आज पढ़िए अदिति भारद्वाज की कहानी। युवा लेखिका अदिति आलोचना लिखती हैं, संपादन करती हैं और कभी कभी बहुत बारीक कहानियाँ लिखती हैं। यह उनकी नई कहानी है। शीर्षक है ‘बातें’- मॉडरेटर
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उसे सपने देखने का मर्ज़ था। पहला सपना उसकी आँखों ने कब देखा था, वह ठीक–ठीक नहीं बता सकती। पर जाने क्यों उसके सपने में हर वो चीज़ थी जो उसके अपने जीवन में नहीं थी।
रात भी देर गए तक मां-बाबा के कमरे से ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें आती रहीं। सुबह आँखें खुलने पर जब उसने मां से पूछा तो मां का पत्थर बना चेहरा बीते रात की हक़ीक़त खुद बयान कर रहा था। “चले गए बाबा ड्यूटी पर, बस जल्दी जाती है न।” मां ने उसके निंदाये चेहरे की तरफ देखते हुए कहा।
“मुझे उठाया क्यों नहीं? बाबा बिना मिले चले गए।” उसका रुआँसा चेहरा मानो पूरा ही बुझ गया था।
“फिर आ जाएँगे कुछ दिन में। फ़ोन करेंगे तो बात कर लेना।” मां की आवाज़ की कठोरता ने उसे कहीं दूर पटक दिया।
अपने बचपन की यह उसकी सबसे पहली स्मृतियां थीं। हर बीतते दिन वह बरसाती घास-पात की तरह थोड़ा और बढ़ जाती। अभी तो कुछ अरसे पहले तक वह मां बाबा के बीच में सोती थी। पर जाने कब मां ने उसे बीच से निकाल कर बड़ी बहन के पास सुलाना शुरू कर दिया। पर बाबा उसे सबसे अधिक प्यार करते। बाकी भाई-बहनों पर भी बाबा जान छिड़कते। पर मां को ? क्या बाबा माँ को प्यार करते हैं? अगर करते हैं तो बाबा माँ से प्यार जताते क्यों नहीं? एक दूसरे को छूते भी नहीं ? दोनों क्यों साथ बैठकर बातें नहीं करते, हंसी के कहकहे नहीं लगाते? वैसा ही जैसा मनीषा के मां पापा करते हैं और सुष्मिता, वह तो उन जैसी है भी नहीं, जिसकी फ़ीस उसने ही बड़ी दीदी से माँग कर दिया था। उसके पिता भी तो उस दिन उसकी मां का हाथ थामे कैसे प्रेम से एक दूसरे की तरफ़ देख रहे थे। बाहर कच्चे आँगन में सुष्मि के घर डेंगा-पानी खेलते हुए उसकी नज़र खुले दरवाज़े पर बरबस ही तो पड़ गयी थी।
शायद इसी से वह सपने देखने लग गयी थी। जो एहसास ज़िंदगी में मुकम्मल नहीं थे, वह सपनों में जी लेना चाहती थी। और सपने भी क्या थे। फ़ैंटेसी। खुली आँखों देखे गये। जहां बस मन की खिड़की से पहुँचा जा सके। कभी कोई ख़रगोशों का जोड़ा होता, कभी गोरैया का तो, कभी तो उसकी कपड़ों वाली फटी-चिटी गुड़िया का ही संसार होता। पर सपनों में वो फटे नहीं होते। उनका एक छोटा पर सुंदर संवरा-सा घर होता। छत के ऊपर विस्तृत आसमान और सामने फैला हरी-भरी घासों से ढका आँगन। उसकी तरह उसके सपनों की गृहस्थी की हर चीज़ भी छोटी होती। और सबसे अद्भुत बात कि ये जोड़े कभी अकेले नहीं हुआ करते। उनके दो-तीन छोटे बच्चे भी घर को घर बनाते। और सपने में चूँकि उसे जीवन की हक़ीक़त दिखाने की पाबंदी नहीं थी तो उसके सपनों की इस दुनिया में सब कुछ सिर्फ अच्छा ही होता। मां-बाबा की तरह नहीं बल्कि प्रेम करते, हंसते और सबसे ज़रूरी, बातें करते हुए जोड़े होते। जाने क्यों उसे बातें करना सबसे अधिक ज़रूरी लगता। चुप्पियों से इतना डरती कि सपनों में भी बड़बड़ाती रहती।
