वरिष्ठ लेखिका मृणाल पाण्डे के साहित्य से हम बहुत अच्छे से परिचित हैं। उनके लेखन के रेंज से भी। अब उन्होंने अपने जीवन की कहानी लिखनी शुरू की है। उसकी पहली प्रस्तुत है। अगले सप्ताह इसकी अगली कड़ी का इंतज़ार कीजिए। फ़िलहाल पहली कड़ी पढ़िए- मॉडरेटर
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जब हितैषी, पाठक और प्रकाशक सब अपनी अपनी तरह से कहने लगें, मृणाल जी, अब आप अपनी कथा लिख ही डालें, तो लेखक का मन एक साथ रोमांच और असमंजस महसूस करता है। वजह यह कि विद्वत्ता सेंत-मेत में तो हाथ लगती नहीं। संस्कृत का एक शब्द है विदग्ध। आजकल यह अक्सर विद्वानों के लिये बतौर विशेषण उपयोग किया जाता है। पर अपने मूल में दईमारे शब्द विदग्ध का मतलब है जीवन की आंच से जल जल (दग्ध हो) कर भली तरह से पक्का पोढा बना मनुष्य।
कौन है ऐसा? द्रौपदी का विदग्ध मन, किरातार्जुनीयम् में तंज़ करता है:
भवाद्रेषु प्रमदाजनोदित्भवत्यधिक्षप इवानुशासनम्।
तथापि वक्तुं व्यवसाययन्ति मान्निरस्तनारीसमयादुराधय।।
‘आप जैसे विद्वानों को, जिन्होने महिलाओं के लिये शालीनता का भारी भरकम अनुशासन रच रखा है, मेरे बोल उपहास लायक लगेंगे। फिर भी कभी कुछ कहने की बारी मिली तो, हमारी गहरी व्यथा हम जैसियों को खुल कर बोलने को प्रेरित करती है।’
दूसरे विदग्ध हैं, कवि और चतुर व्यापारी बनारसी दास। राजनैतिक हलचल भरी अठारहवीं सदी के भारत की महाजनी गलियों में घूमते हुए उन्होंने जितना मुनाफा कमाया उससे ज़्यादा वे अनदेखी अनसुनी कथाएँ भी जिनको अपनी आत्मकथा ‘अर्धकथानक’ में कह दिया और कई बार भरी सभा में भी।
‘..भाखै अकथ कथा बिरतांत। ठानै नृत्य पाई एकांत।।
अनदेखी, अनसुनी बनाई। कुकथा कहै सभा मंहि आई।।..’.
और जो सूछम दसा अनंत. ताकी गति जानै भगवंत…
एक जीव की एक दिन, दसा होहि जेतीक.
सो कहि सकै न केवली, जानै जद्यपि ठीक।।…
आगै जो कछु होइगी और। तैसी समुझेंगे तिस ठौर।।
(भाखा अकथ कथावृत्तांत, किया नृत्य पाय एकांत।।
अनदेखी अनसुनी बनाई, कुकथा कही सभा में आई।।…
एक जीव की एक दिन में दशा होय जै भांति,
कह न सके कैवल्यप्राप्त भी, जानै यद्यपि ठीक।।…
आगे जो कुछ होयगी और, समझें उसे पहुंच उस ठौर।।)
-(1641 ई. में बनारसीदास की आत्मकथा ‘अर्धकथानक’ से)
सो सोचा, कभी हमहूं काहे न पाय एकांत, भाखें अकथ कथा वृत्तांत? अपने जीवन जगत का अर्धकथानक।
पर विदग्ध पुरुष की तुलना में औरत का लिखा-कहा संदर्भ में सही तरह समझने और सहने लायक कितना विवेक, धीरज या उदारता हमारे आज के पाठकों या प्रकाशक समाज में है? यह अभी साफ नहीं।
अब वृत्तांत लिखने बैठो, तो सबसे पहले लिखित परंपरा के वे तर्क घेरते हैं जिनके हिसाब से ‘’कालो न याति वयमेव याता:’’, काल न आता है, न जाता है। हमीं बीतते जाते हैं। सो अपने जिये काल के टुकड़ों से चिंदी-चिंदी हो चुकी स्मृतियाँ बीन कर उनको धो कर धुन कर झीनी झीनी चादर बुनना बिना नोट्स या डायरी के, यह क्या संभव है?
पर जैसी भी हो, स्मृति ही तो लेखक के लिये देखे सुने का इकलौता माप हैं, जैसे संगीतकार के लिये लय। निरंतर और क्षणजीवी स्मृतियों की लय ही सर्जना की तमाम नई संभावनाओं को जगाती हैं। माटी के लोंदे जैसी अनगढ और तनिक हाथ फिसला तो बिखरूं-बिखरूं करने वाली बीते समय की स्मृतियाँ ही तो कथाएँ बन कर हमारे समय को बार बार नये कोणों से ज़िंदा करती हैं।
लेखन के चाक पर बैठे हर शिष्य को गुरु चाहिये जो आखिरकार यक्षरूपधारी मन में छुपे मिले। वह यक्ष मन जब जब लिखने बैठती हूं, तब तब एक कुशल कुम्हार की तरह गिन गिन कर रचना खोट काढता है पर फिर भी वह गुरु ठहरा। भीतर-भीतर उसके कुशल हाथों ने ही तो मुझे अनगढ़ आख्यानों को समय के चाक पर जतन से आकार देना भी सिखलाया।
तन्मेमनो शिवसंकल्पमस्तु।
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जीवन के अंतिम सालों में मेरे पास न कोई पुराना पुश्तैनी घर है, न ही सेंत कर रखे गये पुराने उपादान और पुरखों के समय की लायब्रेरी। मेरा जीवन ‘बार बार आती है मुझको मधुर याद..’ किस्म का विगत भी नहीं। कम से कम मेरे लिये तो। मेरा जो जिसे भाया उसे यथासंभव उठा कर और न भाया तो चार उल्टी-सीधी बातें सुना कर जवाब पाने से पहले जो चलते बने, कई हैं। अपना कहने को बचा है बस एक यही अंतर्तम में बैठा यक्ष। मेरे प्रवास, वनवास और पुनर्प्रवास की कथाओं का साखी।
मैं माँ की पहली संतान, उसके मायके ओरछा के राजभवन में जन्मी। पर लडकी? वह भी दूसरी? अनाहूत| अवांछित।
सुना सुना कर बाद तक आंसू पोछे जाते रहे, देखो इन्हीं राजमहलों में पली बेचारी गौरा का नसीब। शांतिनिकेतन से बीए किया। तब तक बाप गुज़र चुके थे कई बेटियों की विधवा माँ को जल्द हाथ पीले करने थे, सो सद्यमृत पत्नीवाले विधुर से ब्याही गई और माँग में सिंदूर गले में मंगलसूत्र पड़ते ही एक बेटी की विमाता बनी। अब साल भर में यह एक और गोद में। ‘अरे दूसरी की बेटी पालना अपनी हथेली का माँस खाने सरीखा है, हाँ नहीं तो।’
अक्सर सुनती बड़ी हुईं बड़ी बहन बीनू और मैं।
भारतीय परिवारों में जब तब कथित हितैषियों द्वारा हर सुखद मौके पर अनेक करुण प्रसंग पिता की तरक्की और लेखन में माँ की अदम्य सफलता के बाद भी जानबूझ कर उठाये जाते रहे। स्कूली पढाई पूरी होते-होते मन जान गया कि असल मंशा संवेदना जताने की नहीं, वे घाव कुरेदने की होती है। जो गौरा के विमाता बन कर भी तीन बेटियों के बाद बेटा पैदा कर पंत कुल की वंश बेलि को बचाने और सफल लेखिका बन कर उभरने से निरंतर खाद पानी पाता रहा।
आज मेरी लेखनी अपने जीवन के अंतिम दशक में वह सब उपनिषदों के दो सिर वाले पक्षी की तरह देख रही है। एक सर जो सब कुछ भोग रहा है, दूसरा वह, जो तटस्थ दृष्टा बन कर निर्वेदभाव से उसको सतत दर्ज कर रहा है।
कालो ह्ययं निरवधि विपुला च पृथ्वी।



