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  • लोकगीत एक लड़की है: वागीश शुक्ल

    युवा कवयित्री आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ का प्रेम-पत्र संग्रह आया है ‘लोकगीत सी लड़की’। सर्वभाषा प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह पर यह टिप्पणी लिखी है जाने-माने विद्वान वागीश शुक्ल जी ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    ‘लोकगीत’ जिन्हें कभी ‘ग्राम्यगीत’ कहा जाता था , हमारे ‘नागर’ हिन्दी-साहित्य-समाज की नजरों से ओझल कभी नहीं रहे किन्तु उनसे एक सचेष्ट दूरी बनाये रखी गयी है। वे एक सैरगाह की हैसियत में हैं जहाँ कभीकभार जाया जा सकता है और अगर कुछ दिलचस्प लगे तो वहाँ से ला कर उसे मञ्च पर दिखाया भी जा सकता है। समय के साथ बाजार ने इन्हें भी पहचान लिया है और अब इनके ‘रचनाकार’ भी सामने आ रहे हैं जिनमें से एकाध अपवादों को छोड़ कर प्रायः सभी किसी माल से खरीदा गया वल्कल पहन कर शकुन्तला दिखने की कोशिश में लगे हैं।

    लोकगीत में चैती और सोहर जैसे कई विभाजन विषय-वस्तु और छन्द वग़ैरा के आधार पर किये जाते हैं किन्तु उस ज़िन्दगी की झलक हमारे जमाने में कम दिख रही है जिसमें से ये उपजते रहे हैं। वह ज़िन्दगी क्या इसलिए ग़ाइब हो रही है कि धोती और साड़ी की जगह जीन्स और लैगिंग लेते जा रहे हैं? मेरा ख़याल है नहीं- और इस ख़याल को मज़बूती मिली जब मैंने आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ की छोटी सी किताब लोकगीत-सी लड़की पिछले दिनों पढ़ी।

    किताब दादी के ‘जिउतिये’ को समर्पित है दादी जिन्हें हमारे समाज ने किसी अँधेरे कोने में ढकेल दिया है और ‘जिउतिया’ जो जीवन से ही नहीं, शब्दकोषों से भी बाहर है। टेलीविजन ने इधर करवा चौथ और राखी की रंगीन वापसी की है और सिन्दूर माँग से उफन कर नाक तक पहुंच रहा है किन्तु कुकरी क्लासेज के विडियो से सीखे मसालों की तरह ही इन सब में देह नामौजूद रहती है, आत्मा की तो बात ही छोड़िए।

    किताबें माँ या बाप को समर्पित करना हिन्दी में नया नहीं है किन्तु माँ और दादी में फ़र्क सिर्फ़ ‘न्यूक्लियर फैमिली’ और ‘ज्वाइन्ट फैमिली’ का नहीं है- दादी परम्परा है जिसकी मौजूदगी में ही माँ उसका अग्रेसरण करने में समर्थ है। मुझे निजी तौर पर और अच्छा लगा होता अगर दादी’ की जगह ‘आजी’ होता किन्तु शब्द-व्यवहार से तात्त्विकता नहीं बदलती यह ‘आजी दादी का ‘जिउतिया’ ही है जिसने बाप को जिलाये रखा ता कि बेटी-बेटा जनम ले सकें।

    ‘जिउतिया एक धागे का नाम है जो चौबीस घन्टे के निर्जल उपवास के बाद बेटे के गले में पहना कर स्त्रियाँ कुछ अन्न-जल ग्रहण करती हैं- व्रत पुत्र की लम्बी ज़िन्दगी के लिए होता है और पण्डितों की भाषा में इसका नाम ‘जीवत्पुत्रिका’ है जिसका तात्पर्य ऐसी स्त्री से है जिसका बेटा ज़िन्दा है किन्तु ‘जिउतिया’ का अर्थ ‘जिलाने वाली’ है- यह धागा ही है जो बेटे को जिलाये रखता है। जन्म देने से ले कर जीवन बचाने का काम माँ का है। यहाँ शायद एक ‘विमर्श’ उपजेगा – बेटी के लिए क्यों ऐसे व्रत का विधान नहीं है? मेरी समझ में इसलिए कि उसे किसी और का वंश-विस्तार करना है-ठीक ऐसा ही जिउतिया बाँधते हुए।