‘मां, बाबा और तुम यूँ ही बेमतलब की बातें क्यों नहीं करते?” एक दिन जब वह होमवर्क बनाते हुए मां से पूछ बैठती है तो मां को उसके सवाल का मतलब ही नहीं समझ आता।
“क्या बेतुकी बातें लेकर बैठ जाती हो। बेमतलब की बात क्या होती है? हमेशा सही बातें करनी चाहिए, ज़रूरत की, काम की बात करनी चाहिए।” मां पता नहीं उसे नसीहत करती या खुद को तसल्ली देती।
“हाँ, तभी क्या तुम बाबा के आने पर सारे दिनों का होमवर्क बतलाती हो? कि क्या सब किया? और हर वक़्त सिर्फ़ ज़रूरतों की लिस्ट दिखलाती हो। कभी मेरा स्कूल ड्रेस छोटा हो गया, वो सिलवाना है तो कभी भैया के कंप्यूटर सेंटर की बक़ाया फ़ीस। तुम और बाबा बिना काम के बात क्यों नहीं करते ? उसके सवाल मानो ख़त्म ही नहीं होते और मां उसे जिस सूनी आँखों से सुनती उसका मतलब यह होता कि यह छोटी भी अब छोटी नहीं रही।
“बड़ी बातें बनाने लगी है। चलो हटो। अपना काम करो। पढ़ने में दिल लगाओ। भाई-बहन सब इतना अच्छा पढ़ते हैं, सब अफ़सर बनेंगे और तुम उनकी नौकरानी बनना।” मां बोलते हुए तल्ख़ हो आती।
पर सपनों वाले घर में जो मां होती वह प्रेम और ममता की देवी होती। बच्चे भी सभी अनुशासित, समझदार। पढ़ने के वक़्त पढ़ते, खेलने के वक़्त खेलते और सोने के वक़्त सोते। उसकी तरह नहीं जिसे कुछ भी तरतीब से करना नहीं आता था। रात को सपने देखने में नींद का हर्जाना होता तो सुबह देर से आँख खुलती। देह और मन से संघर्षों की उम्र थी, जहां हर वक़्त कोई विद्रोह कुलबुलाता रहता। और कुछ बुरी सोहबतों का भी असर था कि घर से स्कूल का कहकर निकलती और फिर दोस्तों के घर ही दिन भर खेलती, जंगल की झरबेरियों और शहतूत के फल लपकती हुई ऐन स्कूल छूटने के वक़्त घर पहुँच जाती। उसकी चोरी तो महीनों बाद भी न पकड़ी जाती अगर एक दुपहर दीदी उसकी टिफ़िन पहुँचाने स्कूल न पहुँच जाती।
“नहीं दिखी होगी। सब बच्चियाँ स्कूल ड्रेस में एक सी लगती हैं।” मां ने अविश्वास से दीदी को कहा था।
“नहीं मां, स्वाति और दीपा भी नहीं दिखी थीं। उन्हीं के साथ कहीं मटरगश्ती कर रही होगी।” दीदी ने अपनी आने-जाने की थकान को सर से पोंछते हुए कहा।
“आने दो आज उसे, मार-मार कर सीधा न किया तो। इतनी छोटी है और इतनी बेईमान हो गयी है। मां का ग़ुस्सा ज़हर की तरह फैलता जाता.. खुद तो नौकरी के नाम पर बाहर चैन से रहते हैं। मुझे इस होस्टल की वार्डन बना गए। कहाँ तक सम्भालूँ सबको मैं। किस-किस पर नज़र रखूँ।” कहती हुई लगभग रोने लगी थी मां।
शायद उस दिन पड़ी मार और घर भर की हिक़ारत का असर था कि उसने उस दिन के बाद से झूठ बोलना छोड़ दिया। या शायद बाबा की फ़ोन पर से छन-छन कर आने वाली ज़िल्लत मिली घुड़की का कमाल। “क्या सुधी, स्कूल क्यों नहीं जाती? कोई परेशानी है? सारा-सारा दिन कहाँ भटकती रहती हो? अच्छी लड़कियाँ ऐसा करती हैं?”
