• समीक्षा
  • जगत सेठ: मिथक और यथार्थ

    जगत सेठ को इतिहास की किताबों में ग़द्दार की तरह देखा गया, जिसके कारण देश में अंग्रेजों का शासन आया। उनके बारे में विस्तार से पढ़ने का मौक़ा नहीं मिला।काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना द्वारा प्रकाशित एक किताब है ‘जगत सेठ और बंगाल में अंग्रेज़ी राज्य की नींव‘, लेखक हैं पारसनाथ सिंह। उसी किताब के बहाने बंगाल के जगत सेठ पर यह दिलचस्प टिप्पणी लिखी है जाने-माने कवि-लेखक यतीश कुमार ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    इतिहास और भूगोल का अन्योन्याश्रय संबंध है।यह भी कहा जाता है कि इतिहास भूगोल पर अवलंबित है। ये अलग बात है कि किताबें हमें इन दोनों का पता ठीक से दे पाती हैं। इसी खोज में इस किताब का चयन हुआ और फिर एक ख़ज़ाना सा जैसे मिल गया इस पाठक को। कई साहित्यिक कृतियों से गुजरते हुए जगत सेठ का इतिहास हमेशा ग्रे लगा। हर किताब एक अलग दृष्टिकोण लिए दिखती, तब से खोज में था कि कोई ऐसी किताब पढ़ने को मिले जो सघन शोध का प्रतिफल हो। तब जाकर यह किताब हाथ में आई जिसे पूरा समय देकर पढ़ा।
    जगत सेठ के बारे में इतनी कहानियाँ हैं कि मुझे लगा इतिहास का यह रोचक किरदार मिथक न बन जाये इससे पहले इनकी जीवनी से गुज़र जाऊँ। काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना के पास ऐसी किताबें हैं जिसे अब इसे पढ़ने के बाद खंगालने का मन करने लगा।

