सपने में जॉर्ज ऑरवेल

हिंदी के वरिष्ठ लेखक बटरोही की यह चिंता उनके फेसबुक वाल से टीप कर आपसे साझा कर रहा हूँ. आप भी पढ़िए उनकी चिंताओं से दो-चार होइए- प्रभात रंजन.
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मुझे नहीं मालूम की कितने लोग इन बातों में रूचि लेंगे? कल रात भर ठीक से सो नहीं पाया, बेचैनी में ही सुबह उठकर मेल खोलते ही अभिषेक श्रीवास्तव का मराठवाड़ा पर यात्रा वृतांत पढ़ा तो कुछ हद तक तनावपूर्ण मनःस्थिति से निजात मिली. हालाँकि इस विवरण में मन को शांत करने वाला ऐसा कुछ नहीं था, उलटे वह हमारे समाज का ही बेहद मार्मिक स्याह पक्ष था, मगर उसे पढ़ते हुए लगा कि जिस समस्या से मैं तनावग्रस्त हूँ, वह तो इस समस्या के सामने कुछ भी नहीं है. 
लेख के शुरू में जॉर्ज ऑरवेल की १९४६ में प्रकाशित पुस्तक \’पॉलिटिक्स एंड द इंग्लिश लैंग्वेज\’ का उद्धरण है : \’\’शब्दों और उनके अर्थ का रिश्ता तकरीबन टूट चुका है। जिनके लेखन से यह बात झलकती है, वे आम तौर से एक सामान्य भाव का संप्रेषण कर रहे होते हैं- कि वे एक चीज़ को नापसंद करते हैं और किसी दूसरी चीज़ के साथ खड़े होना चाहते हैं- लेकिन वे जो बात कह रहे होते हैं उसकी सूक्ष्मताओं में उनकी दिलचस्पी नहीं होती।\’\’

हुआ यह कि देहरादून में अपनी किताब \’गर्भगृह में नैनीताल\’ पर हुई चर्चा से लौटते वक़्त दून पुस्तकालय के निदेशक बी. के. जोशी जी ने मुझे बिना किसी भूमिका के एक किताब दी \’द दून वैली एक्रौस द ईयर्स\’. मैं अब तक समझ रहा था कि यह पुस्तक एक सामान्य भेंट होगी, मगर कल जब इसे पढ़ा तो इस पुस्तक को देने का अभिप्राय समझ में आया. दरअसल यह किताब भी मेरे उपन्यास की तरह गणेश सैली के द्वारा सम्पादित एक ऐसी किताब है जिसमें कुछ अँगरेज़ लेखकों के द्वारा देहरादून घाटी में अपनी ऐशगाह के रूप में बसाये गए मसूरी, चकराता आदि का बड़ा उत्तेजक और रोमांचक विवरण है. इसके कई सन्दर्भ विभूति नारायण राय के \’नया ज्ञानोदय\’ में प्रकाशित उपन्यास \’भूत की प्रेमकथा\’ में उतने ही उत्तेजक ढंग से चित्रित किये गए हैं. \’द दून वैली…\’रूपा एंड कंपनी\’ के द्वारा २००७ में प्रकाशित है.

मैंने अपने उपन्यास में १९४१ में अँगरेज़ पर्यटक पीटर बैरन द्वारा बसाये गए नैनीताल के माध्यम से उस गर्भगृह को खोजने की कोशिश की है, जिसे अंगेज़ शासकों और प्रशासकों ने अपने कब्जे में करके उसे उस ब्रिटिश संस्कृति के रूप में विकसित किया, जो आज समूचे भारत की अनिवार्य पहचान बन चुकी है. उपन्यास में दो प्रमुख पात्र हैं : औपनिवेशिक संस्कृति के प्रतीक, \’राष्ट्रवाद\’ की भावुकता को भुनाने वाले अमिताभ बच्चन (जो ६ अक्टूबर, २०११ को उडीसा के सब-इन्स्पेक्टर की विधवा रोजलिन को राष्ट्र की ओर से कृतज्ञता के रूप में \’कौन बनेगा करोडपति\’ की हॉट सीट पर आमंत्रित कर साढ़े बारह लाख का चेक भेंट करते हैं) और दूसरा मेरे गाँव धसपड़ का खड़क सिंह रैक्वाल, जो एक आम उत्तराखंडी का प्रतिनिधि है. उपन्यास में इस तरह के अंतविरोधों को सीधे कथा-शिल्प में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था इसलिए उपन्यास के विधागत ढांचे को बार-बार तोड़ा गया है, हालाँकि विधा के अनिवार्य ढांचे को नुकसान पहुंचाए बगैर. 

