
लोकप्रिय साहित्य पर हिंदी में अपेक्षाकृत कम गंभीर लेखन हुआ है, जबकि उसके पाठकों की दुनिया बेहद व्यापक, जीवंत और बहुरंगी रही है। सुरेन्द्र मोहन पाठक उन विरल लेखकों में हैं जिन्होंने न केवल करोड़ों पाठकों तक पहुँच बनाई, बल्कि अपने पाठकों के साथ एक विशिष्ट भावनात्मक और सांस्कृतिक रिश्ता भी निर्मित किया। “पाठक की कहानी एक पाठक की ज़ुबानी” इसी रिश्ते की कथा है। इसके लेखक सुहैब अहमद फ़ारूक़ी पेशे से पुलिस अधिकारी हैं, लेकिन इस लेख में उनकी पहचान सबसे पहले एक ऐसे पाठक की है जिसकी पाठकीय यात्रा किशोरावस्था में पाठक के उपन्यासों से शुरू हुई और समय के साथ संवाद, आत्मीयता और स्मृतियों के एक लंबे सिलसिले में बदल गई। यह संस्मरण न तो साहित्यिक आलोचना है, न जीवनी, न ही कोई शोधपरक अध्ययन। यह एक पाठक की आँखों से देखे गए लेखक का वृत्तांत है, जिसमें सुरेन्द्र मोहन पाठक के व्यक्तित्व, उनके पाठकों के साथ संबंध और लोकप्रिय साहित्य की उस संस्कृति की झलक मिलती है जिसने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया है। दिलचस्प बात यह है कि यह लेख पहले सुरेन्द्र मोहन पाठक के चर्चित उपन्यास “स्टॉप प्रेस” के नवीन रीप्रिंट संस्करण में परिशिष्ट के रूप में प्रकाशित हो चुका है। जानकीपुल पर इसे प्रकाशित करने का उद्देश्य लोकप्रिय साहित्य और उसके पाठकों की दुनिया पर एक अलग तरह की गवाही को पाठकों तक पहुँचाना है- मॉडरेटर
=============================
एक संदेश, एक शाम:
तेरह जून 2021, रविवार, 8:49 पीएम:
“हल्लो! गुड इवनिंग! हैव यू बिन ट्रांसफर्ड?”
13 जून की इतवारी शाम थी। पोस्टिंग मेट्रो रेलवे में चल रही थी। इस पोस्टिंग से अपेक्षाकृत ज़्यादा हासिल क्वालिटी टाइम में कश्फ़ साहिबा के साथ उस वक़्त के ठिकानेचमन, ग़फ़्फ़ार मंज़िल में बैठा था। सरकारी ई-मेल और व्हाट्सएप की आड़ में मोबाइल पर फ़ेसबुक विचरण भी चल रहा था कि एसएमएस की नोटिफिकेशन टोन – एक ऐसी आवाज़ जिसे आजकल हम अनदेखा कर देते हैं – बज उठी।
फोन हाथ में था, इसलिए तुरंत देख लिया। मैसेज ‘साहब’ का था। सचेत होकर पढ़ने में दस सेकंड लगे। पूरे दो महीने बाद संवाद स्थापित हो रहा था। इससे पहले 14 अप्रैल को उन्होंने उमैर नजमी का यह शेर भेजा था :
मैं ख़ुद को तुझसे मिटाऊँगा एहतियात के साथ
तू बस निशान लगा दे जहाँ-जहाँ हूँ मैं।
“सर, आँखें तरस गई थीं आपका मैसेज पढ़ने के लिए।”
“मुमकिन हो तो . . . बात हो सकती है?”
“शुक्र है ख़ुदा का।”
“ट्रांसफ़र की बोलो!”
“जी, पिछले महीने ट्रांसफ़र हो गया हूँ। अब मैं स्टेशन हाउस आज़ादपुर मेट्रो में हूँ।”
साहब के मैसेज के जवाब में सकते की हालत में एक ही बार में भेजने लायक़ जैसे उपरोक्त मैसेज मैंने एक के पीछे चार भेजे। उस वक़्त मेरी यह ग़ैरमामूली हालत देखकर कश्फ़ साहिबा की ख़ास तवज्जो मुझ पर हुई। जब उन्हें मालूम हुआ कि संदेश किसका था तो उनकी ख़ुशी में भी इज़ाफ़ा हो गया।
साहब की तरफ़ से जवाब आया, “जनाब, मैं अभी भी बुरे हाल में हूँ। चलना ठीक होने में अभी एक महीना और लगेगा। मुकम्मल ठीक होने में साल भी लग सकता है। बाक़ी अल्लाह बेली।”
मैंने लिखा: “बिल्कुल सर, अल्लाह हर शै पर क़ादिर है।”
फिर अगले दिन दोपहरबाद बात करने का हुक्म हुआ। इन सुकून और ख़ुशी के पलों से जब उबरा, तो इन लम्हात और जज़्बात को कुलभूषण चौहान साहब से साझा किया।
साहित्य की शरण:
हज़रात, एक उम्र के बाद सामान्य आदमी जीवन की सामान्य चर्या से हटकर एक रिफ़्यूज – यानी शरण – खोजने लगता है। मेरे यह कहने से मुराद यह है कि आदमी का बच्चा पैदा हुआ, पढ़ा-लिखा, नौकरी या व्यवसाय में कैरियर ढूँढ़ा, विवाह हुआ और फिर बच्चे भी हो गए। बच्चे बड़े होने लगे तो वैवाहिकता निजी सम्बंधों की प्रगाढ़ता से निकलकर पारिवारिक और सामाजिक आबद्धताओं के अधीन आ गई।
अब इस उम्र में आकर मेरे जैसा सामान्य आदमी क्या करे? मेरे लिए साहित्य हमेशा वही शरणस्थली रहा है। पुलिस की नौकरी में जहाँ रोज़ अपराध, पीड़ा, धोखा और टूटे हुए चेहरे सामने आते हैं, वहाँ किताबें मेरे लिए नख़लिस्तान हैं। और उसी नख़लिस्तान का सबसे बड़ा दरख़्त हैं – सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब।
ऊपर वाले वार्तालाप में ‘साहब’ से अभीष्ट वही हैं।
बात कोरोना के मरदूद काल की हो रही है। 18 अप्रैल 2021 को पता चला था कि पाठक साहब और उनके साहबज़ादे सुनील दोनों कोरोना संक्रमित हैं। साहब का ऑक्सीजन स्तर 65-78 तक पहुँच गया था और तमाम प्रयासों के बावजूद अस्पताल में बेड नहीं मिल पा रहा था। बेबसी और लाचारी की इस स्थिति को अगले दिन तक गुज़ारने के बाद दोनों को अपोलो अस्पताल, जसोला विहार, नई दिल्ली में एडमिशन मिल गया था।
पुरानी कहावत है, दवा के साथ दुआ भी ज़रूरी है। मुझसे बेहतर कौन जान और समझ सकता है इस सच्चाई को!
पिछले साल इसी नामुराद बीमारी के चलते ख़ाकसार का ऑक्सीजन लेवल 87 तक आ चुका था। सीटी स्कैन की रिपोर्ट 18/25 की मार्किंग के साथ आई थी। तब मैं भी दुआओं के सबब बाहर आया था। पाठक साहब के साथ तो ख़ैर दुआओं का एक सैलाब था, सैलाब है और सैलाब रहेगा। पाठक साहब अपने पाठकों में विद्यमान रहते थे, विद्यमान रहते हैं और विद्यमान रहेंगे। ख़ैर, 5 मई को 22 दिन बाद दोनों साहबान अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर आ गए। निःशक्तता और दुर्बलता के सबब बोलचाल बंद थी। तमाम ख़्वाहिशों के बावजूद फ़ोन न करने की मजबूरी थी। सुनील साहब और रीमा से मैसेज के ज़रिये ख़ैरियत पता चलती रही।
रात बड़ी बेकली से कटी। 14 जून की सुबह सरकारी कार्यों में कट रही थी। लेकिन इस कटते हुए समय में कई बार चाह उठी कि फ़ोन मिला लूँ। दोपहर हो गई। दोपहरबाद भी हो गई – यानी डेढ़ भी बज गया। पौने दो बजे मोबाइल की घंटी बजी। साहब का ही फ़ोन था।
“नमस्कार सर!” मैंने जज़्बात को कंट्रोल में करते हुए सलाम पेश किया।
उधर से पुरतरन्नुम आवाज़ सुनाई दी, “कूचे में तिरे आके तेरा घर न रहा याद…” आवाज़ मख़मली इतनी कि जगजीत सिंह की याद आए और लहजा ऐसा कि उस्ताद जिगर मुरादाबादी या कलीम आजिज़ का गुमान हो।
मैं दम-बख़ुद हो गया।
कुछ क्षण बाद उधर से आवाज़ आई,“हल्लो?”
मैंने गला साफ़ करते हुए कहा, “जी, जी! मैं सुन रहा हूँ। आप कंटीन्यू रखिए।”
फिर उन्होंने शेर मुकम्मल किया:
कूचे में तिरे आके तेरा घर न रहा याद,
क्या तूने बुलाया मुझे, क्या मैंने किया याद।
“आप हैरान होंगे,” उन्होंने कहा, “मैं इतना गंभीर केस था कि बोल नहीं सकता था। मुँह से आवाज़ निकालता था तो गले में फँस जाती थी।”
साहब अपने बाईस दिनों के अस्पताल-प्रवास को बयान कर रहे थे। मैं सुन रहा था। उनकी आवाज़ के सहर में खो रहा था।
बाईस दिन! इत्तिफ़ाक़ से मेरा भी इतने ही दिनों का अस्पताल में निवास रहा था। साहब का बयान एक रूदाद तो था, मगर उस रूदाद में अफ़सोस की जगह उल्लास था।दूसरे सभी ख़ैरख़्वाहों के साथ-साथ इस गुनहगार की दुआ भी असर लाई थी।
उन्होंने कहा, “सुहैब बेटा! मैं तो क़िस्मत से बच गया! बनाने वाले से सारे गिले-शिकवे दूर हो गए।”
घर आने के बाद उनका मोबाइल कुछ दिन पहले ही घरवालों ने वापस किया था – इस हिदायत के साथ कि बात नहीं करोगे, सिर्फ़ मैसेज टाइप करोगे। और उसी मोबाइल से आया यह फो़न, जिसमें बीमारी की जगह शायरी थी, शिकवे की जगह शुक्र था, और मौत के साए से लौटे इंसान की आवाज़ में ज़िंदगी की पूरी मिठास थी।
मैं देर तक फोन हाथ में लिये बैठा रहा। कुछ लोग सिर्फ़ लिखते नहीं, लिखे को जीते हैं। कुछ आवाज़ें सिर्फ़ सुनाई नहीं देतीं, दुआ बन जाती हैं और कुछ लम्हे ऐसे होते हैं जो हमेशा के लिए दिल में दर्ज हो जाते हैं।
स्योहारा की लाइब्रेरियाँ और पहला पाठकीय प्रेम:
जहाँ तक मुझे याद आता है, पाठक साहब से मेरा – उनका पाठक होने वाला – रिश्ता 1984 से, स्कूल के दिनों से है। तब मैं स्योहारा (बिजनौर) में प्राइवेट लाइब्रेरियों से पच्चीस पैसे प्रतिदिन किराये पर उनके उपन्यास, दूसरे जासूसी उपन्यासकारों के उपन्यासों के साथ, पढ़ा करता था। ख़रीद कर किताब पढ़ने की औक़ात बनी तो फिर हर नया उपन्यास ख़रीदा। पुराने ढूँढ़-ढूँढ़ कर निजी संग्रह में शामिल किए। हर उपन्यास के पहले या दूसरे पन्ने पर ख़रीदने की तारीख़, जगह और अपना नाम लिखने की परंपरा बना ली। मेरी जेब में पाठक साहब के मेरे पास उपलब्ध उपन्यासों की हस्तलिखित सूची भी रहती थी – कौन-सा उपन्यास था, कौन-सा नहीं था, सब दर्ज रहता था।
दरियागंज की पहली मुलाक़ात:
सन् 1993 में, जब मुझे दिल्ली नगर निगम के सरकारी स्कूल में अध्यापक की नौकरी मिली, तब तक पाठक साहब से ख़त-ओ-किताबत के ज़रिये – उन्हें बिना देखे और मिले – एक आत्मीय सम्बंध मेरी ओर से स्थापित हो चुका था। मेरी चिट्ठियाँ उनके उपन्यासों के ‘लेखकीय’ में स्थान भी पा चुकी थीं।
लेकिन रू-ब-रू मिलने में एक सुकुमार प्रेमरूपी झिझक आड़े थी। अगले बरस जब मेरा चयन दिल्ली पुलिस में हुआ, तब मैं इस ख़ुशख़बरी के साथ बड़ी हिम्मत कर के सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब के कार्यालय – दरियागंज, दिल्ली – पहुँचा।
साहब ने बड़ी आत्मीयता और ख़ुशी से, जैसे मुझे कई बरसों से जानते हों, मेरा सत्कार किया। चाय पिलाई और अपने सहयोगियों से मेरा परिचय दिल्ली के थानेदार के रूप में कराया – जबकि तब मुझे थानेदारी का ‘थ’ भी नहीं पता था, सब-इन्स्पेक्टर अभी मैं बस भर्ती हुआ था। चलते वक़्त साहब ने अपने दो रीप्रिंट नॉवेल गिफ़्ट किए।
ख़ुमारी की हालत में मैं नीचे उतर आया, सड़क पर उसी ट्रांस जैसी हालत में कोई एक किलोमीटर चल भी दिया, फिर ख़याल आया, ‘मैं साथियों पर कैसे रौब डाल सकूँगा कि पाठक साहब से मिला था?’