इस आख़री जुमले ने मां के कई तमाचों की चोट को भी मात दे दिया था। तो क्या बाबा समझते हैं कि मैं बुरी लड़की हूँ। मैं, उनकी सुधी, जो बाबा से इतना प्यार करती है, वह बुरी हो सकती है।”
जाने क्यों उस दिन के बाद से उसने अपनी तमाम फ़िज़ूल दोस्तियाँ छोड़ दीं। घर से स्कूल और स्कूल से घर करते कब ज़िंदगी एक बंधी लीक पर चलती हुई इतनी दूर आ गयी। पर उसके सपने? उसके सपनों से उसकी दूरी नहीं हो पायी। घर से दूर एक बड़े नामी गिरामी कॉलेज में पढ़ते हुए भी नहीं। इम्तिहानों में सबसे अधिक नम्बर ला कर भी नहीं। मां और बाबा से इतनी दूर हो जाने के बाद भी नहीं। प्रेम के अंतहीन विकल्पों के युग में भी नहीं।
“हाँ, आज बाबा तो बिना खाए ही चले गए थे। मां से तो महीने भर से ऊपर हुआ, बात भी नहीं की है। जाने किस बात का झगड़ा है। एक छत के नीचे रह कर भी दोनों अपनी-अपनी दुनिया में रहते हैं। मां ने तुम्हें बताने से मना किया था, तुम अब कुछ मत बोल बैठना।” जब दीदी ने फ़ोन पर बताया था तो जाने क्यों वह फिर बचपन की वह सुधी हो आयी थी, जिसके मन में सवालों की झड़ी लग गई थी।
सवाल, जिनके जवाब तो उसे होशमंद होने के बाद भी न मिले थे। अक्सर दिल में सोचती, इतने सारे बच्चों को अकेले सम्भालती मां को क्या बाबा की रोज़मर्रा की कमी नहीं खलती थी? वह सब तो मां की हमउम्र भी नहीं हैं, क्या मां को किसी साथी की ज़रूरत नहीं लगती? बाबा भी तो इतने-इतने दिन अपनी पोस्टिंग्स पर रहते हैं तो क्या उन्हें मां की याद नहीं आती होगी? और जब वो साथ होते भी हैं तो वो क्या चीज़ है जो इनके बीच के शून्य को भरने के बजाय और बड़ा करती रहती है?
एक बार छुट्टियों में जब घर गयी तो उसे जाने क्यूँ सब कुछ वैसा–का–वैसा लगते हुए भी बदला-बदला-सा लगा। बाबा ने जब से वीआरएस लिया है तब से तो मां के साथ घर पर ही रहते हैं, पर कुछ है जो उन्हें अपने-अपने घेरों में क़ैद रखता है। उस रात को मच्छरदानी लगाते हुए जब उसने विस्मय से बहन से पूछा “बड़ी दी, मां और बाबा एक कमरे में नहीं सोते अब?” तो नयी ब्याही दीदी ने उसका हाथ दबाते हुए कहा “ श्श्श……धीरे बोलो। नहीं, अब साथ नहीं सोते। मां कह रही थी अब उम्र हुई, अपना-अपना कमरा में सोना अच्छा लगता है। फैल से सोते हैं। बाबा खर्राटे भी तो कितना लेते हैं न।”
उसने अपने विस्मय भरे दुख को एकदम दबाते हुए बात बदल दिया, ‘निराले मां बाबा नहीं हैं हमारे?”