    कम मालूम है कि बहन भी ऐसे ही एक धागे से भाई को बचाये रखती है-यज्ञोपवीत के समय मेखला धारण का मन्त्र है -यह मेखला मेरी उस तरह रक्षा करे जैसे बहन मेरी रक्षा करती है। अब यह रिश्ता उलट दिया गया है और जो धागा श्रावणी पूर्णिमा के दिन ब्राह्मण अपने जजमानों की रक्षा के लिए बाँधते थे उसे बहनें भाई को बाँध कर अपनी रक्षा की याचना करती है। किन्तु सच वही है जो आकृति विज्ञा ने पिपरा क जोड़ नाहीं पान के पतइया हो (पृ 103-105) में लिखा है:

    प्रेयसी के नयनों में काजल बस इसलिए नहीं होता कि वह सौन्दर्य का अङ्ग है बल्कि इसलिए भी होता है कि नयनों में बसने वाले केशव को कोई नज़रा न दे। हमारी दुनिया में कोई यह बात नहीं करता कि बेटी-बेटा को ‘सन्तान’ क्यों कहते हैं। ‘सन्तान’ का अर्थ ‘विस्तार’ होता है- जैसे ‘संसार’ का भी। तो यह एक स्वीकार का नाम है हम न होते अगर माँ-बाप न होते जो न होते अगर आजा-आजी नाना-नानी न होते। माँ और बहन से सुरक्षित पुरुष को एक स्त्री अपनी पनाह में लेते हुए लोक को दिशा और काल के अक्षों पर आगे बढ़ाती है। इन बातों के शास्त्रीय आधार पर मैंने कुछ अपनी पुस्तक आहोपुरुषिका में लिखा है, उसे न दुहराऊँगा किन्तु लोक स्त्री से ही बनता है।

    लोकगीत एक लड़की है- रचना में विराजमान, स्वर में शोभायमान । किताब प्रेमपत्रों के संग्रह के रूप में प्रस्तुत है किन्तु पत्र किसको लिखे गये हैं यह लेखिका को भी मालूम नहीं है- मछली जल को चाहे क्यों और कैसे, वह तो जल के बिना रहेगी ही नहीं। पृ 16। मछली जल को कैसे पत्र लिखती है? यह आवाहन करते हुए कि जल में गङ्गा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु, कावेरी, सब सन्निधि करें- जल चाहे अक्वेरियम में ही हो, वह हमेशा सप्तसिन्धु का जल होता है। इन पत्रों में दादा-दादी नाना-नानी सब मौजूद हैं और अब चाहे माँ रुठे या बावा, यारा मैंने तो हाँ कर ली की कोई गूँज नहीं है। किन्तु हैं ये एक प्रियतम को ही लिखे गये जो अज्ञात भले ही हो, अनाम नहीं है क्योंकि जैसा पृ 15 पर कहा गया- लड़की राम जी को जीती है।

    लेकिन राम जी कुछ दूर हैं- माथे की भंवरी हमारे प्रेम में डूबने की पुष्टि कर रही है (पृ 39) किन्तु माथे पर की भैवरी नदी में डूबने का ही संकेत नहीं देती-एक लोक-विश्वास यह भी है कि जिस लड़की के माथे पर भँवरी होती है उसका ब्याह किसी दूर देस में होता है। वह दूर देस शायद आँखों में ही बसा है- जब काजल करती हूँ तो अपनी पुतलियों में एक मुस्कराता दिव्य तत्त्व का

    स्रोत देखती हूँ (पृ 38)।

    बिना ऐसी दिव्यता के ऐसी पंक्तियों क्योंकर लिखी जा सकती है?