मैं वापस लौटा। वजह जान कर साहब बहुत ज़ोर से हँसे। फिर दोनों किताबों पर उन्होंने आशीर्वाद सहित हस्ताक्षर किए।
उस मुलाक़ात से पहले मैं पाठक साहब का केवल एक पाठक था – गहरा डूबा हुआ, लगभग आसक्त पाठक। मुझे यह एहसास तब नहीं था कि जिस लेखक को मैं इतना पढ़ रहा हूँ, वही आगे चल कर मेरे जीवन में गुरु, मार्गदर्शक और आत्मीय बन जाएगा।
यहीं से रिश्ता केवल पाठक का नहीं रहा – एक सी-सॉ वाली दोस्ती का बन गया। सी-सॉ पर खेलने वाले दो साथियों को देखिए – ऊपर-नीचे होते हुए भी दोनों साथ दिखाई देते हैं। लेकिन हक़ीक़त यह है कि भारी दोस्त अपने पैरों की मदद से अपेक्षाकृत हल्के दोस्त को अपने साथ बनाए रखता है।
किताबें, घर और जीवन की दिशा:
किताबें मेरे जीवन में वस्तु नहीं, जीवित उपस्थिति रही हैं। दिल्ली में स्थापित होने के बाद मैं स्योहारा और उमरी में रखी अपनी तब तक की संचित किताबों को – जिनमें अस्सी प्रतिशत पाठक साहब के उपन्यास थे – बोरों में भर कर ले आया। किराये के पाँच-छः कमरे बदलने के बाद जब मुझे सुल्तानपुरी की पुलिस कॉलोनी में सरकारी फ़्लैट मिला, तो उस दो कमरों के फ़्लैट में ज़रूरत की चीज़ों से कहीं ज़्यादा किताबें थीं – अलमारियों में, मेज़ों पर, बिस्तर के पास, यहाँ तक कि किचन और टॉयलेट तक में।
विवाह, बनारस और ‘धमकी’:
जून 2001.
विवाह के तुरंत बाद मैंने हनीमून के लिए बनारस चुना। पत्नी ने पूछा तो मेरा तर्क सीधा था – दैहिक आकर्षण क्षणिक होता है, बौद्धिक और आध्यात्मिक निकटता स्थाई। काशी और सारनाथ की धरती पर हम उस शाश्वत प्रेम को महसूस करेंगे – ऐसा मेरा भोला, आदर्शवादी विश्वास था। साथ ही बड़े भाई समान विनय श्रीवास्तव जी के परिवार से मिलने की इच्छा भी थी।
यह हमारी – मतलब हम दोनों की – पहली ट्रेन यात्रा थी: काशी-विश्वनाथ एक्सप्रेस। टिकट साथ-साथ थे, पर मेरा मन किसी और ही यात्रा पर था। सामने वाली सीट पर मैं पाठक साहब का नवीनतम उपन्यास ‘धमकी’ – जो कुछ दिन पहले ही प्रकाशित हुआ था और जो विवाह की गहमागहमी में अपठित रह गया था – पढ़ने में इस कदर तल्लीन था कि नई-नवेली दुल्हन की उपस्थिति भी उस क्षण मेरे पाठकीय संसार को भंग नहीं कर पा रही थी। अब पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो हँसी भी आती है और संकोच भी।
पत्नी ने तीन बार पूछा, “सुनिए, कौन-सा स्टेशन आ रहा है?”
मैंने किताब से नज़र हटाए बिना कहा, “पढ़ना आता है। बाहर देखो, लिखा होगा!”
यह वाक्य आज भी याद है – और उसके साथ वह पश्चाताप भी, जो तब तुरंत महसूस नहीं हुआ था। कुछ देर बाद सामने वाली बर्थ पर बैठी एक आंटी ने पत्नी से पूछा, “बेटी, किसके साथ हो?”
तब मुझे अपनी भूल का एहसास हुआ।
मैं झटके से सम्भला, “आंटी, यह मेरे साथ हैं।”
मैं पास जाकर बैठा। औपचारिक-सा पूछा,“भूख लगी है? कुछ खाओगी?”
और फिर वही मूर्खतापूर्ण वाक्य, “सो जाओ थोड़ी देर। मायके की याद आ रही होगी।”
किताब फिर खुल गई। ‘धमकी’ अपने क्लाइमैक्स की ओर बढ़ रही थी, और मेरी वैवाहिक संवेदनशीलता अभी प्रारम्भिक अध्याय में ही अटकी हुई थी।
सपत्नीक विज़िट और अलीना का पहला जन्मदिन:
बनारसी हनीमून से लौटने के कुछ दिन बाद मैं सपत्नीक पाठक साहब के कृष्णा नगर वाले घर पहुँचा। यह हमारी पहली पारिवारिक, औपचारिक मुलाक़ात थी। साहब ने बड़े अपनत्व से स्वागत किया। पत्नी की ओर देख कर मुस्कुराए और बोले, “बिटिया, तुम बहुत लकी हो कि तुम्हें सुहैब जैसा शरीक-ए-हयात मिला है।”
यह सुन कर पत्नी थोड़ी असहज हो गईं – और ख़ाकसार भीतर ही भीतर तारीफ़ से फूल कर कुप्पा हो गया। उस एक वाक्य में साहब ने केवल दुआ नहीं दी थी, उन्होंने मेरे जीवन के चुनाव पर अपनी मुहर लगा दी थी।
इसके बाद पाठक साहब से मुलाक़ातें होती रहीं, टेलीफ़ोन पर बातें होती रहीं। बातचीत के विषयों में मेरी उर्दू भाषा की जानकारी और पुलिस कार्यप्रणाली सम्बंधी विवरण भी शामिल होते थे। मुझे फ़ख़्र होता था जब हमारे बीच चर्चा किए गए कुछ बिंदु पाठक साहब के आने वाले उपन्यासों के कथानक में दृष्टिगोचर होते थे।
अलीना के पहले जन्मदिन पर, मुझे याद है, पाठक साहब आए थे। बिटिया को आशीर्वाद देने के बाद जब मैंने उन्हें तलाश किया तो पता चला कि वे जा चुके थे। आह! ऐसे ही क़द्रदान हैं हमारे पाठक साहब –लाइमलाइट से दूर रहने वाले।
पाठक साहब ने बिटिया को जो उपहार दिया था, वह तो मुझे याद नहीं; लेकिन उसका रैपर – जो स्वयं पाठक साहब के आर्टवर्क का शाहकार था – हमारी अब तक की संकलित निधियों में शामिल है।
2010 – टूटन, अवसाद और एक लेखक का सहारा:
साल 2010
थानेदारी के अपने कैरियर की पीक पर था। प्रमोशन लगभग तय था – बस औपचारिक घोषणा शेष थी। बाहर से देखिए तो सब कुछ व्यवस्थित और सफल प्रतीत होता था – वर्दी का रौब, अनुभव की ठसक, वरिष्ठों का भरोसा, कनिष्ठों का सम्मान।
लेकिन भीतर कुछ टूट रहा था। दिल्ली की भागती-दौड़ती ज़िंदगी, दिखावटी सम्बंध, प्रतिस्पर्धा की अनवरत दौड़ और हर चेहरे पर चिपकी कृत्रिम मुस्कानें – सब अचानक अर्थहीन लगने लगे थे। दिन भर अपराध, शिकायतें, फाइलें, दबाव और ज़िम्मेदारियाँ; और रात को एक लम्बा, ठंडा सन्नाटा। ऐसा सन्नाटा जिसमें आदमी अपने ही विचारों से डरने लगे। धीरे-धीरे महसूस होने लगा कि मैं अपने ही भीतर से दूर होता जा रहा था। जैसे इस महानगर ने मेरी आत्मा पर महीन-सी धूल जमा दी हो – दिखती नहीं, पर साँस लेने में बाधा देती हो।
स्थिति यहाँ तक पहुँची कि मुझे मनोचिकित्सक की शरण लेनी पड़ी। मैं अपने ही खो़ल में सिमटता जा रहा था। तब पत्नी ने बिना बताए एक क़दम उठाया – उन्होंने चुपचाप सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब को फोन कर दिया।
कुछ ही दिनों बाद साहब का संदेश आया, “आओ, मिलो।”
मैं गया।
साहब ने मेरी हालत भाँप ली थी। उन्होंने कोई लम्बा उपदेश नहीं दिया, कोई मनोवैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया। बस, एक सीधा-सा काम सौंप दिया, “अहमद नदीम क़ासमी की एक कहानी का हिंदी में अनुवाद करना है।” साथ ही बताया कि रवि पॉकेट बुक्स से उनका एक संकलन प्रकाशित होना है।
फिर सहजता से कहा, “उसकी भूमिका तुम लिखोगे।”
मैं चौंका भी और हिचका भी। मैं? भूमिका?
