बिहार में चुनाव का माहौल है। वैसे माहौल हो या न, मन्नू भंडारी का ‘महाभोज’ हमेशा प्रासंगिक रहता है।शायद इसलिए भी कि राजनीति में शामिल लोग हमेशा इसकी तैयारी ही करते रहते हैं। ऐसे में हिंदी साहित्य के विद्यार्थी गुलफ़राज़ अहमद द्वारा ‘महाभोज’ नाटक पर की गई टिप्पणी आज प्रस्तुत है – अनुरंजनी
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सत्ता की राजनीति के विरुद्ध सत्य की राजनीति का संघर्ष है ‘महाभोज’
‘महाभोज’ मन्नू भंडारी द्वारा लिखित नाटक है। हिन्दी साहित्य संसार में यह पहली रचना है जिसे नाटक और उपन्यास दोनों विधाओं में प्रकाशित किया गया। ‘महाभोज’ सर्वप्रथम उपन्यास के रूप में 1979 ई. में प्रकाशित हुआ था। बाद में इसी उपन्यास को नाटक के रूप में 1982 ई. में प्रकाशित किया गया। यह नाटक राजनैतिक विषयों पर आधारित है जिसमें राजनैतिक मूल्यों के ह्रास का यथार्थपरक अंकन प्रस्तुत किया गया है। इस नाटक की कथावस्तु अस्सी के दशक में बुनी गई है लेकिन यह वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी प्रासंगिकता रखता है, बल्कि आज तो राजनीतिक शुचिता, आदर्श एवं मूल्य के पतन में दैनंदिन वृद्धि होती जा रही है। राजनीति का नाम सुनते ही मस्तिष्क में अनियमितता, भ्रष्टाचार, लूट, चाटुकारिता, पद-लोलुपता, षड्यंत्र, दमन, अनैतिकता तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था का दुरुपयोग आदि चित्र उभरने लगता है। सीधे अर्थों में राजनीति सिद्धांतविहीन हो गई है। ‘राज+नीति’ के विपरीत दिशा में चली गई है ‘राजनीति’।
‘महाभोज’ के केंद्र में सरोहा नामक गांव है जिसकी कथा पटना के बेलछी गांव में घटित दलितों के नरसंहार से संबद्ध दिखाई देती है। उस समय इंदिरा गांधी का हाथी पर बैठकर बेलछी जाना राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अख़बारों में सुर्ख़ियों का केंद्र रहा था। इस नाटक में सत्ता का क्रूर रूप सामने आता है, जहां सत्ता, अपराधी और पुलिस का गठजोड़ नागरिकों का जीना मुहाल करता है एवं लोकतंत्र और क़ानून की धज्जियां उड़ाता है। सत्ता संपोषित, सत्ता संरक्षित और सत्ता प्रायोजित अपराध को बढ़ावा केवल कुर्सी के मोह में दिया जाता है। इसी तरह सरोहा के दलित बस्ती में आगज़नी की घटना को अंजाम दिया जाता है और बाद में दलित युवक बिसू की हत्या तथा उसके साथी को झूठे केस में फंसाया जाता है। इसमें सामाजिक न्याय के साथ आर्थिक न्याय का संघर्ष भी है।
पहले दृश्य में बिसू की माँ अपने बेटे की लाश के साथ छाती पीट-पीट कर रो रही है। लाश सड़क किनारे पुलिया पर पड़ी मिली है। ग्रामीण हत्या की आशंका व्यक्त करते हैं। लेकिन प्रशासन द्वारा लीपा-पोती कर वास्तविक अपराधी को बचाने का प्रयास किया जाता है। नाटक का पात्र थानेदार कहता है कि “मार-पीट या चोट का तो कौनो निसानौ नहीं। ख़ुदै कुछ खा-खुआकार सो गया होगा ससुरा।” एक तो इस तरह का बयान भाषाई स्तर पर अमानवीय कृत्य है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सीधे-सीधे न्यायालय के कामकाज में हस्तक्षेप है। हालिया समय में ‘बुलडोज़र एक्शन’ विवादों में घिरा ही रहा है। यह कृत्य लोकतान्त्रिक प्रणाली को आघात पहुंचाता है। इससे जनमानस में अविश्वास जन्मता है तथा प्रशासन की साख भी गिरती है।
