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  • गुंजन उपाध्याय पाठक की आठ कविताएँ

    गुंजन उपाध्याय पाठक ऐसी युवा कवयित्री हैं जिनके पास कहने के लिए कुछ है, सशक्त भाषा है और गहरी बेधक दृष्टि है। आज उनकी आठ कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर

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    १.प्रतिजैविक

    मेरे हाथ टटोलते हुए अपने ही गले को
    कर लेना चाहते हैं अपनी पकड़ मजबूत

    कि तुम्हारी ऐनक वाली आंखें चमक उठती हैं
    और यक-ब-यक दोनों हथेलियां नाभी पर रख
    याद करती हूँ तुम्हारी सिरफिरी बातें

    अस्फूट मंत्रोचार सी फूट पड़ती हैं बतकहियां हमारी
    और किसी एंबुलेंस की तीखी गंध को
    अपनी ही शिराओं से बहते हुए महसूस करती
    औचक सी देखती हूँ तुम्हें

    दूर कोई सायरन की आवाज़ सुनकर
    पुकारती हूँ तुम्हें और प्रतिउत्तर में
    उभर आए मेरे नाम से चिमटकर मुस्कुरा उठती हूँ
    हसरत का एक टुकड़ा जो चखा था कभी
    अब भी प्रतिजैविक की तरह मुझमें फलता फूलता है

    हालांकि ईश्वर की बेबसी
    चिपकी हुई रहती है किसी दुआ मांगते होठों पर
    और बच्चों की सिसकियां उसे चुभती है रात भर

    २.गीता का उपदेश

    कैसा दंभ है,
    कैसी ज़िद है!
    कोई जा रहा हो तो
    जैसे देह से निचुड़ता है खून

    सैकड़ों करंट एक साथ दौड़ पड़ते हैं नसों में
    इतनी बेचैनी और तड़प कि
    माथे में कुछ तड़कने लगता है

    और कोई आए तो
    उसके होने का भरम
    कांधे पर उचककर बैठ जाता है
    जबकि कालांतर में
    छूट चुकी होती हैं
    या चूक चुकी होती हैं कामनाएँ

    बस
    कमबख़्त आदत!
    टटोलता है उसका होना
    न पाकर पटकता है माथा

    जून के चाँद से बरसती हैं सैकड़ों बिजलियाँ
    और सोख लेती हैं
    उम्मीद का कतरा–कतरा
    बीत चुकी चाँदनी
    (जिसमें बचा रह गया लालित्य–बोध)
    चुटकियाँ लेती है

    वह बेतहाशा खुद को पीटती है
    मुँह में कुछ मीठा पाकर
    जीभ लपक उठती है
    और दाँतों में फँसे अपने ही खून से संतुष्ट होकर
    चेहरे पर उभर आती है हँसी

    एक सिगरेट,
    अंतिम कश,
    और गीता का उपदेश—
    “जो हुआ अच्छा हुआ,
    जो होगा अच्छा होगा।”

    सोचकर वह चिल्लाते हुए
    हँस पड़ती है

    ३. हुक्का

    बेकली सी रातों में नाचते हैं गिद्ध
    पारिस्थितिकी का हुक्का पीते हुए चीखते है प्रेत

    हवाला देती है ठिठुरती ठंड
    रूठी चांदनी की आंखों में बहता है रक्त
    समेट कर रख लेती हूं आसमां सिरहाने अपने

    ह्रदय के अगल बगल लगी चिमटी
    जोकि नापती है नमी मुहब्बत की
    और सुलग जाते हैं बुरांश मेरे होठों पर

    बेदिली में झकझोरती है यादें
    उन लम्हों को
    जो किस्मत में मेरी कभी थे ही नहीं

    ४. धुनकी

    जब माघ बांधता है माथे पर पाग पीली
    और फाग गाते चंग पर
    थिरकती है उंगलियां फाल्गुन की

    और ज्येष्ठ में ड्योढी पर छांव के मंजीरे
    अषाढ़ में उस क्षितिज के पार भी
    सदा अनुगुंजित रहेंगे हमारी आंखों के मौन
    जब छितराए पंख बूंदों में नृत्य करता है
    मयूरा सावन का

    सुनो , तब पुकारता है प्रेम
    जिसे रट लेती है जोगन कोई
    लेकर उधार कुछ रात सिलवटो की

    और दूर कहीं कोई धुनकी अपनी
    कठेल पर रख धुनता हुआ देह जोगन की
    गाता है गीत कोई
    जिस पर नाचता फिरता है अघौड़ कोई

    ५.इच्छाओ के बीज

    चौराहों पर
    दोमुंहे रास्तों के किनारे
    गोलंबर
    और कोई आर ब्लॉक का पुल
    या फिर गांधी मैदान के आसपास
    भटकती है
    न जाने
    कितनी ही अधसोई अधजगी-सी चाहनायें

    तुमसे बेसबब लिपट जाने को
    कह देने को
    रो लेने को
    चमकती आंखों में ढूंढ लेने को कोई ख़्वाब

    इस जून में इमली की खटास से भरी हुई जीभ
    पेट पर अनायास ही हाथ फेरती है
    इस बार इच्छाओं के बीज

