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उसकी आवाज़ मेरे जीवन का एकमात्र दृश्य है

मेरा मन था कि बाबुषा पर कुछ अलग से लिखूं . उसे पढ़ना एक ऐसे कीमियागर के पास बैठना है,जो दुःख की मिट्टी उठाता है तो टीस के सारे मुहाने खुल जाते हैं और सुख यहाँ इस तरह आता है जैसे अप्रत्याशित घटना -कि आप चकित हैं और चकित हैं . प्रेम इन कविताओं में संवेदनाओं की परत दर परत खुलता जाता है। मुझे आकर्षित करता है प्रेम का यह स्वरुप -इंद्रजाल में दम साधे का इंतज़ार …
बाबुषा की कविताओं को मैं चुपचाप अपने पास संजो रही थी . पहले वह बरिस्ता जो उनका अपना ब्लॉग था में पोस्ट डालती थीं . अब बरिस्ता खामोश है पर उसकी कई पोस्ट मेरे पास संभली हुई हैं. दूसरे वे अपनी रचनाएँ कहीं भेजती नहीं हैं ..अपने आप में लिखती मिटाती हैं ..उनकी यह स्लेट मेरे हाथ लग गई है ..या कहिये चुरा लायी हूँ .
मैंने उनकी कविताओं को बिना इजाज़त के जानकी पुल के संपादक प्रभात जी के पास भेजा . कविताओं की ज्यामिति ही कुछ ऐसी है कि पहली बार में प्रभात जी को रचनाएँ अच्छी लगीं और उन्होंने इन्हें प्रकाशित करने की सूचना मुझे भेजी . इन कविताओं को हम सब तक बहुत पहले ही आ जाना चाहिए था- अपर्णा मनोज 
=================== 
श्वास-श्वास झंकार
वे दुबके पड़े रहते अपनी उबासियों में
पर उनकी कट्टर निराशाएं चमचमाती
और हम फटेहाल सड़कों पर नृत्य करते
हमारे पाँव की थाप से पृथ्वी थरथराती है
वे पीड़ा से बिलबिलाते हैं
कि जैसे उनकी आत्मा पर ठोंकी गयी हो गहरी कील
जिस पर टंगी है उनकी देह
हमारी आत्माओं में भी कम नहीं गरम चिमटे से पड़े चकत्ते
जले निशानों को पिरो कर हमने बाँध लिए अपने पाँव में घुँघरू
अनंतकाल के गले पर फंसी सुबक हैं उनके भारी कदम
हम  पानी में निरंतर फैलते अमीबा अपने भूत-भविष्य से बेख़बर 
थिरकते झरने की लय पर
उनके  पेट  में कुलबुलाता है नृत्य
वे कस कर बांधते हैं कमरबंद 
उनकी जम्हाइयों से बनी हवा की दीवार
सीलन भरी उनके सामने खड़ी 
हम चिन्दीचोर – से नाचते हैं सड़क पर यूँ कि नाचता है आलम
नाचती है पृथ्वी गोल -गोल दरवेश सी
हम नृत्य से ढंक लेते हैं अपनी देह की नग्नता
हमारी आत्माएं नाचती हैं निर्वस्त्र
हमारे नृत्य पर करते हैं वे विलाप
हम कर सकते हैं उनके विलाप पर दो मिनट का मौन नृत्य
कि विलाप के नृत्य की मुद्राएं भी आती हैं हमें
हम रूमी की बौरायी सी चकरघिन्नियाँ हैं
नटराज की नाभि से फूटा झन-झन करता नाद हैं



दंड

ओ मेरे देश
यदि  इस घोर विपत्ति काल में मेरे मुंह में  छाले पड़ जाएं
और मैं कुछ कह न सकूँ तो तू मुझे दंड देना
मेरे गूंगेपन को इतिहास के चौराहों पर धिक्कारना
ओ मेरी मिट्टी,
मेरे फेफड़ों में भरी हवाओं
और मुझे सींचने वाले जल
इस कठिन समय में मेरे कंठ की तटस्थता पर थूकना 
ओ मेरे मुक्त आकाश,
ओ विनम्र  पेड़ और धधकती  अग्नि शिखाओं,
जीभ में भर आए फोड़ों के लिए मुझे दंड देना 
फांसी से कम तो हरगिज़ नहीं !
इस चालाक चुप्पी के लिए मेरे शव को भी दंड देना
अपनी स्मृतियों में दिन रात कोड़े मारना – आजीवन

