
प्रसिद्ध लेखक और राजनयिक अभय के की किताब ‘नालंदा: विश्व चेतना का उद्गम स्थल’ नालंदा को लेकर लिखी गई एक प्रामाणिक पुस्तक है। पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित इस किताब पर यह टिप्पणी लिखी है युवा लेखक अभिषेक कुमार अम्बर ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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नालंदा, यह शब्द सुनते ही मस्तिष्क में एक आकृति उभरती है नालंदा विश्वविद्यालय की और याद आते है महात्मा बुद्ध एवं उनका दर्शन और उसके बाद याद आता है नालंदा को नष्ट करता बख़्तियार खिलजी। बस यह तीन दृश्य ही यकायक सामने आते हैं। हम में से अधिकांश साहित्य के विद्यार्थियों का इतिहास से इतना ही नाता होता है। पिछले दिनों जब अभय के. द्वारा लिखित पुस्तक “नालंदा : विश्व चेतना का उद्गम स्थल’ पढ़ी तो नालंदा के समृद्ध इतिहास से वाक़िफ़ हुआ। नालंदा पर यह हिन्दी में एक मुकम्मल किताब है जिसको पढ़कर नालंदा का इतिहास, भूगोल, सामाजिक व्यवस्था, रहन-सहन एवं पठन-पाठन की परंपराओं को जाना जा सकता है।
सम्राट अशोक ने जब तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में भगवान बुद्ध को समर्पित एक स्तूप का निर्माण कराया तो उसके साथ ही एक विहार की स्थापना की। जो आगे चलकर सम्पूर्ण विश्व में नालंदा महाविहार के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहाँ आचार्य नागार्जुन, वसुबंधु, शांतरक्षित, आर्यभट और कमलशिल आदि ज्ञान के ज्योतिपुंज थे। नालंदा में ही महायान बौद्ध दर्शन, माध्यमक एवं योगाचार का विकास हुआ। आचार्य नागार्जुन ने प्रज्ञापारमिता वज्र विच्छेदिका नामक सूत्र की रचना की। जिसे दुनिया की पहली मुद्रित पुस्तक ‘दी डायमंड सूत्र’ के नाम से जाना जाता है।
नालंदा, मगध साम्राज्य के राजगृह का एक उपनगर था। महापरिनिर्वाण सूत्र में बुद्ध के समय राजगृह को एक महान शहर के रूप में वर्णित किया गया है। यह व्यापार का एक प्रमुख केंद्र था। मगध पर उस समय हर्यंक वंश के बिंबिसार का शासन था। ज्ञानप्राप्ति के पश्चात बिंबिसार ने राजगृह में गौतम बुद्ध का भव्य स्वागत किया एवं बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। बुद्ध को उन्होंने भेंट स्वरूप वेणुवन दिया। राजगृह में यह वन बुद्ध का निवास स्थान बना। गौरतलब है कि बुद्ध के जीवन की अंतिम यात्रा भी राजगृह से ही प्रारंभ हुई।
गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पश्चात् अजातशत्रु के संरक्षण में वेणुवन के पास सप्तपर्णी की गुफ़ा में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता महाकश्यप ने की। अजातशत्रु ने राजगृह में दो स्तूपों का निर्माण करवाया। एक गौतम बुद्ध के अवशेषों पर तो दूसरा उनके शिष्य आनन्द के अवशेषों पर। आगे चलकर अशोक ने प्रथम स्तूप को खुदवाकर गौतम बुद्ध के अवशेष बाहर निकाले तथा 84000 स्तूपों में उन्हें स्थापित किया। इन्हीं में से एक स्तूप नालंदा में है। नालंदा महाविहार की प्रामाणिक जानकारी हमें चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के यात्रा विवरणों से मिलती है। 1811-12 में फ्रांसिस बुकानन हैमिल्टन ने नालंदा के बरगांव से हिन्दू तथा बौद्ध मूर्तियां प्राप्त कीं। 1847 में मारख़म किट्टो ने नालंदा महाविहार के अवशेषों एवं इस स्थल के मध्य संबंध स्थापित किया। जब 1853 में स्टैनिस्लास जूलिएन ने ह्वेन त्सांग की पुस्तक का फ्रेंच भाषा में अनुवाद ‘द टैंग रिकॉर्ड ऑन द वेस्टर्न रीजन’ प्रकाशित किया तो हिंदुस्तान में नालंदा की खोज में रुचि लेने वाले अलेक्जेंडर कनिंघम जैसे लोगों की काफ़ी सहायता की। इस पुस्तक के सटीक वर्णनों का प्रयोग करके नालंदा महाविहार के स्थलों की सही पहचान कर ली गई।
