
हिन्दी के पहले समाचार पत्र ‘उदंत मार्तंड’ के दो सौ साल पूर हो रहे हैं. हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा के क्रम में प्रभाष जोशी के साथ यह बातचीत मौजू है. शायद इतने विस्तार से समकालीन हिंदी पत्रकारिता के बारे उनकी यह आखिरी बातचीत है, जो उनके घर पर 15 जून 2008 को हुई थी. 5 नवंबर 2009 को उनका देहांत हो गया. बातचीत की थी अरविंद दास ने। अरविंद दास ने जेएनयू से पत्रकारिता में पीएचडी की है और आजकल वे डीवाई पाटिल इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, पुणे के स्कूल ऑफ मीडिया एंड कम्युनिकेशन स्टडीज में डायरेक्टर-प्रोफेसर हैं। आप यह बातचीत पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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अरविंद दास: हिंदी पत्रकारिता पर भूमंडलीकरण के प्रभाव को किस रूप में देखते हैं?
प्रभाष जोशी: मैं उसको शुभ और अशुभ दोनों मानता हूँ. शुभ इस माने में कि पत्रकारिता जब तक जन-जन की नहीं होगी तब तक पत्रकारिता का मतलब नहीं है. और ग्लोबलाइजेशन ने हिंदी अखबारों को पाठकों तक पहुँचने की मजबूरी पैदा कर दी है. इसके दो कारण हुए. एक तो टीवी आया और टीवी ने तत्काल खबरों का जो ऑल इंडिया मार्केट था उस पर पहला हाथ मार दिया. जो बचा खुचा था वह अखबारों को मिला. अब गाँव-कस्बे और छोटे शहर ऐसी जगह थी जहाँ की खबरें टीवी वाले कवर नहीं करते थे. भारतीय भाषाई अखबारों को लगा कि हमको गाँवों-कस्बों और छोटे शहर में पहुँचना चाहिए. और इसलिए उन्होंने राज्यों में अपने संस्करण खोले. और राज्य का प्रत्येक संस्करण, प्रत्येक जिले के लिए चार पेज का पुल आउट निकाला. चार पेज के पुल आउट में इतनी जगह होती थी कि एक्सीडेंट में भैंस की मरने की खबर भी आप ले सकते थे, और ली जाती है. क्योंकि गाँव, कस्बे और छोटे शहर में टीवी अभी उनके साथ कंपिट नहीं कर रहे है. इसलिए 1991 के बाद राष्ट्रीय कहे जाने वाले अखबार पीछे रह गए और क्षेत्रीय कहे जाने वाले अखबार आगे निकल कर आए.
अरविंद दास: इस परिवर्तन की दिशा क्या रही ?
इन क्षेत्रीय अखबारों का अपने पाठकों और अपने राष्ट्रीय कवरेज, अपने समाज के बारे में बहुत समझदार परिवर्तन हुआ हो ऐसा नहीं है ये सारे अखबार विज्ञापन की स्पेस, सर्कुलेशन की स्पेस के लिए लड़ रहे हैं. हिदी का जो बौद्धिक, सांस्कृतिक और वैचारिक समाज है उसको भी हमें इनकैश करना है इन अखबारों को वो समझ नहीं आता. ये समझते हैं कि संपादकीय को पतला से पतला करने से लोग उसे स्वीकार कर लेगें. लेकिन इतने बड़े हिंदी समाज की बौद्धिक, सांस्कृतिक और वैचारिक जरूरतें इनसे पूरा नहीं होती है. इस कारण जो ग्रोथ हुई हैं वह बहुत लोपसाइडेड हैं. यानी सर्कुलेशन और विज्ञापन के नाते ये अखबार इफिसेंट हुए और तेजी से पहुँचने वाले हैं, लेकिन खबर, राय, विचार दुनिया का तत्व देने में उनको कोई महारत हासिल हुई हो ऐसा आपको नहीं लगेगा.
अरविंद दास: जनसत्ता ने अखबारों की भाषा को एक नय रूप दिया था. वर्तमान में हिंदी अखबारों की जो भाषा है उसके बारे में आपकी क्या राय है?
