प्रवीण बंजारा की कहानी ‘पहले जैसा पीला’

अकेलापन व्यक्ति को किस हद तक निराश कर सकता है इसका अनुमान प्रवीण बंजारा की कहानी ‘पहले जैसा पीला’ को…

इतिहास, स्मृति और लेखकीय संवेदना का संतुलन: ‘इतिहास की थाली’

हाल में ही पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित पुस्तक ‘इतिहास की थाली’ प्रकाशित हुई है। लेखक अनिमेष मुखर्जी की यह किताब…

लोक और शास्त्र के मेलजोल की किताब ‘नैनन में आन-बान’

27 फ़रवरी की शाम पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित यतीन्द्र मिश्र की किताब ‘नैनन में आन-बान’ पर बातचीत हुई। दिल्ली के…

*अंधकार में मोमबत्तियों की तरह होना* 

हाल में रज़ा फ़ाउंडेशन द्वारा अंतरराष्ट्रीय कविता का आयोजन किया गया है। ‘संसार’ शीर्षक से आयोजित इस आयोजन की संक्षिप्त…

अस्सी: सांख्यिकी के शोर में सिसकती न्याय की पुकार

हाल में ही अनुभव सिन्हा की फ़िल्म आई है ‘अस्सी’। इस फ़िल्म पर यह टिप्पणी लिखी है मनीष चौरसिया ने।…

बूंग: आकांक्षा का भूगोल, स्वावलंबन की राजनीति और एक वैश्विक मान्यता

मणिपुरी भाषा की फ़िल्म बूँग को ब्रिटिश अकेडेमी ऑफ फ़िल्म एंड टेलीविजन आर्ट्स(BAFTA) का प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला है। लक्ष्मीप्रिया देवी…

मसला वर्गीकरण का नहीं, मेहनताने का था

कल जानकी पुल पर प्रसिद्ध लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक ने लिट फ़ेस्ट, मानदेय को लेकर अपने विचार रखे। आज उसकी…

सुरेंद्र मोहन पाठक की निगाह में लिट फ़ेस्ट

प्रसिद्ध लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक ने लिट फ़ेस्ट पर चली बहस के बहाने साहित्य और साहित्यकारों से जुड़े कई मुद्दे…

दूर देश के परिंदे: उजड़ने और बसने के बीच की करुणा का कथानक

अनामिका का उपन्यास ‘दूर देश के परिंदे’ जैसे आजादी के आसपास के भारत में चलने वाले विमर्शों की कथा है।…

मनीष यादव की कविताएँ

फ़रवरी, जिसे प्रेम का महीना भी कहा जाता है। इसके बीतने के पहले आइए कुछ प्रेम-कविताएँ पढ़ते हैं। ये कविताएँ…

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