उन्होंने मुझे लेखक की तरह नहीं, एक सम्भावित लेखक की तरह देखा। शायद मुझसे पहले उन्होंने मेरी संभावना देख ली थी।
अनुवाद करते–करते मैं शब्दों में लौटने लगा। भूमिका लिखते-लिखते मैं अपने भीतर लौटने लगा। जैसे किसी ने भीतर बुझती चिंगारी पर धीरे से फूँक मार दी हो।
उस दिन मुझे समझ आया कि साहित्य केवल शौक़ नहीं, सहारा भी होता है। अनुवाद का वह छोटा-सा काम मेरे लिए औषधि सिद्ध हुआ। अगर 2010 में साहब का वह भरोसा न मिला होता, अगर उन्होंने मुझे लेखक की तरह देखने का साहस न किया होता, तो शायद आज मैं केवल एक पुलिस अफ़सर होता। वर्दी होती, अनुभव होता, सेवा-रिकॉर्ड होता, पर शब्द नहीं होते और शब्दों के बिना मैं अधूरा होता।
प्रेस क्लब 2014 – पचपन वर्षों का उत्सव:
सन् 2014 अपने अंतिम दिनों में था। सोशल मीडिया पर ऑर्कुट के पिछड़ने के बाद फ़ेसबुक पर पाठक साहब के पंखों ने – यानी फ़ैन्स ने, बोले तो सुमोपाइयों ने – उनके नाम से एक पेज बना लिया था। ऑर्कुट के मुकाबले फ़ेसबुक एक खुले ड्रॉइंगरूम जैसा मंच था। कई महीने एडजस्ट होने – यानी मानसिकता बदलने – में लगे। कुछ मतभेद होने पर कुछ पाठकों ने एक नया ग्रुप पेज अलग बना लिया। मैं दोनों ही समूहों में शामिल था।
इन्हीं सुमोपाइयों ने 28 दिसंबर की शाम को नई दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया था। अवसर था – हिन्दी गल्प-साहित्य सम्राट जनाब सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब के लेखन के पचपन वर्षों की उल्लेखनीय यात्रा का उत्सव। कुछ दिन पहले ही फ़ेसबुक पर इस सम्मान समारोह की सूचना देख ली थी और हामी भी भर दी थी – जैसे वुज़ू इस नीयत से कर लिया हो कि समय मिला तो नमाज़ भी पढ़ ली जाएगी। बाद में पता चला कि सीटें सीमित थीं, तो मैंने शरद श्रीवास्तव जी को फोन कर अपनी सीट पक्की करवाई। उधर केबीसी साहब का भी फोन आ गया। उन्होंने भी सुनिश्चित कर लिया कि मैं पहुँचूँगा ही।
एक दिन पहले साहब को फोन किया तो उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा, “आ जाओ।”
बस, फिर क्या था। ड्यूटी को थोड़ा आगे-पीछे किया, रिज़र्व ड्यूटी का जोखिम भी लिया और हाज़िर होने का प्रण कर लिया।
28 दिसंबर की सुबह, जब उठा तो मौसम बिल्कुल ‘अपठनीय’ था – धुंध से भरा हुआ। मगर मन में नीयत बन चुकी थी। दिल्ली की सर्दी उस सुबह अपने पूरे जलाल और शबाब पर थी। धुंध इतनी गहरी थी कि सूरज भी मानो देर तक रज़ाई ओढ़े बैठा रहा।
दिल्ली की सर्दी, ट्रैफ़िक और धुंध से जूझता हुआ जब रायसीना हिल्स पर स्थित उस ऐतिहासिक इमारत में पहुँचा, तो प्रवेश द्वार पर केबीसी भाई ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में स्वागत किया। ऊपर हाल की ओर बढ़ा तो शरद जी मुस्कराते हुए मिले और बेसन के पकौड़ों की प्लेट आगे बढ़ा दी। मगर चालीस पार की उम्र में आदमी खाने से पहले उसके दुष्परिणाम भी सोचने लगता है, इसलिए मैंने पकौड़ों की जगह चाय की प्याली पर ही इक्तिफ़ा किया। गैलरी में विशी सिन्हा जी मिले। आगे बढ़ते हुए हसन अलमास और मुबारक भाई से अभिवादन हुआ।
तापमान नीचे उतरता जा रहा था, मगर पाठकों का उत्साह किसी अलाव की तरह गर्म था। देश के कोने-कोने से लोग आए थे – और कुछ तो विदेश से भी पहुँचे थे। विचारों में मतभेद हो सकते थे, लेकिन पाठक साहब के प्रति प्रेम में कोई मतभेद नहीं था।
लेकिन मेरा ध्यान तो बस एक दिशा में था – जहाँ साहब बैठे थे। मतलब यह कि हमारा प्रेम पाठक साहब से कुछ-कुछ गोपियों वाला था। मैं तेज़ी से उनकी ओर बढ़ा। वहाँ एसीपी डॉ. मक्खन सिंह साहब भी मौजूद थे – जो पाठक साहब के युवावस्था के मित्र रहे हैं। हमारे बीच तो एक पीढ़ी का फ़ासला है। एसीपी साहब ने अपनी कुर्सी छोड़ कर मुझे बैठाया, यह अपने-आप में मेरे लिए संकोच का विषय था।
नांगल वाले सुमोपाई राकेश वर्मा साहब मंच-संचालन कर रहे थे। सबसे पहले पाठक साहब को मंचासीन कराया गया। तभी थाने से एक फ़ोन आ गया। चूंकि फोन पर बात करना दुरुस्त नहीं था और पाठकों की भीड़ से उठ कर हाल से बाहर जा कर फ़ोन सुनने के बाद वापस सीट को क्लेम करना नैतिक रूप से संभव नहीं था इसलिए काल को काट कर फ़ोन करने वाले से मैं व्हाट्सऐप पर चैट करने लगा।
वर्मा जी की आवाज़ से मेरी तंद्रा टूटी। वह मुझे ही पुकार रहे थे। मैंने अचकचा कर स्टेज की ओर देखा। पाठक साहब के दाहिनी ओर एक नामी प्रकाशन समूह की संपादिका और दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफ़ेसर साहब विराजमान थे। बाईं तरफ़ वाली एक कुर्सी ख़ाली थी। समझ में आया कि वर्मा जी मुझसे स्टेज पर आने और उस कुर्सी पर बैठने का अनुरोध कर रहे थे।
ट्रांस की-सी कैफ़ियत में मैं उठा और उस कुर्सी पर जा कर बैठ गया, जो पाठक साहब के दिल की तरफ़ थी। मन में वही संकोच, कि मैं यहाँ क्या कर रहा था? मेरी औक़ात से कहीं ऊपर मुझे मंच पर पाठक साहब के साथ बैठा दिया गया था। वह मेरा कोई अर्जित अधिकार नहीं था, वह पूरी तरह साहब का वात्सल्य और उनके पाठकों द्वारा दिया गया सत्कार था।
कार्यक्रम शुरू हुआ। सभागार में साहित्यिक आत्मीयता का वातावरण था। एक-एक वक्ता पाठक साहब की लेखकीय यात्रा, उनके योगदान और उनके व्यक्तित्व पर बोल रहा था। इतने लोगों के बीच बैठा मैं भीतर से लगातार महसूस कर रहा था कि यह सब मेरे हिस्से का सम्मान नहीं है, यह तो उनके प्रेम की छाया है, जिसमें मैं अनायास आ खड़ा हुआ हूँ।
मंच पर बोलने की बारी आई तो मैं बिना तैयारी के था। अंग्रेज़ी में कहें तो एक्सटेम्पोर बोलना पड़ा। उस समय मेरा शायरी का कीड़ा भी कुलबुलाने लगा था, लेकिन साहस इतना नहीं था कि अपने शेर सुनाऊँ। इसलिए मैंने निदा फ़ाज़ली साहब के ये दो शेर उद्धृत कर के अपनी बात पूरी की:
मन बैरागी तन अनुरागी क़दम–क़दम दुश्वारी है
जीवन जीना सहज न जानो बहुत बड़ी फ़नकारी है
औरों जैसे होकर भी हम बाइज़्ज़त हैं बस्ती में
कुछ लोगों का सीधापन है, कुछ अपनी अय्यारी है
उस शाम मुझे एक बात बहुत गहराई से समझ में आई – साहित्य केवल किताबों से नहीं बनता, वह रिश्तों और स्मृतियों से भी बनता है और यह भी कि किसी लेखक की सबसे बड़ी कमाई उसकी पुस्तकें नहीं, उसके पाठकों का प्रेम होता है। उस सर्द शाम प्रेस क्लब में बहुत लोग थे, बहुत भाषण हुए, बहुत तस्वीरें खिंचीं – लेकिन मेरे लिए उस शाम का सबसे बड़ा दृश्य यही था कि मैं अपने प्रिय लेखक के साथ मंच पर बैठा था। लेकिन भीतर कहीं यह भाव उठ रहा था – कभी कभी जीवन हमें हमारी औक़ात से कहीं अधिक दे देता है। तब समझ में आता है, यह हमारी कमाई नहीं, किसी बड़े आदमी का स्नेह है।
शायरी का कीड़ा और मुशायरा 2016:
शायरी का कीड़ा जामिया नगर थाने की पोस्टिंग के दौरान, सन 2015 में खुल कर बाहर आ गया था। अब मैं खुलेआम शेर कहने लगा था और छोटे-मोटे मुशायरों में भी ख़ुद को आज़माने लगा था। मई 2016 में दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी के बैनर तले जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बड़े ऑडिटोरियम में एक आल इंडिया मुशायरा आयोजित हुआ। मंच पर नामचीन शायर– राहत इंदौरी, नवाज़ देवबंदी . . . और उनके साथ एक वर्दीधारी शायर भी पढ़ने वाला था:
मैं!
यह आयोजन मेरे लिए केवल साहित्यिक कार्यक्रम नहीं था; निजी स्वप्न की कसौटी था। बरसों पहले बचपन में देहरादून के परेड ग्राउंड में जिन आवाज़ों को दूर से सुना था, जिन मंचों को विस्मय से निहारा था, उसी परंपरा की एक कड़ी अब मेरी ज़िंदगी में जुड़ रही थी। लेकिन उस शाम मेरे लिए सबसे बड़ा आकर्षण मुशायरा नहीं था। मेरे मन में एक और योजना थी – मैं चाहता था कि हिंदी क्राइम फ़िक्शन के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब को मंच पर आमंत्रित कर पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी की ओर से उनका सम्मान करूँ। यह केवल औपचारिक सम्मान नहीं होता; मेरे जीवन के एक वृत्त का पूर्ण होना होता – किराये पर उनके उपन्यास पढ़ने वाला पाठक, अब उसी लेखक को सम्मानित करता।
मैंने उनसे मुशायरे में आने का विनम्र निवेदन किया। उन्होंने अपनी दो पूर्वनिर्धारित व्यस्तताएँ निरस्त कर के आने की स्वीकृति दे दी।
मुशायरे की शाम पाठक साहब अपने और मेरे कुछ ख़ास सुमोपाइयों के साथ आए – सादगी से, बिना किसी आडंबर के।
मैं अवसर की प्रतीक्षा करता रहा कि उन्हें मंच पर बुलाऊँ। पर उनकी प्रकृति अलग है।
वे रोशनी रचते हैं, रोशनी में खड़े होना उन्हें भाता नहीं। कार्यक्रम के मध्यांतर में, जब मैं व्यस्त था, वे चुपचाप उठे और उतनी ही ख़ामोशी से लौट गए – बिना बताए। बाद में ज्ञात हुआ कि वे केवल मेरी हौसलाअफ़ज़ाई के लिए आए थे; न सम्मान लेने, न प्रकाश में आने।
उस शाम मुझे समझ में आया कि बड़े लोग अपनी ऊँचाई से नहीं, पीछे हट जाने की कला से बड़े होते हैं। मंच पर मैं था, तालियाँ मेरे लिए थीं, पर भीतर जो आत्मविश्वास था, वह उनकी उपस्थिति का प्रतिफल था। अगर वे मंच पर बैठ जाते तो दृश्य भव्य होता। पर उनका चुपचाप लौट जाना – वही क्षण मेरे लिए विराट था।
वे आए! देखा! मुस्कुराए! दुआ दी! …और चले गए…
कुछ लोग रोशनी साथ लाते हैं,
कुछ लोग स्वयं रोशनी होते हैं।
क्रिसमस 2016 — जब लेखक ने पाठक का इंटरव्यू लिया:
क्रिसमस 2016, प्रेस क्लब गोष्ठी। 2016 की एक और स्मृति है, और वह भी कम अनमोल नहीं।
क्रिसमस का दिन था। दिल्ली की सर्दी अपने पूरे शबाब पर। धूप पतली, हवा में हल्की नमी, और प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के प्रांगण में एक आत्मीय-सी चहल-पहल। यह कोई औपचारिक साहित्यिक सम्मेलन नहीं था; यह पाठक साहब के प्रशंसक समूह की एक गोष्ठी थी – फ़ेसबुक के माध्यम से जुड़े लोग, जो किताबों के ज़रिये पहले ही एक-दूसरे के परिचित हो चुके थे। वहाँ उपस्थित लोगों के लिए सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब केवल एक लेखक नहीं थे, वे एक युग थे।
गोष्ठी चल रही थी कि अचानक शरद श्रीवास्तव जी ने मुस्करा कर प्रस्ताव रखा, “आज कुछ अलग हो जाए! क्यों न पाठक साहब, सुहैब जी का इंटरव्यू लें!”