भूमंडलीकरण के बाद अंग्रेजी का और आज के नए बाजार का का मुख्य केंद्र महानगर होता गया. जितनी भी भारत की बड़ी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं वह मध्यवर्ग को देख रही है जो महानगरों में रहती है और जिनके पास पैसा है, जो इनकी बनाई चीज खरीद सके. इनको लगा कि इन तक पहुँचने के लिए वो हिंदी आप इस्तेमाल करेंगें जो हिंदी बोलने वाले कर रहे हैं. आप देखेगें कि जो हिंदी महानगरों में चलती है वह अखबार इस्तेमाल कर रहे हैं. ये जो अंग्रेजी-हिंदी है वह खरीदारी, लेनदेन काम चलाने के काम आती है लेकिन ये वो हिंदी नहीं है जो आपकी गहरी अनुभूतियों को व्यक्त कर सके. जो गहरे से गहरे विचार को ठीक से प्रकट कर सके. ये वो भाषा नहीं है जिसमें हिंदी समाज की सांस्कृतिकता प्रलक्षित होती हो. ये वो हिंदी है जो ज्यादा से ज्यादा बॉलीवुड को बतलाती है. इसलिए अखबारों और टीवी के भी चार सी प्रमुख हो गए हैं- सिनेमा, क्रिकेट, क्राइम, कॉमेडी. ये चार आप देखें पूरे अखबारों और टीवी पर हैं. अंग्रेजी का दुरुपयोग छोड़ दें तो आज की मीडिया की भाषा पर एक डेफिनेट जनसत्ता का असर है. हमारे इंटरवेंशन से भाषा का उपयोग बदला. भाषा सीधी, अनौपचारिक और लोगों के सरोकार और भावनाओं को ढूंढने वाली बनी. लेकिन हमने उसके लिए बोलियों, लोक साहित्य का इस्तेमाल किया. लेकिन ये लोग अंग्रेजी और बॉलीवुड का इस्तेमाल करते हैं. जो मुहावरा है, बोलने का वह वहीं है जो जनसत्ता ने शुरु की.
अरविंद दास: हिन्दी अखबारों का विस्तार हुआ पर कंटेंट के लिहाज से हिंदी के अखबार क्यों कमजोर हैं?
1983 से 1991 तक सब लोग कोशिश करते थे कि सबको खबर दें सबकी खबर ले’ की नकल करें. भूमंडलीकरण के बाद लेकिन जब बाजार खुला तो दौर मार्केट स्पेस प्राप्त करने की हुई, हिंदी समाज के दिल और दिमाग कैप्चर करने की नहीं हुई. इसलिए चाहे नवभारत टाइम्स हो, दैनिक भास्कर हो या जागरण हो, ये पहले आगे गए और अब हिंदुस्तान ज्वाइन कर रहा है. इनकी सारी मेहनत इस पर थी हमारा विज्ञापन स्पेस कोई ले ना जाए. सर्कुलेशन की एक एक कॉपी के लिए ये लड़ते थे. एक कॉपी के लिए बिस्तर, बाल्टी, कुर्सी दिया जाने लगा. उनका सारा ध्यान विज्ञापन और सर्कुलेशन पर है.
मैं जब भी बाहर छोटे शहरों में जाता हूँ तो मेरे पास नए रिपोर्टर आते हैं. वो कहते हैं कि यदि हमसे कोई एक विज्ञापन प्राप्त कर देने में चूक हो जाए और हमारा कॉम्पिटिटर उसे ले आए तो सबेरे से लेकर रात तक जब तक हम वो विज्ञापन अखबार को पहुँचा नहीं दे देते हैं तब तक दफ्तर से फोन आते हैं, लेकिन यदि हमसे कोई खबर देने में चूक हो जाए तो कभी दफ्तर से कोई फोन पलट नहीं आता है कि खबर क्यों नहीं दी . फिर उन्होंने कहा कि हम अधिकारियों के तारीफ में कोई खबर भेजें तो वो गलतियों समेत वैसी ही छप जाती है. लेकिन अधिकारियों और राजनेताओं के खिलाफ कोई खबर भेजें तो वह उस अखबार में नहीं छपती. इसका मतलब कि आपने रिपोर्टर विज्ञापन और सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए रखें है. खबर छापना है सिर्फ धौंस है. खबर और राय का इस्तेमाल लोगों को शिक्षित करने कि लिए नहीं हो रहा है, बल्कि सर्कुलेशन बढ़ाने और लोगों से विज्ञापन लेने के लिए हो रहा है. मैं रतलाम गया तो एक बड़ा अखबार वालों ने कहा कि आज हमारे यहाँ फलां अखबार का ब्यूरो पाँच लाख में निलाम हुआ. उन्होंने कहा कि रतलाम में जो दफ्तर खोलता है, खबर देने से ज्यादा यहाँ विज्ञापन इकट्ठा करने वाला होता है. रिपोर्टर विज्ञापन ले आते हैं और पैसा खुद रख लेते हैं. तो अखबार ने तय किया कि जो हमारे यहाँ जो पाँच लाख जमा करेगा उसे ही हम ब्यूरो चीफ बनाएँगे. पाँच लाख में जो ब्यूरो नीलाम करेगा वह रिपोर्टर तो नहीं लाएगा! ब्यूरो चीफ चार-पाँच लड़कों को पकड़ लेता है. 3-4 हजार देता है. उनकी कोई ट्रेंनिंग नहीं. कोई पत्रकार की जिम्मेदारी नहीं. ऐसे में वह खबर को वह वस्तु बना कर ही इस्तेमाल करेगा. खबर को वस्तु बनाने और राय को भयादोहन (ब्लैकमेलिंग) का जरिया बनाने का तरीका उन्होंने किया है. ऐसा स्थिति में अखबार को जो विस्तार हुआ है उससे समाज की सही परिस्थिति का ज्ञान नहीं होता है.