    जगत सेठ का इतिहास खंगालते हुए लेखक नागौर के हीरानंद साह ओसवाल जैन के पास पहुँचता है। रोचक तथ्य यह पता चला कि हीरानंद के पिता करमचंद और पितामह अक्षयराज क्षत्रिय थे और परिवार ने धनुर्वाण त्याग कर जैन धर्म अपना लिया था। हीरानंद को पूर्वी भारत में ज़्यादा रुचि हुई और उन्होंने पटना को अपने व्यापार का केंद्र बना लिया। वे 1652 ई० में पटना आए। व्यापार में कैसे वे शीर्ष पर पहुँचे, इसके बारे में ज़्यादा लिखा उपलब्ध नहीं है, पर इतना पता है कि उनके पाँचवें पुत्र मानिकचंद पटना से निकलकर बंगाल की उस समय की राजधानी ढाका पहुँच गए।
    पटना के इतिहास में झाँका जाये तो समझ में आता है कि शुरू से शोरा यानी पोटैशियम नाइट्रेट जो कि बम बारूद बनाने में काम में आता रहा व्यापार का मुख्य आकर्षण केंद्र बन गया और इसके लिए अंग्रेज़ पटना से व्यापार के लिए इतने व्याकुल हो गए। पटना उस समय भी इसके व्यापार का मुख्य केंद्र रहा। यह उस जमाने की बात है जब बंगाल की राजधानी राजमहल हुआ करती थी। अंग्रेज़ यहाँ सोना और चाँदी लाते थे जिसे जगत सेठ जैसे टकशाल रखने वाले सिक्के ढालने में काम में लाते थे । अंग्रेज़ इसके बदले नील, अफ़ीम,चीनी और शोरे का निर्यात करते थे । अफ़ीम पर एक समय कंपनी का आगे जाकर एकाधिकार हो गया जो अंत में नमक तक गया।
    मानिकचंद की ईस्ट इंडिया कंपनी से मुलाक़ात 1706 ई० से पहले की है। कासिमबाज़ार का महत्व तब से है और मानिकचंद ही कोलकाता आकर मुर्शिदाबाद में अपने व्यापार का केंद्र बना लिया। 1714 में उनका देहांत हुआ। उनकी बहन का लड़का फतहचंद उनका दत्तक पुत्र 1700 ई० से पटना में अपने मामा के घर रहा। यहाँ मुर्शिदकुली ख़ाँ जिन्होंने मुर्शिदाबाद को बंगाल की राजधानी बनाई का जिक्र किए बिना इस किताब पर विवेचना अधूरी है । मुर्शिदाबाद अपने कृषि व्यापार और रेशम-बुनाई केंद्र के रूप में तब से आज तक जाना जाता है। मानिक चंद और बाद में फ़तहचंद जैसे धनाढ्य उनके दरबारी मंत्री थे । अंग्रेज़ों को अपनी सिफ़ारिश कराने के लिए फ़तहचंद का दरवाज़ा खटखटाना पड़ता था।
    पटना, ढाका और फिर मुर्शिदाबाद अपने व्यापार का केंद्र बदलने के साथ साथ जगत सेठ यानी माणिकचंद की अर्थ शक्ति विश्व में सबसे शक्तिशाली लोगों में से एक हो गई ।रास्ते में ठगों का आतंक था और राजस्व लुट जाने के डर से हुंडी के माध्यम से बंगाल का राजस्व दिल्ली तक पहुँचाने में आसानी थी जो जगत सेठ के परिवार के नियंत्रण में था। इसी के साथ सिक्कों की ढलाई का काम भी पूरब में सिर्फ़ इन्हीं के पास था।जगत सेठ नवाब के लगभग वित्त मंत्री व सलाहकार की भूमिका में रहें ।अठारहवीं शताब्दी के दूसरे दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी को सम्राट तक पहुँचाने में मानिकचंद की मदद मिली और उन्हें 3000 रुपये सालाना की एवज में बंगाल में करमुक्त व्यापार करने की आज्ञा मिल गई। एक समय ऐसा आया कि टकसाल भी जगत सेठ के हाथ में था और जमींदार भूमिराजस्व भी मानिकचंद को ही जमा करते थे। कहा जाता है उनके व्यापार के उत्थान और प्रभाव को देखकर दिल्ली के सम्राट मुहम्मद शाह ने मानिकचंद को ‘जगत सेठ’ की उपाधि दे दी।
    इतिहास में कई महत्वपूर्ण मोड़ आया है जिसने दिल्ली की गद्दी हिला दी और उन्हें अपना राज-काज चलाने के लिए भी सेठों से उधार लेना पड़ा । 1739 में नादिरशाह का दिल्ली में दो महीने का लूटपाट और मराठों का बंगाल में 1751 तक का लूटपाट वैसी ही घटनाएँ हैं जिनसे अंग्रेज़ों को मौक़ा मिला कमजोर शासन के विरुद्ध कदम बढ़ाने में। इस बारह साल में उड़ीसा, बंगाल और बिहार में घटी घटनाओं की बहुत बारीक तफ़तीश ज़रूरी है इस बात को समझने के लिए कि आखिर जो अंग्रेज़ आपसे हर बार हाथ जोड़कर व्यापार करने की आज्ञा और घूसखोरी पेशगी के रास्ते देने की आदत रही उन्हें उन्हीं नवाबों के विरुद्ध बगावत करने की क्यों ज़रूरत पड़ी और फ़िर कैसे वे आसानी से सफल भी हुए।

