आजकल आदिवासी जीवन को लेकर लेखन की चर्चा है. ऐसे में याद आया साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार 2015 से सम्मानित हंसदा सोवेंद्र शेखर की अंग्रेजी किताब ‘आदिवासी विल नॉट डांस’, जिसका हिंदी अनुवाद राजपाल एंड सन्ज प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने वाला है. अनुवाद हिंदी की युवा कवयित्री रश्मि भारद्वाज ने किया है.
हंसदा सोवेन्द्र शेखर झारखंड सरकार में मेडिकल ऑफिसर हैं। अंग्रेज़ी में लिखने वाले हंसदा उर्वर और खनिज संपदा से युक्त आंतरिक क्षेत्र और लगातार विस्तार ले रहे झारखंड के मलिन शहरों पर आधारित अपनी कहानियों में मिट्टी और रक्त के बने जीवंत पात्र गढ़ते हैं , उनके पात्र उस धरती की तरह ही होते हैं, जहां वे जन्म लेते हैं, रहते हैं, और जिसपर कई बार वे खून भी जरूर बहाते हैं।
आदिवासी नहीं नाचेंगे एक परिपक्व, आवेगपूर्ण और अत्यंत राजनैतिक कहानियों की किताब है, जो जीवन के तत्वों से परिपूर्ण है। यह हंसदा सोवेन्द्र शेखर को एक बहुत ही महत्वपूर्ण समकालीन लेखक के रूप में स्थापित करती है- मॉडरेटर
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नवंबर के आते ही, संथाल पुरुष, स्त्रियाँ, और बच्चे पहाड़ों के अपने गाँवों और संथाल परगना के दूरस्थ इलाकों से निकलकर जिला मुख्यालय के स्टेशन पहुँचते हैं। ये संथाल- पूरा गाँव, पूरी बिरादरी- एक लंबा, सर्पीला जुलूस निकालते हैं, जब वे अपने जमीन, अपने खेतों को छोडकर पश्चिम बंगाल के वर्धमान जिले में स्थित नमल और वहाँ के धान के खेतों में पहुँचने के लिए ट्रेन लेने आते हैं।
बाईस साल की तालामाई किस्कू उन 43 लोगों के समूह का हिस्सा है जो आज रात यात्रा करने वाले हैं। उसके साथ, उसके माता-पिता और दो बहनों में से एक बहन है। उसका लगभग पूरा गाँव- उसके तीन भाइयों और एक जीजा सहित सहित सब बहुत पहले ही बर्धमान के लिए निकल गए हैं।
तालामाई तीन लड़कियों और तीन लड़कों वाले परिवार की दूसरी लड़की है। उसका नाम कल्पना की कमी को दर्शाता है। वह बीच की लड़की है – ताला मतलब बीच और माई मतलब लड़की। तालामई का परिवार ईसाई है। कोई भी यह उम्मीद करेगा कि तालामाई के माता-पिता इतने पढे लिखे होंगे कि अपनी बेटी के लिए बढ़िया, रचनात्मक नाम सोच सकते होंगे। फिर भी मिशनरियों द्वारा शिक्षा दिये जाने के वायदों के बाद भी, तालामाई के माता-पिता कभी स्कूल के अंदर जाकर देख तक नहीं जा सके, और ना ही उसने देखा। वे या तो कोयला बटोरते थे, या बर्धमान के खेतों में काम करते थे।
तालामाई अपने समूह से अलग हो गयी। वह एक आदमी की ओर आकर्षित हुई है। वह जवान, गोरा, डीकू रेलवे सुरक्षा बल का जवान है। अपने हाथ में एक ब्रेड पकौड़ा लिए, वह उसे अपने पीछे आने का इशारा करता है, और कोने में जाकर गुम हो जाता है।
तालामाई द्वंद में है कि उसे जाना चाहिये कि नहीं, और फिर वह जाने का निर्णय करती है। आख़िरकार वह भोजन का आमंत्रण दे रहा और वह भूखी है। अभी रात के साढ़े दस हो रहे हैं और ट्रेन को आने में अभी भी दो घंटे हैं।
‘क्या तुम भूखी हो?’ जवान तालामाई को कोने में बुलाता है। ‘तुम्हें खाना चाहिये?’ वह पुलिस क्वार्टर के सामने खड़ा है।
‘हाँ,’ तालामाई ने उत्तर दिया।
‘तुम्हें पैसे चाहिये?’