नाटक में सामंतवादी प्रवृत्तियां अनेकानेक रूपों में आई हैं, जहां एक दलित युवक की हत्या प्रमुख है, जिसके तार पूर्व में हरिजन टोले में घटित आगज़नी की घटना से भी जुड़े होते हैं। सामंतवादी प्रणाली में शिक्षा और समानता के अधिकारों का व्यापक हनन होता है, बिल्कुल दोयम दर्जे का व्यवहार। उपरोक्त घटनाएं इन्हीं अधिकारों की प्राप्ति की प्रक्रिया में घटित हुई हैं। ज़ोरावर का कथन है- “अब आप ही सोचो दा साहेब! इन हरिजनों के बाप-दादे हमारे बाप-दादों के सामने सिर झुकाकर रहते थे। झुके-झुके पीठ कमान की तरह टेढ़ी हो जाया करती थी, पर आप लोग इतना माथे चढ़ा रहे हो कि आज ये ससुरे आंख में आंख गड़ाकर बात करते हैं। बर्दास्त नहीं होता यह हमसे।” इस तरह बिसू की हत्या केवल एक दलित युवक की हत्या नहीं है, यह उस लोकतंत्र की भी हत्या है जिसकी बुनियाद शिक्षा और समानता पर टिकी है जो किसी भी समाज और देश के विकास में अत्यावश्यक हैं।
इस घटना पर पत्रकारिता की भूमिका का समसामयिक धरातल पर वर्णन है। लोकतंत्र का कथित चौथा स्तंभ पत्रकारिता समाज में तनाव उत्पन्न करने में लगा रहता है। ‘मशाल’ का साप्ताहिक कार्यालय है। उपसंपादक भवानी अपने सहकर्मी पत्रकार को निर्देशित करते हुए कहता है कि “मौक़ा लगे तो वहां के खेत मालिकों को भी छान लेना। दोनों पक्षों की बात होगी तो कॉन्ट्रोवर्सी पैदा की जा सकती है।” यहाँ पत्रकार का हिंसक चरित्र स्पष्ट प्रदर्शित हो रहा है जो निजी स्वार्थ में समाज को दूषित करने का प्रयास कर रहा है। टीआरपी की जंग में मसालेदार ख़बर परोसी जाती है और ज्वलंत मुद्दे पर पर्दा डाल दिया जाता है। यही हाल बिसू की हत्या और आगज़नी की घटना के साथ होता है। बिसू का दोस्त बिंदा और शोधार्थी महेश के पास प्रमाण होने के बावजूद छापने से इंकार कर दिया जाता है।वहाँ पत्रकारिता पर सत्ता से नज़दीकियां और सत्ता की चाटुकारिता हावी हो जाती है। भवानी द्वारा दत्ता बाबू की असामान्य प्रसन्नता का रहस्य पूछने पर संपादक महोदय कहते हैं- “चार विज्ञापनों का वायदा और चार का ही आश्वासन…और मुख्यमंत्री के पी. ए. का आश्वासन यानी पक्का ही समझो इन्हें भी…!” ऐसे में स्वाभाविक है कि प्रश्न विपक्ष से ही पूछे जाएंगे। नरोत्तम जब बिसू की हत्या को प्रमुखता से उठाता है तो उसे संपादक द्वारा विपक्ष के हथकंडे में सम्मिलित होने की बात कही जाती है। इस पर सत्य पत्रकारिता कर रहे नरोत्तम अख़बार से संबंध तोड़ लेता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी निष्ठावान पत्रकार को त्यागपत्र देने पर विवश कर दिया जाता है या हत्या करवा दी जाती है। आर्थिक लाभ के लोभ में पत्रकारिता का व्यावसायीकरण किया जा रहा है।
एक राजनेता से जैसी तवक़्क़ो की जाती है, उसका चित्रण मन्नू भंडारी जी ने सम्मान एवं निष्पक्ष भाव के साथ नाटक में प्रस्तुत किया है। मसलन, वह राजनीति में शुचिता का प्रतीक हो, सरल स्वभाव तथा मिलनसार व्यक्तित्व का धनी हो, आदि-आदि। राजनेताओं पर लोगों की वैध-अवैध उम्मीदों की पूर्ति का भी नैतिक भार होता है। बहरहाल, नाटक के आरंभिक अंशों में उक्त सभी गुणों की झलकियां मुख्यमंत्री दा साहेब में विद्यमान होती हैं। कम से कम ऊपरी तौर पर तो ज़रूर उदार चरित्र के मालूम होते हैं। चाहे वह ‘घरेलू उद्योग योजना’ के माध्यम से दलितों एवं श्रमिकों की आय दुगुनी करनी हो, या पुलिस वालों के विभागीय कार्य में हस्तक्षेप करने से अस्वीकृति प्रदान करने का मामला हो, या फिर पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने राजनीतिक उद्देश्यों से अवगत कराते हुए लोकतंत्र की शिक्षा देनी हो। एक अन्य प्रसंग में जनता के अविश्वास को रेखांकित करते हुए दा साहेब का कथन है “रुपया ज़रूर पहुंचा देना चाहिए, वरना कागज़ी योजनाएं विश्वास तोड़ देती हैं लोगों का।” इस पर अदम गोंडवी का एक प्रसिद्ध शेर याद आता है।
तुम्हारी फ़ाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है !
