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  • इंस्पेक्टर झेंडे: खाकी की खामोश जीत

    हाल में ही नेटफ़्लिक्स पर फ़िल्म आई है ‘इंस्पेक्टर झेंडे’। इस पर यह सुविचारित टिप्पणी लिखी है वाणी त्रिपाठी टिक्कू ने। वाणी त्रिपाठी टिक्कू रंगमंच और फ़िल्म अभिनेत्री तथा फ़िल्म निर्माता हैं। आप उनकी यह टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर

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    भारतीय अपराध-कथा परंपरा अक्सर अपराधी की चमक-दमक में उलझ जाती है। दरअसल हमारी संस्कृति में ‘रॉबिनहुड’ या ‘मास्टरमाइंड’ अपराधियों का आकर्षण हमेशा से रहा है। चार्ल्स शोभराज, दाऊद इब्राहीम या हाजी मस्तान—ये सब लोककथाओं जैसे चरित्र बन चुके हैं। पर क्या हमने कभी सोचा कि इन अपराधियों को पकड़ने वाले पुलिसकर्मियों के नाम कितने लोगों को याद हैं? नेटफ्लिक्स की फिल्म इंस्पेक्टर झेंडे इसी विस्मृति को तोड़ती है। यह अपराधी के आकर्षण से ज़्यादा, खाकी की खामोश जिद पर रोशनी डालती है।

    70–80 के दशक की मुंबई अपने आप में एक प्रयोगशाला थी। एक ओर यह शहर आर्थिक उदारीकरण से पहले ही अंतरराष्ट्रीय अपराधियों का ठिकाना बन चुका था, तो दूसरी ओर यह आम लोगों की जद्दोजहद का प्रतीक भी था।

    मुंबई के बार, होटल और कैफ़े अपराधियों की ‘सुरक्षा कवच’ थे। एक तरह से यह शहर अपराध और आधुनिकता का संगम था। इस पृष्ठभूमि में इंस्पेक्टर ज़ेंडे की कहानी सामने आती है—एक ऐसा पुलिसकर्मी जो न तो नायकत्व का दंभ भरता है और न ही शहर की अंधेरी चमक से विचलित होता है।

    मनोज बाजपेयी का ज़ेंडे भारतीय पुलिसिंग का वह चेहरा है जो अक्सर कैमरे से बाहर रह जाता है। वे ‘गोलियों की बौछार करने वाले हीरो’ नहीं हैं। उनकी ताक़त है—सूक्ष्म दृष्टि, धैर्य और अविचल जिद।

    यहाँ विश्लेषण ज़रूरी है: भारतीय पुलिस व्यवस्था प्रायः संसाधनों की कमी और राजनीतिक दबावों से जूझती रही है। ऐसे में कोई भी जाँच महज़ तकनीक या बल प्रयोग से पूरी नहीं होती। वह पूरी होती है—बुद्धि, धैर्य और निरंतरता से।

    ज़ेंडे इसी प्रणाली के भीतर खड़ा एक ऐसा चरित्र है जो दिखाता है कि असली ‘पुलिसिंग’ किसे कहते हैं। जिम सर्भ का कार्ल भोजराज अपराध के उस आकर्षण का प्रतीक है जो हमेशा जनता को लुभाता आया है। महंगे कपड़े, चालाक मुस्कान और विदेशी ठाठ—यह अपराधी हमें डराता कम, आकर्षित ज़्यादा करता है।

    पर यही आकर्षण दरअसल भारतीय समाज की एक विडंबना उजागर करता है। हम अपराधी की चकाचौंध में खो जाते हैं, लेकिन अपराध को रोकने वाले की नीरव मेहनत को भूल जाते हैं।

    फिल्म इस बिंदु पर सबसे अधिक रचनात्मक है—यह अपराधी की चमक और पुलिस की खामोशी को एक नैतिक द्वंद्व की तरह हमारे सामने रख देती है।

    बाजपेयी ने ज़ेंडे को ‘थकान’ और ‘जिम्मेदारी’ के बीच के तनाव से गढ़ा है। उनका चेहरा थका हुआ है, आँखें रातों की नींद खो चुकी हैं, लेकिन भीतर कहीं एक ज़िद है—कि यह अपराधी पकड़ा ही जाएगा।

    यह अभिनय किसी व्यक्तिगत नायकत्व की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय पुलिसबल की उस सामूहिक मानसिकता को सामने लाता है जहाँ लाख मुश्किलों के बावजूद ड्यूटी निभाना ही सबसे बड़ी पहचान है।

    निर्देशक चिन्मय मांडलेकर का शिल्प एकदम संतुलित है। उन्होंने जान-बूझकर फिल्म को चमक-दमक से दूर रखा। कैमरा अक्सर गलियों, चाय के ठेलों, और छोटे-से थाने की मेज़ों पर टिका रहता है।

    यह चुनाव महत्वपूर्ण है। अपराध-आधारित सिनेमा में अक्सर भव्यता और ‘स्टाइल’ पर ज़ोर होता है। लेकिन यहाँ साधारणपन ही सबसे बड़ा शिल्प बन जाता है। और यही साधारणपन हमें असाधारण बना हुआ दिखाई देता है।

    अगर गहराई से देखें तो फिल्म अपराधी और पुलिसवाले के बीच की लड़ाई नहीं है। यह दो भारतों की टक्कर है— एक ओर वह भारत जो पश्चिमी ठाठ और दिखावे के बल पर अपराध को भी ‘ग्लैमरस’ बना देता है। दूसरी ओर वह भारत जो खाकी की धूल, पसीने और थकान के बीच भी न्याय की जिद नहीं छोड़ता। यह द्वंद्व आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस दौर में था।

    फिल्म का चरम दृश्य गोवा में आता है। यहाँ गोलीबारी नहीं होती, न ही कोई सिनेमाई विस्फोट। बस खामोशी है—एक पुलिसवाला अपराधी को पकड़ लेता है। यही खामोशी असली विजय है। दरअसल इस फिल्म की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है—वह हमें याद दिलाती है कि नायकत्व हमेशा शोर से नहीं आता। कभी-कभी नायकत्व वही है जो गुमनाम रहता है, लेकिन इतिहास को दिशा दे जाता है।

    इंस्पेक्टर झेंडे भारतीय अपराध-सिनेमा को नया दृष्टिकोण देती है। यह फिल्म अपराधी के आकर्षण से हमें बाहर निकालती है और उस पुलिसिंग की ओर मोड़ती है जो असल में हमारे समाज की रीढ़ है।

    इसमें रचनात्मकता भी है—मुंबई को चरित्र की तरह चित्रित करना, पुलिस की थकान को कविता की तरह बुनना, और अपराधी की चमक को नैतिक प्रश्न बना देना।

    और इसमें विश्लेषण भी है—कि भारतीय समाज किन नायकों को याद रखता है और किन्हें भुला देता है।

    अंततः, यह फिल्म हमें बताती है कि खाकी की खामोश जीत ही असली जीत है।

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