसको इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ कहा जाता है। 2005 से 2015 के बीच यह पुरस्कार अंग्रेज़ी में लिखने वाले लेखकों के साथ साथ उन लेखकों को भी मिल सकता था जिनकी किताबें अंग्रेज़ी में अनूदित हों और उनका प्रकाशन इंग्लैंड या आयरलैंड से हुआ हो। अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध विद्वान हरीश त्रिवेदी ने अपने एक लेख में यह लिखा है कि मुख्य पुरस्कार से इस पुरस्कार में ‘अंतर यह भी था कि यह पुरस्कार किसी सद्य प्रकाशित कृति के बजाय किसी लेखक को उसके संपूर्ण कृतित्व पर मिलना था. इसमें हमारे उपमहाद्वीप के दो बड़े लेखक मनोनीत हुए, कन्नड़ के यू. आर. अनंतमूर्ति और उर्दू के इंतज़ार हुसैन, दोनों एक साथ 2013 में, पर दोनों को ही यह पुरस्कार नहीं मिला।’

2016 से इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ केवल अंग्रेज़ी में अनूदित उपन्यासों के लिए कर दिया गया। 50 हजार पौंड की पुरस्कार राशि को लेखकों और अनुवादकों में आधा आधा बाँट दिया जाता है। जो छह किताबें पुरस्कार के लिए नामित अंतिम छह की सूची में आती हैं उनके लेखकों और अनुवादों को भी एक हज़ार पौंड दिया जाता है। इस पुरस्कार का उद्देश्य उल्लेखनीय अनुवादों को बढ़ावा देना रखा गया। 2016 में जब पहली बार कोरियाई भाषा से अंग्रेज़ी में अनूदित उपन्यास ‘वेज़ेटेरियन’ को इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ मिला तो दुनिया भर का ध्यान कोरियाई साहित्य की तरफ गया। उपन्यास की लेखिका हान कांग की ख्याति दुनिया भर में फैली। कहते हैं कि हाल के बरसों में बीटीएस जैसे कोरियाई पॉप की दुनिया भर में प्रसिद्धि, कोरियाई खान-पान की लोकप्रियता के पीछे कहीं न कहीं अंतरराष्ट्रीय बुकर प्राइज़ का योगदान है। ध्यान कोरियाई साहित्य की ओर गया, उस उपन्यास की जड़ें अपने समाज में थीं तो दुनिया का ध्यान उस समाज की ओर गया, उसके खान-पान की ओर गया, सिनेमा की ओर गया।

यह बात ध्यान रखने की है कि 2020 में दक्षिण कोरिया की फ़िल्म ‘पैरासाइट’ सर्वश्रेष्ठ सिनेमा का ऑस्कर पुरस्कार पाने वाली पहली ग़ैर अंग्रेज़ी फिल्म बनी। यानी ऑस्कर के इतिहास में पहली बार किसी ऐसी फ़िल्म को बेस्ट पिक्चर का अवार्ड मिला जिसकी मूल भाषा अंग्रेज़ी यही ही नहीं, वह एक एशियाई भाषा कोरियन की फिल्म थी। यही नहीं उपन्यास की अनुवादिका देबोरा स्मिथ की प्रसिद्धि बहुत बढ़ गई। अनुवाद के क्षेत्र में उनका नाम अंतरराष्ट्रीय स्तर समादृत नाम है। इस पुरस्कार ने पहली बार लोगों का ध्यान इस बात की तरफ दिलाया कि अनुवादक की महत्ता ही नहीं सत्ता भी हो सकती है। अनुवाद को लेकर पहले से भी कुछ पुरस्कार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदान किए जाते हैं लेकिन इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ ने अनुवादकों की सत्ता को स्थापित करने का काम किया है।