नालंदा जैसे महान विहार को संचालन बिना किसी राजसी संरक्षण के संभव नहीं था। पुरातात्विक स्रोतों से पता चलता है कि शक्रादित्य, वज्र, बुधगुप्त, तथागतगुप्त, बालादित्य एवं हर्षवर्धन आदि शासकों ने नालंदा को संरक्षण प्रदान किया। ह्वेन त्सांग लिखते हैं कि अकेले हर्ष ने 100 गाँवों की आय महाविहार को दान दी थी। इत्सिंग के समय में यह संख्या बढ़कर 200 हो गई थी। बंगाल का पाल वंश नालंदा के बड़े संरक्षकों में से एक था। सुमात्रा के राजा बालपुत्रदेव के राजदूत के अनुरोध पर पाल शासक देवपालदेव ने पाँच गाँव सुमात्रा की ओर से नालंदा को दान दिए थे।
नालंदा का जितना संबंध गौतम बुद्ध से था उतना ही उनके शिष्य मौद्गल्यायन एवं शारिपुत्र से रहा। दोनों का जन्म नालंदा में हुआ। ‘कोलिता’ जिन्हें मौद्गल्यायन के नाम से जाना जाता है, का जन्म कुलिता (वर्तमान में जगदीशपुर) गाँव में हुआ। यह बुद्ध से पूर्व संजय बेलठीपुत्त के शिष्य थे। दोनों इनके उपदेशों से असंतुष्ट थे। दोनों इस शर्त पर सत्य की खोज में भिन्न-भिन्न रास्तों पर निकले कि जिसे पहले ज्ञान प्राप्त हो जाएगा वह दूसरे को सूचित कर देगा। एक दिन शारिपुत्र ने बुद्ध के पाँच शिष्यों में से एक अश्वजीत को उपदेश देते देखा। उनके शब्दों को सुनकर शारिपुत्र को सोतापन्न (प्रथम ज्ञान अवस्था) प्राप्त हुआ और फिर उन्होंने मौद्गल्यायन को यह ज्ञान प्रदान किया। आगे चलकर यह दोनों शिष्य बुद्ध के दाएँ (मौद्गल्यायन) और बाएँ (शारिपुत्र) हाथ बने। धर्मसेनापति की उपाधि से विभूषित शारिपुत्र द्वारा ही बौद्ध संघ का संचालन किया जाता था। संघ के नियमों की स्थापना भी शारिपुत्र ने ही की एवं त्रिपिटक के अभिधम्म पिटक का संकलन का दायित्व भी निभाया। गौतम बुद्ध ने अपने पुत्र राहुल को दीक्षित करने का दायित्व भी शारिपुत्र को ही सौंपा।
वहीं मौद्गल्यायन के सम्मान में गौतम बुद्ध ने वेणुवन के द्वार पर भवचक्र चिन्हित करवाया था, जो आज सम्पूर्ण एशिया में बौद्ध धर्म का एक पवित्र प्रतीक है। मौद्गल्यायन ने ही सर्वप्रथम उदयन बुद्ध प्रतिमा का निर्माण किया था जिसमें बुद्ध के 32 महापुरुष लक्षणों को दर्शाया गया था।
ह्वेन त्सांग लिखते हैं कि बुद्ध पूर्व जन्म में नालंदा राज्य के शासक थे। जीवों के प्रति करुणा एवं अनुराग के कारण उन्हें ‘शी वू यान’ यानी ‘दान में अतृप्त’ कहा जाने लगा। गौरतलब है कि चीन के तांग वंशी, नालंदा के चीनी नाम हेतु ‘शी वू यान’ शब्द का ही प्रयोग करते हैं।
कहा जाता है कि जिस भूमि पर नालंदा महाविहार की स्थापना हुई वहाँ कभी आम के बाग़ हुआ करते थे जिनके बीच एक तालाब था एवं उसमें ‘नालंदा’ नामक एक नाग का वास था। और उसी के नाम पर इस स्थान का नाम नालंदा पड़ा।
नालंदा में प्रतिवर्ष सैकड़ों विदेशी अध्येता अध्ययन हेतु आते थे। ह्वेन त्सांग एवं इत्सिंग के बीच 40 वर्षोँ की अवधि में ही 56 चीनी यात्रियों ने नालंदा का दौरा क़िया। इनमें फ़ाहियान, ह्वेन त्सांग, इत्सिंग नामक चीनी यात्री सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। नालंदा में महायान तथा 18 संप्रदायों का अध्ययन कराया जाता था। इसके अलावा वेद, हेतुविद्या, शब्दविद्या, चिकित्सा, तांत्रिक ग्रंथ, संख्या आदि भी पढ़ाए जाते थे। बौद्ध धर्म की वज्रयान शाखा भी इधर फली-फूली तथा 84 सिद्धों में से बहुत से सिद्धों की कर्मभूमि भी इधर रही।