आवाज़ दृश्य है
पलकों की ज़िल्द के नीचे ढंकी किताब
छुपा लेना चाहती थी  अपना नाम
आख़िरी पृष्ठ तक पढ़ गयी मैं
बिना कोई क्षेपक लगाए
कोलाहल में भी  आंसुओं को सुन सकती हूँ
मौन में गुनगुना सकती हूँ पीड़ा
मैं छू सकती हूँ आत्मा की ऊपरी त्वचा
आत्मा के नहीं होते हज़ारों महल
उसका घर भुरभुरा है
आधा ही लीपा है मैंने  मिट्टी का
आँगन
रात का कलेजा काट देती हूँ देह की दूरी के राग से
लोहे की आरी पर नाचते हैं मेरे गीत
उत्सव से कम तो हर्गिज़  नहीं है जीवन
दुनिया की किसी पेंटिंग में नहीं दिखाया जा सकता
बर्फ़ीले पर्वतों का पिघलना
न ही किसी पहाड़ी नदी का उमगना
लहरों के सारे चित्र झूठे हैं
दृश्य गल कर कर अदृश्य हो जाते हैं
अदृश्य के जमने पर उमड़ता है आँखों के सामने
एक क्षणभंगुर दृश्य !
उसकी आवाज़ मेरे जीवन का एकमात्र दृश्य है

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मेरा मन था कि बाबुषा पर कुछ अलग से लिखूं . उसे पढ़ना एक ऐसे कीमियागर के पास बैठना है,जो दुःख की मिट्टी उठाता है तो टीस के सारे मुहाने खुल जाते हैं और सुख यहाँ इस तरह आता है जैसे अप्रत्याशित घटना -कि आप चकित हैं और चकित हैं . प्रेम इन कविताओं में संवेदनाओं की परत दर परत खुलता जाता है। मुझे आकर्षित करता है प्रेम का यह स्वरुप -इंद्रजाल में दम साधे का इंतज़ार …
बाबुषा की कविताओं को मैं चुपचाप अपने पास संजो रही थी . पहले वह बरिस्ता जो उनका अपना ब्लॉग था में पोस्ट डालती थीं . अब बरिस्ता खामोश है पर उसकी कई पोस्ट मेरे पास संभली हुई हैं. दूसरे वे अपनी रचनाएँ कहीं भेजती नहीं हैं ..अपने आप में लिखती मिटाती हैं ..उनकी यह स्लेट मेरे हाथ लग गई है ..या कहिये चुरा लायी हूँ .
मैंने उनकी कविताओं को बिना इजाज़त के जानकी पुल के संपादक प्रभात जी के पास भेजा . कविताओं की ज्यामिति ही कुछ ऐसी है कि पहली बार में प्रभात जी को रचनाएँ अच्छी लगीं और उन्होंने इन्हें प्रकाशित करने की सूचना मुझे भेजी . इन कविताओं को हम सब तक बहुत पहले ही आ जाना चाहिए था- अपर्णा मनोज 
=================== 
श्वास-श्वास झंकार
वे दुबके पड़े रहते अपनी उबासियों में
पर उनकी कट्टर निराशाएं चमचमाती
और हम फटेहाल सड़कों पर नृत्य करते
हमारे पाँव की थाप से पृथ्वी थरथराती है
वे पीड़ा से बिलबिलाते हैं
कि जैसे उनकी आत्मा पर ठोंकी गयी हो गहरी कील
जिस पर टंगी है उनकी देह
हमारी आत्माओं में भी कम नहीं गरम चिमटे से पड़े चकत्ते
जले निशानों को पिरो कर हमने बाँध लिए अपने पाँव में घुँघरू
अनंतकाल के गले पर फंसी सुबक हैं उनके भारी कदम
हम  पानी में निरंतर फैलते अमीबा अपने भूत-भविष्य से बेख़बर 
थिरकते झरने की लय पर
उनके  पेट  में कुलबुलाता है नृत्य
वे कस कर बांधते हैं कमरबंद 
उनकी जम्हाइयों से बनी हवा की दीवार
सीलन भरी उनके सामने खड़ी 
हम चिन्दीचोर – से नाचते हैं सड़क पर यूँ कि नाचता है आलम
नाचती है पृथ्वी गोल -गोल दरवेश सी
हम नृत्य से ढंक लेते हैं अपनी देह की नग्नता
हमारी आत्माएं नाचती हैं निर्वस्त्र
हमारे नृत्य पर करते हैं वे विलाप
हम कर सकते हैं उनके विलाप पर दो मिनट का मौन नृत्य
कि विलाप के नृत्य की मुद्राएं भी आती हैं हमें
हम रूमी की बौरायी सी चकरघिन्नियाँ हैं
नटराज की नाभि से फूटा झन-झन करता नाद हैं



