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  • गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘सह-सा’ पर महेश कुमार

    हिन्दी की महत्वपूर्ण लेखिका गीतांजलि श्री का नया उपन्यास आया है ‘सह-सा’। ध्यान रहे कि 2022 में इंटरनेशनल बुकर प्राइज़ के बाद यह उनका पहला उपन्यास है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास पर युवा लेखक महेश कुमार ने बहुत सारगर्भित टिप्पणी की है। पाठ केंद्रित समीक्षा का अच्छा उदाहरण है यह टिप्पणी। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    होने और न होने के बीच ‘जो है’ उसकी उपस्थिति है ‘सह-सा’।

    गीतांजलि श्री का नया उपन्यास है ‘सह-सा’। हिंदी शब्दसागर के अनुसार ‘सहसा’  का अर्थ ‘आकस्मिक’ और ‘अचानक’[1] है। उपन्यास के ब्लर्ब में भी यही लिखा है कि ‘अकस्मातों से बनती व्यापक मानव नियति की कहानी है’। जबकि उपन्यास में घटनाओं की क्रमबद्धता है जिसके पीछे सुनियोजित वैचारिकी है। ब्लर्ब प्रायः पाठकीय दृष्टि को पूर्वाग्रही बना देते हैं और फिर हम उसी नजरिये से पढ़ने लगते हैं।

    शीर्षक ‘सह-सा’ है। यहाँ सह के बाद एक योजक चिन्ह है जिसका प्रचलित ‘सहसा’ शब्द से इतर अर्थ है। हिंदी शब्दसागर ‘सह-सा’ का सत्तावन अलग-अलग अर्थ बताता है। उपन्यास के संदर्भ में जो अर्थ लिया जा सकता है वह है ‘अनेक कार्य साथ होते हुए देखना,  सह अस्तित्व की भावना, संग रहने का भाव, एक साथ रहनेवाला’[2]। सामान्य अर्थ देखें तो यही निकल कर आता है ‘साथ-जैसा’। उपन्यास के विषय और घटनाओं को पढ़ने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि भूलेराम मिसिर के गृहस्थी में एक साथ कई जीवन संदर्भ शामिल हैं और सबका एकदूसरे के साथ सह-अस्तित्व है। चूहों का सरदार बड़कू है, वन-प्रांगण के कबूतर हैं, अम्मा हैं, चिया, प्रेमिला, शंभु और उसकी जिज्जी हैं, बेघरी है और भूले से जुड़े हुए कई लोग हैं।

    उपन्यास चार अध्याय में है:- होना, न होना, अनागत और प्रारब्ध।

    ‘होना’ का संदर्भ सामने से दृश्यमान घटनाओं और पात्रों से है। भूले जी और उनकी गृहस्थी यहाँ सजीव हैं। जीवंतता है। गृहस्थी का पूरा वैभव है। भूलेराम गृहस्थी संभाले हुए हैं। उनके भीतर एक ग्रामीण व्यक्ति का संस्कार है। यही कारण है कि वो तरह-तरह के साग और सब्जी लाने दूर तक चले जाते हैं। सबका बराबर ख्याल रखते हैं। अपने घर के नौकरों के साथ बराबरी का व्यवहार रखते हैं। घरेलू व्यवस्था में एक लोकतांत्रिकता है जहाँ सबके लिए उसके हिसाब से कुछ न कुछ है। एक संतुलन। यह संतुलन इतना सहज है कि बाकियों की नजर में वो ‘खलीहर’ या ‘अदृश्य’ होने लगते हैं। इसका एहसास उनको तब होता है जब एक गौरैया उनके बाँह पर बैठती है और उनकी तरफ देखती नहीं है। वहाँ से उनको अपने ‘न होने’ का एहसास होता है। ‘न होना’ जीवन को रसविहीन बनाता है। भूलेराम यहाँ ‘वापसी’ कहानी के ‘गजोधर बाबू’ जैसे दिखने लगते हैं। अंतर यह है कि गजोधर बाबू परिवार को खटकते हैं और भूलेराम को परिवार नजरअंदाज किए हुए है। गजोधर बाबू वापस काम पर चले जाते हैं और भूलेराम इस जीवन को ही छोड़कर चले जाते हैं।

    उपन्यासकार भूलेराम की ‘वापसी’ कराती हैं। यह वापसी ‘बुजुर्गीयत के वैभव’ की स्थापना के लिए है। परिवार लोकतांत्रिक व्यवस्था की धुरी है। इसे चलाने के लिए परिपक्वता और संतुलित मानसिकता की जरूरत होती है। भूलेराम में यही बात थी। उनके ‘न होने’ से जो अदृश्य था वह सब एकाएक दृश्यमान हो उठता है। व्यवस्था में असंतुलन यह एहसास कराता है कि घर (लोकतंत्र) में परिपक्व ‘बुजुर्ग’ के न होने से असंतुलन किस तरह का ‘खालीपन और अव्यवस्था’ को जन्म देती है। प्रेमिला, चिया, अम्मा, शंभु, वन-प्रांगण के सदस्य सबके दिनचर्या और जीवन असंतुलित हो जाता है। ‘न होना’ इतना प्रासंगिक हो उठता है कि सबके जीवन के केंद्र में ‘भूलेराम की वापसी’ हो जाती है। सब उनके योगदानों की चर्चा करने लग जाते हैं। किस्सों और एहसानों का सिलसिला चल पड़ता है। उपन्यासकार किस्सागोई की शृंखला रचती हैं। इसे पढ़ते हुए मलिक मुहम्मद जायसी की पँक्ति याद आ जाती हैं :-”कोइ न रहा, जग रही कहानी”। लेकिन, कहानियों से व्यवस्था नहीं चलती है। उसे चलाने के लिए निर्णय लेने क्षमता और सबको साथ लेकर आगे बढ़ने का विवेक चाहिए। इसके अभाव में ‘अनागतों’ का सिलसिला शुरू हो जाता है और व्यवस्था भरभरा जाती है।