अरविंद दास: अखबारों में ‘एडवरटोरियल’ पर जोर बढ़ा है. खबर और विज्ञापन के इस घालमेल को लेकर आप क्या सोचते हैं?
अभी शुरु हुए आईपीएल ने कहा कि हम कवेरज, फोटो के एक्रीडिटेशन का इतना पैसालेंगे. कई एजेंसियों ने कहा कि हम इतना पैसा नहीं देंगे. बॉयकॉट करने की भी बात हुई. टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पेज पर लिखा ‘चूँकि हम उनकी कमाई में योगदान करते हैं तो उन्हें चाहिए हमको उनका इमेज, ब्रांड बनाने का कोई पैसा नहीं चार्ज करें.’ ध्यान दीजिए कि ना तो उन्होंने ये कहा कि हम खेल और खिलाड़ियों को लोगों तक पहुँचाने का पब्लिक सर्विस करते हैं, या लोकहित में काम कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि ये काम हम आपका व्यापार बढ़ाने के लिए कर रहे हैं. यदि आप धन कमाने, व्यापार करने, मुनाफे के पार्टनर हैं तो आप पब्लिक सर्विस और पब्लिक स्पेस पर क्लेम नहीं कर सकते. यानी फॉर ऑल प्रैक्टिकल परपस आप प्रकाशन उद्योग के लोग हैं. आप पत्रकारिता के लोग नहीं है. क्योंकि पत्रकारिता सिर्फ भारत में ही नहीं पूरी दुनिया में लोक हित का काम माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट अखबार के मामलों पर फैसला देता है तो कहता है कि यदि पब्लिक सर्विस में स्टिंग ऑपरेशन करते हैं तो कर सकते हैं. यदि ये पार्टनर हैं तो कभी आप इन पर इंडिपेंडेंट ऑपिनियन के लिए ट्रस्ट नहीं कर सकते हैं. ये तो आईपीएल की बात है. आप देखेंगे कि कोई फिल्म आती है तो क्रेडिट लाइन में आपको कोई ना कोई मीडिया पार्टनर मिल जाएगा. तो जो अखबार या चैनल फिल्म को प्रमोट करने में लगे हैं वह कैसे इंडिपेन्डेंट ओपिनियन फिल्म के बारे में दे सकता है. इसलिए टाइम्स ग्रुप यदि पार्टनर होने का निर्णय लेता है तो कैसे आप उनसे पत्रकारिता की अपेक्षा कर सकते हैं. इसलिए वे पत्रकारिता छोड़ कर मनोरंजन उद्योग में चले गए हैं और मनोरंजन उद्योग से बराबरी की कमाई करना चाहते हैं. इसलिए उनके महानायक अमिताभ बच्चन हैं. ‘सरकार राज’ फिल्म मीडिया पार्टनर का एक उदाहरण है. क्या एक चैनल या न्यूजपेपर का काम फिल्म का प्रमोट करना है? उसका काम नीर क्षीर विवेक से फिल्म के बारे में राय देना है. जिसने पैसे की पार्टनरशिप की उससे आप उम्मीद नहीं कर सकते है. क्रिकेट को उन्होंने बॉलीवुड और खेल का मसाला बनाया है. आईपीएल के खिलाफ कहीं खबर नहीं देखेंगे आप. पूरी दुनिया में पब्लिसिस्ट और जर्नलिस्ट में फर्क होता है! जब चुनाव होता है तो कोई भी उम्मीदवार बिना विज्ञापन के एक पूरा पेज अपने लिए लगातार 20 दिन तक छपवा रहा है. उतना पैसा अखबार को देना पड़ता है उसे. वो पेज जो खबरों का पेज हैं, जिसे हम और आप चुनाव का रिपोर्टिंग मान कर पढ़ रहे हैं दरअसल वह उम्मीदवार का विज्ञापन है. जो खबरों के रूप में छप रहा है जिसे अखबार को पैसा मिल रहा है. 2005-2006 में हम तिलोनिया गए. मैं और अजित भट्टाचार्य. 1 जनवरी के भास्कर अखबार में आखिरी पन्ने में पर पूरे पेज में रिलायंस मोबाइल का विज्ञापन था- अब देश में कहीं भी 1 रुपए में बात की जा सकती है. और यह उस अखबार की पहले पेज की लीड भी वही थी- अब देश में कहीं भी 1 रुपए में बात की जा सकती है. वहाँ को जो संपादक था वह मुझसे मिलने आया उसने बताया कि ‘वह जो विज्ञापन आया था वह इस शर्त पर आया था हम उनको एडिटोरियल सपोर्ट देंगें.’ इसे अंग्रेजी वाले कहते हैं- फेवरेबल एडिटोरियल कंटेंट. यानी आप सिर्फ विज्ञापन ही नहीं छाप रहे हैं, उसके आस पास के स्पेस भी कंट्रोल कर रहे हैं.
