• Blog
  • विशाखा मुलमुले की कुछ कविताएँ

    विशाखा मुलमुले समकालीन कविता का जाना-पहचाना नाम है। आज उनकी कुछ कविताएँ पढ़िए-
    =================
     
    1 ) जाने तक के लिए
    —————————-
     
    जाने तक के लिए
    फूलों तुम दिखला दो अपनी रंग सुगन्ध
    कपास तुम घेर लो बन के कोमल वसन
    अंत समय तो
    द्वार बंद होंगे नासिका के
    रोमछिद्रों से भी सोखने हेतु कहाँ बहेगा खारा जल
     
    जाने तक के लिए
    रोशनी तुम दिखला दो अपना चंचल नृत्य
    बादल तुम बनो इस रंगमंच के रोशनी व संगीत के निर्देशक
    कभी धूप कभी छांव का खेल खेलो
    कभी गरज बरस के आल्हादित कर दो हृदय का आंगन
    अंत समय तो
    नहीं जान पाएगी आंखें कि
    दिन है , दोपहर है या पास आती सांझ की बेला
    जो नाम सत्य है
    वह गूँज रहा होगा चहुँ ओर
    अभिराम से जीवन में अनसुना रहा जो सत्य
    उस सत्य की ध्वनि तब भी कहाँ सुन सकेंगे कर्ण
     
    जाने तक के लिए
    अग्नि तुम दे दो ताप
    कि पका के अन्न देह की भट्टी जलाये रख सकूँ
    देना इतनी ऊष्मा कि शीत से कांपती देह कुछ क्षण थिर हो सके
    सेंक सकूँ भुट्टे के दाने किसी दिन
    किसी दिन उपवास में बैठूं तो टुंग सकूँ मूंगफली
    तुझे स्मरण करते हुए
    अंत समय तो
    संचित सारा वसा गल जायेगा
    काष्ठ संग देह भी जल जाएगी
    तब कहाँ महसूस होगी अग्नि तेरी ऊर्जा
    अग्नि का गोला फिर दिख सकेगा कहाँ
     
    जाने तक के लिये
    जीवन तुम बहना अपनी धार में
    पंचमहाभूत तुम रहना सतत संग
    पंचामृत का पान करती रहे यह नश्वर देह
    पात्र में पड़ा तुलसी का पत्र अंतिम ग्रास में ही मिले !
     
    2 ) प्रेम गली अति सांकरी
    ——————————–
    हम एक ही शहर में रहते हैं
    हम रोज़ नहीं मिलते हैं
    फिर भी ,
    तुम रहते हो मेरे साथ हर पल
    मैं महसूसती हूँ तुम्हें हर पल
    मेरे चलने , उठने , बैठने में होते हो तुम
    मेरे रुकने , थमने , स्वप्न में होते हो तुम
     
    पर ,
    मैं होना चाहती हूँ वहाँ ; जहाँ तुम हो
    मैं रहना चाहती हूँ वहाँ ; जहाँ तुम हो
    मैं देखना चाहती हूँ तुम घर में किस तरह रहते हो
    घर काम में मदद करते हो या बैठे ही रहते हो
    मैं चाहती हूँ देखना
    तुम्हारी चाय की प्याली का कौन सा है रंग
    तुम्हारे कपड़े पहनने का कैसा है ढंग
     
    क्या तुम हर दिन अख़बार पढ़ते हो ?
    पढ़ते हो तो किस ख़बर को देख थमते हो
    तुम फिल्में – विल्मे भी क्या कभी देखते हो ?
    देखते हुए खुल के हँसते हो
    या आँसूओं को जज्ब करते हो ?
     
    हमारा एक ही शहर है
    पर तुम्हारा मोहल्ला कौन – सा है
    तुम्हारी रहगुज़र का रास्ता कितना संकरा है
    क्या हम दो गली से गुज़र पाएंगे
    या एक होने की उस गली की शर्त निभा पाएंगे
     
    मैं तुम्हारे देखने को देखना चाहती हूँ
    मैं तुम्हारे चलने संग चलना चाहती हूँ
    मैं तुम्हारे होने संग होना चाहती हूँ
    तुम कहो ! क्या यह सब मुमकिन है ?
     
    3 ) टुकड़ा भर आसमान
    ——————————–
    मुझे हासिल टुकड़ा भर आकाश में
    मैंने देखना चाहा सूर्योदय सूर्यास्त
    देखना चाहा चंद्रोदय
    उसकी घटत – बढ़त
     
    चाहत कि ,
    चन्द्र जब सबसे नजदीक हो धरा के
    तब बिन सीढ़ी लगाए छू सकूँ उसे
    न हो तो निहार ही लूँ उसे भर आँख
     
    आस रखी उत्तर में दिख जाए ध्रुव तारा
    सांझ ढले दिख जाए चमकीला शुक्र तारा
    जब कभी बृहस्पति के नज़दीक से गुजरे शनि
    तो देख लूँ उन्हें अपने ही घर की सीध से
     
    कहने को क्षेत्रफल में अलां – फलां स्क्वायर फुट का घर मेरा
    तो हिसाब से उतनी ही बड़ी मिलनी चाहिए थी छत मुझे
    पर महानगर की गुजर – बसर में
    हासिल मुझे खिड़की से दिखता टुकड़ा भर आसमान
     
     
    4 ) संक्रमण काल
    ————————
     
    अब धूप में इतनी तेजी नहीं
    कि वह तपा सके गहराई में छुपे जल का तल
    हाँ , यह रिश्तों के
    शीतकाल का मौसम है
     
    हम जा बैठे हैं
    अपनी – अपनी खोह में , कंदराओं में , गुफाओं में
    बरस भर का दाना समेटे
    वार त्यौहार जश्न मनाकर
    अपने मचान में झालर लगाकर
    दे देते अपने जीवित होने के प्रमाण
     
    पर , देहरी के बाहर रखे दीपक
    अंतस को रोशन करते नहीं
    न ही वे दीप स्तम्भ बन
    ला सकते अंधकार को उजास तक
     
    यह बचाव का मौसम है
    आयतन के हिसाब से
    किसी के पास है डोंगरी
    किसी के पास नाव
    किसी के पास जहाज
    भय सागर में
    अच्छे समय का दूर – दूर तक
    द्वीप दिखता नहीं
    सागर की कोई सीमा भी नहीं
     
    5 ) हाथों में हाथ
    ——————–
     
    तुमनें हाथ से छुड़ाया हाथ
    और हाथ मेरा
    दुआ मांगता आसमां तकता रहा
     
    मुझे नहीं चाहिए अनामिका में
    किसी धातु का कोई छल्ला
    जो दबाव बनाता हो हृदय की रग में
     
    तुम बस मेरी उंगलियों के
    मध्य के खाली स्थान को भर दो
    मेरे हाथ को बेवजह यूँ ही पकड़ लो
     
    ताकि , मैं महसूस कर सकूं
    मुलायम हाथ की मज़बूत पकड़
    कह सकूं ,
    ” दुनिया को तुम्हारे हाथ की तरह
    गर्म और सुन्दर होना चाहिये “
     
    —–
    विशाखा मुलमुले
    vishakhamulmuley@gmail.com
    9511908855
    PUNE

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins