या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता!

विजयादशमी के बहाने एक लेख लिखा है- प्रभात रंजन 
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ब्रिटिश लेखिका एलिस एल्बिनिया ने कुछ साल पहले महाभारत की कथा को आधुनिक सन्दर्भ देते हुए एक उपन्यास लिखा था ‘द लीलाज बुक’, इसमें समकालीन जीवन सन्दर्भों में संस्कृति-परम्परा की छवियों को देखने की एक मजेदार कोशिश की गई है. इसमें एक पात्र शिव है जो उस भारत की तलाश में है जो मुसलमानों और अंग्रेजों के आने से पहले था. लेकिन उसकी मुश्किल यह है कि उसकी बात का सभी उपहास उड़ाते हैं. समय के साथ परम्पराएँ हमें हास्यास्पद लगने लगती हैं.  
बचपन में स्कूल की किताबों में पढ़ा था विजयादशमी बुराई पर अच्छाई की विजय का त्यौहार है. कॉलेज में आया तो निराला जी की कविता पढ़ी ‘राम की शक्ति पूजा’. ‘रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमर/रह गया राम-रावण का अपराजेय समर…’ कविता की पहली पंक्ति अक्सर याद आ जाती है. दूसरी कहानी यह सुनी थी कि देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया था और उसी उपलक्ष्य में दुर्गापूजा मनाया जाता है. बचपन में नवरात्र के दिनों में महिषासुर मर्दिनी की मूर्तियों के दर्शन करने जाता था. विजयादशमी का पर्व दुर्गा को महिषासुर से हुए युद्ध में मिली विजय की स्मृति में तो मनाया जाता है तो कहीं राम के रावण पर विजय की याद में भी मनाया जाता है। अस्मिताओं के उभार के इस दौर में  समाज में महिषासुर के उपासक आगे आये. अब महिषासुर की याद में आयोजन होने लगे हैं.

परम्पराएँ बदल जाती हैं, प्रतीक बदल जाते हैं, दिवस बचे रहे जाते हैं स्मृति चिन्हों की तरह. स्मृतियों से स्मृतियाँ जुडती चली जाती हैं. बनती-बिगड़ती चली जाती हैं. अच्छाई-बुराई के पर्व से आगे बढ़कर एक सांस्कृतिक संगठन इसे शस्त्र पूजा के रूप में मनाता है. विजयादशमी को अपने स्थापना दिवस से जोड़कर. शास्त्रों की निकली परम्पराएँ शस्त्रों में सिमटती जा रही है.

दरअसल, उत्तरआधुनिकता का यह दौर छवियों का दौर है, डिजिटल एज में छवि चमकाने का खेल सबसे ज्यादा चलता है. बचपन में जब सीतामढ़ी नामक कस्बे में रहता था तो नवरात्र और विजयादशमी हमारे लिए आजादी का बड़ा उत्सव होता था. दुर्जा पूजा के पंडालों में घूमना, रात-रात भर चलने वाले संगीत के आयोजनों में जाना. घर की तरफ से पूरी आजादी रहती थी. धर्म के नाम पर सब चीज की छूट रहती थी. हम अपनी सहपाठिनों से, पड़ोसिनों से क्लास के, घर-परिवार के माहौल से बाहर ऐसे ही अवसरों पर मिलते थे, मिलने से ज्यादा देखा-देखी का सुख उठाते थे. बरसों बाद जब बांग्ला लेखिका मंदाक्रांता सेन का उपन्यास ‘झपताल’(हिंदी में ‘अंधी छलांग’ नाम से प्रकाशित) में नवरात्र के नौ दिनों के दौरान चली मार्मिक प्रेम कहानी पढ़ी तो मुझे सीतामढ़ी के दिनों के नवरात्र की याद आई. देवी की कहानी न जाने कहाँ पीछे छूटती चली गई.

बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए नवरात्र की वह धारणा बदल गई. यहाँ हम अंग्रेजी ढंग से दशहरा को ‘डूशहरा’ बोलते थे और बंगाली स्कूल के पंडालों में बढ़िया प्रसाद के लिए जाते थे. दिल्ली विश्वविद्यालय के खुले माहौल में ‘नयनसुख’ पंडालों में जाने का कोई आकर्षण नहीं रह गया था.

अब दिल्ली में विस्थापित के रूप में नवरात्र अपने ‘स्थापित’ दिनों की याद मनाने का उत्सव रह गया है, जहाँ हम विस्थापित मिलते हैं, कोई जानता हो, पहचानता हो या नहीं अपने जैसों की भीड़ में घुल मिल कर एक अलग सा ही आनंद आता है. ठीक है रात भर के संगीत कार्यक्रमों में जाने की आजादी का वह सुख नहीं रहा, देवी के अलग-अलग पंडालों में जाने, प्रसाद खाने की वह उत्कंठा जाती रही. लेकिन अपने जैसों के जनसमूह में खो जाने का सुख हम विस्थापितों से पूछिए. हमारे लिए दशहरा धार्मिकता का प्रतीक नहीं है, वह अपनेपन का प्रतीक है. धार्मिक प्रतीक जब सामाजिक परम्पराओं में ढल जाते हैं तो उत्सव का हिस्सा हो जाते हैं.जाने माने कवि अशोक वाजपेयी का यह बड़ा पुराना कथन है कि हमारा देश उत्सवधर्मी देश है. धर्म तो एक बहाना है!

इससे याद आया मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘कुरु-कुरु-स्वाहा’. देवी की कथा को पहुंचेली नामक उस स्त्री की कथा के रूप में कहने की कोशिश की गई है जिसका रूप बार-बार बदल जाता है. वह एक ही है जो अनेक रूपों में सामने आती है या कई स्त्रियाँ हैं जो जिसे हम एक ही छवि में देखने की, गढ़ने की कोशिश करते हैं. बहरहाल, वह मिलकर भी नहीं मिलती. जिसे वह जिस रूप में मिलती है वह उसे उसी रूप में पहचानता है, जानता है- ‘या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता!’    

  

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