समस्या पर विस्तार से लिखने के लिए जिस तरह का धैर्य, स्थान और समय चाहिए, वह अभी सम्भव नहीं है, कल के मेरे उद्वेग का कारण सिर्फ यह था कि मेरे दो-एक अन्तरंग स्थानीय मित्रों और मित्र आलोक राय को छोड़कर किसी की ओर से कोई भी अच्छी-बुरी प्रतिक्रिया नहीं मिली. मैंने इसकी प्रति इस उम्मीद से कई मित्रों को, जिनसे मेरा संवाद रहा है, भेजी – जैसे नामवर सिंह जी, अशोक वाजपेयी जी, ओम थानवी जी, मंगलेश जी, ज्ञान जी, वीरेन आदि लगभग एक दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित लेखकों को. अन्तरंग लेखक के नाते मेरी इच्छा स्वाभाविक थी कि कम-से-कम ये लोग पहुँच की सूचना तो देंगे. (पहुँच की सूचना केवल प्रयाग शुक्ल से मिली.) पता नहीं, गलत या सही, मैं समझ रहा था कि अपनी जड़ों से कट जाने और एक नकली संस्कृति को अपनी जड़ें स्वीकार कर लेने की नियति को ये लोग समझेंगे, मगर दून घाटी पर लिखी सैली और विभूति जी के उपन्यास को पढ़कर मुझे लगा कि अपने पीछे छूट चुके तथाकथित \’असभ्य\’ अतीत और उन जड़ों के जरिये अपने समय की विडम्बनाओं को समझना कितना कठिन है, जब कि औपनिवेशिक वर्तमान के जरिये गर्व महसूस करना कितना आसान. क्या हम भारतीय एक दोहरे उपनिवेश (शुद्धतावादी हिन्दुओं और औपनिवेशिक \’विश्ववादियों\’ के शिकार होकर खुद ही अपने और अपने समय के साथ एक क्रूर मजाक नहीं कर रहे हैं?

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हिंदी के वरिष्ठ लेखक बटरोही की यह चिंता उनके फेसबुक वाल से टीप कर आपसे साझा कर रहा हूँ. आप भी पढ़िए उनकी चिंताओं से दो-चार होइए- प्रभात रंजन.
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मुझे नहीं मालूम की कितने लोग इन बातों में रूचि लेंगे? कल रात भर ठीक से सो नहीं पाया, बेचैनी में ही सुबह उठकर मेल खोलते ही अभिषेक श्रीवास्तव का मराठवाड़ा पर यात्रा वृतांत पढ़ा तो कुछ हद तक तनावपूर्ण मनःस्थिति से निजात मिली. हालाँकि इस विवरण में मन को शांत करने वाला ऐसा कुछ नहीं था, उलटे वह हमारे समाज का ही बेहद मार्मिक स्याह पक्ष था, मगर उसे पढ़ते हुए लगा कि जिस समस्या से मैं तनावग्रस्त हूँ, वह तो इस समस्या के सामने कुछ भी नहीं है. 
लेख के शुरू में जॉर्ज ऑरवेल की १९४६ में प्रकाशित पुस्तक पॉलिटिक्स एंड द इंग्लिश लैंग्वेजका उद्धरण है : शब्दों और उनके अर्थ का रिश्ता तकरीबन टूट चुका है। जिनके लेखन से यह बात झलकती है, वे आम तौर से एक सामान्य भाव का संप्रेषण कर रहे होते हैं- कि वे एक चीज़ को नापसंद करते हैं और किसी दूसरी चीज़ के साथ खड़े होना चाहते हैं- लेकिन वे जो बात कह रहे होते हैं उसकी सूक्ष्मताओं में उनकी दिलचस्पी नहीं होती।