एक क्षण को मुझे लगा, यह मज़ाक है। लेकिन अगले ही पल साहब ने अपनी विशिष्ट गंभीर मुस्कान के साथ मेरी ओर देखा, “तो जनाब, बताइए … शुरू करें?”
उस क्षण भीतर कुछ काँपा था।
जो व्यक्ति जीवन भर मेरे सवालों के केंद्र में रहा हो, वही आज मुझसे सवाल पूछे, यह स्थिति साधारण नहीं थी। मैं कुर्सी पर साहब के साथ बैठा तो था, पर भीतर खड़ा था – जैसे परीक्षा दे रहा हूँ।
उनके प्रश्नों में स्नेह भी था और एक अजीब-सी बारीकी भी।
वे मेरी शायरी, मेरी पुलिस सेवा, पढ़ने की आदत और जीवन के संतुलन पर बात करते रहे—जैसे किसी पाठक से नहीं, किसी अपने से बात कर रहे हों।
फिर उन्होंने मुस्कराकर, थोड़ा ठहरते हुए पूछा, “पढ़ते तो बहुत रहे हो, अब लिखने का खयाल कैसे आया?”
मैंने थोड़ा सँभलकर जवाब दिया, “सर, शायद आपको पढ़ते-पढ़ते ही लिखने की हिम्मत आ गई।”
वे हल्का-सा मुस्कुराए।
उस मुस्कान में सराहना भी थी और एक अनकहा परीक्षण भी।
फिर उन्होंने जैसे बात को और गहराई दी, “अच्छा, तो लिखते वक्त यह सोचते हो कि क्या लिख रहे हो, या यह कि क्यों लिख रहे हो?”
उस क्षण लगा जैसे सवाल मुझसे कम, मेरे भीतर से ज़्यादा पूछा गया हो।
मैंने धीरे से कहा, “सर, अभी तो सीख ही रहा हूँ। मगर कोशिश यही रहती है कि जो लिखूँ, वह सच्चा लगे – कम से कम खुद से तो झूठ न हो।”
वे संतोष से सिर हिलाते रहे।
उस पल मुझे लगा, वह कोई इंटरव्यू नहीं था, वह शब्दों के संसार में प्रवेश की एक मौन स्वीकृति थी।
हाल में बैठे लोग मुस्कुरा रहे थे। बीच-बीच में तालियाँ भी बजती रहीं, पर मेरे लिए वह दृश्य किसी सार्वजनिक कार्यक्रम से अधिक एक निजी दीक्षा जैसा था।
साक्षात्कार समाप्त हुआ तो लगा जैसे भूमिकाएँ बदल गई हों – लेखक ने पाठक को देखा, परखा और मान्यता दी हो।
उस दिन समझ में आया कि सम्मान केवल मंच से दिया गया स्मृति-चिन्ह नहीं होता।
कभी-कभी सम्मान यह होता है कि आपका आदर्श आपको गंभीरता से ले, आपके शब्दों को सुनने योग्य समझे।
क्रिसमस की उस ठंडी दोपहर में मुझे जो ऊष्मा मिली, वह आज तक बनी हुई है।
क्योंकि उस दिन पहली बार मैंने स्वयं को केवल पाठक नहीं, बल्कि संवाद योग्य लेखक भी महसूस किया।
7 अप्रैल 2017 — थाने में पाठक साहब:
कहते हैं, कुछ दिन तारीख़ नहीं होते, यादों की तह में रखे उजले काग़ज़ होते हैं। 7 अप्रैल 2017 मेरे लिए ऐसा ही एक दिन था। उस दिन सचमुच ‘चींटी के घर भगवान’ आए। मैं जामिया नगर थाने में रोज़मर्रा के काम में व्यस्त था कि करीब सवा चार बजे फोन घनघनाया।
उधर से वही परिचित आवाज़, “बरख़ुरदार, कहाँ हो?”
“थाने में हूँ, सर।” मैंने कहा।
“मैं फ़रीदाबाद में हूँ।” उन्हों ने जवाब दिया, एक घंटे में पहुँच रहा हूँ।”
कुछ क्षणों के लिए समय ठहर-सा गया।
करीब छ: बजे साहब थाने पहुँचे। मैंने पाँच मिनट की मोहलत माँगी – पेंडिंग सरकारी काम निबटाने के लिए। इसी बीच पत्नी का फ़ोन आया। उत्साह में बता दिया, “पाठक साहब आए हैं।”
साहब ने खुद फ़ोन लेकर उनसे बात की और मुस्कराते हुए कहा, “मैं लाइन में खड़ा हूँ, मिलने आया था… साहब व्यस्त हैं।”
घर पास ही था, सो थोड़ी ही देर में पत्नी और बेटी भी थाने पहुँच गईं । माहौल सचमुच ऐसा हो गया था:
तुम आ गए हो तो फिर चाँदनी-सी बातें हों,
ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़-रोज़ उतरता है।
उस दिन थाने की मेज़ पर रखी किताबों में से साहब ने उर्दू शायर शकील जमाली की किताब ‘कटोरे में चाँद’ उठा ली। मेरे एक सहकर्मी को आश्चर्य हुआ। उसने सहजता से पूछा, “सर, आपको उर्दू भी आती है?”
साहब मुस्कराए और बोले, “भाई, मेरी पैदाइश लाहौर की है।”
बस, एक वाक्य! और कई भ्रांतियाँ चुप हो गईं।
उस दिन थाने की दीवारें भी जैसे कुछ देर के लिए साहित्यिक हो गई थीं। वर्दी, फ़ाइलें, शिकायतें – सबके बीच एक लेखक की सादगी और आत्मीयता ने जगह बना ली थी। दिन के अंत में जब साहब लौटे, तो मैं देर तक उसी कुर्सी पर बैठा रहा।
कुछ मुलाक़ातें पद से बड़ी होती हैं। कुछ रिश्ते औपचारिकता से परे और कुछ दिन जीवन भर के लिए उजाले की तरह याद रह जाते हैं। मतलब:
“मेरे रश्क-ए-क़मर, तूने पहली नज़र
जब नज़र से मिलाई मज़ा आ गया…”
फरवरी 2018 — एक शेर, एक मुलाक़ात:
कभी-कभी एक शेर पूरी ग़ज़ल से बड़ा हो जाता है, और कभी एक मुलाक़ात पूरी रचनात्मकता को जगा देती है।
कुछ समय से मेरा लेखन ठहरा हुआ था। तबीयत की नासाज़ी, नौकरी की व्यस्तता, ये सब तो थे ही, पर असली वजह थी भीतर का सूखा पड़ जाना। प्रेरणा न हो तो आदमी चाहे कितना भी पढ़ा-लिखा हो, एक लफ़्ज़ भी काग़ज़ पर नहीं उतरता। फरवरी 2018 की 27 तारीख़ थी। ऐसे ही एक सूखे दौर में अचानक फ़ोन बजा। उधर से वही परिचित आवाज़:
“जनाब, नमस्ते, थाने में हो?”
“मैं पुलिस स्टेशन में हूँ सर!” आनंद मिश्रित मेरा तत्पर स्वर।
“पुलिस स्टेशन पर हो न?”
“हाँ चित्तरंजन पार्क, सर!” मैंने अपनी मौजूदा पोस्टिंग-प्लेस को क्लियर करते हुए कन्फ़र्म किया।
साहब नेहरु प्लेस के नज़दीक थे और रास्ता पूछ रहे थे।
“ओके, थोड़ी देर में आता हूँ। ”
फ़ोन कट गया। बस, इतना सुनना था कि मेरे भीतर जैसे बारिश की पहली फुहार उतर आई। मेरे साथ उस समय मेरे बैचमेट विजेंद्र राणा बैठे थे। हम दोनों उम्र के उस पड़ाव पर पहुँच चुके थे जहाँ ग्रीन-टी और घुटनों की एमआरआई जीवन-चर्चा का हिस्सा बन जाते हैं।उन्होंने मेरे चेहरे पर अचानक आई चमक देखकर पूछा, “कौन आ रहा है?”
मैंने बस इतना कहा, “साहब!”
‘साहब’ – यानी सुरेन्द्र मोहन पाठक। वह व्यक्ति जिनसे मिलने लोग अपॉइंटमेंट लेते हैं, जिनके कार्यक्रमों में भीड़ उमड़ती है – वे स्वयं मेरे थाने आ रहे थे। सचमुच, उस दिन कुआँ ख़ुद प्यासे के पास आया था।
क़रीब चालीस मिनट वे वहाँ रहे। पर उन चालीस मिनटों में समय का हिसाब नहीं था। राणा जैसे सख़्तमिज़ाज और नॉनलिटरेरी पुलिस अधिकारी भी उनसे बीस मिनट तक साहित्य और जीवन पर बातचीत करते रहे। साहब ने बड़े स्नेह से राणा को मेरी शुरुआती मुलाक़ातों और हमारे पुराने रिश्ते के किस्से सुनाए।
दरअसल, कुछ दिन पहले अपने जन्मदिन पर मैंने एक शेर लिखा था और आदतन उन्हें ई-मेल कर दिया था। वे सोशल मीडिया पर नहीं हैं; संवाद एसएमएस और ई-मेल से ही होता है। उसी शेर की बहर पर मैं एक ग़ज़ल गढ़ रहा था। इसी बीच उनकी आत्मकथा ‘न बैरी न कोई बेगाना’ पढ़ते हुए अचानक मेरी नज़र दूसरे अध्याय के शुरुआती पन्ने पर ठिठक गई। वहाँ मेरा ही शेर छपा हुआ था:
फूलों ने तो हँस-हँस के बस ज़ख़्म दिए मुझको,
पर देख मुझे ज़ख़्मी, हर ख़ार बहुत रोया।
एक पल को यक़ीन नहीं हुआ। फिर भीतर एक सुकून-सा उतरा। यह छपना नहीं था, यह स्वीकार होना था। उसी दिन ग़ज़ल मुकम्मिल हुई। और मैंने उसे ‘साहब’ की नज़्र कर दिया।
कभी-कभी प्रेरणा बड़े भाषणों से नहीं आती, वह अचानक दरवाज़े पर दस्तक देती है, चालीस मिनट बैठती है और जाते-जाते एक सूखे दिल में हरियाली छोड़ जाती है।
जून 2018 — जयपुर लिट फे़स्ट:
जयपुर की सर्दी अपने पूरे रंग में थी, पर उस दिन दिग्गी पैलेस के परिसर में एक अलग ही तापमान था – साहित्य का ताप।
मैं थाने की व्यस्त दिनचर्या से समय निकालकर, बाक़ायदा योजना बनाकर, सपत्नीक जयपुर पहुँचा था। यह कोई साधारण पुस्तक-लोकार्पण नहीं था। पत्नी भी इस उत्सव की सहभागी थीं। वे जानती थीं कि वह मेरे लिए सिर्फ़ साहित्यिक कार्यक्रम नहीं, एक निजी पड़ाव था। वह उस व्यक्ति की आत्मकथा का पहला खंड था जिसने मेरे किशोर मन को किताबों की दुनिया से बाँधा था।
सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब की आत्मकथा – ‘न बैरी न कोई बेगाना’।
होटल दिग्गी पैलेस के पंडाल में प्रवेश करते ही एक अजीब-सी आत्मीय हलचल महसूस हुई। मंच सजा था। कुर्सियाँ भरी हुई थीं और दर्शकों में एक विशिष्ट ऊर्जा थी। आवंटित समय मात्र चालीस मिनट था, पर वे चालीस मिनट किसी औपचारिक विमोचन से अधिक एक जीवन-यात्रा का सार्वजनिक उद्घाटन बन गए।
साहब जब बोले तो शब्दों में वही पुराना आत्मविश्वास था, पर स्वर में एक अलग पारदर्शिता। वे केवल घटनाएँ नहीं सुना रहे थे, अपने जीवन के बंद कमरों की खिड़कियाँ खोल रहे थे। कहीं ठहरते, कहीं भावुक होते, फिर संभलते और आगे बढ़ते। वे घटनाएं सुनाते रहे, हर वाक्य के साथ पंडाल की तालियाँ उनके शब्दों की लय से क़दमताल करती रहीं।
पचास से अधिक एसएमपियन – उम्र, वर्ण, लिंग, भाषा के भेद से परे – उस दिन वहाँ उपस्थित थे। यह सिर्फ़ पाठकों की भीड़ नहीं थी; यह एक परंपरा की साक्षी सभा थी। शुरुआत में साथ बैठे कुछ अंग्रेज़ी-प्रधान साहित्यप्रेमियों के चेहरों पर हल्का-सा आश्चर्य था – “लिट–फेस्ट में हिंदी बुक लॉन्च?” पर जब साहब ने हिंदी, पंजाबी और उर्दू के साथ सहज अंग्रेज़ी में अपने अनुभव बाँटे, तो वही चेहरे ध्यानमग्न हो गए। भाषा की दीवारें वहीं गिर गईं ।
मैं श्रोताओं के बीच बैठा था, पर भीतर कहीं बहुत पीछे चला गया था – स्योहारा की लाइब्रेरी, पच्चीस पैसे का किराया, जेब में लिखी उपन्यासों की सूची, और आज वही लेखक सामने मंच पर अपनी जीवन-गाथा कह रहा था।
कार्यक्रम के बाद कई पुराने एसएमपियन्स से मुलाक़ात हुई। जैसे बिछड़े हुए सहपाठी वर्षों बाद मिलें। पत्नी चुपचाप यह सब देखती रहीं – शायद उन्हें भी मेरे भीतर के उस पाठक की झलक मिल रही थी, जो आज भी जीवित है। उस दिन महसूस हुआ कि किताबें केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे जीवन के बीचोंबीच खड़ी रहती हैं और समय-समय पर हमें पुकारती हैं।
थाने की नौकरी से कुछ घंटों की छुट्टी लेकर जयपुर पहुँचना एक प्रशासनिक निर्णय नहीं था, वह हृदय का निर्णय था। और वापसी में सचमुच लगा कि आने वाले कई महीनों की थकान के लिए ऊर्जा साथ लेकर लौट रहा हूँ। कुछ समारोह औपचारिक होते हैं, कुछ ऐतिहासिक और कुछ निजी जीवन की परिधि पर खींची गई एक पूर्ण वृत्त-रेखा। 27 जून 2018 मेरे लिए ऐसा ही एक दिन था।
नवंबर 2018 – साहित्य आजतक:
18 नवम्बर 2018
स्थान – इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), नई दिल्ली का ओपन-थिएटर।
सर्दियों की वह सुनहरी दोपहर थी। हल्की हवा, खुला आकाश, और सामने सजा हुआ मंच। उस दिन ‘साहित्य आजतक’ के मंच पर हिंदी फ़िक्शन के बेताज बादशाह सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब के साथ चर्चित क्राइम जर्नलिस्ट शम्स ताहिर ख़ान की वार्ता होने वाली थी। मैं भी सपत्नीक अन्य सुमोपाइयों के साथ पहली पंक्ति में बैठा था। मंच सज चुका था। दोनों हस्तियाँ अपनी जगह ले चुकी थीं। इंटरव्यू शुरू होने ही वाला था।
और तभी वह हुआ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। पाठक साहब की नज़र अचानक पहली पंक्ति में मुझ पर पड़ी। क्षण भर को उनकी आँखों में पहचान की चमक आई, और वे बिना किसी औपचारिकता के मंच से उतरकर सीधे मेरी ओर बढ़ चले।
इस उपक्रम में उनके कोट पर लगा मिनी माइक गिर पड़ा। आयोजक टीम उन्हें पुकारती रह गई, “सर… सर…”
लेकिन वे तब तक मेरे पास पहुँच चुके थे। उन्होंने गले लगाकर मेरा हाल पूछा, पत्नी को आशीर्वाद दिया, दो-चार आत्मीय शब्द कहे, और फिर वापस मंच पर लौट गए।
मैं अवाक् था। खुले मंच पर, सैकड़ों लोगों के बीच, इतने बड़े लेखक का यह सहज व्यवहार मेरे लिए शब्दों से परे था।
इंटरव्यू शुरू हुआ। पाठक साहब की हाज़िरजवाबी से रंग जमने लगा था और वार्त्ताकार शम्स ताहिर ख़ान धीरे-धीरे उनके स्मार्ट-टॉक वाले आभामंडल में जैसे समा रहे थे। इस आभामंडल से बाहर निकलने के उपक्रम में शम्स साहब ने एक प्रश्न दागा, “आपसे लाश नहीं देखी जाती, ख़ून देखकर दहशत होती है, हथियार आपने कभी थामा नहीं। लेकिन ये सारी चीज़ें आपने अपनी किताबों में लिख डालीं! कैसे?”
साहब मुस्कराए। फिर बड़े सहज स्वर में बोले, “भई, ये अकादमिक बातें हैं। तैयारी करनी पड़ती है। होमवर्क करना पड़ता है। जो नहीं आता, वो सीखना पड़ता है। जो सीखने से भी न आए, वो borrow करना पड़ता है। … ये सुहैब जी एसएचओ हैं बदरपुर थाने के…”
इतना सुनते ही शम्स साहब ने मुस्कराकर टोका, “मतलब आप यहाँ पर भी पुलिस वालों के साथ?”
पूरा एम्फ़ीथिएटर ठहाकों से गूँज उठा।
लेकिन मैं… सच कहूँ तो नवविवाहिता की तरह शर्म से गड़ गया।
लेकिन साहब यहीं नहीं रुके। वे पूरी सादगी से बोले, “. . . बहुत मदद करते हैं कई बातों में। कोई धारा, कोई दफ़ा, किसी बारे में जानना हो तो इनको फोन खड़काते हैं। बताओ भई, हमें कुछ नहीं आता…”
यह वाक्य मेरे लिए गर्व नहीं, विनम्रता का पाठ था। जिस व्यक्ति ने सैकड़ों अपराध-कथाएँ लिखीं, करोड़ों प्रतियाँ बिक चुकीं – वह खुले मंच से कह रहा था, ‘हमें कुछ नहीं आता।’
यही उनकी असली ऊँचाई है। ज्ञान के शिखर पर खड़े होकर भी ज़मीन पर बने रहना। उस दिन मैंने दो बातें सीखी:
पहली – बड़ा वही है जो मंच की ऊंचाई से उतरकर निचली पंक्ति में बैठे अपने मुरीद को गले लगा ले।
दूसरी – बड़ा लेखक वही है जो अपनी तैयारी को ‘होमवर्क’ कहे और मदद को खुलेआम स्वीकार करे।
साहित्य आजतक का वह सत्र बहुतों के लिए एक इंटरव्यू रहा होगा। मेरे लिए वह आत्मीयता, विनम्रता और रिश्ते का सार्वजनिक प्रमाण था। और सच कहूँ – उस खुले आसमान के नीचे उस दिन मुझे लगा कि कुछ लोग केवल किताबें नहीं लिखते, रिश्ते भी लिखते हैं।
मार्च 2019 — पीपल का पेड़, अलीना और एक छोटी–सी सीख:
“पत्थर से आदमी के हैं रिश्ते बड़े अजीब,
ठोकर किसी ने मारी, कोई जल चढ़ा गया…”
किसी अज्ञात शायर का यह शेर उस दिन की पूरी कहानी कह देता है। शै वही रहती है, नज़र बदलती है।
थाना साउथ एवेन्यू, नई दिल्ली डिस्ट्रिक्ट के अहाते में एक पुराना, विशाल पीपल का पेड़ खड़ा है। अपनी पूरी गरिमा और विस्तार के साथ। पीपल का पेड़ अपने आप में बहुत पवित्र और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। इसी वृक्ष के नीचे सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ था और वे बुद्ध बने थे। बाद में उन्होंने पूरी दुनिया को ज्ञान की रोशनी दी। उस पीपल के तने से एक जड़ बाहर की ओर निकली हुई दिखाई देती है। सामान्य नज़र से देखें तो वह केवल एक जड़ है लेकिन अगर किसी कलाकार की दृष्टि से देखें तो उसी जड़ में हाथी का सिर, कान और सूंड जैसी आकृति दिखाई देने लगती है। और अगर हम भक्ति-भाव से देखें तो उसी आकृति में प्रकृति की रचना के भीतर गणेश जी का रूप भी दिखाई देता है।
यह सब हमारी दृष्टि का कमाल है। जड़ जैसी साधारण चीज़ भी हमें जीवंत लगने लगती है। प्रेमभरी नज़र से देखें तो छोटा-सा कण भी सूरज की तरह चमकने लगता है।
मार्च 2019 की बात है। उन दिनों अलीना की परीक्षाएँ समाप्त हो चुकी थीं और उसकी छुट्टियाँ चल रही थीं। मेरी छुट्टी नहीं थी, इसलिए घर ही थाने आ गया था। मैंने उसे वही पीपल का पेड़ दिखाया – और वह जड़ भी, जिसमें मुझे गणेश का आभास दिखाई देता था। मैंने उससे कहा, “देखो, चीज़ें वही रहती हैं, अर्थ बदल जाते हैं।”
शायद यह केवल प्रकृति–दर्शन नहीं था, दृष्टि का पाठ था। उसी दिन एक और सौभाग्य जुड़ गया।
सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब थाने पधारे। उनकी आमद मेरे लिए हमेशा किसी ख़ुदादाद तोहफ़े से कम नहीं होती। लेकिन, उस दिन उन्हें देखते ही मन थोड़ा–सा कस गया। पिछली मुलाक़ात सर्दियों में हुई थी। अब वे कुछ कमज़ोर दिखाई दे रहे थे। उम्र का असर, आँखों की घटती रोशनी, जीवन की अनिवार्य सच्चाइयाँ सामने थीं।
क्षण भर को लगा – समय किस तेज़ी से निकल जाता है। लेकिन बातचीत शुरू होते ही वही पुराना तेज़, वही विनोद, वही जिज्ञासा लौट आई। साहित्य, जीवन, उम्र, अनुभव – हर विषय पर खुलकर संवाद हुआ।
अलीना पास बैठी सब कुछ बहुत ध्यान से सुन रही थी। उसे यूँ सुनते देख कर मुझे अपने वालिद साहब याद आ गए। मैं भी कभी उनके पास बैठकर इसी तरह बातें सुना करता था – बिना यह समझे कि वे बातें जीवन भर साथ चलने वाली थीं। शायद पीढ़ियों का कर्ज़ इसी तरह उतरता है – सुनने और सीखने के सिलसिले से।
कश्फ़ साहिबा ने बातचीत के दौरान गुलज़ार देहलवी और खुशवंत सिंह का ज़िक्र छेड़ दिया। साहब अपने मूड में आ गए। मेरी ताज़ा ग़ज़ल की तारीफ़ भी की। वह क्षण मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था। थोड़ी देर बाद साहब ने मुस्कराकर पूछा, “सारे दिन वर्दी में रहते हो?”