    भूलेराम के मर जाने के बाद चूहों का अदृश्य जगत सक्रिय हो उठता है। बड़कू चूहा उनका ‘सरदार’ है। चूहों के बीच का ‘भूलेराम’ है। उसके नेतृत्व में चूहों की दुनिया संतुलित और खुशहाल है। वही बताता है कि घर में प्रवेश कैसे करना है, भोजन कैसे प्राप्त करना है, खतरों से कैसे बचना है और वापस सुरक्षित कैसे आना है। अनागतों के इस सिलसिले में ‘सह-सा’ की पूरी व्याख्या है। ‘चूहे’ यहाँ ‘अदृश्य भारत’ के प्रतीक हैं जो तब तक दिखाई नहीं देते जब तक ‘हुड़दंग, हड़ताल, क्रान्ति’ नहीं करते। जब वे काम में जुटे होते हैं वो दिखाई नहीं देते हैं। बड़कू सरदार के नेतृत्व में चूहे (वंचित समूह)  अपनी सहजीविता को क्लेम करते हैं। लेकिन, अतिउत्साह में और नेतृत्व को नजरअंदाज करने के कारण बारिश के पानी में बहकर मर जाते हैं और बचे हुए को बचाने में बड़कू सरदार मर जाता है। परिपक्वता, संयम और नेतृत्व के अभाव में चूहों का संसार असंतुलित होकर बिखर जाता है।  उपन्यासकार कथानक को ‘सस्टेनेबिलिटी’ के सिद्धान्त से जोड़कर चूहों (जन्तु और प्रकृति) की एक चुहलभरी और ‘अदृश्य समूहों’ का एक व्यंग्यात्मक भाषा को रचती हैं । मनुष्य (जो सबल है)  किस तरह इस दुनिया पर (जो सबकी है) कब्जा जमाता जा रहा है और बाकियों को हाशिए पर जाने के लिए मजबूर कर रहा है उसकी अभिव्यक्ति दुख से ज्यादा व्यंग्य के माध्यम से हुई है। उपन्यास में यह एक नवोन्मेष है कि मनुष्यों के साथ जन्तु का भी मानवीकरण करके उसकी एक भाषा रची गयी है। यहाँ दो तरह का प्रयोग है; मनुष्येतर जो भी है उसको भी महत्व देना और एक पात्र से दो तरह का काम लेना। ‘चूहे’ मनुष्येतर भी हैं और प्रतीक के स्तर पर ‘अदृश्य मनुष्यों’ के प्रतिनिधि भी।

    भूलेराम और बड़कू सरदार अपने-अपने परिवार और समूह को संतुलित और संयमित रखने में सक्षम थे। दोनों की दुनिया एक साथ आबाद थी।  ‘कॉमन-मिनिमम अग्रीमेंट’ के तहत दोनों का साहचर्य निभ रहा था। दोनों के जाने के बाद व्यवस्था में अराजकता आ जाती है। भूलेराम का परिवार चूहों को पूरी तरह खत्म करना चाहता है। वन-प्रांगण की भूमि को पक्का कराना चाहता है। दूसरी तरफ चूहे भी वैकल्पिक व्यवस्था, पलायन और अपनी उपस्थिति को क्लेम करने के बारे में विचार कर रहे हैं। दोनों परिवारों का ‘प्रारब्ध’ है ‘बिखराव’ और ‘दिशाहीनता’। इसके मूल में है ‘नेतृत्वकर्ता’ का न होना। एक तरह से यह उपन्यास भिन्न समूहों में ‘नेतृत्वकर्ता के अभाव से उपजे दिशाहीनता’ की कहानी है।

    गीतांजलि श्री का वाक्य विन्यास हिंदी के प्रचलित वाक्य विन्यासों से अलग है। वाक्य विन्यासों के साथ प्रयोग की मदद से वह अपनी भाषा बनाती हैं। एक वाक्य है ‘थकान’। इस शब्द के बाद पूर्ण विराम है। आदमी थकता है तब रुकता है; सुस्ताता है फिर चलता है। उपन्यास में एक शब्द का यह वाक्य इसी थकान को महसूस करने और पाठक को घड़ी भर सुस्ताने के लिए प्रयोग में आया है। उनके यहाँ संज्ञा और सर्वनाम से ज्यादा क्रिया बोलता है। एक वाक्य है “चुप थी। चुप था। चुप थे। चुप हैं।” यहाँ लिंग से लिंग निरपेक्ष तक की क्रिया है। ऐसे वाक्य विन्यासों से जो रोचक और ‘गीतांजलि श्री नुमा हिंदी’ बनाती हैं उससे उनके उपन्यास की पठनीयता बढ़ती भी है और अटकाती भी है। यह उपन्यास रोचक वर्णन के कारण पठनीय बना है। यही पठनीयता इसके संप्रेषण को बाधित भी करती है। ऐसा लगता है कि लेखिका ‘कहने’ के अभाव में अपनी भाषा को ज्यादा ‘बोलने’ में खर्च करती जाती हैं।

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    [1] https://dsal.uchicago.edu/cgi-bin/app/dasa-hindi_query.py?qs=%E0%A4%B8%E0%A4%B9%E0%A4%B8%E0%A4%BE&matchtype=default

     

    [2] https://dsal.uchicago.edu/cgi-bin/app/dasa-hindi_query.py?qs=%E0%A4%B8%E0%A4%B9-%E0%A4%B8%E0%A4%BE&matchtype=default

     

     

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