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  • इंटरनेशनल बुकर प्राइज के लांगलिस्ट और बानू मुश्ताक़

    साल 2025 के लिए इंटरनेशनल बुकर प्राइज के लांगलिस्ट की घोषणा हो चुकी है। साल 2022 के बाद एक बार फिर से एक भारतीय भाषा की लेखिका का नाम इस सूची में नमूदार है। 25 फ़रवरी 2025 को 76 वर्षीय बानू मुश्ताक़ इस सूची में शामिल होने वाली कन्नड़ भाषा की पहली लेखक हैं, जिन्हें अंग्रेज़ी में अनूदित उनके कहानी संग्रह ‘हार्ट लैंप’ के लिए इस पुरस्कार के लिए नामित किया गया है। ‘हार्ट लैंप’ बानू का कहानी संग्रह है जिसमें कुल बारह कहानियाँ हैं। संग्रह में शामिल सभी कहानियाँ 1993 से 2023 के बीच लिखीं गई हैं। कन्नड़ से इसका अंग्रेज़ी अनुवाद दीपा भष्ठी ने किया है। दीपा ने इससे पहले बानू मुश्ताक़ के पहले कहानी संग्रह ‘हसीना एंड अदर स्टोरीज़’ का अनुवाद किया था जिसे पिछले साल का इंगलिश पेन ट्रांसलेशन अवार्ड मिला है। इस साल के इंटरनेशनल बुकर प्राइज की लाँग लिस्ट में अपनी जगह बनाए जाने के कारण बानू इन दिनों वैश्विक साहित्यिक दुनिया में चर्चा में हैं। इसी क्रम में दी हिंदू के लिटरेरी रिव्यू सेक्शन में उनका एक इंटरव्यू आया है। अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस इंटरव्यू के कुछ महत्वपूर्ण हिस्से और बानू की कही कुछ ख़ास बातें। लिखा है कुमारी रोहिणी ने- मॉडरेटर

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    लिखने की प्रेरणा से संबंधित प्रश्न पर बानू का कहना है कि ‘ मेरे लिए लिखना उतना ही आसान है जितना कि साँसें लेना। मैं जो कुछ भी सोचती और अपने आसपास देखती और महसूस करती हूँ उसे बहुत आसानी से कहानी का शक्ल दे देने में सक्षम होती हूँ। बस लिखना शुरू करने भर की देरी होती है। लिखना मेरे लिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का भी एक तरीक़ा है। कुछ ग़लत होता देखने के बाद मैं चुपचाप बैठी नहीं रह सकती। मुझे अपनी भावनाओं को जज़्ब करना नहीं आता है। मैं लिखकर प्रतिक्रिया देती हूँ।’

    अपने लेखन और विचार से बहुत सारे लोगों के नाराज़ होने, उनके ग़ुस्से का शिकार होने और उन सबसे उबरने से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए बानू कहती हैं, ‘साल 2000 का समय मेरे लिए मुश्किलों भरा था। दरअसल उससे ठीक पहले मैंने मस्जिद में औरतों के नमाज़ के अधिकार की बात कही थी और उसका समर्थन किया था। मुझे धमकी भरे फ़ोन आते थे। कई महीनों तक मैं घर में ही बंद रही और कहीं आती-जाती नहीं थी। मुझे अपने परिवार को लेकर बड़ी चिंता रहती थी, ख़ासकर अपने बच्चों के लिए मैं बहुत परेशान थी। लेकिन मेरे पति और मेरी माँ मेरे साथ थे।

    मेरी माँ, जिन्होंने बमुश्किल हाई स्कूल तक की ही पढ़ाई की है, उन्हें मालूम नहीं था कि क्या हो रहा है। लेकिन वह जानती थीं कि मैं परेशान हूँ। जब मैंने उन्हें विस्तार से पूरी बात बताई तब उन्होंने भी मेरे विचारों का समर्थन किया। उन्होंने मुझसे इतना वादा तक कर लिया कि अगर इन सब में मुझे कुछ हो जाता है तो वह मेरे बच्चों का ध्यान रखेंगी। वह बहुत ख़तरनाक समय था। उसके बाद अगले दो सालों तक मैं कुछ लिख ही नहीं पाई।’

