विशाल फैली पहाड़ियों ने नीला कंबल ओढ़ लिया है

युवा कवयित्री अनामिका अनु ने केरल में 12 साल में एक बार खिलने वाले फूल नीलकुरिंजी की कथा लिखी है- मॉडरेटर

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                        नीलाकुरिंजी

कल मुन्नार के चाय बगान में दौड़ती किसी लड़की को एक आदमी “नीला नीला” कहकर पुकार रहा था।उस नन्ही-सी लड़की के खिले चेहरे को देखकर मेरे मुख से निकला -“नीलकुरिंजी”

केरल में ऐसी मान्यता है कि बारह साल में एक बार  देवतागण धरा पर पधारते हैं और धरा उनके स्वागत में नीलाकुरिंजी की कालीन बिछा देती है। मुन्नार और नीलगिरि की पहाड़ियां जामुनी-नीले फूलों से आच्छादित हो जाती है। अगस्त से अक्टूबर तक अपनी अनुपम छटा बिखेरते इन पुष्पों का सौन्दर्य अप्रतिम है।

मलयालम में इस घंटीनुमा नीले पुष्प को ” नीलाकुरिंजी” कहते हैं। हिन्दी में इसे “नीला करवी” और वनस्पति विज्ञान में इसका वैज्ञानिक नाम है-“स्ट्रोबिलैंथस कुंतीआना”

इस प्रजाति के नामाकरण” की कथा भी काफ़ी दिलचस्प है।केरल के पल्लाकाड में “साइलैंट वैली नेशनल पार्क” के बीचों बीच एक खूबसूरत बलखाती नदी बहती है, नाम है- “कुंती”। इसी नदी के आसपास नीलाकुरिंजी की लहलहाती मुस्कुराती फ़सल को देखकर वनस्पति वर्गिकी वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति का नाम रखा- “स्ट्रोबिलैंथस कुंतीआना”

नीलकुरिंजी एकैनथेसिया परिवार (बारलेरिया परिवार) का सदस्य है।स्ट्राबिलैंथस की लगभग ३५० प्रजातियां हैं  इनमें से लगभग ४९प्रजातियां केरल में पायी जाती है और मुन्नार के “एराविकुलम नेशनल पार्क’ में कुरिंजी की २० प्रजातियां देखने को मिल जाती हैं। वनस्पति विविधता और संपदा के मामले में केरल एक संपन्न राज्य है।

नीलाकुरिंजी एक उष्णकटिबंधीय एकश: फलनी पौधा है। यह पौधा अपने जीवनकाल में एक बार ही पुष्प और बीज देता है।वह भी बारह साल में सिर्फ एक बार।

बीज से पौधा बनने और पौधे के वयस्क होने में बारह वर्ष का समय लग जाता है,तब जाकर नीलाकुरिंजी का पुष्प खिलता हैं।

अपस्थानिक मूल वाला यह पौधा अपनी विशिष्ट पुष्प-फलन क्षमताओं के साथ-साथ अपनी औषधीय उपयोगिता के लिए भी जाना जाता है।

वैसे तो स्ट्राबिलैंथस की कई प्रजातियां विभिन्न प्रकार की बिमारियों की अचूक दवा है और इनसे प्राप्त एथेनाॅल सत्व का प्रयोग जीवाणुरोधी, कवकरोधी और कृमिनिस्सारक के रूप में होता आ रहा है। नीलाकुरिंजी के भी विभिन्न भागों से प्राप्त सत्व- स्नायु विकार,कटिस्नायु विकार,जलशोथ,जोड़ों के दर्द और सूजन में बहुत आराम पहुंचाता है।