हुआ यह कि देहरादून में अपनी किताब गर्भगृह में नैनीतालपर हुई चर्चा से लौटते वक़्त दून पुस्तकालय के निदेशक बी. के. जोशी जी ने मुझे बिना किसी भूमिका के एक किताब दी द दून वैली एक्रौस द ईयर्स‘. मैं अब तक समझ रहा था कि यह पुस्तक एक सामान्य भेंट होगी, मगर कल जब इसे पढ़ा तो इस पुस्तक को देने का अभिप्राय समझ में आया. दरअसल यह किताब भी मेरे उपन्यास की तरह गणेश सैली के द्वारा सम्पादित एक ऐसी किताब है जिसमें कुछ अँगरेज़ लेखकों के द्वारा देहरादून घाटी में अपनी ऐशगाह के रूप में बसाये गए मसूरी, चकराता आदि का बड़ा उत्तेजक और रोमांचक विवरण है. इसके कई सन्दर्भ विभूति नारायण राय के नया ज्ञानोदयमें प्रकाशित उपन्यास भूत की प्रेमकथामें उतने ही उत्तेजक ढंग से चित्रित किये गए हैं. द दून वैली…रूपा एंड कंपनीके द्वारा २००७ में प्रकाशित है.

मैंने अपने उपन्यास में १९४१ में अँगरेज़ पर्यटक पीटर बैरन द्वारा बसाये गए नैनीताल के माध्यम से उस गर्भगृह को खोजने की कोशिश की है, जिसे अंगेज़ शासकों और प्रशासकों ने अपने कब्जे में करके उसे उस ब्रिटिश संस्कृति के रूप में विकसित किया, जो आज समूचे भारत की अनिवार्य पहचान बन चुकी है. उपन्यास में दो प्रमुख पात्र हैं : औपनिवेशिक संस्कृति के प्रतीक, ‘राष्ट्रवादकी भावुकता को भुनाने वाले अमिताभ बच्चन (जो ६ अक्टूबर, २०११ को उडीसा के सब-इन्स्पेक्टर की विधवा रोजलिन को राष्ट्र की ओर से कृतज्ञता के रूप में कौन बनेगा करोडपतिकी हॉट सीट पर आमंत्रित कर साढ़े बारह लाख का चेक भेंट करते हैं) और दूसरा मेरे गाँव धसपड़ का खड़क सिंह रैक्वाल, जो एक आम उत्तराखंडी का प्रतिनिधि है. उपन्यास में इस तरह के अंतविरोधों को सीधे कथा-शिल्प में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता था इसलिए उपन्यास के विधागत ढांचे को बार-बार तोड़ा गया है, हालाँकि विधा के अनिवार्य ढांचे को नुकसान पहुंचाए बगैर. 

समस्या पर विस्तार से लिखने के लिए जिस तरह का धैर्य, स्थान और समय चाहिए, वह अभी सम्भव नहीं है, कल के मेरे उद्वेग का कारण सिर्फ यह था कि मेरे दो-एक अन्तरंग स्थानीय मित्रों और मित्र आलोक राय को छोड़कर किसी की ओर से कोई भी अच्छी-बुरी प्रतिक्रिया नहीं मिली. मैंने इसकी प्रति इस उम्मीद से कई मित्रों को, जिनसे मेरा संवाद रहा है, भेजी – जैसे नामवर सिंह जी, अशोक वाजपेयी जी, ओम थानवी जी, मंगलेश जी, ज्ञान जी, वीरेन आदि लगभग एक दर्जन से अधिक प्रतिष्ठित लेखकों को. अन्तरंग लेखक के नाते मेरी इच्छा स्वाभाविक थी कि कम-से-कम ये लोग पहुँच की सूचना तो देंगे. (पहुँच की सूचना केवल प्रयाग शुक्ल से मिली.) पता नहीं, गलत या सही, मैं समझ रहा था कि अपनी जड़ों से कट जाने और एक नकली संस्कृति को अपनी जड़ें स्वीकार कर लेने की नियति को ये लोग समझेंगे, मगर दून घाटी पर लिखी सैली और विभूति जी के उपन्यास को पढ़कर मुझे लगा कि अपने पीछे छूट चुके तथाकथित असभ्यअतीत और उन जड़ों के जरिये अपने समय की विडम्बनाओं को समझना कितना कठिन है, जब कि औपनिवेशिक वर्तमान के जरिये गर्व महसूस करना कितना आसान. क्या हम भारतीय एक दोहरे उपनिवेश (शुद्धतावादी हिन्दुओं और औपनिवेशिक विश्ववादियोंके शिकार होकर खुद ही अपने और अपने समय के साथ एक क्रूर मजाक नहीं कर रहे हैं?

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