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  • एकता, संस्कार और प्यार की भाषा है हिंदी: प्रो. योगेश सिंह

    नई दिल्ली, दिल्ली विश्वविद्यालय। विश्वविद्यालय के सर शंकर लाल हॉल में ‘हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय’ “अभिप्रेरणा” कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के तौर पर उपस्थित दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने दीप प्रज्ज्वलन कर समारोह का शुभारंभ किया। अपने संबोधन में उन्होंने हिंदी की सहजता और समाज को जोड़ने की इसकी अद्भुत क्षमता पर विस्तार से चर्चा की।

    व्यवस्थाएं प्रयास करें या न करें , हिंदी बढ़ती रहेगी। कुलपति प्रो. योगेश सिंह ने कहा कि हिंदी जन-जन और मन की भाषा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि हिंदी भाषा के प्रसार के लिए किसी व्यवस्था के सहयोग की आवश्यकता नहीं है, हिंदी अपनी सरलता और व्यापकता के कारण निरंतर आगे बढ़ती रहेगी। कुलपति ने प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और शिक्षा मंत्री का उदाहरण देते हुए कहा कि हिंदी भाषी न होते हुए भी इन व्यक्तित्वों का हिंदी के प्रति अटूट सम्मान हम सबके लिए प्रेरणादायी है।

    मौलिक लेखन की चुनौती और लक्ष्य- प्रो. सिंह ने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा, “जब स्कूली स्तर पर हिंदी अनिवार्य है, तो उच्च शिक्षा में इसे लेकर हिचक क्यों?” उन्होंने निदेशालय को चुनौती देते हुए अगले एक वर्ष में विभिन्न विषयों पर कम से कम 100 मौलिक पुस्तकें तैयार करने का लक्ष्य दिया। उन्होंने तर्क दिया कि एक अच्छा लेखक ही कठिन विषय को रुचिकर बना सकता है और अच्छी किताब लिखना किसी अच्छी फिल्म बनाने जैसा ही कलात्मक कार्य है।

    भाषा से मजबूत होगा समाज – कार्यक्रम की निवेदक और हिंदी माध्यम कार्यवान्यन निदेशालय की निदेशक प्रो. मंजू मुकुल कांबले ने कहा कि समाज को वैचारिक रूप से सशक्त बनाने के लिए भाषा का सशक्त होना प्राथमिक शर्त है। उन्होंने संस्थान के पूर्व निदेशकों के योगदान को याद करते हुए भाषा को साहित्य की सीमाओं से बाहर निकालकर विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भी विस्तारित करने की बात कही।

    इस अवसर पर साउथ कैंपस की निदेशक प्रो. रजनी अब्बी, डीन ऑफ कॉलेजेज प्रो. बलराम पाणी सहित प्रो. सुधा सिंह एवं विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों के प्राचार्यगण , शिक्षक शोधार्थी एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में संयुक्त निदेशक डॉ. सत्यप्रकाश सिंह ने भविष्य में भी ऐसे बौद्धिक विमर्श जारी रखने का आश्वासन दिया।

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