
कल महान शायर बशीर बद्र का देहांत हो गया। वे बहुत संजीदा शायर थे और उतने ही लोकप्रिय भी थे। सन् 2000 के आसपास जब वाणी प्रकाशन से उनकी किताबें प्रकाशित हो रही थीं तब उनके साथ काफ़ी समय बिताने का मौक़ा मुझे भी मिला था। मैं उनके ऊपर बाद में लिखूँगा। आज पढ़िए युवा शायर-लेखक त्रिपुरारि की यह टिप्पणी- प्रभात रंजन
=====================
कल्पना कीजिए- घर की तन्हा बालकनी। शाम की गोधूलि बेला। अंधेरे का हल्का धुंधलका। दूर से आती हुई शास्त्रीय संगीत की आवाज़। पहले महबूब के साथ बिताए हुए पलों की धड़कती हुई याद। सीने में उठती हुई एक आधी टीस। शाख़ों से फूलों के उतरने की आवाज़। चाँदनी की सरसराहट। इससे पहले कि आँखें डबडबा जाएँ, कुछ लफ़्ज़ आपका हाथ थामकर आपके दर्द पर मरहम रख जाते हैं-
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।
यह बात सच है कि कुछ शायर तूफ़ान की तरह आते हैं। उनकी आवाज़ ऊँची होती है, उनका असर अचानक होता है। लेकिन कुछ शायर शाम की बारिश जैसे होते हैं- धीमे, नरम, और भीतर तक उतर जाने वाले। बशीर बद्र उन्हीं शायरों में से हैं। उनकी शायरी चीख़ती नहीं, धीरे से दिल के पास बैठ जाती है। …मगर बशीर बद्र से मेरा पहला परिचय बिल्कुल अलग अंदाज़ में हुआ था। उन दिनों इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दिन थे। बारहवीं के इम्तिहान सर पर थे, लेकिन शनिवार की रात ईटीवी उर्दू पर मुशायरे का प्रोग्राम देखने से ज़्यादा ज़रूरी कुछ नहीं लगता था। वहीं पहली बार मैंने एक शायर को यह शेर पढ़ते हुए सुना—
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
यह शेर सिर्फ़ एक सामाजिक टिप्पणी नहीं है; इसमें इंसानी दर्द की पूरी कहानी समाई हुई है।
“घर” यहाँ सिर्फ़ ईंट और दीवार नहीं, बल्कि उम्मीद, मेहनत, रिश्ते और यादों का प्रतीक बन जाता है। बशीर बद्र की यही ताक़त है कि वे छोटे से लफ़्ज़ में बड़ी दुनिया समेट देते हैं। शायद इसीलिए मुझे उनकी शायरी हमेशा पुराने घरों की याद दिलाती है। बरामदे में रखी एक कुर्सी, आधी खुली खिड़की, बारिश के बाद भीगी हुई सड़क, और रात के आख़िरी पहर तक जलता हुआ एक अकेला चिराग़। उनकी ग़ज़लों में यही दुनिया बसती है- छोटी-छोटी चीज़ों से बनी हुई, लेकिन गहरे एहसासों से भरी हुई। वे मोहब्बत को किसी बड़ी दास्तान की तरह नहीं लिखते; वह उनके यहाँ रोज़मर्रा की ज़िंदगी में साँस लेती है। चाय के प्याले में, बिछड़ते क़दमों में, और उन कमरों में जहाँ किसी की याद अब भी ठहरी रहती है।
बशीर बद्र की सबसे बड़ी ख़ूबी उनकी सादगी है। उनकी ज़बान मुश्किल नहीं मगर असर बहुत गहरा है। वे ऐसे अल्फ़ाज़ चुनते हैं जो आम आदमी की ज़िंदगी से जुड़े हों। यही वजह है कि उनकी शायरी सिर्फ़ अदबी हल्क़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि आम लोगों की ज़बान का हिस्सा बन गई। उनके कई शेर लोग रोज़मर्रा की बातचीत में इस्तेमाल करते हैं, जैसे वे किसी निजी एहसास का बयान हों-
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों
या फिर,
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता
बशीर बद्र की दुनिया में तन्हाई बार-बार लौटती है। मगर यह तन्हाई नाटकीय नहीं होती। यह आधुनिक ज़िंदगी की वह ख़ामोश उदासी है जो भीड़ में भी इंसान का पीछा करती रहती है। उनके यहाँ शहर सिर्फ़ जगह नहीं, एक एहसास बनकर आता है- रोशनी से भरा हुआ, लेकिन भीतर से उजाड़। देर रात तक खुली खिड़कियाँ, सुनसान सड़कें, कोहरे में लिपटी गलियाँ- ये सब उनकी शायरी के स्थायी मंज़र हैं।