    उसकी समस्त धमनियों में नहीं
    अनजान शहरों के
    रेलवे स्टेशनों पर
    जन्मते हैं, किलकते हैं और
    रात की साजिशों में एक स्त्री देह (में) महकते
    दिन के उजालों के ख़ौफ से कांपते हैं

    मौलिकताओं को खारिज करने की कोशिश में
    एक मरोड़ के साथ
    कुछ भींगे हुए आंसुओं और
    जांघों के बीच से बहते गहरे भूरे कत्थई रंग
    काल की नीली साजिशें
    टूटे हुए बिंब और उदास शरीर पर
    चाहनाओं के चितकबरे धब्बे

    शरारत और चालाकियों के बावजूद
    कभी-कभी खिल ही जाते हैं

    रात के दो बजे
    उसका एक होना, उसकी दूसरी हो सकने की चाहत को
    बालकनी में खड़ी निहारती है
    जहां उसकी तीसरी संभावना के पास
    आकाश के छोटे से टुकड़े से

    कौंधता हुआ एक डर
    लात मारता है और वहीं कहीं दूर छिटक कर
    बटोरती है बेखुदी में
    एक अपने को
    अपनी ही हथेलियों से

    ६.जीने लगती हूं

    एक तरफ कुछ लोंदे मांस के रक्त सने दिखते हैं
    दूसरी तरफ कुछ एक दो कटी हुई उंगलियां
    इक हृदय पलटा हुआ
    और थोड़ा-सा बहता हुआ अंधेरा

    मेरे चारों ओर बिखरी पड़ी चीजों में
    कुछ आवाजें हैं घुटी हुईं
    जिंदगी लाचार-सी घसीटती है देह अपनी
    मौत इतराती-सी
    मचल मचल
    खेलती है
    छुआछूत का खेल

    इक बेबसी मुस्कुराती है
    और डर का प्रेत रोज रात मेरी
    पसलियां चबाता हुआ ठठाकर हंस पड़ता है

    इक मैं जो मर नही पाती
    इसीलिए जीने लगती हूं

    ७.पीली टैक्सी

    आकाशगंगाओं की उत्पत्ति से पहले
    उपजे कोलाहल की दुर्दांत ध्वनि और अन्य
    उल्कापिंडों की दहकती हुई भटकनों में

    मायावी दुनिया की बारिश, सिगरेट, पीली टैक्सी
    और फिर से टकराना
    उसी जगह

    जैसे समय दिखाना चाहता हो कोई समानांतर दुनिया
    वहीं बैठा था उसकी टेबल से कुछ दूरी पर
    जिसकी आंखों में थी
    अंतर्मन को पढ़ लेने की कला
    जिसके साथ उसे देखने थे चांद के हर घटते-बढ़ते नियम

    जो निहायत बैचैन हो उठता
    अगर उसके चेहरे की भंगिमाओं से छलक जाता दुख
    अनंत साल पुराने इस शहर के इस बार में
    अदृश्य लय थी सम्मोहन की

    इसकी सीढ़ियों पर
    चुंबन की लालसा
    कनपटियों और गले से फिसलती
    हृदय को मरोड़ती
    अपने गंध से देह को बिंधती

    खत्म हो चुकी सिगरेट के बहानों के साथ
    दे सकता था दस्तक एक मायालोक
    मगर अंदेशों और हादसों के अप्रत्याशित हमलों से परिचित,
    गटागट वह पीती जाती है
    कामनाओं के प्रेत का रक्त

    और खाली ग्लास में तैरता है
    बीते कल का प्रतिबिंब
    चिढ़ता हुआ! चिढ़ाता हुआ!!

    वह बेखुदी में बुदबुदाती है—
    “अब हम वो नहीं रहे जिन्हें भरोसा था मोहब्बतों पर,
    अब तो कुछ सांसें हैं, जो सीने पर भारी हैं।”

    ८.
    चौरासी

    इस बेतुके जीवन के
    अंत से ठीक पहले
    इश्क़ की इनायतें
    शायद लुका-छिपी में हारकर
    उमड़ पड़ी हैं मन के आँगन में
    छीजती दीवारों पर अल्पनाएँ उभर आई हैं

    सांझ की बेहयाई में
    कोई उतारता है अपना खोल;
    दिन और रात दहलीज़ पर ठिठके खड़े हैं

    चाँद की कुबड़ पर तड़प की
    नर्गिसी खिल उठी है
    समर्पण का यह अंदाज़
    कुछ ऐसा है कि— जानते हुए भी कि
    इन चौरासी सिद्ध कलाओं का
    योग नहीं है मेरी हथेलियों में
    मैं बाट जोहती हूँ उस बेला की, जब
    धड़कनों में उन्माद की लय बहे

    इश्क़ का धुआँ कुछ ऐसे उतरे धमनियों में कि
    वैद्य तक को गुमान न हो
    अप्सराएँ रश्क करें

    सारे झूठ, सारे भरम
    तुम्हारे स्नेहसिक्त शब्दों में परिवर्तित होकर
    वास्तविकता की तरह मेरे भाग्य पर टपकें
    अवांछनीयता की चोट पर
    तुम्हारे शब्द छलकते रहें किसी मरहम की तरह

    जानते हो—
    जेठ की दुपहरी में
    इश्क़ की अठखेलियाँ तपती नहीं,
    बरसती हैं

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