    उनके मुसकाने में कोई जादूटोना राम जी

    इस बावरिया का तुम देखो जोगन होना राम जी

     धनुह नैन पर चाप चढ़े हैं कैसे ना दिल हारें हम

     उनके होने में ही है अब मेरा होना राम जी ॥

    बहुत से गीतों में ‘हो रामा’ और ‘हो राम’ आता रहता है- कभी पँक्ति के बीच में, कभी पँक्ति के आखीर में। इस ‘राम’ का कोई ‘अर्थ’ नहीं होता उस आदत की तरह जो जंभाई लेते समय ‘हे राम’ कहने के लिए मजबूर करती है।

    ख़ुशबू को परवीन शाकिर की कविता ने लड़की के साथ अग्र प्रस्तुत किया और यह काम आकृति विज्ञा के जिम्मे था कि वे यह छिपा हुआ सवाल उजागर करें कि ख़ुशबू ज़हन में है या गुलाल में। उन्होंने इसका जवाब भी दिया है- ख़ुशबू ज़हन में है (पृ 12)।

    परवीन शाकिर की एक ग़ज़ल का आख़िरी शेर है:

    इस असीरी में भी हर साँस के साथ आती है सहन+ए+ज़िन्दाँ में उन्हें दश्त-ए-वतन की ख़ुशबू ॥

    [ असीरी= क़ैद ; सहन+ए ज़िन्दाँ = क़ैदखाने के अहाते के भीतर का आँगन; दश्त+ए-वतन= अपने देस का उजाड़ जिसमें अपनी रहन है। ]

    जिसे मैं बदल कर अब इस तरह से भी पढ़ना चाहूंगा:

    इस असीरी में भी हर साँस के साथ आती है सहन+ए+ज़िन्दाँ में मुझे मेरे ज़हन की खुशबू ।

    एक वाक्यांश – आँखों का झरना और साथ में मुस्कराना (पृ 11) ने भी परवीन शाकिर की याद दिलायी:

      लड़कियों के इस अजब होते हैं सुख उनसे अजीब

     हँस रही हैं और काजल भीगता है साथ-साथ ।

    लोकगीत ‘ग्राम्यगीत’ कहलाते ही नहीं, माने भी जाते हैं। मुझे एक श्लोक याद आया जिसे आत्मानन्द ने अस्यवामीय सूक्त के पहले मन्त्र (ऋग्वेद 1-164-1) की व्याख्या में उद्धृत किया है।

    ग्राम्यो विशस्तैजसोऽदिश्चान्तिमः प्राज्ञ ईरितः

    तुरीयं श्वेतमत्राहुः सर्वानुस्यूतमद्वयम् ॥  १

    मोटे तौर पर जागते हुए की दुनिया ‘ग्राम्य’ कहलाती है, सपने देखते हुए की दुनिया ‘तैजस’ और सोते हुए की दुनिया ‘प्राज्ञ इन सबसे परे चौथी दुनिया ‘श्वेत’ नाम की है और अद्वैत सर्वत्र अनुस्यूत है।

    फिलहाल इस श्लोक को आध्यात्मिक संसार से बाहर खींचते हुए मैं यों पढ़ना बाहता है: जब तक हम जागते हैं तभी तक हमें गाँव दीखता है- उसके बाद जो है वह सपना है या नींद है, या फिर ब्रह्मज्ञान है।

    लोकगीत उनका गीत है जिनकी आँखें खुली हैं। जिस लड़की की आँखें खुली हैं वही लोकगीत-सी लड़की हो सकती है। शहर में आते ही आँखों की जगह रंगीन चश्मे चढ़ जाते हैं यह बाद और वह वाद के चश्मे। वहाँ से देखने पर गाँव भी यह-वादी वह वादी गाँव दिखता है और महानगर के मेल्टिंग – पॉट में विलीन हो जाता है- फिर इसके बाद वह कोई हेड गियर पहन कर आदिवासी फेस्टिवल के कास्यूम शो में उतरने के ही काम का रह जाता है।