दंड

ओ मेरे देश
यदि  इस घोर विपत्ति काल में मेरे मुंह में  छाले पड़ जाएं
और मैं कुछ कह न सकूँ तो तू मुझे दंड देना
मेरे गूंगेपन को इतिहास के चौराहों पर धिक्कारना
ओ मेरी मिट्टी,
मेरे फेफड़ों में भरी हवाओं
और मुझे सींचने वाले जल
इस कठिन समय में मेरे कंठ की तटस्थता पर थूकना 
ओ मेरे मुक्त आकाश,
ओ विनम्र  पेड़ और धधकती  अग्नि शिखाओं,
जीभ में भर आए फोड़ों के लिए मुझे दंड देना 
फांसी से कम तो हरगिज़ नहीं !
इस चालाक चुप्पी के लिए मेरे शव को भी दंड देना
अपनी स्मृतियों में दिन रात कोड़े मारना – आजीवन

आवाज़ दृश्य है
पलकों की ज़िल्द के नीचे ढंकी किताब
छुपा लेना चाहती थी  अपना नाम
आख़िरी पृष्ठ तक पढ़ गयी मैं
बिना कोई क्षेपक लगाए
कोलाहल में भी  आंसुओं को सुन सकती हूँ
मौन में गुनगुना सकती हूँ पीड़ा
मैं छू सकती हूँ आत्मा की ऊपरी त्वचा
आत्मा के नहीं होते हज़ारों महल
उसका घर भुरभुरा है
आधा ही लीपा है मैंने  मिट्टी का आँगन
रात का कलेजा काट देती हूँ देह की दूरी के राग से
लोहे की आरी पर नाचते हैं मेरे गीत
उत्सव से कम तो हर्गिज़  नहीं है जीवन
दुनिया की किसी पेंटिंग में नहीं दिखाया जा सकता
बर्फ़ीले पर्वतों का पिघलना
न ही किसी पहाड़ी नदी का उमगना
लहरों के सारे चित्र झूठे हैं
दृश्य गल कर कर अदृश्य हो जाते हैं
अदृश्य के जमने पर उमड़ता है आँखों के सामने
एक क्षणभंगुर दृश्य !
उसकी आवाज़ मेरे जीवन का एकमात्र दृश्य है

33 thoughts on “उसकी आवाज़ मेरे जीवन का एकमात्र दृश्य है

  1. बहुत कम मिलीं है ऐसी कविताएँ पढ़ने को।ये है साहित्य…जो पढ़ने सोचने और बदलने के लिए बाध्य कर दे।

  2. सच ही तो हैँ।
    सुगंध जब॰जब अपने घरौँदे से उन्मुक्त होती हैँ,तो वह घरौँदे के बाहर की सजीवता को,महक की मोहकता देकर,एक नयी सृजनता देती हैँ।ऐसे ही यह अपने भीतर,हर बार नयी सृजनता को सृजन करती रहती हैँ।और यह मोहकता, जब इस दुनिया मेँ,हम जैसे अनभिज्ञोँ को जान पडती हैँ,तो बस हम जैसोँ के पास मदहोश होने के सिवा कुछ नहीँ बचता।और आपको शुभकामनाएँ देने के सिवा कुछ नहीँ बचता।
    आपको नवीन कवि परिचय कराने पर बधाई।

  3. Gyasu Shaikh said:

    स्तब्ध कर जाती है उनकी कविताएं फिर हमारे
    अस्तित्व का आकाश मौन हो जाए… भर जाते हैं हम,
    सराबोर से। नित नवीन कविताएं उनकी…अजीब सी
    शब्द रचना तिरोहित भावनाओं का हो जैसे आईना।
    एक कविता में भी उन्हें पाया जाए और अनेकों कविताओं
    में भी…जो वो रचे समझो बने समय की एक नई सी स्थाई सी
    पहचान। अनायास सी कविताएं योग्यता से ही आए …
    एक सधी हुई कला दृष्टि और व्यापक जीवन दृष्टि से ।

    ऐसी कविताएं कम ही मिले जैसी होती है बाबूशा की कविताएं…

    डॉ. अनुराग जी की बात से भी पूरी तरह सहमत हूँ …

  4. …….ये कविताएँ नहीं हैं बल्कि एक तिलस्म है, शब्द शब्द जादू है

  5. बाबुषा की छिटपुट चीज़ें किसी ब्लॉग पर पहले पढ़ने का ध्यान है। लेकिन पहली बार इतनी सारी कविताओं से एक साथ रूबरू हुआ। फिर उनका गद्य भी गंभीरता से देखा। वे अपनी पारदर्शी और तरल शैली के साथ अपना लिखा हुआ पढ़ने को मजबूर करती हैं। उन्हें ढेर सारी बधाई और शुभकामनाएं।

  6. नानी की फैली हथेलियों पर खुदा दस्तखत कर रहा था और मैं काजल की डिबिया लेकर उसके पीछे भाग रही थी ..पर नानी कहाँ जा छुपीं ..