    अलीवर्दी ख़ाँ और फिर सिराजुद्दौला के रोल को भी समझना उतना ही ज़रूरी है। जबकि अलीवर्दी ख़ाँ(अस्सी साल की उम्र तक) के लंबे शासकीय अनुभव के सामने सिराजुद्दौला का समय मात्र पंद्रह महीने का शासन कैसा रहा।मराठों का हमला अली वर्दी ख़ान के राज तंत्र को कमजोर कर गया ।सिराजुद्दौला बाईस वर्ष का युवा था जब गद्दी पर बैठा और जोश से भरा था। उसमें अनुभव के साथ और भी तमाम कमियाँ थीं। जून 1756 को सिराजुद्दौला ने फोर्ट विलियम पर कब्ज़ा कर लिया। तब तक अंग्रेज़ों में इतनी हिम्मत नहीं थी कि सीधे मुक़ाबले पर उतर जाते। इसके कुछ दिनों बाद ही तीन करोड़ की उगाही करने से जगत सेठ का मना करना और महताबराय यानी जगत सेठ को इस कारण थप्पड़ मारना और फिर बंदी बना लेना एक महत्वपूर्ण चिंतनीय घटना मानी जा सकती है। जगत सेठ का इतना महत्व और दखल रहा है बंगाल और बिहार के नवाब के राजनीतिक और व्यापारिक निर्णय में कि इस एक घटना ने उसे गद्दी के विरुद्ध खड़ा कर दिया । मोटे तौर पर यह कहा जा सकता है कि बंगाल में राज्य क्रांति कराने वाले में एक ओर सिराजुद्दौला और दूसरी ओर महताबराय थे । सिराजुद्दौला ने विवेकहीनता और दुर्व्यवहार से और जगत सेठ जैसे अपने नाना के शुभचिंतक और मित्र को भी अपना शत्रु बना लिया और दूसरी ओर अपमान असह्य हो जाने से वही शुभचिंतक मित्र अंग्रेज़ों की पूरी तरह सहायता उसे समाप्त करने में लगा बैठा । मीर जाफ़र संभाल लेगा यह जगत सेठ की धारना भी निर्मूल निकली और नवाब-नाज़िम कंपनी के हाथ की कठपुतली बनते चले गए और उसी कंपनी ने अंत में अंतिम जगत सेठ को भी नहीं छोड़ा ।

    15 दिसंबर 1756 को क्लाइव और वाटसन को मद्रास कौंसिल ने दल-बल के साथ कोलकाता भेजा। जनवरी 1757 में क्लाइव ने फोर्ट विलियम वापस जीत लिया और आठ दिन में ही कोलकाता भी । उस समय तक जगत सेठ मध्यस्थता की कोशिश कर रहे थे। सिराज के समय ही कलकत्ता को अलीनगर कहा गया।
    क्लाइव ने जो पत्र जगत सेठ को लिखा, उससे साफ़ है कि 120 अंग्रेज़ कुलीन लोगों की नृशंस हत्या के बाद फलता व बजबज़ में छह महीने टेंट में रात इस आशा में गुज़ारने के बाद कि सिराजुद्दौला आख़िरकार मान जाएगा परंतु उसके नहीं पिघलने से ही बग़ावत की यह नौबत आई।

    सिराजुद्दौला एक बार संधि के लिए राज़ी हुआ, कोलकाता आया, पर 5 फ़रवरी को क्लाइव ने उसकी छावनी पर हमला बोल दिया। उसके बाद फिर से रंजित राय की मध्यस्थता में एक पत्र लिखा गया। अमीचंद और जगत सेठ दोनों अब मीरजाफ़र के साथ थे। यह भी रोचक जानकारी है कि अमीचंद के ख़ानदान से ही भारतेंदु हरिश्चंद्र हुए, जो उनके बेटे गोपालचंद — जो हिंदी भाषा के बड़े कवि थे — के पुत्र थे। अमीचंद उर्फ़ ओमीचंद का रोल बहुत संदिग्ध रहा और वे अंग्रेज़ों से पैसे बटोरते रहे और दोतरफ़ा खेल खेलते रहे ।अंग्रेज़ जब फ़्रांसीसियों से भिड़ने की सोच रहे थे, तब अमीचंद ने कहा कि जगत सेठ के फ़्रांसीसियों के पास से तेरह लाख का पावना है। ऐसा कहकर अंग्रेज़ों को जगत सेठ से दूर करने की उनकी यह कोशिश सफल रही और 14 मार्च 1757 को चंदननगर पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो गया।