नालंदा की प्रवेश प्रक्रिया को लेकर कहा जाता है कि यहाँ का द्वारपंडित प्रवेश के इच्छुक विद्यार्थियों से वाद-विवाद करता। जो विजित होते उन्हें महाविहार में प्रवेश दिया जाता तथा बाकियों को लौटा दिया जाता था। ह्वेन त्सांग लिखते हैं कि प्रत्येक 10 विद्यार्थियों में से केवल दो या तीन प्रवेश पाते, जो प्राचीन तथा नवीन ज्ञान में पारंगत होते। फिर भी नालंदा विहार के विद्यार्थियों की संख्या सदैव 10000 तक होती। इनमें 1000 भिक्षु 20 ग्रंथ, 500 भिक्षु 30 ग्रंथ तथा 10 महान आचार्य 50 ग्रंथों की व्याख्या करने में निपुण होते थे। इत्सिंग के समय तक यह संख्या घट कर 3000 से कुछ अधिक थी।
नालंदा महाविहार के अध्येता दुनिया भर में महान विद्वानों, दार्शनिकों, अनुवादकों, गणितज्ञों एवं खगोलशास्त्रियों में गिने जाते हैं। यहाँ शून्यवाद की माध्यमिक दर्शन प्रणाली के प्रतिपादक नागार्जुन, योगाचार दर्शन के संस्थापक असंग- सह-संस्थापक वसुबंधु, भारतीय गणित के जनक आर्यभट, बौद्ध तर्कशास्त्र के संस्थापक दिङ्नाग तथा वल्लभी विहार के संस्थापक स्थिरमति आदि विद्वान हुए। जिनकी छत्रछाया में छात्रों को अध्ययन करने का अवसर प्राप्त होता था।
नालंदा के विदेशी विद्वानों की संख्या भी कम नहीं, वे जहाँ भी गए उन्होंने नालंदा के छात्र होने के कारण सम्मान पाया। ह्वेन त्सांग इनमें सबसे प्रमुख हैं जो सत्ताईस वर्ष की आयु में भारत आए। नालंदा में सम्मान के साथ उनका स्वागत हुआ। यहाँ उन्हें विशेष सुविधाएं प्राप्त थीं। उन्हें घुमाने के लिए एक हाथी का प्रबंध किया गया था। नालन्दा में केवल 10 विद्वानों को यह सुविधा प्राप्त होती थी। ह्वेन त्सांग 657 पवित्र ग्रंथों को भारत से चीन लेकर गए। इन्होंने भारत के भूगोल, माप प्रणाली, जीवन, वास्तुकला, वर्ण व्यवस्था आदि का विवरण अपनी किताब में दिया है।
तिब्बती विद्वान थोन्मि संभोट, ह्वेन त्सांग के नालंदा आगमन के समय यहाँ अध्ययनरत थे। सर्वप्रथम यह बौद्ध ग्रंथों को तिब्बत ले कर गए। इन्होंने तिब्बती भाषा के लिए गुप्त ब्राह्मी लिपि पर आधारित लिपि विकसित की।
नालंदा महाविहार में आने वाले अंतिम विदेशी विद्वान धर्मस्वामिन थे। इनके आगमन के समय बौद्ध स्थलों का विध्वंस हो चुका था। नालंदा अपने पतन पर था। नालंदा के प्रधान राहुल श्रीभद्र उस समय 90 वर्ष की अवस्था में थे। तथा स्थानीय राजा बुद्धसेन की आर्थिक सहायता से नालंदा किसी तरह कार्यरत था।
नालंदा के विध्वंस के कारणों में मुस्लिम आक्रमणकारियों का आगमन, राजसी संरक्षण का निरंतर समाप्त होते जाना, बौद्धों में सामूहिकता की कमी तथा आंतरिक संघर्ष को माना जाता है। कारण जो भी रहे हों भारत ने नालंदा महाविहार के समय शिक्षा का एक स्वर्ण युग देखा है। जब पठन-पाठन हमारे जीवन का अहम हिस्सा थे तथा दुनिया भर के विद्वान आकर्षित होकर यहाँ अध्ययन हेतु आते थे।
अभय के. की पुस्तक ‘नालंदा: विश्व चेतना का उद्गम स्थल’ हमें यह विचारने मजबूर करती है कि नालंदा महाविहार का सम्पूर्ण अध्ययन करके हम अपने अतीत से क्या सीख ले सकते हैं। कौन से ऐसे तरीके हैं जिनको अपनी शिक्षा व्यवस्था में अपना कर गुणवत्ता लाई जा सकती है। तथा नालंदा के नष्ट होने के कारणों का अध्ययन करके हम भविष्य के लिए सबक़ लें। हमें वर्तमान में नालंदा जैसे विश्वविद्यालय की बहुत आवश्यकता है। यह किताब उसी आवश्यकता के महत्व को समझने के लिए एक ज़रूरी क़दम है।
– अभिषेक कुमार अम्बर

