नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है?

संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी ने आज अपने स्तम्भ ‘जनहित में जारी, सब पर भारी’ में बाल साहित्य की ऐतिहासिकता और समकालीन संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता पर यह सुंदर टिप्पणी लिखी है। वाणी त्रिपाठी ने बच्चों के लिए ‘Why Can’t Elephants be Red?’ नाम से पुस्तक लिखी थी, जिसका हिन्दी अनुवाद हाल में ही प्रकाशित हुआ है ‘क्यों नहीं हो सकते हाथी लाल?’ वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का सरस अनुवाद किया है अदिति माहेश्वरी गोयल ने। आप यह लेख पढ़िए और सोचिए कि बच्चों के लिए क्या लिखा जाना चाहिये, किस तरह लिखा जाना चाहिये- मॉडरेटर 

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प्राचीन काल से ही भारतीय साहित्य में बाल साहित्य और मुख्यधारा साहित्य के पृथक्करण का एक भ्रामक विचार विद्यमान रहा है। यदि हम भारतीय साहित्य, विशेषतः संस्कृत और हिंदी के प्राचीन साहित्य का विश्लेषण करें, तो स्पष्ट होगा कि अधिकांश लोक कथाएँ, दंत कथाएँ और जातक कथाएँ बच्चों के लिए लिखी गई थीं, परंतु ये सामाजिक परिवर्तन और समाज को संदेश देने की प्रक्रिया का भी अभिन्न अंग थीं। अतः, बाल साहित्य को मुख्यधारा साहित्य से अलग करना हमारी सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टि से अनुचित होगा और हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं से विचलन होगा।

वर्तमान संदर्भ में बाल साहित्य और बच्चों के लिए लिखी जाने वाली पुस्तकों पर विचार करें।  प्रमुख समस्या यह है कि वयस्क मस्तिष्क अपने बचपन को याद रखने की क्षमता से कोसों दूर है।  वास्तव में, बचपन में हमें शीघ्र वयस्क होने और बड़े होने का दबाव डाला जाता है, जिससे… बड़ों की तरह सोचना है। और उस आपाधापी में सबसे बड़ी विसंगति जो उत्पन्न होती है वह? ये होता है, न तो हम बच्चे रह जाते हैं और न हम ठीक से बड़े हो पाते हैं। उदाहरणार्थ, जो सबसे बड़ा संकट हमारी शिक्षा प्रणाली में है। वह ये है के या तो हम रट कर पढ़ने को पढ़ना मानते हैं। हमारे समग्र विकास को बढ़ावा देने वाली शिक्षा प्रणाली के बारे में हमारी सोच सीमित है; परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना और ग्रेड ही केंद्र बिंदु बन गया है। यह प्रभाव हमारे बच्चों के लिए रचित साहित्य, नाट्य कृतियों और वर्तमान में प्रचलित सामग्री पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।

लगभग तीन दशक पूर्व, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की थिएटर शिक्षा कंपनी ने बैरी जॉन जैसे संवेदनशील निर्देशक के नेतृत्व में एक अभिनव प्रयोग आरंभ किया। यह प्रयोग स्कूली बच्चों के साथ नाटक कार्यशालाओं और नाट्य रचनाओं पर केंद्रित था। इन नाट्य कृतियों में बच्चों के जीवन, परीक्षा के तनाव, पारिवारिक संबंधों में आ रही दूरियों, और सामाजिक विघटन से प्रभावित परिवारों जैसे संवेदनशील विषयों को शामिल किया गया था। यह रंगमंडल का मुख्य उद्देश्य था। आज, तीन दशक बाद, यह एक व्यापक आंदोलन बन चुका है, जिसमें लाखों शिक्षकों, वयस्कों और बच्चों को जोड़ने वाला एक रचनात्मक नेटवर्क कार्यरत है।

इसी थियेटर एजुकेशन कम्पनी ने अपनी प्रयोगधर्मिता के तहत एक कमाल का नाटक किया था, जिसमें मैं लीड रोल में थी, “लाल लाल हाथी” नाम का। इस लेख में जिन सारी बातों का जिक्र कर रही हूँ, उनका एक बेहतरीन उदाहरण यही नाटक है। इसमें एक छोटा बच्चा है, पढ़ाई में बहुत कमज़ोर, लेकिन कला में बहुत अच्छा।  एक दिन उसने आर्ट क्लास में बड़े कैनवास पर लाल हाथी बना दिया। उसका टीचर बहुत गुस्सा हो गया और बोला कि तुम्हारी कल्पनाशीलता पर तो मैं कुछ नहीं कहता, लेकिन हाथी लाल कैसे हो सकता है? भूरा, काला या कभी-कभी सफेद होता है।  तो बच्चे ने अपने टीचर से बहुत ही भावुक, मगर दृढ़ता से बहस की कि जब आपके हाथी सफेद या काले हैं, तो मेरा लाल क्यों नहीं हो सकता? उनका एक काल्पनिक मित्र था, एक लाल हाथी, और नाटक उसी संबंध पर आधारित था। हम बच्चों की कल्पनाशीलता को, मानो किसी डिब्बे में बंद कर देते हैं, धीरे-धीरे, बड़े होने की प्रक्रिया के साथ। हमारे आस-पास की दुनिया देखिए, वह पूरी तरह से चौकोर है। जो टेलीविज़न हम देखते हैं, वह चौकोर है; जिस ब्लैकबोर्ड पर लिखा जाता है, वह चौकोर है; जो किताबें हम पढ़ते हैं,वे चौकोर हैं; जिस मेज़ पर हम बैठते हैं, वह चौकोर है; यहाँ तक कि जो टिफ़िन बॉक्स हम स्कूल ले जाते हैं, वह भी चौकोर है। रंगकर्म, संस्कृत और साहित्य इसी चौकोर प्रवृत्ति को गोल बनाने की प्रक्रिया हैं।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर आयु-आधारित वर्गीकरण का मूल्यांकन करने पर पता चलता है कि बच्चों के लिए उपयुक्त सामग्री की तुलना में वयस्कों के लिए अधिक सामग्री उपलब्ध है।  सिनेमा और वेब सीरीज में हिंसा का बढ़ता प्रदर्शन चिंता का विषय है, साथ ही अपशब्दों का सामान्य प्रयोग और हिंसा का चित्रण भी गंभीर मुद्दे हैं। है। एक छोटा सा कोमल मन। जब किसी भी भंयकर हिंसात्मक घटना को। किसी बड़े पर्दे पर या छोटे पर्दे पर देखे। तो वह हमेशा हमेशा के लिए। उसके मानस पटल पर अंकित हो जाती है। यही हाल बच्चों के लिए लिखे जाने वाले साहित्य उनकी किताबें और उनके लिए लिखे जाने वाली कृतियों का भी है।

सबसे पहले तो अगर हम अपने आस-पास के प्रकाशन इंडस्ट्री को देखें। तो वो किसी भी तरह का प्रयास करने में सक्षम नहीं हैं। किवो। कक-कथाएं कहानियां और किताबें बाल मन उसकी संवेदनाएँ उनके संघर्ष और उनके अन्तर मन पर। आधारित होत अक्सर प्रकाशकों की जद्दोजहद रहती है। कि आज वैसे ही किताबें बेचना इतना आसान नहीं यदि हम केवल एक ही तरह के साहित्य पर ध्यान केंद्रित करेंगे, तो हमारी प्रगति बाधित होगी। समस्या यह है कि हमने जो पुस्तकें एकत्रित की हैं, वे वयस्कों और बच्चों दोनों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। हमारी शिक्षा प्रणाली, कक्षाएँ, ब्लैकबोर्ड, पुस्तकें और साहित्य ऐसे कुंठित सामाजिक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं जिससे हमें अवश्य मुक्ति पाना चाहिए। बाल साहित्य में आर्थिक लाभ की संभावना सीमित है। पश्चिमी देशों के उदाहरण, जैसे हैरी पॉटर और डिज़्नी, दर्शाते हैं कि सफल बाल साहित्य बाजार तंत्र को समझता है और बच्चों से जुड़ने वाले कथानकों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है।  बच्चों के लिए साहित्य, फिल्मों, वेब सीरीज और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर सामग्री की कमी है, और मौजूदा सामग्री में अक्सर असत्य और रूढ़िवादी परिकथाएँ शामिल हैं।और ज्यादा भ्रमित करती हैं क्योंकि इनका बच्चों की रोजमर्रा की जिंदगी से कोई संबंध नहीं है।। इनका सम्बन्ध इसलिए नहीं है क्योंकि हमें बच्चों की रोजमर्रा की ज़िन्दगी को। मनोरंजक रूप से देखने या उसे यथार्थवादी दृष्टि से देखने से हम गुरेज करते हैं।

पिछले दिनों जो किताब मैंने लिखी “व्हाई कांट एलिफेंस बी रेड” जिसका अभी हिंदी रूपांतर हाथी क्यों नहीं हो सकते लाल के नाम से आया। इसको लिखते हुए सबसे बड़ी बात जो। मेरे मन में कौंधी वह ये थी। जब मेरी किताब की। प्रमुख पात्र 2/3 साल की बच्ची है और उसकी दैनिक जीवन में उनके विस्तृत परिवार के सदस्यों की अंतःक्रियाएँ उनके चरित्र को दर्शाती हैं, और प्रत्येक दिन एक अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।  हालांकि, हम “रियल टाइम राइटिंग” की अवधारणा से बहुत दूर चले गए हैं, और अपना बचपन खो चुके हैं।  हमने अपनी बचपन की छोटी-छोटी समस्याओं और अन्वेषण की क्षमता को बहुत पहले ही दबा दिया है। यदि एक वयस्क अपना बचपन भूल जाता है, तो वह बच्चों के प्रति असंवेदनशील हो जाता है।

यह एक नए वार्तालाप का समय है। क्या हम बच्चों, उनके साहित्य, उनके जीवन, और उनकी भावनाओं के प्रति असंवेदनशील हो गए हैं? क्या हम अपने और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की चिंता करने की क्षमता खो चुके हैं? शुरुआत साहित्य से होनी चाहिए। यदि बच्चों के लिए ऐसी कहानियाँ लिखी जाएँ जो उनके आंतरिक संघर्षों, छोटी-छोटी समस्याओं और दैनिक चुनौतियों को दर्शाएँ, तो ही हम सामाजिक रूप से बच्चों के प्रति संवेदनशील होने की प्रक्रिया आरंभ कर पाएँगे।

आजकल, निर्णय क्षणिक होते हैं; भोजन, वस्त्र, निवास, विश्राम, अध्ययन – सब कुछ दस सेकंड में तय हो जाता है। क्या यह समझना इतना कठिन है कि बच्चों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण से जुड़ना, हमारी अपनी निर्मलता, संवेदनाओं और संस्कृति के पुनर्मूल्यांकन के समान है? यदि हम अभी भी जागरूक नहीं हुए और कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे जीवन में विशाल रूप से प्रवेश कर चुकी है, तो भविष्य में हमें गंभीर सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।

सच माना जाय तो बच्चे गुरुतुल्य होते हैं। ऐसी मेरी वैयक्तिक अवधारणा हैं। ऐसे गुरू जो हमें हमारे वयस्क जीवन की सारी जटिलताओं से मुक्त करने का जादू अपने पास छुपाकर रखते हैं।

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