    इस किताब पर लिखते हुए मुझे ज़ाती तौर पर यह मुश्किल पेश आयी कि मैं उन दिनों में लौट गया जिन दिनों में मैं स्कूल के बाहर भी उन लोगों से कुछ सीख सकता था जिनकी स्कूली शिक्षा मेरे मुक़ाबिले कुछ न थी। अपने भरसक इस ताकत को बचाये रखने की मैंने बहुत कोशिश की है लेकिन महानगरीय जीवन में लोग किसी-न-किसी साँचे से निकल कर आते हैं। तो हालाँकि घनघोर अरन में बूंदाबादी (पृ 78-80) के इस अंश:

    हमने जंगल काटे। रास्ते बनाने के बजाय हम जंगल हटा रहे हैं। हर फ़्लैट की खुदाई के नीचे किसी खेत का क़ब्र मिलेगा और किसी पार्क की सीमेन्टेड कुर्सी के नीचे तड़पता कुँआ में मैं यह सुधार कर सकता हूँ कि ‘का क़ब्र मिलेगा न लिख कर ‘की क़ब्र मिलेगी’ लिखो -जो एक भोजपुरिया होने के नाते मुझे नहीं करना चाहिए-इससे मूल प्रश्न अनुत्तरित रहता हैः खेत ख़ुद जंगल की कब्र के ऊपर बसता है और फ़्लैट ही नहीं, झोंपड़ी भी खेत की क़ब्र के ऊपर ही बड़ी होती है: तो क्या मनुष्य के बसने के लिए कोई जगह ही इस धरती पर नहीं है? सोचने पर हिंसा की एक शृंखला दिखायी देती है जिसके सिरे आपस में गुंथे लगते हैं- जंगल उजाड़ कर शहर बसता है लेकिन इन्सानी बसाव के हार मानते ही जंगल फिर बढ़ आता है, पेड़ महलों को गिरा कर चढ़ आते हैं और सियार से ले कर शेर तक के बसने की जगह तैयार हो जाती है। किसी के होने की क़ीमत किसी का न होना है।

    चेतना के स्तर पर शायद केवल भारतीय मन ने इसको पहचाना था जिसने अपने गृहस्थों को आदेश दिया कि तुम अपनी रसोई में जीमने तक चक्की और चूल्हे से जितनी हिंसा करते हो उसके प्रायश्चित्त के लिए बलिवैश्वदेव करो- पहली रोटी गाय को, आख़िरी रोटी कुत्ते को दो, बुला कर खिलाओ, खिला कर खाओ। अब , जब कि हमारा बहुत सा आचरण ‘कर्मकाण्ड’ होने के नाते तिरस्करणीय हो चला है, केवल उस गँवारूपन में ही कुछ स्वच्छता झलकती है जिसने लोकगीतों को अभी मरने से रोक रखा है और उनके भरोसे पर्व-त्यौहारों को बचाये रखा है ताकि दिवाली ‘फ़ेस्टिवल आफ़ लाइट्स’ तक न रह जाय।

    बछड़े को बधिया करके उसकी नाक में रस्सी बाँधकर उसे बैल बनाने वाले को उसके पाप से मुक्ति दो बैलों की कथा की वह ‘आज़ादी’ नहीं दिलाती जो हीरा और मोती अपने धान पर लौट कर पाते हैं. परती परिकथा की ताजमनी का यह सवाल दिलाता है जो वह बैलगाड़ी दौड़ में हारे हुए जितेन्द्र से पूछती है- बैलों को कभी अपने हाथ से रोटी गुड़ खिलाते हो? ताजमनी और मलारी, जो गीत टोलियों की ‘मूलगैन’ हैं इस बात को समझती है कि पछाड़ मार कर रोने से पछाड़ मार कर खिलखिलाने को कैसे उपजाया जा सकता है और आसमान में उड़ने वाली सामा चिड़िया को कैसे इन्सान से मुख़ातिब किया जा सकता है।