फिर रातें आतीं और उसकी उनींदी आँखें वही सपने देखने लगती। जागती आँखों वाले सपने। हाँ इन सालों में फ़र्क़ बस इतना आया है कि अब उसकी इच्छाएँ ख़रगोश या चिड़ियों के जोड़ों से संतुष्ट नहीं हो पाती। उम्र के इस पड़ाव पर उसके सपनों के घर लोगों से आबाद हो गए थे। जीते-जागते, चलते-फिरते सच्चे इंसानी जोड़े। सपने में दिखायी पड़ने वाला पुरुष तो उसे जाना पहचान लगता। कोई सहपाठी, कोई दोस्त, कोई क़द्रदान या कोई जिसे वह खुद चाहती हो, पर स्त्री की जगह उसे अपना चेहरा कभी नज़र न आता, ऐसा लगता कोई फ़िल्म चल रही हो पर जिसकी नायिका वह न हो। हाँ, एक चीज़ जो बचपन से अब तक समान थी, वह यह कि इन आदम जोड़ों में भी प्रेम उसकी रंगीन कल्पनाओं वाला ही था। स्त्री पर जान छिड़कता पुरुष और प्रेम की देवी बनी एक स्त्री। उसके ख़यालों के इस घर में एक को दूसरे से कोई कुंठा न थी। दोनों बस बच्चों को पालने और पैसे कमाने में खपते हुए से नहीं होते थे। उनका प्रेम उनसे अलग कोई वस्तु नहीं बल्कि उनके भीतर चलता–फिरता कोई जीवित प्राणी था। पर उन जोड़ों में वह अपना चेहरा कभी न देख पाती। मानो सपना तो उसकी आँखें देख रही हों, पर जिसमें होना उसकी नियति न हो।
नींद टूटने पर कानों में पड़ने वाली आवाज़ें उसे इस बात का और यकीन दिला देतीं कि सपने जीवन की हक़ीक़त नहीं बनते। “अजीब कोल्ड इंसान हो तुम सुधा। मतलब, प्रॉब्लम क्या है तुम्हारी। जब भी तुमसे कमिटमेंट की बात करो तुम समय का, करियर का हवाला क्यों देने लगती हो?” आकाश के मुंह से उनके रिश्ते की कमज़ोरियाँ सुनने की वह यूँ भी अभ्यस्त हो गई थी। पर आकाश को, जो उसके साथ उसी विश्वविद्यालय में पढ़ाता था, सुधा के तर्क कभी न समझ आते। “अभी-अभी तो पढ़ाना शुरू किया है मैंने आकाश, तुम्हारी तरह पाँच साल नहीं हुए हैं कि बस अब सब कुछ पा लिया है तो घर ही बसा लिया जाए। मुझे थोड़ा तो इस नौकरी के साथ ताल–मेल बिठा लेने दो।” कहती हुई वह खुद भी यह जानती कि उसका यह कहना वाकई टालना ही है। वह शादी को उसी तरह नहीं देख पाती जैसे कि बाकी लोग देखते। उसके सपनों वाले घर पर मां-बाबा की वास्तविकता हावी हो आती। “मुझे डर लगता है दीदी कि….कि अगर कहीं मैं भी मां की तरह ही आकाश के साथ बस रस्मी शादी में फंस गई तो उससे निकलना मेरे लिए दूभर हो जाएगा। मां ने झेल लिया पर मैं नहीं झेल पाऊँगी। मुझे शादी के बाद की उपेक्षा नहीं झेलनी।” आज कल वह बड़ी बहन से प्रायः इसी मुद्दे पर बात करती।
“पर सुधा, जरूरी तो नहीं कि तुम और आकाश भी मां-बाबा जैसा जीवन जियो। वो तुम्हें इतना पसंद करता है। तुम्हारी बराबरी का है। उसकी भी सोच इतनी खुली है। और एक बात बताओ, तुम कौन सा मां जैसा हाउस वाइफ बनने जा रही हो? तुम तो कॉलेज में पढ़ाती हो। तुमको कौन-सा घर बैठना है।” दीदी के समझाने पर भी मानो मन में कोई खटका सा छुपा बैठा रहता उसके।