‘हाँ’।
‘क्या तुम मेरा कुछ काम करोगी?’
तालामाई जानती है कि वह किस काम के बारे में बात कर रहा है। उसने यह काम कोयला रोड पर कई बार किया है, जहां कई संथाल स्त्रियाँ और लड़कियाँ ट्रक से कोयला चुराती हैं। वह बहुत औरतों को जानती है, जो यह काम ट्रक ड्राईवर और अन्य आदमियों के साथ करती हैं। और वह जानती है कि नमल के रास्ते में, संथाल औरतें यह काम भोजन और पैसों के लिए रेलवे स्टेशन पर भी करेंगी।
‘हाँ,’ तालामाई कहती है, और अंधेरे में पुलिसवाले के पीछे चलती पुलिसवालों के कमरे के पीछे की पक्की जगह पर आती है।
काम बहुत समय नहीं लेता। पुलिसवाला तैयार है। वह जमीन पर एक गमछा बिछाता है और अपनी पतलून उतार देता है। उसके पास कॉन्डोम पहनने का समय भी है। तालामाई को भी अपने सारे कपड़े नहीं उतारने हैं। वह बस अपनी लुंगी और पेटिकोट उतारती है – वह दस्तूर जानती है। पुलिसवाला उसके नितंब दबोचता है, उन्हें उठा कर, तालामाई को अपने हिसाब से जमाते हुये, उसके अंदर प्रवेश करता है। अपना सारा भार उसपर डालते हुये वह शरीर हिलाने लगता, उसके मुँह से घुरघुराने की ध्वनि निकल रही है। तालामाई चुपचाप लेटी रहकर, हल्के प्रकाश में पुलिसवाले के चेहरे की बदलती मुखाकृति देखती रहती है। कभी उसका मुँह ऐंठ जाता है, कभी वह मुस्कुरा देता है। एक बार वह कहता है, ‘साली, तुम संथाल औरतें सिर्फ़ इस काम के लिये ही बनी हो। तुम अच्छी हो!’
तालामाई कुछ नहीं कहती है, कुछ नहीं करती है। एक समय तो वह उसके ब्लाउज़ के अंदर से उसके वक्षों को निचोड़ता है। वह उन्हें काटता है और उसके निपल्स को चूसता है। इससे दर्द होता है।
‘चिल्लाओ मत,’ आदमी हांफता है। ‘एक शब्द भी मत कहो। इससे तकलीफ़ नहीं होगी’।
तालामाई इस बात का ध्यान रखती है कि वह चीखे या झिझके भी नहीं। वह नियम जानती है। उसे कुछ नहीं करना है, सिर्फ़ अपने पैर फ़ैलाने है और चुपचाप लेटना है। वह जानती है कि सबकुछ आदमी के द्वारा ही किया जाता है। वह सिर्फ़ लेटती है, निष्क्रिय, भावशून्य,अपलक। बिलकुल उस पत्थर की जमीन की तरह ठंडी ,जिसे वह गमछे के पतले कपड़े के अंदर महसूस कर पा रही है; एक निरपेक्ष मिट्टी के कटोरे की तरह जिसपर काले बादल ख़ुद को खाली कर जाते हैं।
दस मिनट से भी कम समय में काम ख़त्म हो गया।
पुलिसवाले ने ख़ुद को खींचा और तालामाई को उठने में मदद की। उसने इस्तेमाल किया हुआ कॉन्डोम फेंक कर अपने कपड़े पहन लिये। फिर उसने तालामाई को दो ठंडे ब्रेड पकौड़े और पचास रूपये का नोट थमाया और चला गया। तालमाई ने अपना पेटिकोट और लुंगी बांधी, पचास रूपये का नोट ब्लाउज़ में खोंसा, दोनों ब्रेड पकौड़े खाये और अपने समूह में वापस लौट गयी।