मैंने अर्ज़ किया, “सर, वर्दी तो हमारी दूसरी खाल है … और आजकल तो फ़ैशन में भी चल रही है।”
वे ठहाका लगाकर हँसे। मेरा इशारा उन दिनों राजनेताओं द्वारा फौजी वर्दियाँ पहनने की प्रवृत्ति की ओर था।
अलीना कुछ समझी, कुछ नहीं। पर समय के साथ समझ जाएगी। व्यंग्य भी विरासत की तरह पीढ़ियों में उतरता है।
उस दिन बहुत कुछ सीखा गया। पेड़ वही था। जड़ वही थी। थाना वही था पर अर्थ बदल गए थे। ज़िंदगी सचमुच अजीब है – जिस पत्थर से ठोकर लगती है, वही कभी पूजित भी हो जाता है। जीवन छोटा है और अनिश्चित भी। इसे नफ़रत में क्यों गँवाएँ? प्यार बाँटिए – शायद यही सच्चा बोध है।
अगस्त 2019 — आत्मकथा का दूसरा खंड थाने में:
अगस्त 2019 की बात है। मैं उस समय अपने कार्यालय – थाना साउथ एवेन्यू, नई दिल्ली डिस्ट्रिक्ट – में नियमित कामकाज में व्यस्त था कि अचानक पाठक साहब का फोन आया।
“थाने में ही हो?”
मैंने कहा, “जी सर, यहीं हूँ।”
कुछ देर बाद वे स्वयं थाने आ पहुँचे। पाठक साहब की आत्मकथा का दूसरा खंड अभी बाज़ार में आया भी नहीं था। न किताबों की दुकानों पर, न पाठकों के हाथों में। केवल प्री-बुकिंग के ऑर्डर लिए जा रहे थे और उसी समय , उससे पहले –
वह किताब मेरे थाने की मेज़ पर रखी थी।
क्यों?
क्योंकि सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब स्वयं उसे लेकर आए थे। उस क्षण मेरे मन में अहमद फ़राज़ का यह शेर कौंध गया:
तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता,
ये बार–बार जो आँखों को मल के देखते हैं।
वह मेरे सामने खड़े थे। हाथ में अपनी आत्मकथा का नया खंड लिए हुए। उन्होंने मुस्कराते हुए किताब मेरी ओर बढ़ाई, “लो भई, दूसरा हिस्सा आ गया।”
क्षण भर को सचमुच यक़ीन नहीं हुआ। जिस पुस्तक का इंतज़ार देश भर के पाठक कर रहे थे, जिसका सर्कुलेशन शुरू भी नहीं हुआ था, उसका पहला स्पर्श मेरे हाथों में था। मैं कुछ क्षण तक चुप ही रहा। थाने का वातावरण भी जैसे थोड़ी देर के लिए बदल गया था। वर्दी, वायरलेस, केस-डायरी और शिकायतों के बीच एक आत्मकथा की ताज़ा स्याही की खुशबू फैल गई थी।
मेरे एक जूनियर सहकर्मी ने धीरे से पूछा, “सर, ये वही पाठक साहब हैं?”
मैंने मुस्कराकर कहा, “जी हाँ। वही।”
लेकिन उस क्षण जो बात सबको सबसे अधिक विस्मित कर रही थी, वह पुस्तक नहीं थी, वह उनका मेरे प्रति स्नेह था। जिस आत्मीयता से वे बात कर रहे थे, जैसे कोई पुराने रिश्ते को निभाते हुए आया हो। उन्होंने कुर्सी खींचकर बैठते हुए सहज स्वर में कहा, “पहले तुम्हें देना था।”
यह वाक्य सुनकर मैं कुछ पल के लिए निःशब्द रह गया।
कुछ सहकर्मियों ने उनके साथ तस्वीरें खिंचवाईं। साहब ने सब से बराबरी के स्नेह से बातें कीं। कोई परिचय पूछता, कोई हाथ मिलाता, और वे हर किसी से उसी सहजता से मिलते, जैसे कोई बड़े घर का बुज़ुर्ग।
मैं एक ओर बैठा यह सब देख रहा था। कभी किताब की ओर देखता, कभी उनके चेहरे की ओर।
उस क्षण मुझे लगा – साहित्य केवल शब्दों का संसार नहीं होता, यह सम्बंधों का संसार भी होता है। मेरे हाथ में उनकी आत्मकथा का दूसरा खंड था। लेकिन सच पूछिए तो वह किताब नहीं, विश्वास का दूसरा अध्याय था। और जीने के लिए आदमी को और क्या चाहिए? कभी-कभी जीवन की असली कमाई बैंक-बैलेंस में नहीं, ऐसे ही पलों में जमा होती है।
एक लेखक, जिसकी किताबों ने किशोर मन को दिशा दी, वही लेखक अपनी आत्मकथा का नया हिस्सा लेकर आपके दफ़्तर आए और मुस्कराकर कहे, “पहले तुम्हें देना था।”
उस दिन सचमुच लगा – तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता…
कोरोना काल – और नोएडा की वह मुलाक़ात:
इस मुलाक़ात के बाद साहब से कोई क़ाबिलेज़िक्र मुलाक़ात हुई हो, मुझे याद नहीं; अलबत्ता फ़ोन पर सम्पर्क बना रहा।
फिर कोरोना का वह नामुराद दौर आया जो सचमुच अकल्पनीय था। इस महामारी से सामना करने का किसी सरकारी या ग़ैरसरकारी महकमे के पास कोई अनुभव नहीं था। पुलिस के लिए तो यह और भी अजीब इम्तिहान था – एक ऐसा दुश्मन जिससे न पूछताछ हो सकती थी, न गिरफ़्तारी।
सड़कों पर क़ानून-व्यवस्था संभालते हुए हम ख़ुद भी उसी अदृश्य ख़तरे के बीच खड़े थे। मैं भी धरना प्रदर्शन में एक ड्यूटी के दौरान संक्रमित हो गया। बाईस दिन अस्पताल में गुज़रे और पूरे पचास दिन बाद जाकर नेगेटिव घोषित हुआ। इस दरम्यान वज़न भी कोई साढ़े दस किलो कम हो गया। ख़ैर, यह भी सेवा के उसी सिलसिले का एक मुक़ाम था जिसमें पुलिसवाला कभी ड्यूटी से बाहर नहीं होता।
अचानक 18 अप्रैल 2021 को मनहूस ख़बर मिली कि पाठक साहब और उनके साहबज़ादे सुनील कोरोना संक्रमित हो गए हैं। ऑक्सीजन स्तर 65-78 तक पहुँच गया था और तमाम कोशिशों के बावजूद कहीं किसी भी अस्पताल में बेड नहीं मिल पा रहा था। बेबसी और लाचारी की उस स्थिति को अगले दिन तक गुज़ारने के बाद दोनों को अपोलो अस्पताल, जसोला विहार में भर्ती कराया जा सका। दवा के साथ दुआ भी ज़रूरी होती है, इस सच्चाई को मैं ख़ुद भुगत चुका था। पिछले साल इसी बीमारी में मेरा ऑक्सीजन लेवल 87 तक गिर गया था और सीटी स्कैन 18/25 की गंभीर रिपोर्ट लेकर आया था। तब मैं भी दुआओं के सहारे ही बाहर आया था। पाठक साहब के साथ तो ख़ैर दुआओं का एक सैलाब था – सैलाब है और सैलाब रहेगा। 5 मई को दोनों साहबान अस्पताल से घर लौट आए, मगर निःशक्तता के कारण बोलचाल बंद थी। सुनील साहब और रीमा से मैसेज के ज़रिये उनकी ख़ैरियत मिलती रहती थी और इसी प्रतीक्षा के बीच 13 जून 2021 की शाम अचानक वह संदेश आया जिसने जैसे दिल की धड़कनें तेज़ कर दीं, “हल्लो! गुड इवनिंग! हैव यू बीन ट्रान्सफर्ड?”
पाठक साहब के अस्पताल से डिस्चार्ज होकर घर पहुँचने की ख़बर मिलने के बाद कई बार मन में तीव्र इच्छा उठती थी कि उनसे जाकर मिलूँ। लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें सख़्त हिदायत दे रखी थी कि अभी किसी से मिलना-जुलना मुनासिब नहीं, पूरी तरह आइसोलेशन में रहना होगा।
ऐसे में मन मसोस कर रह जाता। दिल कहता, चलो मिल आते हैं। दिमाग़ समझाता, यह वक़्त एहतियात का है। सो, मुलाक़ात की जगह टेलीफोनिक बातचीत से ही तसल्ली करनी पड़ती रही। आख़िरकार नवम्बर 2021 में सुनील साहब का संदेश आया कि डॉक्टरों ने अब सीमित मुलाक़ातों की अनुमति दे दी है। बस, फिर क्या था। जैसे किसी बंद दरवाज़े की कुंडी खुल गई हो।
मैंने उसी वक़्त कश्फ़ साहिबा को साथ लिया और नोएडा स्थित पाठक साहब के निवास की ओर चल पड़ा।
दरवाज़े पर पहुँचा तो मन में एक अजीब-सी घबराहट भी थी और उत्कंठा भी। अंदर जाकर जब साहब को देखा तो दिल एक पल को ठिठक-सा गया।
शरीर अशक्तता की प्रतिमूर्ति बना हुआ था – मानो बीमारी ने अपनी पूरी ताक़त आज़मा ली हो। चेहरा कुछ कमज़ोर, चाल धीमी। मेरी आँखों में बादलों-सी नमी तैरने लगी और लगा जैसे शब्द गले में अटक गए हों। बड़ी मुश्किल से अपने जज़्बात काबू में किए। भीतर ही भीतर ऊपर वाले का शुक्र अदा किया कि उसने अनगिनत दुआओं के सबब इस अज़ीम आदमी को अब तक हमारे बीच महफ़ूज़ और सलामत बनाए रखा।
लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि शरीर भले थका हुआ दिख रहा था, मगर उनकी जीवंतता में कोई कमी नहीं थी। वही हल्की मुस्कान। वही अपनापन। वही बातों में चमकती हुई ऊर्जा। बैठते ही पूछने लगे:
“घर में सब कैसे हैं?”
“बिटिया कैसी हैं?”
“ड्यूटी कैसी चल रही है?”
