युवा लेखिका तस्नीम खान का कहानी संग्रह आया है ‘बवालिस्तान’। अनबाउंड स्क्रिप्ट प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह को हाल में विजयमोहन सिंह स्मृति युवा सम्मान से सम्मानित किया गया है। आइये इस कहानी संग्रह की समीक्षा पढ़ते हैं, जिसे लिखा है जाने-माने लेखक, पटकथाकर चरण सिंह पथिक ने- मॉडरेटर
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हम उन्हें कहानियों की खान कहते हैं। युवा लेखक तसनीम खान का अनबाउंड स्क्रिप्ट से प्रकाशित ताजा कहानी संग्रह ‘बवालिस्तान’ पाठकों के बीच अच्छा—खास बवाल मचाए हुए है। तसनीम खान का यह दूसरा कहानी संग्रह है। इससे पहले उनके दो उपन्यास व एक कहानी संग्रह प्रकाशित होकर पाठकों के बीच चर्चित हो चुके हैं। उनके उपन्यास ‘ऐ मेरे रहनुमा’ का अंग्रेजी में अनुवाद भी हुआ है। तसनीम खान को अब तक कई पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है। और अभी—अभी उन्हें स्व. विजयमोहन सिंह स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया है। वे खुद पत्रकारिता के पेशे से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि उनकी खोजी नजर कहानियों की तलाश में हमेशा सजग और सतर्क रहती है।
उनका ताजा कहानी संग्रह ‘बवालिस्तान’ पीड़ाओं का आख्यान है। संग्रह की शीर्षक कहानी ‘बवालिस्तान’ हिंदुस्तानी मीडिया अफसरशाही और राजनीति को अंदर तक भेदती चली जाती है। कहानी के केंद्र में मीडिया है, जो सत्ता के शीर्ष पर बैठे शख्स के लिए दिन—रात हलकान है। रोज—रोज नए—नए मुद्दे और नए शब्दों की ऐसी खूनी—प्यासी तलाश आज के मीडिया को आदमखोर बना चुकी है। मीडिया का ऐसा दयनीय चेहरा शायद ही कभी देखा हो। दयनीय….! …. वो भी आदमखोर!
यह साम्प्रदायिकता का महाभारत काल है। जो चुनाव आते ही अपनी शकुनी चालें चलना शुरू कर देता है। हर जायज मांग और वाजिब आवाज कुचल दी जाती है। हर किसी पर एक दुधारी तलवार लटकी हुई है। ‘बवालिस्तान’ की इस दुनिया में हम बेआवाज जीने पर मजबूर हैं। यहां सच बोलने वाला या तो ‘देशद्राही’ करार दिया जाता है या ‘आतंकवादी।’
अगर आप उस अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं, जिसे मुस्लिम कहा जाता है, तो हर कदम पर, हर बार, आजादी के इतने सालों बाद भी आपसे हिंदुस्तानी होने का सबूत— कहीं भी, कभी भी मांगा जा सकता है। हिंदुस्तान की जिस अस्मिता और गौरव के लिए हर तबके और धर्म के लोगों ने अपना खून—पसीना बहाया है। वे या उनके पूर्वज या विभाजन की त्रासदी में बिछुड़े ‘हाफिज’ जैसे बच्चे पाकिस्तान से जैसे—तैसे अपनी मिट्टी को याद कर लौटते हैं, तो उनका जो हश्र होता है, वो ‘पैरों में फिर पीर उठी है’ कहानी में तसनीम खान ने बखूबी दर्ज किया है। तसनीम के पास प्रेम और पीड़ा की अभिव्यक्ति के लिए एक सार्थक भाषा है।