    बीबी घसीटी भी सिराजुद्दौला से परेशान थी, इसलिए जगत सेठ के साथ मीरजाफ़र की सहयोगी हो गई। अब अमीचंद भी इन सबके साथ सिराजुद्दौला के ख़िलाफ़ क़िलाबंदी में लग गया। इस पूरे समूह ने सिराजुद्दौला के बदले मीर जाफ़र को गद्दी पर बिठाया।अब जैसे ही मीरजाफ़र और अंग्रेज़ों के बीच संधि होने लगी तो अमीरचंद ने अपनी माँग रख दी। तब क्लाइव ने उसकी माँग — पाँच प्रतिशत ख़ज़ाने की — को लाल नक़ली संधिपत्र में बदलकर पानी फेर दिया। मीरजाफ़र का नवाबी शासनकाल बहुत दिन नहीं टिक सका। उसका बेटा मीरन भी बिजली गिरने से मारा गया ( मृत्यु का कारण हालांकि संदिग्ध ही रहा) और मीरक़ासिम को बंगाल का नवाब बनने का अवसर मिला।
    मीरक़ासिम हुशियार निकला और अनावश्यक व्यय पर अविलंब रोक लगा दी। उसे बंगाल के पुराने लोगों पर भरोसा नहीं था। उसने अपनी राजधानी भी मुर्शिदाबाद से मुंगेर बदल ली। उसके राज में ही पहली बार चुंगी सबके लिए बराबर हुई, जबकि पहले अंग्रेज़ों के लिए 9 प्रतिशत और हिंदुस्तानियों के लिए 25 प्रतिशत की दर तय थी। मीरक़ासिम ने ही मुंगेर में अपने लोगों को बंदूक और तोप बनाना सिखाया। एक बड़ी गलती उससे हुई कि जगत सेठ को भी क़ब्ज़े में कर मुंगेर ले आया। उसे डर था कि हर बार की तरह तख्तापलट से जुड़े जगत सेठ इस बार उसके ही विरुद्ध अपनी शक्ति न लगा दें। जगत सेठ यानी महताबराय और उनके भाई दोनों को गंगा में डुबोकर मारा गया। यहाँ उनके एक नौकर चुन्नी की कहानी भी लोककथा में तब्दील हो चुकी है, जिसने पहले ख़ुद अपनी जान दी ताकि मालिकों को थोड़ा और मौक़ा और समय मिल पाए।

    मीरक़ासिम अंग्रेज़ों से हार खाने के बाद अवध के नवाब शुजाउद्दौला से जा मिला, पर यह दोस्ती बक्सर की लड़ाई के पहले समरू नाम के पूर्व सेनानायक के कारण टूट गई और मीरक़ासिम को दलबल से बाहर निकाल दिया गया। नतीजतन शुजाउद्दौला को 22 अक्टूबर 1764 में हार नसीब हुई और मीरजाफ़र फिर से बंगाल का नवाब बन गया। मीरक़ासिम भागकर पलवल में छिपकर रहा और वहीं उसकी मौत हुई।

    शाह आलम उस समय का सबसे कमजोर शासक निकला और लगभग बेपेंदी का लोटा था। महताबराय के मरने के बाद उसे लगा कि उसे सोने की चिड़िया हाथ लग गई है। जगत सेठ के बेटे गुलाबचंद और मेहरचंद को छोड़ने के एवज में शाह आलम का मुँह मोतियों से भरना पड़ा।

    एक ज़माना था कि पूरा पारसनाथ पहाड़ महताबराय यानी जगत सेठ की ज़ाहिर थी। अंत तक खुशालचंद जगत सेठ जैन मंदिर के जीर्णोद्धार पर व्यय करते रहे।

    इधर गुरुघंटाल नंदकुमार और कंतू बाबू अब भी अपनी शाख़ बनाए हुए थे। नंदकुमार ने बाद में 1775 में हेस्टिंग्स पर अभियोग चलाया, जिसमें मुन्नी बेगम से रिश्वत लेने का आरोप भी था, जो कि न्यायालय में साबित भी हुआ। बाद में एक केस में नंदकुमार को भी फँसाकर फाँसी दे दी गई। अंग्रेज़ों की इतनी मदद करने वाले का ऐसा अंत सबको हिला गया।