ठंड फिज़ा,चाय बगान और नीली पहाड़ियां देख कभी- कभी एक प्रेम कथा याद आ जाती है ।

बारह साल में एक बार रंगों की ऐसी बारिश हुई कि वादियां जामुनी झांस लिए नीली फूलों से ढंक गयी।पुष्प के सागर में अठखेलियां करती पहाड़ियां खुला आमंत्रण दे रहीं थीं चिड़िया,भंवरे,बादल,सूरज,देवता और मनुष्य को।ऐसे में नीला आसमान भगवान मुरूगन ( भगवान कार्तिकेय) के साथ ज़मीन पर उतरा और गहरा नीला हो गया। युद्ध के देवता मुरूगन का हृदय क्रियादेवी “वल्ली” को देखकर नीलाकुरिंजी हो गया और  इसी पुष्प की माला पहनाकर उन्होंने एक दूसरे को वरण किया।ये भगवान मुरुगन का प्रेम-विवाह था और वल्ली उनकी दूसरी पत्नी थीं।

राॅबिन्सन ने अपनी बोटेनिकल डायरी में 1838 से 1934 के बीच जिन वर्षों में यह फूल खिले थे ,उनको नोटबद्ध किया है ।सबसे रोचक बात यह है कि आज भी इन पहाड़ियों पर रहने वाले आदिवासी इस फूल के खिलने को आधार बनाकर ही उम्र की गणना करते हैं।

मुमताज़ इस्माइल ने अपनी कविता

“नीला कुरिंजी ब्लुम्स” में मुन्नार की पहाड़ियों पर खिले इस हृदय पुष्प  के बारे में लिखा है –

“विशाल फैली पहाड़ियों ने नीला कंबल ओढ़ लिया है,

मुन्नार की पहाड़ियों ने नीला कुरिंजी को हृदय से लगा रखा है,

लग रहा है मानो यह अलौकिक सौंदर्य वाली परियों की ज़मीन हो।”

दो हजार साल पुराने तमिल साहित्य में भी इन पुष्पों के अप्रतिम सौंदर्य और इनके पराग से बने मधु का वर्णन मिलता है। संगम साहित्य में भी इसके बारे में लिखा गया है और करूनटोकाई(Kuṟuntokai)में  इस पुष्प की चर्चा भी हुई है।क्लेर फ्लाइन के ऐतिहासिक उपन्यास “कुरिंजी फ्लावर” में नीला कुरिंजी के पृष्ठभूमि पर 1940 की एक दुख भरी प्रेम कथा लिखी गई थी।स्थानीय लोगों की मान्यता है कि मंदिर की घंटियों से दिखते ये नीले फूल जब-जब खिलते हैं ,तब तब भगवान धरा पर आते हैं और धन-धान्य,स्वास्थ्य एवं समृद्धि में वृद्धि होती है ।

केरल की सुप्रसिद्ध कवियत्री ” सुगत कुमारी” ने इस खूबसूरत पुष्प पर एक कविता लिखी है।

इस कविता में कवियत्री  नीलाकुरिंजी के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कहती हैं कि दूर पूर्वी पहाड़ी इलाकों में  सुन्दर नीलाकुरिंजी समुद्र सी खिली और फैली है। मैं वहाँ नहीं जा पा रही हूँ, लेकिन जिन्होंने भी ये नज़ारा देखा है वे कह रहे हैं कि वह दृश्य बहुत मनमोहक है।उसमें कृष्ण के श्याम शरीर की आभा है और वहाँ प्रकृति अपने सुन्दरतम स्वरूप में है।काले सूने पर्वत कई साल तपकर तपस्या करते हैं तब जाकर बारह साल में एक बार एक दिन अचानक ये फूल खिल उठते हैं ।

कवियत्री आशंका जताती हैं कि अब वह बूढ़ी हो रही हैं, बुढ़ापे की देहरी पर खड़ी हैं,आगे बारह साल बाद जब ये फूल खिलेंगे तब तक वे जिन्दा रह सकेंगी या नहीं?

 २०१८ में जब नीला कुरिंजी खिला था तब लोन्ली प्लेनेट ने एशिया में वर्ष 2018 की सबसे खूबसूरत जगहों में पश्चिमी घाट को भी शामिल किया था।

 २०३०का इंतजार है,जब एक बार फिर मुन्नार नीला हो जाएगा और देवों के देश का दिल और हरा!

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