अरविंद दास: लेकिन खुले बाजार में प्रतियोगिता से अच्छी चीजें से भी आई है?
मैं नहीं मानता कि कंपटिशन से हर वक्त अच्छी चीज निकल कर आती है. जयपुर में राजस्थान पत्रिका बड़ा प्रतिष्ठित, विश्वनीय अखबार था. उसके बाद भाष्कर वहाँ आया. भास्कर तरह तरह की चीजें छाप कर राजस्थान पत्रिका के बारे में भी खबरें छापना शुरु किया. जब बहुत अधिक हो गया तो पत्रिका भी भास्कर के विरुद्ध खबर छापना शुरु किया. इस तरह से दोनों का लेवल नीचे चला गया. खुले बाजार में सारे अखबार अपना मार्केट शेयर बढ़ाने के लिए दूध को पतला से पतला करने को तैयार हैं. अंग्रेजों का राज के होते हुए भी हिंदी पत्रकारिता में जितनी स्वतंत्र चेतना थी वह 1991 के बाद अंग्रेजी और दुनिया के बाजार में चिल्लर बटोरने का काम कर रही है. क्योंकि उनका सारा मटेरियल जूठन है जो टैबलॉयड अखबार से निकल कर वहाँ आती है. जहाँ आप अपने स्वतंत्र विचार करने को स्वतंत्र नहीं है. जहाँ आप स्वतंत्र बुद्धि को रेहन रखे हुए हैं वहाँ आप अपने लोगों की आकांक्षा को कैसे प्रकट कर सकते हैं. हिंदी पत्र इसलिए चल रहे हैं कि हिंदी वालों का सबसे बड़ा मार्केट है. कोई कंपनी हिंदी वालों तक पहुँचे बिना अपने प्रोडक्ट नहीं बेच सकती है.
अरविंद दास: अखबारों में संपादक की भूमिका कम हुई और ब्रैंड मैनेजरों की भूमिका बढ़ गई है. आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
मैं मानता हूँ कि एक अखबार एक मिल्कियत वाली कंपनी है लेकिन उससे भी ज्यादा वह पब्लिक टस्ट्र है. अखबार मिल्कियत वाली कंपनी के नाते मालिक का और पब्लिक ट्रस्ट के नाते संपादक का होता है. क्योंकि संपादक उस अखबार में पढ़ने वाले के विश्वास का रक्षक बन कर बैठा है. अगर ये विश्वास अखबार और पाठक में नहीं होगा तो पत्रकारिता का अंत निश्चित है, ये मैं निश्चित तौर पर मानता हूँ. यदि अखबार धोखा देने वाला है तो रोज सुबह आप उठ कर क्यों पढ़ेंगे? संपादक नाम की संस्था का क्षरण 1991 से शुरु हुआ. जब मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था भारत में आई तो सबसे पहले टाइम्स ग्रुप के समीर जैन ने दिलीप पडगोनकर को कहा कि आप वहीं कीजिए जो मैनेजर कहते हैं. और मैनेजर और संपादक का पद अदला-बदली किया जा सकता है. इसलिए कई बार उन्होंने पडगोनकर से निमंत्रण पत्र भी लिखबाए. सबसे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया ने संपादक नाम की संस्था को खत्म किया. ये पतन क्यों हुआ ये सोचने की बा है. कोई भी संपादक अखबार नहीं बनाता, बल्कि महान अखबार महान संपादक
बनाते हैं और ऐसे संपादकों को संभव महान मालिक ही बनाते हैं. रामनाथ जैसे संपादक की वजह से ही हम इमरजेंसी से लड़ सके थे. जो मार्केट में शेयर प्राप्त करने के चक्कर में ट्रस्ट का ध्यान नहीं रख रहे हैं जल्दी कीमत चुकाएंगे.
(यह बातचीत लेखक की शोध किताब ‘हिंदी में समाचार’, अंतिका प्रकाशन, 2013 में संकलित है).