    साहित्य बहुत से काम करता है- फ़िलहाल, और अक्सर इसके पहले भी, वह कोई-न-कोई अजेन्डा चला रहा होता है ताकि इन्सान की बटमारी को बौद्धिक समर्थन दिया जा सके। उसमें वह रुलाई कहीं नहीं है जो हिसा की लगाम खींचती हुई उसे गतिशीलता की शर्त तक सीमित करती है और उतनी ही धूल उड़ाने देती है जितनी चलने दौड़ने में अपरिहार्य है, न ही वह ख़ुशी है जिससे साबित होता है कि अस्तित्व की अनिवार्य हिंसा से कुछ अहिंसक भी उपज सकता है। यह रुलाई और यह ख़ुशी केवल उन अनाम स्त्रियों की वाचनाओं में मौजूद हैं जिन्होंने रिश्तों में बंध कर माँ, बेटी, बहन, पत्नी, रक्षिता बन कर मनुष्य को उसके अहङ्कार के अकेलेपन से उबारते हुए पेड़, पहाड़, नदी, और दूसरे इन्सानों से जुड़ने को विवश किया।

     तुम खोंइछा के चाउर हो (पृ 108-110) में ‘खोइँछा’ को ले कर कुछ बातें लिखी हैं। उन्हें थोड़े विस्तार की जरूरत है। ‘खोइँछा’- थोड़ा सा चावल जो विवाहिता स्त्री के आँचल में मंगल द्रव्य के रूप में विदाई के समय बाँधा जाता है-सिर्फ़ नैहर से ससुराल जाने वाली स्त्री को नहीं पड़ता, द्विरागमन के बाद कुटुम्ब का अङ्ग बन चुकी बहू के लिए भी पड़ता है और किसी आगन्तुका की घर से विदाई के वक़्त भी पड़ता है क्योंकि यह भी घर में बसने के नाते कुटुम्ब का ही अङ्ग है। यह उस कौटु‌म्बिकता की ही अन्नमय अभिव्यक्ति है जिससे स्त्री संसार रचती है- सर्जना और सम्पोषण को समेटती हुई जिसका जिम्मा वह लेती है। सृष्टि और स्थिति का ब्रह्मा और विष्णु की शक्तियों का एकत्र समन्वय ही ‘साँ

    ‘खोंइछा’ कहलाता है। और चूँकि विष्णु का मोहिनी अवतार कालकूटपायी मृत्युञ्जय महादेव की अमृत वितरण करती हुई शक्ति है इसलिए अभय उसी में सन्निहित है:

    आँचल के छोर में बंधे साँइछे के चाउर में पूरा ब्रह्माण्ड उतर आया है। चलो आज काजर पार लेती हूँ ताकि कोई ब्रह्माण्ड को नजरा न दे।

     

     

     

     

     

     

     

    2 thoughts on “लोकगीत एक लड़की है: वागीश शुक्ल

    1. शुक्रिया जानकीपुल

      मुझ जैसी एक नवागंतुक के लिये अत्यंत सौभाग्य की बात है कि मूर्धन्य आलोचक व साहित्य-मर्मज्ञ वागीश शुक्ल जी ने पुस्तक “लोकगीत सी लड़की” की समीक्षा की है । यह आशीर्वाद मेरे लिये साहित्यिक जीवन का वो पहलू है जिसपर मेरी स्थिति आप यूं समझें कि ,” अंतर्गत ही भावे” । यह आशीष इस जीवन का वह खोइछा है जिसे अपने मन आँचल मे सदैव ज़िम्मेदारी-पूर्वक सहेजे रहूँ ऐसी कामना व माँ वागीश्वरी से प्रार्थना है।

    2. क्या बेहतरीन समीक्षा की गयी है बहुत सुंदर।।
      साहित्य आज तक में मैंने लेखिका का इंटरव्यू सुना था जिससे मैं पहले से ही प्रभावित हुआ पर जब यह समीक्षा पढ़ी तो साहित्य का सूक्ष्म और विस्तृत दृष्टिकोण समझ पाया इस पुस्तक का मूल्य समझ पाया।। पिछले दिनों साहित्य अकादमी के मुख्य 10 की सूची में शामिल होने के साथ साथ कई सरकारी व अन्य पुरस्कारों से पुरस्कृत इस पुस्तक और इसकी लेखिका को अनंत कोटि साधुवाद।। ऐसी और भी रचनाएं मां वागीश्वरी की दया से आप करती रहें ऐसी प्रार्थना के साथ पुनः बहुत शुभकामनाएं।।

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