दिलचस्प बात यह है कि इतनी उदासी के बावजूद उनकी शायरी मायूस नहीं लगती। उसमें एक नरमी है, एक इंसानी गर्माहट। वे रिश्तों के टूटने की बात करते हैं, मगर मोहब्बत पर यक़ीन कभी नहीं छोड़ते। उनकी शायरी जैसे यह कहती है कि दुनिया चाहे कितनी भी सख़्त हो जाए, इंसान को अपने भीतर की मुलायमियत बचाकर रखनी चाहिए।
बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को नई ज़मीन दी। क्लासिकी ग़ज़ल में महबूब अक्सर एक ख़याली या प्रतीकात्मक शख़्सियत हुआ करता था, मगर बशीर बद्र के यहाँ महबूब इस दुनिया का इंसान है- रेलवे स्टेशन पर बिछड़ता हुआ, शहरों के फ़ासलों में खोता हुआ, या किसी पुराने ख़त की तरह यादों में रह जाने वाला। उन्होंने ग़ज़ल की परंपरा को तोड़ा नहीं, बल्कि उसमें आज की ज़िंदगी की धड़कन शामिल कर दी। जैसे-
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
या,
इसी शहर में कई साल से मिरे कुछ क़रीबी अज़ीज़ हैं
उन्हें मेरी कोई ख़बर नहीं मुझे उन का कोई पता नहीं
उनकी शायरी का एक और अहम पहलू उसकी संगीतात्मकता है। उनके शेर पढ़े ही नहीं जाते, गुनगुनाए भी जाते हैं। उनमें लय है, रवानी है, और एक ऐसी मिठास जो सीधे दिल तक पहुँचती है। शायद यही वजह है कि उनके अशआर लोगों की ज़बान पर चढ़ जाते हैं। उनके यहाँ तस्वीरें बहुत ख़ास हैं। वे बड़े-बड़े रूपकों का इस्तेमाल कम करते हैं। एक बुझता हुआ दीया, धूल से ढकी मेज़, बारिश की बूंदें, या बंद दरवाज़ा- ये मामूली चीज़ें उनकी शायरी में गहरे एहसास का रूप ले लेती हैं। वे ज़्यादा नहीं कहते; बस इशारा करते हैं। और वही इशारा दिल में देर तक गूंजता रहता है। कभी-कभी यह हौसला भी देता है। जैसे यह शेर—
हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा
उनकी शायरी में समाज की तकलीफ़ भी मौजूद है। उन्होंने दंगों, नफ़रत और टूटते हुए इंसानी रिश्तों को बहुत क़रीब से देखा। लेकिन वे नारेबाज़ शायर नहीं हैं। उन्होंने राजनीति से ज़्यादा इंसान की तकलीफ़ पर लिखा। उनके यहाँ सवाल यह नहीं कि कौन सही है और कौन ग़लत; सवाल यह है कि नफ़रत के बीच इंसानियत कहाँ बचती है। लेकिन एहतियात के साथ—
बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता
या फिर,
यहाँ लिबास की क़ीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे
शायद इसी वजह से उनकी शायरी हर पीढ़ी को अपनी लगती है। युवा पाठक उसमें अपने टूटे हुए रिश्ते देखते हैं, और बुज़ुर्ग अपने गुज़रे हुए दिन। उनकी ग़ज़लें वक़्त के साथ पुरानी नहीं होंगी क्योंकि वे इंसानी एहसासों की बुनियादी सच्चाइयों से जुड़ी हुई हैं। बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि वह हर बार हमें थोड़ा कम अकेला महसूस कराती है। उनकी ग़ज़लें पढ़ते हुए लगता है कि किसी ने हमारे भीतर छिपे हुए दुख, हमारी अधूरी मोहब्बतों, और हमारी ख़ामोश यादों को आवाज़ दे दी हो। वे मुश्किल बातें बहुत आसान लहजे में कहते हैं, और शायद यही असली फ़न है। मिसाल के तौर पर—
शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
यही वजह है कि बशीर बद्र की शायरी को सिर्फ़ पढ़ा नहीं जाता, महसूस किया जाता है। वह सौंधी मिट्टी की ख़ुशबू की तरह ठहरती है। एक पुराने ख़त की तरह बार-बार खोली जाती है। और एक दूर जलती हुई रौशनी की तरह हमें यह यक़ीन दिलाती है कि दुनिया में अब भी नर्मी, याद और मोहब्बत बाक़ी है। उनका एक मशवरा जो मुझे बहुत काम आया, शायद आपके भी काम आए-
सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा

