उर्दू शायरी और पुलिस की अफ़सरी दोनों को बखूबी साधने वाले सुहैब अहमद फ़ारूक़ी कल छप्पन साल के हुए तो उन्होंने अपने अनुभव को लिखकर बयान किया। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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अब_तक_छप्पन:
हज़रात, संलग्न चित्र में, ख़ाकसार, बच्चा पार्टी के साथ अपने छप्पनवें अवतरण दिवस की पूर्वसंध्या पर गाँव में बने नए घरेलू पूल में कूल होना दर्शा रहा हूँ।
मैंने कई बार कहा है कि उपलब्ध साधनों में प्रसन्न रहने का यत्न ही जीवन है और इससे हासिल संतुष्टि ही ज़िंदादिली है।
आपको #हबीब_अमरोहवी साहब का शे’र सुनाता हूँ:-
बेहतर दिनों की आस लगाते हुए ‘हबीब’
हम बेहतरीन दिन भी गँवाते चले गए
साहिबान, 56 साल की उम्र में, मैं ख़ुद को उस ख़ूबसूरत चौराहे पर खड़ा पाता हूँ जहाँ एक तरफ़ ज्ञान का सागर लहराता है और दूसरी ओर शरारतों के झरने झरते हैं। #सुकरात ने कभी कहा था, “The unexamined life is not worth living.” तो मैंने अपने जीवन की गहराई से जाँच की है—और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि यह अब भी मज़े लेने लायक़ है, मतलब शुगर की दवाई के साथ थोड़ी सी मिठाई खा लेना।
एक बात और, अक्सर लोगों से सुना है कि उम्र के साथ समझदारी आती है। सच है। #मार्क_ट्वेन ने भी, शायद मज़ाक में ही, कहा था—”Wrinkles merely indicate where the smiles have been.” लेकिन आपकी मुहब्बतों और दुआओं की वजह से मेरी झुर्रियाँ अभी उभरी नहीं हैं और उम्र की दूसरी पहचान यानी सफ़ेद बाल, अच्छे हेयर कलर की मदद से, मैं बड़ी ख़ूबी से छुपा लेता हूँ। तो उम्र के बढ़ने से आई समझदारी का साथ मेरे साथ ज़्यादा देर नहीं टिकता।
एक और सयाने #एपिक्यूरस ने तो यहां तक कहा था कि असली ख़ुशी दौलत या पैसे में नहीं, बल्कि दोस्ती और छोटी-छोटी खु़शियों में होती है।
56 साल की उम्र में मेरी ख़ुशी भी ऐसी ही चीज़ों में है—एक शुगर-फ्री़ कड़क चाय, बच्चों के साथ लम्बे संवाद, और कभी-कभी दोपहर की नींद लेना, जो मुझे किसी इबादत जैसा सुकून देती है।
उम्र के इस पड़ाव पर आकर मुझे महसूस होता है कि सालगिरह सिर्फ़ समय के गुज़रने की याद नहीं कराती, बल्कि यह हल्की-सी याद-दहानी कराती है कि ज़िंदगी खेलते रहने, सीखते रहने और ख़ुश रहने में ही है।
जैसे #जॉर्ज_बर्नार्ड_शॉ ने कहा—”We don’t stop playing because we grow old; we grow old because we stop playing.”
तो, 56 साल का होना मेरे लिए सिर्फ़ एक संख्या नहीं है। मेरे नज़दीक यह ज़िंदगी के प्रति एक नज़रिया है कि
जिज्ञासु बने रहो, पूरी सकारात्मकता के साथ ख़ुश रहो, और अपनी स्टाइल को बरक़रार रखते हुए नौजवान दिल से बुढ़ापे की ओर क़दम बढ़ाओ।
मैं ख़ुद को याद दिलाता हूँ कि मैं 56 साल की उम्र तक पहुँच चुका हूँ।
दिल में शुक्रगुज़ारी है, दिमाग़ में यादें सारी हैं, और जेब में गोलियाँ (दवाई वाली) भारी हैं।
एक शुगर के लिए, एक ब्लड प्रेशर के लिए—ये गोलियाँ याद दिलाती हैं कि फ़िलॉसफी़ चाहे जितनी भी ऊँचाई छू ले, उसे बायोलॉजी के आगे घुटने टेकने ही पड़ते हैं।
बायोलॉजी से याद आया।पढ़ने के दिनों यानी संघर्ष के दिनों में, जब पैसे कम थे, दिल में हज़ारों ख़्वाहिशें थीं। आज जब पैसा क़रीब हर चाहत पूरी करने को तैयार है, तो लगता है—ख़्वाहिशें ख़ुद ही रिटायर हो गई हैं।
सच में, ज़िंदगी अच्छा मज़ाक करती है।
तो 56 साल के होने पर मैं ख़ुद को सलाम करता हूँ और आशा करता हूँ कि मुझमें इतनी अक़्ल रहे कि ग़लतियों से सीख सकूं, दिल इतना जवान रहे कि उम्मीदें अभी भी ज़िंदा रहें, और इतनी शरारत बची रहे कि बची हुई ज़िंदगी स्टाइल से जी सकूं। यही बातें मेरे इन अश’आर में भी मिलेगी–
ग़मों को चेहरे पे मलने के बाद आई है
कशिश तो उम्र के ढलने के बाद आई है
क़दम संभाल के रखने की ये जो ख़ू है मिरी
हज़ार बार फिसलने के बाद आई है (ख़ू= habit)
दुआओं में याद रखियेगा।


आप की लेखनी आपके दारोगा होने क़े contrary है सुहैब साहब. आपका लिखा पढ कर आनंद आता है और कहने को दिल करता है “वर्दी वाला शायर”. बेहतरीन लेख. अब आपके 57 साल होने का इंतजार