2016 से यानी जब से इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ को केवल अनुवादों का पुरस्कार बनाया गया तब से लेकर आज तक यह पुरस्कार अनुवाद की सात किताबों के लिए दिया जा चुका है, सात भाषाओं की अनूदित कृतियों के लिए दिया जा चुका है। कोरियाई भाषा के बाद यह पुरस्कार हिब्रू, पोलिश, अरैबिक, डच, फ्रेंच भाषाओं के लेखकों के बाद सातवीं भाषा के रूप में हिंदी भाषा से अनूदित उपन्यास के लिए दिया गया है। अब तक सभी पुरस्कार उपन्यासों के लिए दिए गए हैं, लेकिन पुरस्कारों की अर्हताओं में केवल उपन्यास होना नहीं है, क्योंकि इस साल जिन छह किताबों को अंतिम रूप से शॉर्टलिस्ट किया गया था उनमें कोरियाई लेखिका बोरा चुंग की किताब ‘कर्स्ड बनी’ भी है जो कहानियों का संकलन है। यह बात विशेष रूप से रेखांकित की जानी चाहिए कि कोरियाई  भाषा की लेखिका को 2016 में पहली बार इंटरनेशनल बुकर मिलने के छठे साल ही कोरियाई भाषा से अनूदित किताब दुबारा इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ के लिए शॉर्टलिस्ट की गई। कोरियाई भाषा, कोरियाई समाज, उसकी मान्यताएँ, उसकी परम्पराएँ ‘द वेज़ेटेरियन’ और उसके अनुवाद के साथ लोकप्रिय हुई।

यह बात भी समझ लेना बहुत जरूरी है कि किसी भाषा की कृति का अंग्रेज़ी अनुवाद ही काफ़ी नहीं है। जिस तरह से बुकर प्राइज़ के लिए 2014 से अर्हता में यह बदलाव किया गया कि किताब का लेखक केवल राष्ट्रमंडल देशों का नहीं बल्कि किसी भी देश का हो सकता था। बस यह ज़रूरी था कि किताब का प्रकाशन इंग्लैंड या आयरलैंड से हुआ हो। उसी तरह इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ के लिए अर्हता यह रखी गई कि किताब का अनुवाद किसी भी भाषा से अंग्रेज़ी में हो सकता था बस शर्त यह थी कि अंग्रेज़ी में अनूदित किताब का प्रकाशन इंग्लैंड या आयरलैंड से होना चाहिए। प्रसंगवश, रेत समाधि के अनुवाद ‘द टुंब ऑफ़ सैंड’ का प्रकाशन इंग्लैंड के टिल्टेड ऐक्सिस प्रेस ने अगस्त 2021 में किया था और भारत के प्रसिद्ध अनुवादक अरुणावा सिन्हा ने ने अपने सोशली मीडिया पोस्ट में यह लिखा था कि रेत समाधि उपन्यास की अंग्रेज़ी अनुवादिक डेज़ी रॉकवेल का ब्रिटेन के उस प्रकाशक से परिचय उन्होंने ही करवाया था। उसके बाद किताब का प्रकाश ब्रिटेन से हुआ। उसके बाद रेत समाधि के अनुवाद ‘द टुंब ऑफ़ सैंड’ ने इतिहास रच दिया। कहा यह जा रहा है कि भारतीय भाषाओं के लिए ‘गीतांजलि’ को मिले नोबेल पुरस्कार ने जिस गौरव बोध से भरा था उसके बाद यह दूसरों बड़ी घटना है, सौ से भी अधिक साल के बाद घटित होने वाली। यह सच है कि हिंदी साहित्य समेत तमाम भारतीय भाषाओं के साहित्य के लिए अंतरराष्ट्रीय पहचान दर्ज करवाने के लिए यह बहुत बड़ी घटना है।

लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि यह अनुवादकों के प्रयास का पुरस्कार है। किसी भाषा के उपन्यास या किताब का चयन अनुवादक करता है, किताब इंग्लैंड या आयरलैंड से प्रकाशित हो इसके लिए प्रयास अनुवादक करता है। इसके बावजूद इस बात की गारंटी नहीं होती कि वह किताब बुकर की अंतिम सूची में आ पाएगी या नहीं। जो किताबें अंतिम सूची में आ जाती हैं वह लेखक के साथ-साथ अनुवादक और प्रकाशक के भाग्य को बदल कर रख देता है। अंतिम सूची की घोषणा के बाद इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ की अंतिम घोषणा के बीच पर्याप्त अंतर रखा जाता है। इस दौरान दुनिया भर में उन किताबों के अंग्रेज़ी अनुवाद की अच्छी बिक्री होती है। बुकर अनुवादक, प्रकाशक और लेखक सबको भरपूर कमाई का पर्याप्त मौका देता है। यहाँ तक कि मूल भाषा में भी किताब की बिक्री अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है। यह कोरियाई भाषा में हुआ और हिंदी में भी हुआ पुरस्कार की घोषणा के एक सप्ताह के अंदर ‘रेत समाधि’ की पैंतीस हज़ार से अधिक प्रतियाँ बिकीं(ऐसा रेत समाधि के प्रकाशक राजकमल प्रकाशन ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में बताया है)।

ऐसा नहीं है कि हिंदी के किसी उपन्यास या साहित्य का अंग्रेज़ी या विदेशी भाषा में अनुवाद न हुआ हो। निर्मल वर्मा के साहित्य का अंग्रेज़ी सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। यहाँ तक समकालीन लेखिका अलका सरावगी के उपन्यास ‘कलि कथा वाया बाइपास का अनुवाद भी अंग्रेज़ी समेत फ्रेंच, स्पेनिश, इटैलियन भाषाओं में हुआ। लेकिन इन अनुवादों के बावजूद हिंदी का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह मुक़ाम नहीं बन पाया जो होना चाहिए था। इसका एक कारण यह भी है कि 2016 के पहले इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ जैसा कोई पुरस्कार नहीं था जो अनुवादकों को प्रोत्साहित करने वाला है। इस बार बुकर गीतांजलि श्री के उपन्यास के अनुवाद को मिला है, आने वाले समय में हिंदी की कुछ और किताबों के अनुवादों को भी पुरस्कार मिल सकता है।

लगे हाथों यह चर्चा भी समीचीन होगा कि हिंदी से अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद के बाद क्या हिंदी भाषा की अपनी विशिष्टता बनी रह पाएगी? जैसे फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ या मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा की भाषा की जो अपनी विशिष्टताएँ हैं अंग्रेज़ी में उनका किस तरह से निर्वाह हो पाएगा? यह वाजिब सवाल है और इसका जवाब यह है कि हिंदी की विविधता को अंग्रेज़ी अनुवाद में एकसमान बना देता है। हिंदी के पाठकों को जो किताब पढ़ने में दुरूह लगी हो अंग्रेज़ी अनुवाद में उसकी व्यापक संभावनाएँ दिखाई देने लगीं तो इसका कारण अनुवाद में भाषा की उसी विशिष्टता का लोप होना है। इसके बावजूद कि रेत समाधि उपन्यास एक बड़े विजन का उपन्यास है, उसका कथानक आइडिया ऑफ़ इंडिया को समझने के एक विराट प्रयास की तरह हो, इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ मिलने के पहले हिंदी में उसका वैसा स्वागत नहीं हुआ था जैसा अब हो रहा है। इसके पीछे अन्य तमाम बातों के अलावा कहीं न कहीं यह सचाई भी है कि यह उपन्यास अंग्रेज़ी अनुवाद में बहुत पठनीय और प्रवाहपूर्ण बन गया है। इसलिए ‘रेत समाधि’ की सफलता ‘द टुंब ऑफ़ सैंड’ के बिना संभव नहीं हो सकती थी।

बहरहाल, तमाम बातों के बावजूद इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि गीतांजलि श्री के उपन्यास ने हिंदी में सबसे बड़ी लकीर खींच दी है। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी साहित्य का स्पेस और बड़ा होगा। यह तो महज शुरुआत है। सबसे बड़ी बात यह है कि इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ ने हिंदी की गम्भीर साहित्यिक परम्परा की ओर दुनिया का ध्यान आकर्षित किया है। इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी की असली विरासत उसकी अपनी गम्भीर साहित्यिक परम्परा ही है। उसकी तरफ ध्यान जाने से आने वाले समय में हिंदी की कुछ बेहतरीन किताबों के अंग्रेज़ी अनुवाद सामने आएँगे। यह तो महज शुरुआत है। आने वाले समय में हिंदी को डेज़ी रॉकवेल जैसे कुछ अन्य श्रेष्ठ अनुवादक मिलेंगे जो हिंदी को उसकी बहुप्रतीक्षित अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाएँगे। ‘इंडिया’ के बरक्स ‘भारत’ की पहचान भी दमदार बनेगी।

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