    1777 तक जगत सेठ की टकसाल बंद नहीं हो पाई थी और कोलकाता में अंग्रेज़ों का अपना टकसाल खुल चुका था। धीरे-धीरे जगत सेठ के टकसाल के सिक्के की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगने लगा और उसे मुबारकुद्दौला पर दबाव डालकर बंद करा दिया गया। अब टकसाल पर भी अंग्रेज़ों का एकाधिकार था।
    यहाँ यह बात नोट करने लायक है कि अंग्रेज़ों द्वारा बनाए सिक्के पर तब तक बट्टा लगता था, जो अब पूरी तरह स्वतंत्र हो चुके थे।

    एक और रोचक बात है कि नमक के ऊपर कर हमेशा रहा, चाहे अंग्रेज़ों को बाकी सभी चीज़ों के व्यापार के लिए करमुक्त कर दिया गया हो। क्लाइव जब दूसरी बार लौटकर आया, तब उसने नमक के व्यापार पर भी एकाधिकार कर लिया। अब कंपनी नमक पर पचास प्रतिशत शुल्क पर व्यापार करने की इजाज़त दे रही थी, जबकि तब, जब नवाब मीरक़ासिम के ज़माने तक कंपनी को पहले नौ प्रतिशत और बाद में 2.5 प्रतिशत शुल्क व्यापार कर के तौर पर देना पड़ता था। एकाधिकार का व्यापार में दायरा बढ़ता गया। नमक के बाद अब रूई की बारी थी। सूरत की रूई बिहार आते-आते 30 प्रतिशत की चुंगी में बदल जाती।

    शाह आलम से दीवानी मिलने के उपरांत चाहे जगत सेठ हों या ख़ुद शाह आलम — सबकी वार्षिक अदायगी तनख़्वाह के समानांतर बना दी गई। जगत सेठ को हर साल उसमें भी गिरावट का सामना करना पड़ा और यह गिरकर तीन लाख सालाना तक आ गई। 1770 के आसपास अकाल के बाद हेस्टिंग्स ने तो शाह आलम को बंगाल से यह कहकर वार्षिक भुगतान बंद करवा दिया कि बंगाल अब दिल्ली से पूरी तरह आज़ाद है।

    11 मई 1772 को यह ऐलान कर दिया गया कि अब मुहम्मद रज़ा ख़ाँ नायब दीवान न रहेंगे और स्वयं कंपनी दीवान के रूप में सर्वसाधारण के सामने उपस्थित होगी। हर ज़िले में कलेक्टर होगा और हर ज़िले में दीवानी अदालत का प्रधान भी कलेक्टर ही होगा।

    उधर गवर्नर जनरल और कौंसिल का पुनर्गठन हो ही चुका था। ‘रेगुलेटिंग एक्ट’ 1773 अब एक ब्रिटिश अधिनियम था, जिसका उद्देश्य भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन को विनियमित करना था। इसने पहली बार कंपनी के राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यों को मान्यता दी, भारत में केंद्रीय प्रशासन की नींव रखी, और बंगाल के गवर्नर को “बंगाल के गवर्नर-जनरल” में बदल दिया तथा उनकी सहायता के लिए एक परिषद बनाई।

    इस कानून ने कंपनी के कर्मचारियों को निजी व्यापार और रिश्वतखोरी से प्रतिबंधित कर दिया और कलकत्ता में पहला सुप्रीम कोर्ट स्थापित किया।