जैसे बीमारी ने शरीर को छुआ हो, मन को नहीं।
हम लोग देर तक बैठे रहे। बीच-बीच में साहब अपने अंदाज़ में किस्से सुनाते, किसी किताब का ज़िक्र छेड़ देते, या किसी पुराने प्रसंग को याद कर के मुस्कुरा उठते। उस पूरे समय में मुझे बार-बार यही महसूस होता रहा, ‘यह आदमी केवल किताबें नहीं लिखता। यह अपने आसपास बैठे लोगों को जीना सिखाता है।’
उस शाम लौटते हुए मन में एक अजीब-सी राहत थी। जैसे किसी बड़ी आशंका का बादल छँट गया हो।
लगा – सचमुच, कुछ लोग केवल लेखक नहीं होते। वे अपने पाठकों की दुआओं का हासिल होते हैं।
फरवरी 2025 — विश्व पुस्तक मेला:
“पापा, मैं तैयार हूँ!”
बिस्तर पर अलसाते हुए मैंने घड़ी देखी।
साढ़े आठ।
दुबारा देखा – साढ़े आठ ही बजने जा रहे थे।
कमाल हो गया! इस जेन-ज़ी के ज़माने में वीकेंड पर दस बजे उठना भी जल्दी उठना माना जाता है और यहाँ बिटिया पूरी तरह तैयार खड़ी थी।
ओह! आज हमें प्रगति मैदान में लगने वाले विश्व पुस्तक मेले जाना था।
मैंने सर्वशक्तिमान ईश्वर को धन्यवाद दिया कि किताबी कीड़ा, जो मुझे अपने माँ-बाप से विरासत में मिला था, अब सफलतापूर्वक अगली पीढ़ी में भी हस्तांतरित हो गया है। हाँ, भाषा ज़रूर बदल गई है। यह बुकवर्म अब हिंदुस्तानी – यानी हिंदी-उर्दू – से आगे बढ़कर अंग्रेज़ी में जा बसा है।
8 फ़रवरी 2025 की हमारी पुस्तक-मेला यात्रा दरअसल तीन अलग-अलग इच्छाओं के एक बिंदु पर मिल जाने का परिणाम थी।
पत्नी जी को परिवार के साथ कुछ क्वालिटी टाइम मिल रहा था, बिटिया को मेरी ही तरह ऑनलाइन और ई-रीडिंग से अलग किताबों को सूँघकर पढ़ने का शौक़ है और मेरा कारण अगले पैरे में बयान है।
उसका चेहरा किताब जैसा है
पढ़िए पढ़िए किताब की बातें।
साहित्य विमर्श उत्कृष्ट साहित्य के प्रसार के लिए समर्पित एक प्रकाशन संस्थान है जिसने कम समय में ही अपना एक अलग स्थान बना लिया है। इस संस्थान के मुख्य कर्त्ताधर्त्ता राजीव सिन्हा साहब का हुक्म हुआ कि जनाब सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब की विमल सीरीज़ के नए उपन्यास ‘कूपर कम्पाउंड’ का विमोचन विश्व पुस्तक मेला 2025 में होना है और ख़ाकसार को पैनल डिस्कशन में भाग लेना है। सिन्हा साहब जेएनयू से शिक्षित अध्यापक हैं और स्वयं भी एक एसएमपियन हैं।
ख़ैर, नियत समय से पहले ही मैं कश्फ़ साहिबा और बिटिया के साथ हाल नंबर 2 के लेखक मंच पर पहुँच गया। साहब पहले से ही वहाँ उपस्थित थे और अपने प्रशंसकों से घिरे हुए बतिया रहे थे। मैं चुपचाप जाकर उनके पीछे वाली कुर्सी पर बैठ गया। ख़ामोशी से और पीछे बैठने के दो कारण थे – और दोनों को मैं अहमद फ़राज़ के इन दो अशआर से बयान करना चाहूँगा। पहला:
तू सामने है तो फिर क्यूँ यक़ीं नहीं आता
ये बार-बार जो आँखों को मल के देखते हैं
मेरी हालत उस मुरीद जैसी हो जाती है जिसके सामने उसका पीर या मुर्शिद अचानक आ खड़ा हो। एक तरह का वज्द-सा तारी हो जाता है। भावनाओं को काबू में रखना मुश्किल हो जाता है। आँसू रोकने पड़ते हैं और धुँधलाती आँखों को रुमाल से बार-बार पोंछना पड़ता है। दूसरा:
ये कौन लोग हैं मौजूद तेरी महफ़िल में,
जो लालचों से तुझे मुझको जल के देखते हैं।
दरअसल, मिलने पर पाठक साहब की स्नेह-वर्षा, जो वहाँ मौजूद हर पाठक पर बराबरी से बरसनी चाहिए, अक्सर किसी कोण से मेरी तरफ़ ज़्यादा झुक जाती है और मैं स्वभाव से कुछ न्यायप्रिय एवं धर्मभीरू प्राणी हूँ, इसलिए भगवान और भक्तों के बीच से थोड़ा किनारा कर लेता हूँ – ताकि साहब को दूर से निहारता रह सकूँ।
धीरे-धीरे लेखक मंच के सामने रखी कुर्सियाँ मेरी ही प्रजाति के लोगों से भरने लगीं। यहाँ ‘प्रजाति’ से मेरा मतलब हिंदी फ़िक्शन पढ़ने वालों से है। जहाँ लिंग, वर्ण, आयु या क्षेत्र का कोई भेद नहीं होता। सत्रह साल से सत्तर साल तक के लोग – श्यामल और धवल, स्त्री और पुरुष, भाई-बहन, मित्र – सब एक ही रस्सी में बँधे हुए थे।
धर्म, जाति, राजनीति के प्रदूषण से परे, सिर्फ़ एक पहचान – एसएमपियन।
नियत समय पर कुलभूषण चौहान साहब के नेतृत्व में पाठक साहब को सहारा देकर मंच तक लाया गया। मंच संचालक मुबारक अली की पुकार पर मैं भी नक़ली विनम्रता दिखाते हुए मंच पर पहुँचा और पाठक साहब की चरण-रज लेते हुए उनके दाहिने बैठ गया।
अब मंच पर बैठना तो आदत का हिस्सा हो चुका है, लेकिन पाठक साहब के साथ मंच साझा करना आज भी मुझे उसी सुकुमार उम्र में पहुँचा देता है जब प्रेम-पत्राचार के बाद पहली बार अपने प्रेमी या प्रेमिका से आमने-सामने मुलाक़ात होती है। दिल कुछ और धड़क रहा होता है, दिमाग़ कुछ और सोच रहा होता है और निगाहें कहीं और भटक रही होती हैं। पाठक साहब का सान्निध्य कुछ ऐसा ही है। आपको अपना शेर फिर पढ़वाता हूँ:
उसका चेहरा किताब जैसा है
पढ़िए पढ़िए किताब की बातें।
विशी सिन्हा, जो एसएमपियन होने के साथ-साथ साइबर एक्सपर्ट भी हैं, ने अपने सौम्य अंदाज़ में प्रश्नोत्तरी के रूप में साहब से संवाद किया। बहुत दिनों बाद एक अच्छा दिन गुज़रा। लगता है उसका नशा कई हफ़्तों तक रहा।
अगस्त 2025 — घर वाली मुलाक़ात:
31 अगस्त 2025 की वह दोपहर मेरे लिए एक साधारण दिन की तरह शुरू हुई थी, लेकिन कुछ ही घंटों में वह मेरी स्मृतियों के सबसे उजले पन्नों में शामिल हो गई। उस दिन हिंदी रहस्य-लेखन के सम्राट सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब ख़ाकसार के घर तशरीफ़ लाए।
उनकी आमद से घर का माहौल ही बदल गया। वही कमरा, वही दीवारें, वही रोज़मर्रा की चीज़ें – सब कुछ जैसे अचानक किसी और ही रौशनी में नहा गया। सच तो यह है कि कुछ लोग जहाँ बैठते हैं, वहाँ की फ़िज़ा भी बदल जाती है। उस दिन हमारे घर में भी कुछ वैसा ही हुआ।
दरवाज़े पर उनका स्वागत करते हुए दिल में वही पुरानी-सी घबराहट और ख़ुशी साथ-साथ मौजूद थी। वर्षों से उनसे मिलते आए हैं, मगर हर बार मुलाक़ात का एहसास कुछ ऐसा ही रहता है, जैसे कोई मुरीद अपने पीर से मिलने जा रहा हो।
भीतर आते ही उन्होंने हमेशा की तरह स्नेहपूर्वक घर-परिवार की ख़ैरियत पूछी। कश्फ़ साहिबा से भी बड़े अपनत्व के साथ बातें कीं। उनकी बातचीत में एक ऐसी सहजता होती है कि औपचारिकता अपने-आप गायब हो जाती है। बैठक में थोड़ी देर तक इधर-उधर की बातें चलती रहीं – कभी साहित्य का ज़िक्र, कभी पुराने प्रसंग, कभी पाठकों की दुनिया। उनके हल्के–फुल्के ठहाके कमरे में गूँजते तो माहौल और भी आत्मीय हो जाता।
इसी दौरान उनकी नज़र मेरी छोटी-सी लाइब्रेरी पर पड़ी, जिसमें लगभग चौथाई किताबें स्वयं पाठक साहब की रचनाएँ थीं। दीवार के साथ लगी अलमारियों में सजी किताबों को उन्होंने ध्यान से देखना शुरू किया। कभी किसी किताब की जिल्द पर उँगली फेरते, कभी किसी शीर्षक को पढ़कर ठिठक जाते, और कभी मुस्कराकर कोई टिप्पणी कर देते।
वह दृश्य मेरे लिए बड़ा विचित्र और भावुक कर देने वाला था। उस क्षण मुझे अपना सरापा उस पतंगे जैसा महसूस हुआ, जो एक चिराग़ की मद्धम रोशनी में अपनी हक़ीर दौलत की चमकते सूरज के सामने नुमाइश करने की कोशिश कर रहा हो। जिन किताबों ने मेरे भीतर पढ़ने का शौक़ जगाया, जिन लेखकों ने मेरे सोचने का ढंग बदला – आज उन्हीं किताबों के सामने वह शख़्स खड़ा था जिसकी रचनाएँ मेरी पढ़ने की दुनिया का सबसे चमकीला हिस्सा रही हैं।
साहब कभी कोई किताब उठाकर देखते, कभी किसी लेखक का नाम लेकर उससे जुड़ी कोई छोटी-सी याद साझा कर देते। उनकी बातों में अनुभव की गहराई भी थी और एक सच्चे पाठक की सादगी भी। मैं एक तरफ़ खड़ा उन्हें देखता रहा – कभी अपनी किताबों की तरफ़, कभी उनके चेहरे की तरफ़।
उस पल मन में बार-बार यही ख़याल आ रहा था कि किताबें सिर्फ़ काग़ज़ और स्याही नहीं होतीं। वे स्मृतियों की तरह होती हैं – एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलने वाली विरासत की तरह।
और सच कहूँ तो उस पल मुझे यह भी महसूस हुआ कि आदमी की सबसे बड़ी पूँजी शायद यही होती है – कुछ अच्छी किताबें, कुछ सच्चे रिश्ते और उनसे जुड़ी हुई कुछ यादें।
फरवरी 2026 —लुगदी लेखक और मानदेय:
25 फ़रवरी 2026 को साहित्यिक पोर्टल जानकी पुल पर सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब का एक लेख प्रकाशित हुआ। विषय था – लिटरेरी फ़ेस्टिवल और लेखक का मानदेय। लेख सामने आते ही साहित्यिक हलकों में हलचल मच गई। कुछ लोगों ने इसे लेखक की गरिमा का सवाल माना, कुछ ने इसे बाज़ारवाद से जोड़ा, और कुछ ने इसे साहित्यिक अहंकार की बहस बना दिया।