    एक कुँए से रूहानियत की आवाज़ आ रही थी ..मैं उसकी जगत पर बैठी रही . मेरे पास जीवन का टेड़ा -मेडा डोल था .एक बलखाई रस्सी थी ..रस्सी से बंधा डोल नाचता हुआ पानी की ज़मीन से टकराया . एक अनजान प्रेमी का दिल था ये कि डोल में बवंडर भर गया ..कुँए को अपने गोल में भरता हुआ जगत के बाहर आ गया …बाबुशा की हथेलियों पर लिखा इसने कि अबोध तू कहाँ भागे जा रही है ..कुँए की पुकार तेरे पैरों की आवाज़ है और ये बवंडर तूने पैदा किया है ….देख बह जायेगी दुनिया और सड़कें अपना बनना भूल जायेंगी ….

    खुशियों से भरा रहे बाबू का दामन . जन्मदिन की शुभकामनाओं के साथ

  7. इतना कुछ खास भी नहीं. बस यूँ ही..मन की मौज में कुछ कागज़ काले किए.
    जानकीपुल,अपर्णा दीदी और दोस्तों,
    शुक्रिया सभी का.

  8. बहुत ही उम्दा कविताएं हैं. खासकर अपने गठन या रचाव में. बाबुशा की कविताएं जिस ढंग से खुद को प्रकट करती हैं, वह पाठक को न सिर्फ चौंकाता है, बल्कि कविता की वैचारिकता के प्रति एक विश्‍वास भी पैदा करता है और उसके पुर्नपाठ के लिए बाध्‍य भी… बधाई – प्रदीप जिलवाने

  9. बाबुशा आप बहुत सुन्दर कविताएें िलखती हैं, मैं आप की कविता पड के अक्क्षर भावुक हाे जा हुं , ऐसा लगता है जाे मे साेच रहा था आप ने वाे ही लिख दिया , आप काे बहुत बहुत शुभकामनाऐ,

    बस ऐसे ही सुन्दर आैर सहज मन से लिखते रहिये…

  10. वाह, यह होती है कविताएं। सहज रूप से लिखी गईं, ग्लेशियर से नदी के निकलने की तरह प्रवाहित। धन्यवाद बाबुषा से परिचय करवाने के लिए। मैंने पहली बार पढ़ा है इनको।

  11. हिंदी ब्लॉग में बहुतेरे ऐसे प्रतिभाशाली लोग है जो छपने वाले कई कवियों लेखको से बेहतर है .बाबुशा उनमे से एक है

  12. babu ki kuch aur kavitayen inse behtar hain.magar yahan bhi unki bhavbhoomi ke kai rang dekhne ko milte hain.prem ki gahrayee wali kavitayen mujhe adhik bhati hain kyonki unmein babu ki shaili anoothi hoti hai.ye kavitayen samaj ke prati dayitv bodh aur lekhan ke abhipray ko darshati hain.

  13. किसी कवि का कहना है: इन उभरते बादलों में बात कुछ तो है। वैसा ही अंदाजेबयॉं बाबूशा में है। वे दिल के हालात को हमेशा नए बिम्‍बों रूपकों उपमानो के साथ बयान करती हैं तो लोग उसे कविता मान लेते हैं। अपर्णा का प्रस्‍तावन भी इन कविताओं पर एक रबर स्‍टैंप की तरह है। बधाई।

  14. babusha ko sadhuvad. sachmuch kavitaye dhadhak rahin hain. jaise jwalamukhi ka lava. babusha ki kavitayon ko aui jagah bhejiye.

  15. यदि इस घोर विपत्ति काल में मेरे मुंह में छाले पड़ जाएं
    और मैं कुछ कह न सकूँ तो तू मुझे दंड देना
    yoon sabhi kavitaen bahut achhi .

  16. Sari kavitayen behtareen hain! Babusha ji ko jahan-jahan padha, kabhi nirasha nahin hui (Na kavita se , na kavayitri se)

  17. Pingback: kojic acid soap
  18. Pingback: u31
  19. Pingback: my sources

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