उनके कथानक अपनी शैली और शिल्प लेकर उसकी भाषा के पीछे—पीछे जैसे अपने आप चले आते हैं। ये उनका कौशल है। आठ—दस पन्ने किसी घटना में काले करने से कोई कहानी नहीं बन जाती। कहानी के लिए यथार्थ के पीछे के यथार्थ का पीछा करना होता है। एक साहसिक पहल करनी होती है। तसनीम खान ये पहल करती हैं। एक जोखिम उठाकर मुस्लिम समुदाय की उन कुरीतियों और कुप्रथाओं को चीरकर रख देती हैं, जहां परंपरा के नाम पर तमाम जिल्लतें औरतों पर जबरन थोप दी गई हैं। तसनीम की मुस्लिम औरतें अपने हक और स्वतंत्रता के लिए जोखिम उठाती हैं। आवाज उठाती हैं। सदियों से चली आई उन सड़ी—गली प्रथाओं और परंपराओं को चुपचाप सहन नहीं करती हैं। संघर्ष करती हैं। यही संघर्ष उन्हें जीने की आजादी कभी न कभी मुहैया करवाएगा।
‘बुगले की चोंच और दिल्ली दरवाजा’ की सीमा हो या बेवा सफीना। ‘मेरे हिस्से की चांदनी’ की निगहत और मीना। ‘दुनियावी खुदा’ की मेहनाज भाभी और ‘रूख ए गुलजार’ की दादी और उसकी पोती। सबके अपने—अपने संघर्ष हैं। अपनी—अपनी पीड़ाएं हैं। जिनसे निजात पाने के लिए वे अंदर और बाहर संघर्षरत हैं। वे चुपचाप समर्पण नहीं करती हैं। यही विशेषता उनके स्त्री पात्रों को अन्य रचनाकारों से अलग करती हैं।
‘भूखमरी की नगरी में दिवाली’ और ‘नफा नुकसान’ कोरोनाकाल की मार्मिक कहानिंया हैं। यूं तो संग्रह की सभी कहानियां भारतीय राजनीति, साम्प्रदायिकता और आमजन की त्रासदियों के कुत्सित चेहरे को बेनकाब करती हैं। मगर इन सब कहानियों के बीच एक प्रेम कहानी अलग से अपनी आभा बिखेरती है— ‘धीणे रख दे रे ढोला।’
साबिर गडरिया और कुलमी की ये प्रेम कहानी रेत पर बिखरे मोती जैसी लगती है। साबिर की बांसुरी की टेर और कुलमी के प्रेमिल आकुल हृदय की टीस रेगिस्तान में अलग ही संगीत की रचना करती है।
इतिहास हमेशा अधूरी प्रेम कहानियों का ही लिखा जाता रहा है। कुलमी की टीस पाठक के अंदर रिसती रहती है। लोक में खूब कहा जाता है कि जो स्त्री मन का मान नहीं रखता स्त्री उसे शापित कर देती है। और उस बरस साबिर की बकरियां ‘धीणे’ नहीं हुई। खाली छूट गई। हो सकता है कि कुलमी का श्राप साबिर को लगा हो….।
‘कथा भोले सैयद की’ लोक कथा के रस से सराबोर बहुत ही मजेदार कहानी है। ‘क्या मांगा था और क्या मिला…।’ आज की जनता यही सब तो भुगत रही है। सरकार कहती है कि हम सब कुछ दे रहे हैं, जनता को। जनता भोलेपन से हर पांच साल में पूछती है— जो दिया वो है कहां धरातल पर? बेचारी जनता… बेचारा भोला सैयद… आज भी जो दिया गया उसकी तलाश में भटक रहा है। यही छल सत्ता और उसके भ्रष्ट कारिंदों का असली चेहरा है।
साम्प्रदायिक सदभाव की एक बेहतरीन कहानी है ‘भाई साब’ इसे जरूर मिसाल के तौर पर पढ़ा जाना जरूरी है।
फिलहाल एक बेहतरीन संग्रह की, बेहतरीन कहानियों के लिए तसनीम खान को बधाई और शुभकामनाएं।
स्वर्गीय विजयमोहन सिंह स्मृति सम्मान के लिए तसनीम को सभी हिंदी पाठकों की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं।
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