मैंने भी वह लेख पढ़ा। पढ़ते-पढ़ते मुझे पाठक साहब की वही पुरानी विशेषता याद आई – बेबाकी। वे अक्सर उस बात को भी सीधे शब्दों में कह देते हैं जिसे दूसरे लोग घुमा-फिराकर कहते हैं। अपने लेख में उन्होंने एक सीधा-सा प्रसंग रखा था:
‘एक लेखक को किसी लिटरेरी फ़ेस्टिवल में बुलाया जाता है। आने-जाने का हवाई किराया, पाँच सितारा होटल में स्टे, एयरपोर्ट से पिक-अप और ड्रॉप, हॉस्पिटैलिटी उद्योग की तमाम सुविधाएँ उपलब्ध। लेकिन लेखक पूछता है, “मानदेय कितना मिलेगा?” और यदि जवाब मनोनुकूल न हो तो कह देता है, “मैं नहीं आ सकता, किसी और लेखक को बुला लीजिए।”
यहीं से बहस शुरू हुई। मुझे लगा कि बहुत-से लोगों ने पाठक साहब की बात को थोड़ा उलटा पढ़ लिया। दरअसल उनका आशय यह नहीं था कि लेखक को मानदेय नहीं मिलना चाहिए। उनका संकेत कुछ और था। उनकी बात का सार यह था कि जब किसी लेखक को यात्रा, ठहरने और आतिथ्य की सारी सुविधाएँ दी जा रही हों, तब उसकी बौद्धिक मेहनत का सम्मान पहले से ही किया जा रहा होता है। लेखक मंच पर अपने शब्दों, अनुभवों और विचारों के साथ उपस्थित होता है, यह निस्संदेह श्रम है; मगर उस श्रम की गरिमा को किसी छोटे-से मानदेय की रकम से तौलना भी हमेशा उचित नहीं होता। उनकी नज़र में साहित्य की दुनिया में कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं जो बाज़ार की गणना से थोड़ा ऊपर खड़े रहते हैं, जहाँ लेखक और पाठक के बीच संवाद का अवसर ही सबसे बड़ा पुरस्कार बन जाता है।
मुझे हमेशा लगता रहा है कि पाठक साहब की असली ताक़त यही है – साफ़गोई। वे अपने हर शब्द का बोझ ख़ुद उठाते हैं। ऐसे मौक़ों पर वसीम बरेलवी साहब का यह शेर याद आ जाता है:
अपने हर हर लफ़्ज़ का ख़ुद आइना हो जाऊँगा,
उस को छोटा कह के मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा।
यानी लेखक की ऊँचाई दूसरों को गिराकर नहीं, अपने शब्दों की सच्चाई से तय होती है। हालाँकि, बहस आगे बढ़ी तो कई जगह उसका तापमान भी बढ़ गया। कहीं-कहीं चर्चा मानदेय के प्रश्न से हटकर ‘लुगदी लेखक’, ‘पत्रकार’, ‘इवेंट मैनेजर टाइप’ जैसी श्रेणियों तक पहुँच गई। जबकि असल सवाल सिर्फ़ इतना था कि लेखक और मंच के बीच सम्बंध की प्रकृति क्या होनी चाहिए।
मुझे हमेशा लगता रहा है कि ‘लुगदी साहित्य’ शब्द की अपनी एक सामाजिक कहानी है। एक समय था जब उत्तम सफ़ेद काग़ज़ महँगा और सीमित था। उस पर छपी किताबें अक्सर पुस्तकालयों या अभिजात्य पाठकों तक सीमित रहती थीं। इसके विपरीत लोकप्रिय प्रकाशकों ने सस्ते, रिसाइकल्ड काग़ज़ पर किताबें छापकर साहित्य को आम पाठकों तक पहुँचाया। बाद में उसी काग़ज़ के कारण लोकप्रिय लेखन को तिरस्कार में ‘लुगदी साहित्य’ कह दिया गया। ऐसे मौक़ों पर जौन एलिया की पंक्तियाँ याद आती हैं:
क्या तकल्लुफ़ करें ये कहने में,
जो भी ख़ुश है हम उससे जलते हैं।
कई बार हमारी नाराज़गी तर्क से कम और असुरक्षा से ज़्यादा पैदा होती है। अगर कुछ पत्रकार या मंच लोकप्रिय लेखकों को भी जगह दे रहे हैं तो इसे साज़िश नहीं बल्कि साहित्य की लोकतांत्रिक हवा समझना चाहिए। अंतिम फ़ैसला वंशावली नहीं, पाठक करता है। इस पूरी बहस ने मुझे अपने बचपन की एक घटना भी याद दिला दी।
सन् अस्सी के दशक में क्रिकेट अभी भी एक तरह का अभिजात्य खेल माना जाता था। कमेंटरी अंग्रेज़ी में होती थी।
मेरे एक चचा, जो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से इंजीनियर होकर दुबई में नौकरी करते थे, छुट्टियों में घर आए हुए थे। उनके सौजन्य से हमारे घर में रंगीन टीवी आया था और हम क्रिकेट देखने लगे थे। एक दिन वे अचानक उदास होकर बोले, “मुन्ना, अब क्रिकेट देखना छोड़ना पड़ेगा।”
मैं घबरा गया। वजह पूछी तो बोले, “अब हिंदी में कमेंटरी होने लगी है। रिक्शा चलाने वाले और सब्ज़ी बेचने वाले भी क्रिकेट समझने लगे हैं।”
तब पहली बार मुझे समझ में आया कि लोकप्रियता कई बार अभिजात्य संवेदनाओं को असहज कर देती है। कभी-कभी साहित्य की बहसें भी उसी मोड़ पर आ खड़ी होती हैं और अंत में, इस पूरी बहस से मेरी कमअक्ली ने तीन बातें सीखीं:
- साहित्य में पैसा भी एक हक़ीक़त है।
- आत्मालोचन ज़रूरी है।
- मगर वर्ग-श्रेष्ठता का भाव पूरी बहस को खोखला कर देता है।
साहित्य की दुनिया में आख़िरी फ़ैसला न मंच करता है, न आलोचक – आख़िरकार फैसला पाठक करता है, पाठक ही करता है।
उपसंहार — ‘एक सीस का मानवा’:
साहिबान! पिछले महीने (जनवरी 2026) ही पाठक साहब की आत्मकथा का पाँचवाँ खंड ‘एक सीस का मानवा’ प्रकाशित हुआ। पढ़ा। उसमें मेरा भी ज़िक्र आया।
आत्मकथा के इस अंतिम खंड के अंतिम पन्नों को पढ़कर मन देर तक शांत नहीं रह सका। उन पंक्तियों में उम्र की थकान भी है, समय की उदासीनता भी, और जीवन की उस सांझ की आहट भी, जो हर मनुष्य को कभी न कभी छूती है।
यह वही आदमी है जिसने अपनी लेखनी से लाखों पाठकों की रातों को रोशन किया; जिसने हिंदी रहस्य-कथा को घर-घर पहुँचाया; जिसने तीन सौ से अधिक उपन्यासों के माध्यम से कई पीढ़ियों को पढ़ने का सुख दिया। और वही आदमी यहाँ अपने जीवन की ढलती धूप में खड़ा होकर समय की परतों को उलट–पुलट कर देख रहा है।
खंड का शीर्षक – ‘एक सीस का मानवा’ – अपने भीतर गहरी दार्शनिकता समेटे हुए है। मानो जीवन के इस पड़ाव पर लेखक कह रहा हो कि अंततः मनुष्य एक सिर, एक चेतना और एक अकेली यात्रा का यात्री है। दुनिया की भीड़, रिश्तों का शोर, यश और लोकप्रियता – सब अपनी जगह हैं; पर मनुष्य का अंतिम संवाद अंततः अपने ही भीतर से होता है।
लेकिन जो लोग पाठक साहब को जानते हैं, जो उनके सान्निध्य में आए हैं, वे यह भी जानते हैं कि उनकी कहानी केवल इन उदास पंक्तियों से पूरी नहीं होती। उनके भीतर एक ऐसी जिजीविषा है जो उम्र से बड़ी है। मुझे आज भी वह दिन याद है जब मैं थाने में अपने रोज़मर्रा के काम में व्यस्त था और अचानक पाठक साहब का फ़ोन आया, “बरख़ुरदार, कहाँ हो?”
कुछ ही देर बाद वे स्वयं वहाँ आ पहुँचे। करोड़ों पाठकों के प्रिय लेखक और दिल्ली पुलिस के एक साधारण-से थाने में बैठा उनका एक पाठक उनसे पाँच मिनट की मोहलत माँग रहा था कि:
“सर, ज़रा सरकारी काम निबटा लूँ।”
उस दिन मुझे पहली बार गहराई से महसूस हुआ कि लेखक और पाठक का रिश्ता केवल साहित्यिक नहीं होता – वह कहीं-कहीं भक्त और भगवान के रिश्ते जैसा भी हो जाता है।
फिर कई और अवसर आए।
साहित्य आजतक के खुले एम्फीथिएटर में, जहाँ सैकड़ों लोगों के बीच मंच पर बैठे पाठक साहब की नज़र अचानक मुझ पर पड़ी और वे कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही मंच से उतरकर मिलने चले आए।
कभी उनकी आत्मकथा का नया खंड सबसे पहले मेरे दफ़्तर में आकर मेरे हाथों में रखा गया। कभी प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में उनके लेखन के पचपन वर्षों के समारोह में मैं अपनी औक़ात से कहीं ऊपर उनके साथ मंच पर बैठा मिला। कभी नोएडा स्थित उनके घर में बीमारी से उबरने के बाद उनसे मुलाक़ात हुई – शरीर कमज़ोर था, मगर आँखों की चमक वही थी – और कभी प्रगति मैदान के विश्व पुस्तक मेले में उनके साथ मंच साझा करने का अवसर मिला, जहाँ आज भी उन्हें देखकर मेरे भीतर वही किशोर पाठक जाग उठता है जिसने पहली बार उनकी किताब पढ़ी थी।
इन तमाम स्मृतियों को याद करता हूँ तो पाठक साहब की आत्मकथा की उन उदास पंक्तियों के पीछे एक दूसरी तस्वीर भी दिखाई देती है – एक ऐसे लेखक की, जिसके चारों ओर पाठकों का अथाह संसार है। लेखक की तनहाई का सच शायद यही है कि वह लाखों लोगों के बीच भी भीतर से अकेला हो सकता है; मगर पाठकों के दिलों में उसकी मौजूदगी कभी अकेली नहीं होती।
मेरे जैसे अनगिनत लोग हैं जिनकी पढ़ने की आदत, जिनकी कल्पना की दुनिया और जिनकी भाषा की सहजता, सब पर कहीं न कहीं पाठक साहब का असर है। हमने उनसे केवल रहस्य-कथा नहीं पढ़ी; हमने यह भी सीखा कि लिखना प्रेरणा का इंतज़ार नहीं, बल्कि निरंतर श्रम और अनुशासन की साधना है।
इसलिए ‘एक सीस का मानवा’ पढ़ते हुए मन में एक ही भावना उठती है – कृतज्ञता की। ईश्वर से मेरी यही दुआ है कि पाठक साहब स्वस्थ रहें, दीर्घायु हों और उनकी लेखनी की यह मशाल यूँ ही जलती रहे।
आने वाली पीढ़ियाँ भी उसी उजाले में पढ़ना सीखें जिसमें हमारी पीढ़ी ने पढ़ना सीखा। क्योंकि सच तो यह है कि कुछ लेखक केवल किताबें नहीं लिखते – वे अपने पाठकों की स्मृतियों में बस जाते हैं और सुरेन्द्र मोहन पाठक साहब उन्हीं बिरले लेखकों में से एक हैं।
(लेखक शायर हैं और दिल्ली पुलिस
में इन्स्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं

