युवा लेखिका प्रकृति करगेती का कहानी संग्रह ‘ठहरे हुए लोग’ जानकी पुल शशिभूषण द्विवेदी स्मृति सम्मान की लांग लिस्ट में शामिल है और अभी हाल में साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार की शॉर्ट लिस्ट में भी उनकी यह किताब शामिल थी। आइये पढ़ते हैं प्रकृति की एक कहानी- मॉडरेटर
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“जब ट्रेन सामने से आ रही थी तब मुझे लगा था कि सब कुछ ख़तम हो जायेगा। ”
“मुझे तो ट्रेन आती हुई दिखी ही नहीं।”
नीले कोट पहना एक आदमी और काली ड्रेस पहनी एक औरत ट्रेन की सामानांतर दौड़ती पटरियों पर चल रहे थे। नीले कोट वाला कुछ दिन पहले पटरियों पर कूद गया था। काली ड्रेस वाली को अपने ऑफिस के लिए हमेशा की तरह एक लम्बे स्काईवॉक से दूसरी तरफ़ जाना था। लेकिन एक दिन उसे आलस आ गया। ट्रेन उस दिन समय पर आई।
“ २११२२ हमेशा देर से आती थी।” उसने नीले कोट वाले को बताया।
“ मेरी न किस्मत ही ख़राब है।” नीले कोट वाले ने अपने कद तक पहुँची घास को नोचते हुए कहा।
“ तुमने तो मरने ही आये थे न।”
“ हाँ। लेकिन मुझे क्या पता था कि कोई और भी मिल जायेगा।”
“ ट्रेन दुर्घटना वालों का पूरा एक समाज है। हम २११२२ वाले हैं।”
“ मैं अकेला रहना चाहता हूँ।”
“ तुम उसके साथ रह सकते हो।”
काली ड्रेस वाली ने दो कटी हुई चलती टाँगों की तरफ़ इशारा किया। वो खेलती कूदती सी पटरियों पर दौड़ रही थीं।
“ वो कौन है ?”
“ आदमी ही है। उसका बाक़ी का हिस्सा ज़िंदा है। टाँगें कट गई थीं।”
“ जिस तरह से चल रहा है लगता है की बहुत चंचल आदमी है। तुम्हारी तरह बहुत बातूनी होगा।”
“ पर बात करेगा कैसे ?”
वो दोनों टांगों के पास पहुँच गए थे। टाँगें उनकी तरफ़ मुड़ी।
“ बोल नहीं सकता है। लेकिन ये मुड़ा कैसे ? कान और आँख भी तो नहीं हैं ”
“ शायद सिक्स्थ सेंस हो।”
“ हम्म्म।”
उन टाँगों के एक पाँव ने दूसरी पाँव के जूते उतारे। फिर मोज़े। नीले कोट वाले ने आँखें बंद कर लीं. जब फिर से खोली तो पाँव की सड़न के अलावा उसे एक और चीज़ ने हैरान किया। पटरी के पास की रेतीली ज़मीन पर उस पाँव ने अपने अँगूठे से एक नाम लिखा था।
“ ये इसका नाम है ?” उसने काली ड्रेस वाली से पूछा।
“ हाँ।” उसने कहा।
नीले कोट वाले ने टाँगों को सम्बोधित कर हेलो कहा। उसे समझ नहीं आया कि वो हेलो बोलते हुए टाँगों को देखें या टाँगों की सीध में रिक्त जगह की तरफ़ जहाँ उसका चेहरा आज भी ज़िंदा होगा।
“ तुम थोड़ा ज़्यादा ऊपर देख रहे हो” लड़की ने कहा।
“ आदमी है। कम से कम ५ फुट ७ इंच का तो रहा ही होगा।” नीले कोट वाले ने जवाब दिया।
“ सिर्फ़ पाँच फ़ीट ।”
“ तुम्हें कैसे पता?”
“ ये मेरे साथ ही पटरियाँ पार कर रहा था।”
“ दोस्त था ?”
“ बॉस था। मतलब है … मतलब पहले था।”
“ बॉस था तो पटरियाँ क्यों पार कर रहा था ?”
“ शादी करना चाहता था मुझसे। हमेशा स्टेशन के बाहर से लिफ़्ट ऑफर करता था। उस दिन मेरे पीछे पीछे ही आ गया।”
“ अगर लिफ़्ट ले लेती तो दोनों ही बच जाते।”
“ फिर ये चेप हो जाता। पीछे पड़ा रहता।”
दोनों ने मुडकर पीछे देखा। टाँगें काली ड्रेस वाली के पीछे पीछे चल रही थीं।
“ अब इतनी गनीमत है कि ये कुछ बोल नहीं सकता।”
“ तुमने शादी क्यों नहीं की ? पैंट और जूते देखकर लग रहा है कि अच्छा ही कमाता होगा।”
“ पर टाँगों को ध्यान से देखो।”
नीले कोट वाले ने ध्यान से देखा। दाईं टाँग ज़मीन से कुछ २ इंच ऊँची उठी हुई थी।
“ इसकी एक टाँग छोटी है। उचक-उचककर चलता था।”
“ हम्म्म। लुक्स से मार खा गए जनाब आप।” नीले कोट वाले ने टाँगों से कहा। फिर काली ड्रेस वाले से कहा,
“ पर तुम भी ऐश्वर्या राय नहीं दिखती।मेरी माँ तो तुम्हारी नाक को पकोड़े जैसी नाक कहती। ”
काली ड्रेस वाली ने गौर किया कि टाँगें रुक गयीं थी। वो फिर से जूते और मोज़े उतारने लगी थीं। काली ड्रेस वाली भी रुक गई। फिर वो झुकी। उसने घाव वाले पाँव पर होंठों से ठंडी हवा की फूक मारी। पाँव की कसी हुई उँगलियाँ ढीली हो गईं। पाँव साँस लेने लगा।
“ ये घाव कैसे लगा ?”
“ इसे बचपन में इन्फेक्शन था। उसी की वजह से टाँग छोटी थी। दवाइयों से इन्फेक्शन कम हो गया। लेकिन गया नहीं। अब तो कटे हुए हिस्से की वजह से और बढ़ गया है शायद।”
“ इसने बताया तुम्हें?”
“ हाँ। ये बताता रहता था। एक बार डिनर के लिए गए थे। मैं तो कलीग समझकर गई थी। इसको डेट लगी। अपनी पूरी जन्मपत्री बता दी।”
सुबह के डेढ़ बज गए थे। स्टेशन पर ज़्यादा भीड़ नहीं थी। रोशनी थी। एक ट्यूबलिघट जलती भुजती हुई हाँफ रही थी। कुत्ते भौंक रहे थे। उनमें से एक कुत्ता, उसी ट्यूबलाइट से गुस्सा जताता हुआ भौंक रहा था। नीले कोट वाले ने ये नज़ारा देखा तो वो हँस दिया।
“ ये रोज़ भौंकता है।” काली ड्रेस वाली ने उसे बताया।
नीले कोट वाले ने सीटी बजाई। कुत्ता सीटी की आवाज़ सुनकर मुड़ गया। वो सूँघता हुआ नीले कोट वाले के बिलकुल पास आ गया। कुत्ते ने ऊपर देखा। उसकी आँखों में कोमलता तैर गई। वो वहीं बैठ गया। अँधेरे में कहीं दूर देखने लगा।
“ मैं इसे जानता हूँ। रोज़ बिस्कुट खिलाता था।” नीले कोट वाले ने कहा।
“ चलो उस दुनिया से कोई तो है जो तुम्हारी आवाज़ सुन सकता है।”
“ पर मैं तो अपनी ही आवाज़ नहीं सुनना चाहता।”
“ मैं चाहती हूँ कि कभी तो वो सुन ले।” ये कहकर काली ड्रेस वाली ने अपनी और प्लेटफार्म की घड़ी देखी। १ बजकर ४० मिनट हो रहे थे। उसने प्लैटफॉर्म से ऊपर जाती सीढ़ियों की तरफ़ देखा। एक काली आकृति बनती हुई दिखी। वो पास आती गई। सीढ़ियों के पास एक रैंप था। वो आकृति रैंप से नीचे आ रही थी। आकृति व्हीलचेयर में बैठे आदमी में बदल गई। नीले कोट ने देखा कि टाँगे व्हीलचेयर की तरफ़ भाग रही थीं। उचक-उचककर। पीछे पीछे काली ड्रेस वाली भी भागी।
“ सुरजीत ! सुरजीत ! सुरजीत !”