मां ने एक दुपहर फोन पर कहा कि उसके पास आने का सोच रही है ताकि कुछ दिन उसके साथ रह सके। “फिर तो शादी हो जाएगी तो इतना वक़्त कहाँ मिल पाएगा।” फ़ोन पर माँ की इस बात से वह बेचैन हो आई थी। फिर वही दिन-रात शादी के लिए समझाने का सिलसिला। आकाश की अच्छाइयाँ गिनवाने से जब मन नहीं भरेगा तो फिर उलाहने पर उतर जाएगी। “क्या बुरा है मेरे और बाबा के शादी में जो इतना मन फेर दिया है शादी से। ऐसे ही होता है सबका शादी। हमलोग कौन सा प्रेमी प्रेमिका थे। मां-बाप ने करवाया और हम लोग निभाए। इतने सारे बच्चों को पढ़ाए लिखाए, सबका शादी–ब्याह, नौकरी। हम लोगों से ज़्यादा सफल कौन होगा।” इस आखरी बात तक आते-आते मां जाने क्यों एक अजीब उदासी से भर जाती। वह उस उदासी के झीने पर्दे के पार पहुँच कर मां से यह पूछना चाहती कि क्या इसीलिए केवल दो लोगों को साथ रहना चाहिए कि उनका जीवन कतर–ब्योंत करते, सामाजिक रीतियाँ निबाहते–ढोते सफल कहलाया जा सके? क्या बस इसीलिए दो विपरीत स्वभाव वाले मनुष्यों को भी समाज के नाम पर संबंध निबाह लेना चाहिए? पर मां के आने पर इस बार वह केवल “ ठीक है मां। आकाश के मां पापा से बात कर लो। वो जब चाहें मैं तैयार हूँ।” ही कह सकी। माँ ने उसके आवाज़ की उदासी को भाँपते हुए भी अनसुना ही तो कर दिया था।
सपने उसे अब भी आते हैं। आकाश से उसकी शादी के कई सालों के बाद भी। उनके बच्चे नहीं हैं पर घर किसी भी तरह से खाली नहीं कहा जा सकता। “कहाँ मां, क्लासेस के बाद भी स्टूडेंट्स की भीड़ आकाश के नाम पर तो मेरे नाम पर हमारे ही घर में जमी रहती है। हमें खुद एक–दूसरे के लिए वक़्त नहीं मिलता। बच्चे क्या खाक संभालते हम दोनों।” वह मां को नहीं बल्कि अपने आप को समझाती। पर मां हार मानने वालों में से न थी। “अरे! आज कल इतना सारा नया-नया तरीका सब आ गया है। अभी तो क्या ही उम्र है तुम दोनों की। एक भी बच्चा होना कितना ज़रूरी है, वो अभी नहीं समझ आएगा सुधी। बुढ़ापा में कोई जब देखने वाला नहीं होगा तुम दोनों को तब सालेगा कि हमारा भी एक बच्चा होता।” वह मां की इस भविष्यवाणी से आहत हो उठती है पर कहती कुछ भी नहीं। बस मन में भुनभुनाती है “बुढ़ापा में कौन देखेगा? जैसे मां–बाबा को तो बहुत देख रहे हैं बच्चे। भैया अपने ही जीवन में विदेश में व्यस्त इतना कि बुलाने पर भी न आए और बड़ी दीदी तो दूर के रिश्तेदारों से भी बढ़कर। महीने, दो महीने में एक फोन आ जाए तो गनीमत।” आकाश के साथ उसने कई बार बच्चे की इस बहस पर अपने आप को भी नकारा संतान घोषित करते हुए कहा था “मैं, जो इतनी सो कॉल्ड समझदार हो कर अपने मां बाबा को नहीं देख सक रही हूँ। मेरी संतान मुझे क्या देख लेगी। चाहिए ही नहीं बच्चे। वो भी अपने शरीर को इतना टॉर्चर कर के तो बिल्कुल भी नहीं।”
आकाश से उसकी दैहिक दूरी अब मानसिक भी हो चली थी। कई-कई हफ़्ते बीत जाते जब वह उसके साथ दो घड़ी अकेले बैठ पाती। अधिकतर समय या तो वह अपने लेक्चर्स और आने वाले सेमिनारों के लिए व्यस्त रहता और नहीं तो बचे समय में अकादमिक दोस्तों के साथ देश-दुनिया के भविष्य पर चर्चा में। पर कहने के लिए उसे अपनी कोताहियाँ भी नज़र आतीं। “मुझे खुद वक़्त नहीं रहता दीदी। कोई-न-कोई कार्यक्रम रहता ही है जिसमें न चाह कर भी जाना पड़ता है। और मेरा अपना पढ़ना–लिखना भी तो है न। मैं कितना प्रेम की देवी बनी रह कर बस घर संभालते रहूँ। और गया वो समय जब वह मुझे अपना साथी समझता था। अब तो पता है कहता रहता है कि तुम्हारा पढ़ना-पढ़ाना क्या खाक कोई काम है। साल-दर-साल एक नोट्स से भी पढ़ाओ तो भी काम चल जाए। बेकार का खुद को व्यस्त रखती हो”। कहते हुए वह मानो आकाश पर नए सिरे से विचार करने लगती। समय ने उसे चुप्पियों की डोर थाम लेना सिखला दिया था। उनकी संवादहीनता घर के कोने-कोने में अंधेरे की तरह पसरी रहती। दोनों चाह कर भी उसे मोड़ कर पड़े नहीं सरका सकते। आमने–सामने हो कर भी दोनों अपनी-अपनी किताबों में मुंह छिपाए चुप की दीवार खड़ी किए रहते।
आस-पास उड़ने वाले अफवाहों को अनसुना करके भी वह घर बचाए रखने का जतन कुछ समय से करने लगी है। “ठीक है न। मैं कितना बांध कर रखूं किसी को। हो गया। नहीं मिलता मन तो कोई क्या करे। मां-बाबा का तो कभी नहीं मिला। इतने बच्चे होने के बाद भी, तो?” एक दिन जब उसे आकाश के विभाग की ही एक प्रोफेसर ने एक कमसिन रिसर्च स्कॉलर के साथ उसकी बढ़ती नज़दीकियों की बात बताई तो वह मानो इसके लिए तैयार ही बैठी थी। उसे गुस्सा नहीं था। उल्टा जाने क्यों निश्चिंत-सी हो आई थी। वह बस रोज़ उसके समय से घर पहुँच जाने और संबंधियों के सामने अच्छे से पेश आने पर ही शुक्रगुज़ार थी।
“पता है दीदी, हमारी बातें नहीं होतीं। कभी से नहीं होतीं थीं। मैं इसीलिए उसके प्रपोज़ल को इतना टालती थी। बस नज़रों में अच्छा लगना और बात है पर जब करने के लिए कोई बातें न सूझें और जो बातें होने पर भी उलझन होने लगे तो सचेत जाना चाहिए।” वह एक शाम अचानक उसके घर आ पहुंची दीदी से जाने क्यों यह सब बिन पूछे ही कहने लगी। “मां और तुम मुझे कितना समझाते थे न कि कर लो, कर लो। मैंने भी मानो मां पर विश्वास कर लिया कि शादी ऐसी ही होती है। जैसी उसकी और बाबा की थी। बिना प्यार के। बिना बात के। बातें केवल मेरे सपने वाले जोड़ों में होती थीं। असल जीवन में कहाँ होती हैं, बातें? बताओ, होती भी हैं क्या?” वह बिना रुके कहती जा रही थी मानो सामने दीदी नहीं बल्कि वह अकेली बैठी हो और अब वह सुधा नहीं बल्कि खुद मां में बदल गई हो।


बहुत ही सरलता से, समाज की ऐसी सच्चाई को दर्शाया है जो हम या तो अनदेखा कर देते हैं या जीवन की वास्तविकता मान कर स्वीकार लेते हैं। ये कहना गलत नहीं कि शायद ये कहानी हर तीसरे घर की हो या हर तीसरे घर में ऐसी ही सपनों वाली सुधी रहती है या आपस में बेमतलब की बात नहीं करने वाले माँ-बाप। बहुत ही खूबसूरत।