    इस बीच सारी पूँजी इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति में खर्च हो रही थी — चाहे वह भाप इंजन हो या फ़्लाइंग शटल। इंग्लैंड में उन दिनों कुछ नए यांत्रिक आविष्कार हुए — जॉन के फ़्लाइंग शटल (1733), हारग्रीव्ज़ की स्पिनिंग जेनी (1767), आर्कराइट के वाटर पावर स्पिनिंग फ़्रेम (1769), क्रॉम्पटन के म्यूल (1779), हम्फ्री डेवी (1815) और कार्टराइट के पावर लूम (1785) से वस्त्रोद्योग में पर्याप्त गति आई। जेम्स वाट के भाप इंजन (1789) का उपयोग गहरी खानों से पानी बाहर निकालने के लिए किया गया।
    आप इस बात से सीधा निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यहीं की कमाई से उद्योग में यह क्रांति संभव हो पा रही थी ।

    यह भी एक तथ्य माना जाए कि सिराजुद्दौला का विध्वंस करने वाला प्रायः दुखांत ही रहा। मीरन मारा गया, जगत सेठ की स्थिति उसके बाद बद से बदतर होती गई। महताबराय और उनके भाई स्वरूपचंद को मीरक़ासिम ने नहीं छोड़ा। मीरक़ासिम ख़ुद दर-दर की ठोकरें खाता हुआ मरा। मीरजाफ़र की ज़िंदगी भी यूँ ही भँवर में डोलती रही।
    स्कार्फ़्टन भी दूसरी बार बंगाल की वापसी के समय समुद्र में डूब गया। क्लाइव ने तो अंत में अपना गला ही काट लिया। नंदकुमार को अंततः फाँसी हुई।

    इस किताब ने एक असाधारण शोधपूर्ण प्रयास किया है जिसमें लेखक पारसनाथ सिंह के साथ काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, पटना की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। हीरा नंद साह, माणिकचन्द, फतह चंद, महताब राय, खुशाल चंद तक की जिंदगी को विस्तार से शोध किया गया है । बाद का इतिहास अब भी शोध करने के लायक है । पारसनाथ की पहाड़ी की मूर्तियों या पादुकाओं पर खुशाल चंद बिरानी का नाम लिखा है । किसी लेख में रूप चंद जगत सेठ का भी नाम आता है । मुर्शिदाबाद के कीरतबाग मंदिर के गर्भ गृह में और फिर एक लेख में राजगृह के एक पादुका का जिक्र है जिसमें जगत सेठ फतहचंद और उनके पुत्र आनंद चंद का नाम भी आता है । इस किताब में कई पृष्ठ पर हुंडी-हुंडावन, आढ़त, दलाली, जैसे विषय को बहुत अच्छे से लिखा गया है ।महाजनी की व्यवस्था पूरे देश में बैंक के बराबर का काम करती थी और हिंदुस्तान से बाहर ईरान काबुल हैरात ताशकंद और मध्य एशिया की और भी जगहों पर क़बूल या स्वीकृत मानी जाती थी । औद्योगिक क्रांति जब राजनीतिक क्रांति का रूप लेने लगी तो हिंदुस्तान का निर्यात कैसे टूट गया इसके बारे में भी आपको पढ़ने को मिलेगा । भाषा ऐसी है कि इतिहास के विधार्थी नहीं होने पर भी आप की पठनीयता बनी रहेगी ।
    यह किताब किस साल लिखी गई इस पर अभी भी बादल गहराया हुआ है। इसकी प्रस्तावना 12 अप्रैल को 1950 में श्री प्रकाश जी ने जो आसाम के गवर्नर रहे हैं । इस शोधपूर्ण किताब में कई किताबों और पत्राचार के संदर्भ हैं जिनमें ख़ास है ‘ मुताखरीन’, ‘रियाजुस्लातीन’ जिसे क्रमशः लिखा था सैयद ग़ुलाम हुसैन ख़ां और ग़ुलाम हुसैन सलीम ने।
    इस विषय आर अगर कोई भी शोध कर रहा हो तो उसे इस किताब से ज़रूर गुज़रना चाहिए।

     नोट: अब एक और बात — क्लाइव के लौटने के बाद बंगाल के गवर्नर बने हालवेल की कहानी फिर कभी। वह इतिहासकार जिसने झूठ रचा, पर विश्व को हिंदू धर्मग्रंथों का अनुवाद दे गया।

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