    इंटरनेशनल बुकर प्राइज के लिए नामित होना कोई छोटी-मोटी बात तो है नहीं। ऐसी किसी उपलब्धि पर किसका दिल खुश नहीं होगा। अपना नाम इस सूची में देखे जाने और उससे जुड़े अपने अनुभवों के बारे में पूछने पर बानू मुश्ताक़ कहती हैं कि ‘कुछ साल पहले दीपा भष्ठी ने मेरी कहानियों का अंग्रेज़ी अनुवाद शुरू किया और वहीं से यह यात्रा आरंभ हुई। मेरे पहले कहानी संग्रह का नाम ‘हसीना एंड अदर स्टोरीज़’ है जिसका अंग्रेज़ी अनुवाद दीपा ने ही किया था और जिसे पिछले साल इंगलिश पेन ट्रांसलेशन अवार्ड मिला। उसके बाद दीपा ने मेरी 11 अन्य कहानियों को अंग्रेज़ी में लाने का काम किया और इस तरह मेरी किताब ‘हार्ट लैंप’ अब इंटरनेशनल बुकर प्राइज के लिए नामित किताबों की सूची में है। उन तेरह नामित लेखकों की सूची में होना मेरे लिए ख़ुशी से भरा है। इस बहाने से कन्नड़ भाषा को प्रतिनिधित्व का मौक़ा मिला है और इसे मिलने वाली ख्याति और पहचान के लिए मैं बहुत खुश हूँ।’

    बानू की लेखन प्रक्रिया भी कम चौंकाने वाली नहीं है। वह बताती हैं कि ‘चूँकि मैं वकालत करती हूँ, इसलिए लिखने का समय नहीं मिल पाता है। पहले मेरे पास एक सहायक था, जो सुनकर मेरी बातें लिखता था। लेकिन, हाल के वर्षों में, मैंने मोबाइल ऐप का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। कोर्ट के अपने ड्राफ्ट भी मैं इसी ऐप की मदद से तैयार करती हूँ।  यह मेरे उच्चारण और मेरी भाषा को समझ लेता है और बहुत कम सुधार के साथ मेरी कॉपी तैयार हो जाती है।’

    बानू ने इस इंटरव्यू में बताया कि वह आजकल अपने नये कहानी संग्रह पर काम कर रही हैं। इसके बारे में बताते हुए बानू ने कहा कि ‘ यह मेरा सातवाँ कहानी संग्रह होगा। समय बीतने के साथ लोगों के बीच की दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें मैं दशकों से जानती हूँ। वे आमने-सामने मिलकर मुझसे बातचीत नहीं करते हैं लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर मेरे राजनीतिक विचारों को लेकर उनकी जिज्ञासा कम नहीं होती है। इस संग्रह के अलावा मैं अपनी आत्मकथा पर भी काम कर रही हूँ जिसका लगभग आधा हिस्सा मैंने लिख लिया है। आगे लिखने के लिए कुछ और चीजों को इकट्ठा करने की ज़रूरत है और मुझे पूरी उम्मीद है कि मैं जल्द ही इस काम को पूरा कर लूँगी।’

    पेशे से वकील और पैशन से लेखक बानू मुश्ताक़ 1990 से पहले तक पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ी थीं। लगभग एक दशक तक न्यूज़ रिपोर्टिंग करने के बाद 1990 में उन्होंने पत्रकारिता छोड़ दी और अपने परिवार की मदद के लिए वकालत करने लगीं। हालाँकि इस दौरान भी उन्होंने कुछ कहानियाँ और कविताएँ लिखीं लेकिन उनका अधिकतर ध्यान अपने काम यानी कि वकालत पर ही रहा। मुश्ताक सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए कन्नड़ साहित्य के बनदया आंदोलन से भी जुड़ी थीं जिसकी शुरुआत 1974 में डी आर नागराज और शूद्र श्रीनिवास ने किया था।

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