नीले कोट वाला भी पीछे पीछे आया। उसने सीटी बजाई तो कुत्ता भी सूँघता हुआ आने लगा।
“ सुनो सुरजीत ! सुनो न।” व्हीलचेयर को बड़ी तेज़ी से प्लेटफॉर्म पर दौड़ाया जा रहा था।
“ ये यहाँ रोज़ आता है ?” हाँफते हुए नीले कोट वाले ने काली ड्रेस वाली से पूछा।
“ हाँ। रोज़ चिल्लाती हूँ। मुझे लगता है उसे आभास होता है।”
“ हाँ। बस आभास होता है। सुनाई नहीं देता। और अच्छा ही है न। ये लोग हमारी आवाज़ सुनकर क्या करेंगे? हम वापस नहीं जाने वाले।”
“ मुझे बस उसे सॉरी बोलना है। मेरी वजह से वो व्हीलचेयर पर है।”
व्हीलचेयर जलती भुजती ट्यूबलाइट के नीचे आ गई। सुरजीत ने एक पीले पन्नों वाला नोटपैड निकाला।
पन्नों के उबड़ खाबड़ आकर देख वो काफ़ी भरा हुआ लग रहा था। फिर एक खाली पन्ने पर वो कुछ उकेरने लगा।
“ ये क्या कर रहा है।” नीले कोट वाले ने पूछा।
“ पता नहीं। लेकिन नोटपैड पहचानती हूँ। मेरे पुराने ऑफिस का है। शायद मेरी ही डेस्क से उठाया हो।”
नीले कोट वाले ने पास जाकर नोटपैड देखा तो हैरान रह गया। वो लगभग खाली सा लगा। बस कुछ काले बिंदु तैरते दिखे।
“ क्या तुम इससे मोर्स कोड में बात कर रही हो ?”
“ नहीं। शायद इसे ऐसा लगता है कि मैं इससे बात कर रही हूँ। लेकिन हमारे पास कहाँ हैं ऐसी शक्तियाँ?”
“ फिर ये लिख क्या रहा है?”
“ क्या पता। कुछ भी हो सकता है। हो सकता है ये रॉ का एजेंट हो। पाकिस्तानी जासूस हो। या फिर पागल हो गया हो।”
सुरजीत ने पूरा पन्ना भर लिया था। फिर नोटपैड बंद कर दिया।
उसने व्हीलचेयर चलाने वाले हेल्पर की तरफ़ देखा। हेल्पर इशारा समझते हुए उसे प्लेटफार्म के ठीक अंत पर ले गया। सुरजीत ने नीचे देखा। पटरियाँ दिखी। उसने अपने कंधे उचकाए। हेल्पर ने इशारा समझते हुए उसे उठाया और व्हीलचेयर को किनारे किया। सुरजीत अब हवा में झूल रहा था। टाँगें प्लेटफॉर्म से उतरकर ठीक उस जगह खड़ी हो गईं जहाँ पर सुरजीत का बाक़ी हिस्सा लटक रहा था। सुरजीत उस क्षण पूरे पाँच फ़ीट का हो गया था।
नीले कोट वाले ने भी उतरकर उसे देखा। सुरजीत कहीं दूर देखता हुआ रो रहा था।
“ ये रोज़ उसी तरफ़ देखता है।” काली ड्रेस वाली ने बताया।
“ एक्सीडेंट वहीं हुआ था ?” नीले कोट वाले ने पूछा।
“ हाँ।”
“ तुम्हें ही देखता होगा।”
“ या फिर अपनी टाँगों को!” काली ड्रेस वाली ने एक पैकेट की तरफ़ इशारा किया। सुरजीत ने उससे जूते निकाले। जो जूते टाँगों ने पहने थे, वो जूते बिलकुल उससे मेल खाते थे।
“ ये एक्सीडेंट वाले जूते हैं।” काली ड्रेस वाली ने बताया।
“ रोज़ लाता है ?”
“ नहीं ,आज पहली बार।”
दोनों ने गौर किया कि सुरजीत को आगे ले जाया जा रहा था। बाहर की दुनिया के लिए वो बिना टांगों के हवा में तैर रहा था । लेकिन नीले कोट और काली ड्रेस वाली के लिए वो पूरा का पूरा सुरजीत था। क्योंकी टाँगें उसके घुटनों से चिपककर चल रही थीं। वो एक पटरी के कोने पर आया। वहाँ उसने जूते रख दिए। थोड़ी देर हाथ बाँधे खड़ा रहा। फिर वापस जाने लगा।
“ ये जूते क्यों छोड़कर जा रहा है ?” नीले कोट वाले ने पूछा। उसे जवाब का इंतज़ार नहीं था।
सुरजीत और उसका हेल्पर रैंप पर चढ़कर ऊपर चले गए।
नीले कोट वाला, काली ड्रेस वाली और सुरजीत की टाँगें अपनी मर्यादा जानती थीं। वो प्लेटफॉर्म से बाहर नहीं गईं। लेकिन फिर सुरजीत की टाँगों को कुछ याद आया। वो भागती हुई पटरियों की तरफ़ गईं। एक छोटी सी काँटेदार दीवार पटरियों को शहर की सड़क से अलग करती थी। उसी सड़क पर सुरजीत ने अपनी कार पार्क की थी। टाँगों के पीछे पीछे चलते नीले कोट और काली ड्रेस वाली भी वहाँ पहुँच गए । व्हीलचेयर में बैठा सुरजीत कार के पास था। वो स्टेशन की तरफ़ देख रहा था। हेल्पर ने दो प्रोस्थेटिक टाँगें कार से निकाली और सुरजीत को पहनाने लगा। प्रोस्थेटिक टाँगें पहनकर जब वो उठा तो पाँच फ़ीट से कुछ लम्बा लगा। सुरजीत की पुरानी टाँगें बेचैनी में उछलने लगीं।
“ इन्हें दिख कैसे रहा है ?” नीले कोट वाले ने पूछा।
“ क्या फ़रक पड़ता है ?” काली ड्रेस ने सिगरेट पीते हुए जवाब दिया।
“ तुम्हारे पास सिगरेट कहाँ से आई ?” नीले कोट वाले ने पूछा। लेकिन फिर ख़ुद ही जवाब दिया,
“क्या फ़रक पड़ता है!” काली ड्रेस वाली ने सिगरेट उसे थमा दी। सुरजीत की टाँगें दूर जा चुकी थीं।
सुरजीत अपनी प्रोस्थेटिक टाँगों से चलता हुआ काँटेदार दीवार की तरफ़ आ रहा था। काली ड्रेस वाली को लगा जैसे उसी के पास आ रहा है। नीले कोट वाला भी थोड़ा दूर होकर देखने लगा जैसे उन दोनों को स्पेस देना ज़रूरी लगा हो। सुरजीत ने अपने हाथ एक गेंदबाज़ की तरह किये और दौड़ता हुआ आया। काल्पनिक गेंद फेंकी और उछलता हुआ चिल्लाया
“ हाउज़ैट !!!!!!”
जैसे वो काल्पनिक गेंद सीधे जाकर काली ड्रेस वाली के माथे पर लगी हो, वो घबरा गई। हड़बड़ी में उसका संतुलन बिगड़ गया। नीले कोट वाले ने उसे संभाला, “ सॉरी बोलकर क्या करोगी? वो कभी माफ़ नहीं करेगा।”
“ चाहे गलती मेरी हो या न हो ?”
“ टच।”
दोनों ने जाते हुए उछलते कूदते सुरजीत को देखा। वो अपनी गाड़ी में बैठा और दूर जाकर ओझल हो गया।
“ जब हम थे तब कितनी सारी संभावनाएं थीं। अब हम इस दशा में जम गए हैं। हम साबुत मरे। और साबुत जम गए। अब हम क्या करेंगे ?” काली ड्रेस वाली ने जलती बुझती ट्यूबलाइट को देखते हुए कहा।
“ जब जीने का मौका था तब जिए नहीं। अब जमने का मौका है। तो….” नीले कोट वाला ये कहकर रुक गया।
“ तो….जमेंगे भी नहीं। फितरत ही यही है।”
नीले कोट वाला ये सुनकर ख़ुश हो गया। वो तुरंत उठा। उसने सीटी बजाई। दूर से कुत्ता भौंकता हुआ आया। जिस तरफ़ नीले कोट वाला भाग रहा था, कुत्ता भी उसी तरफ़ भागने लगा।
“ एक बार स्टेशन पार करके तो देखते हैं। क्या पता कुछ मिल जाए।” वो दौड़ते सीढ़ियों की तरफ़ जा रहा था। काली ड्रेस वाली भी भागती हुई उसकी तरफ़ जाने लगी। और जैसा अपेक्षित था, सुरजीत की टाँगें भी काली ड्रेस वाली के पीछे पीछे भागने लगीं। भागते भागते वो स्टेशन के गेट पर पहुँच गए। लेकिन उन्हें वहाँ टी.टी.इ ने पकड़ लिया।
“ टिकट टिकट टिकट !” उन्हें रोकते हुए उसने कहा।
तीनों हैरान।
“ मुझे तो लगा तुम लोग आओगे ही नहीं। इतना पसंद आ गया क्या ये स्टेशन ? तुमसे पहले वाले सब निकल गए। चलो अब टिकट दिखाओ।”
“ कौनसा टिकट? हम तो मर गए हैं। ” नीले कोट ने पूछा।
“ मरने से पहले जो खरीदा था।”
“ हमें कहीं जाना ही नहीं था। मैं तो बस क्रॉस कर रही थी। और ये भी।” काली ड्रेस वाली ने सुरजीत की टाँगों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा।
“ बिना टिकट के ?”
“ हाँ।”
“ सर ये रहा मेरा टिकट।” नीले कोट वाले ने अपनी जेब से एक प्लेटफॉर्म टिकट निकाला और टी.टी.इ को थमा दिया।
“ देखो! ये होता है अच्छा नागरिक। अब जिस जेब से ये निकाला है उसी जेब से दो हरी पत्तियाँ निकालो और इन टांगों को भी ले जाओ यहाँ से।”
“ और मैं ?” काली ड्रेस वाली ने पूछा।
“ तुम्हें तो कहीं जाना ही नहीं था न।” टी.टी.इ ने मुस्कुराते हुए कहा।
“ टिकट तो इन टांगों के पास भी नहीं था। इन्हें क्यों जाने दे रहे हो ?”
“ मैडम इनकी सड़न देखकर उबकाई आती है।” ये कहकर टी.टी.इ ने अपना पान थूका।
काली ड्रेस वाली ने नीले कोट वाले को उम्मीद भरी नज़रों से देखा। लेकिन नीले कोट वाले ने नज़रें नीचे कर लीं। फिर टाँगों को आगे बढ़ने का इशारा किया और कहा, “ चलें ?”
टाँगें चलने लगीं।
नीले कोट के बिना पीछे मुड़कर जोर से कहा, “ दिल पर मत लेना। मैं बस अकेला रहना चाहता हूँ।”
काली ड्रेस वाली उन्हें जाते हुए देख रही थी।
“मैं तो बस क्रॉस करने आई थी। ट्रैन आती दिखी ही नहीं।” उसने टी.टी.इ से कहा। टी.टी.इ ने डिब्बी से दूसरा पान निकाला और दाढ़ में ठूसते हुए कहा, “ जानता हूँ।” फिर वो आगे निकल गया।
काली ड्रेस वाली प्लेटफॉर्म पर वापस आकर ट्यूबलाइट के नीचे बैठ गई। उसे अचानक हलचल महसूस हुई। उसने देखा तो रैंप की तरफ़ से टाँगें फिसलती हुई नीचे आ रही थीं। काली ड्रेस वाली उठी और उनकी तरफ़ दौड़ती हुई गई। काली ड्रेस वाली अब टाँगों के आमने सामने थीं। टाँगों ने जूते उतारे। काली ड्रेस वाली ने झुककर ऊपर ठंडी हवा की फूक मारी।
“ उसके साथ तुम्हारा मन नहीं लगा न। वो बात ही नहीं करता। अच्छा किया कि आ गए।” काली ड्रेस वाली ने फिर से फूक मारी। उँगलियाँ का कसाव कम हुआ। काली ड्रेस वाली मुस्कुराई। उसने अपने ड्रेस का घेर पकड़ा और घूमने लगी। टाँगें भी नाचने लगीं। उचककर उचककर। काली ड्रेस वाली और टाँगें पूरी रात नाचे। और वो कुत्ता ट्यूबलाइट के नीचे खड़ा भेड़िये की तरह चीखा जैसे वो एक चाँदनी रात हो।


बहुत ही बढ़िया कहानी 🙏!