हाल में ही सुपर्ण वर्मा निर्देशित फ़िल्म आई है ‘हक़’, जो पत्रकार जिग्ना वोरा की किताब ‘बानो: भारत की बेटी’ पर आधारित है यह किताब आधारित प्रसिद्ध शाहबानो केस में उच्चतम न्यायालय द्वारा सुनाए गए फ़ैसले पर। इसी फ़िल्म पर यह टिप्पणी लिखी है प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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कुछ फ़िल्में शोर के साथ आती हैं—भारी-भरकम ट्रेलर, पहले से तय कर दी गई “महत्वपूर्ण” छवि, और प्रचार का ऐसा शोर जो फ़िल्म से पहले ही फ़ैसला सुना देता है। और फिर हक़ जैसी फ़िल्में होती हैं, जो लगभग चुपचाप आती हैं- बिना किसी तमाशे के, बिना किसी उद्घोषणा के- लेकिन अपने पीछे ऐसी प्रतिध्वनि छोड़ जाती हैं जो देर तक पीछा नहीं छोड़ती। हक़ ध्यान माँगती नहीं है; वह ध्यान अर्जित करती है। यह किसी घोषणापत्र की तरह नहीं खुलती, बल्कि एक प्रक्रिया की तरह सामने आती है, यह दिखाते हुए कि अधिकार कैसे तय होते हैं, कैसे टाले जाते हैं, कैसे छीने जाते हैं, और कभी-कभी, भारी व्यक्तिगत कीमत चुकाकर, कैसे हासिल किए जाते हैं।
सुपर्ण वर्मा के संयमित और संवेदनशील निर्देशन में बनी हक़ उस सिनेमा का उदाहरण है जो मानता है कि सामाजिक यथार्थ को सजाने-सँवारने की ज़रूरत नहीं होती- उसे बस ईमानदारी चाहिए। वर्मा भावनाओं को ज़बरदस्ती उभारने या संदेश को रेखांकित करने के प्रलोभन से बचते हैं। उनकी दृष्टि स्थिर, धैर्यपूर्ण और नैतिक है। वे परिस्थितियों को उनके स्वाभाविक असहजपन के साथ घटित होने देते हैं और दर्शक की समझ पर भरोसा करते हैं। यही भरोसा हक़ को उपदेश नहीं, बल्कि साक्ष्य बनाता है।
पहली नज़र में हक़ का कैनवस सीमित लग सकता है। न कोई भव्य दृश्य, न लंबे-लंबे संवाद जो नैतिकता का एलान करें। लेकिन यही सादगी धोखा देती है। फ़िल्म का असली विस्तार उस अदृश्य सत्ता-संरचना को पकड़ने में है जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी को नियंत्रित करती है। हक़ यह समझती है कि अन्याय अक्सर अन्याय के रूप में सामने नहीं आता। वह दिनचर्या, परंपरा, प्रक्रिया या “नियम” के रूप में आता है। इस मौन हिंसा को नाम देकर, फ़िल्म सिनेमा का सबसे ज़रूरी काम करती है- अदृश्य को दृश्य बनाना।
“हक़” शब्द अपने आप में सदियों का बोझ उठाए हुए है, कानूनी भी, नैतिक भी, और आध्यात्मिक भी। यह भीख नहीं है; यह दावा है। इस शब्द को शीर्षक बनाकर फ़िल्म एक स्पष्ट हस्तक्षेप करती है- यह अपने पात्रों को याचक के रूप में देखने से इनकार करती है। वे दया नहीं माँगते; वे अपना अधिकार माँगते हैं। लेकिन हक़ की त्रासदी यही है कि आज के समाज में इस तरह का दावा करना ही एक विद्रोह बन चुका है—क्योंकि व्यवस्था आज्ञाकारिता को पुरस्कृत करती है और आग्रह को दंडित।
इस नैतिक संसार के केंद्र में यामी गौतम की सधी हुई, गहन और बेहद ईमानदार अभिनय-उपस्थिति है। यामी किसी “मुद्दा-आधारित” भूमिका के परिचित जाल में नहीं फँसतीं, न अतिनाटकीय पीड़ा, न घोषणात्मक साहस। उनकी ताक़त अल्पसंकेत में है। वे अपने किरदार को प्रतीक नहीं, मनुष्य की तरह निभाती हैं- सतर्क, उलझा हुआ, और उस तरह से मज़बूत जो अक्सर दिखाई नहीं देता। उनकी आँखों में हर निर्णय का बोझ है- कब बोलना है, कब रुकना है, कब प्रतिरोध संभव है और कब चुप रहना ही जीवित रहने की रणनीति।
यामी गौतम यहाँ वह हासिल करती हैं जो आज के सिनेमा में दुर्लभ होता जा रहा है- घोषणा के बिना गरिमा। उनका अभिनय हमें याद दिलाता है कि साहस हमेशा ऊँची आवाज़ में नहीं आता। कई बार वह सहनशीलता में होता है, अन्याय को आत्मसात न करने के फैसले में होता है, और लगातार अपनी मनुष्यता पर ज़ोर देने में होता है, भले ही व्यवस्था उदासीन ही क्यों न रहे। यह अभिनय स्थिरता पर भरोसा करता है। उसी से फ़िल्म की भावनात्मक और राजनीतिक गहराई बनती है।
रूप-रचना के स्तर पर हक़ धैर्य की भाषा बोलती है। कैमरा वहाँ ठहरता है जहाँ मुख्यधारा का सिनेमा कट लगा देता। दृश्य साँस लेते हैं। अर्थ संवादों से नहीं, बल्कि क्रमिक अनुभव से बनता है—एक नज़र, जो ज़रा देर तक ठहर जाती है; एक हाथ, जो दरवाज़ा खटखटाने से पहले रुक जाता है; एक बातचीत, जो बीच में ही थम जाती है क्योंकि आगे बोलना ख़तरनाक हो सकता है। सुपर्ण वर्मा के निर्देशन में ये छोटे क्षण प्रतिरोध की शब्दावली बन जाते हैं।
ध्वनि और ख़ामोशी फ़िल्म की भावनात्मक बनावट में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। हक़ की ख़ामोशी कभी खाली नहीं होती। वह इतिहास, डर और संभावित परिणामों से भरी होती है। जब पात्र नहीं बोलते, फ़िल्म इसे कमज़ोरी नहीं मानती। बल्कि वह इसे सबूत मानती है- दबाव का, निगरानी का, और उस व्यवस्था का जिसने लोगों को बोलने की क़ीमत सिखा दी है। इस तरह हक़ बोलने से ज़्यादा चुप्पी की फ़िल्म बन जाती है।
हक़ को अन्य सामाजिक फ़िल्मों से अलग बनाता है उसका नैतिक सरलीकरण से इंकार। यहाँ सत्ता किसी एक खलनायक में सिमटी नहीं है। वह फैली हुई है—संस्थाओं में, व्यवहार में, और उन लोगों में भी जो शायद जानबूझकर नहीं, लेकिन अन्याय से लाभ उठाते हैं। यह दृष्टिकोण असहज करता है, क्योंकि यह दर्शक को भी कटघरे में खड़ा कर देता है। यहाँ निंदा करने की सुरक्षित दूरी नहीं मिलती।
यहीं सुपर्ण वर्मा की सबसे बड़ी ताक़त सामने आती है- दर्शक को सहज महसूस न कराने का साहस। फ़िल्म में कोई कैथार्सिस नहीं, कोई निर्णायक जीत नहीं जो नैतिक संतुलन बहाल कर दे। हक़ जानती है कि अधिकारों की लड़ाइयाँ अक्सर अधूरी, लंबी और थकाने वाली होती हैं। उन्हें एक फ़िल्म में समेटकर “समाप्त” करना झूठ होगा। इसलिए यह फ़िल्म अंत नहीं, निरंतरता देती है- यह कहती है कि कहानी पर्दे के बाहर भी जारी है।
आज के उस दौर में, जहाँ सिनेमा से अपेक्षा की जाती है कि वह तेज़, वायरल और तुरंत समझ में आने वाला हो, हक़ धीमेपन और अस्पष्टता को चुनती है। यह दर्शक से समय माँगती है, ध्यान माँगती है, असहजता के साथ बैठने का आग्रह करती है। यह याद दिलाती है कि न्याय कोई मंज़िल नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है।
क्रेडिट्स ख़त्म होने के बाद भी हक़ साथ रहती है- दृश्यों की स्मृति की तरह नहीं, बल्कि चेतना की धार की तरह। अगली बार जब हम किसी को अपना हक़ माँगते देखें- दफ़्तर में, किसी सरकारी दफ़्तर में, या निजी रिश्तों में- तो उसे “मुश्किल” या “असुविधाजनक” कहकर टाल पाना आसान नहीं रहता। फ़िल्म हमारे नैतिक पैमाने को थोड़ा सा खिसका देती है।
आख़िरकार, हक़ सिर्फ़ अन्याय पर बनी फ़िल्म नहीं है; यह एजेंसी पर बनी फ़िल्म है—नाज़ुक, विवादित, महँगी, लेकिन वास्तविक। सुपर्ण वर्मा के संतुलित निर्देशन और यामी गौतम के गहरे, आत्मसात अभिनय के ज़रिए यह सिनेमा को फिर से एक नागरिक कर्म बना देती है। यह तालियाँ नहीं माँगती। यह जवाबदेही माँगती है।
हक़ सिर्फ़ मुस्लिम औरतों के बारे में नहीं है, यह ज़्यादातर औरतों के बारे में है और Patriarchs उनके साथ कैसा बर्ताव करते हैं। यह हर इंच जगह, इज़्ज़त और सम्मान के लिए लड़ने के बारे में है, जिसके लिए औरतों को ज़िंदा रहने के लिए अपनी ज़िंदगी के ज़्यादातर हिस्से में लड़ना पड़ता है।
और शायद आज के समय में, जब ध्यान भटकाने और इनकार करने की भरमार है, यही इसका सबसे बड़ा—और सबसे ज़रूरी—हक़ है।