मगर ये आंकड़े झूठे हैं, ये दावा किताबी है !!
वे राजनीतिक विरोधियों पर बिफरते हुए कहते हैईं कि “जो भी हो, अपनी लड़ाई मैं उनके हथियार से नहीं लड़ूंगा।” यहां पर अपने मेयार की रक्षा का सुंदर चित्रण है। एक जगह मुख्यमंत्री दा साहेब का कथन, ‘सामाजिक न्याय की नींव आर्थिक न्याय पर आधारित है’, को चरितार्थ करती है- “इसलिए मैं ऐसी स्थिति पैदा करना चाहता हूँ कि उन्हें क़र्ज़ लेने ही न पड़े। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होकर ही शोषण से मुक्त हो सकेंगे और समाज में समानता का दर्जा पा सकेंगे ये लोग।” लेकिन वहीं अंतिम दृश्यों में आते-आते दा साहेब की छवि धूमिल होने लगती है। सरोहा चुनाव का प्रत्याशी लखन जब बिसू की मौत, मंत्रिमंडल की मौत हो जाएगी कहता है, तब कुर्सी के मोह में एक दाग़ी राजनेता की उत्पत्ति हो जाती है। इसके साथ बिसू की हत्या का षड्यंत्रकारी ज़ोरावर को बचाने का प्रयास करते हुए ईमानदार पुलिस पदाधिकारी एसपी सक्सेना के निलंबन एवं बिसू की हत्या का आरोप बिंदा पर मढ़ते हुए केस को विपरीत दिशा में मोड़कर उसकी गिरफ़्तारी का आदेश जारी कर देता है। यहां क़ानून का दुरुपयोग साफ़ चित्रित हुआ है। यह भी स्पष्ट देखा जा सकता है कि राजनीतिक शुचिता एवं वैचारिक प्रतिबद्धता में किस प्रकार से गिरावट आती है। साथ ही मन्नू जी ने सत्ता की प्रकृति को भी सूक्ष्मता से अंकित किया है जहां अब यही लगता है कि अंततः राजनीति सेवा का माध्यम न रहकर निजी स्वार्थ की पूर्ति मात्र रह गया है जहां कुर्सी पाना ही अंतिम लक्ष्य है।
एसपी सक्सेना को जांच के दौरान महेश शोधार्थी के कार्य सीमा से अवगत कराता है और शिक्षा पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए कहता है “आप ही बताइए क्या मतलब है ऐसी एजुकेशन का?” इतना सुनते ही सक्सेना क्रोध से बोल उठते हैं, “देखिए, मिस्टर शर्मा, मैं यहां भाषण सुनना नहीं चाहता।” यह हमारे समाज की विडंबना है कि स्वयं से छोटे (किसी भी स्तर पर) का सवाल पूछने की क्रिया को हम अपना अपमान मान लेते हैं। किसी भी तर्कशील समाज के विकास में यह अत्यावश्यक है कि संवाद की प्रक्रिया निरंतर बनी रहे। अन्यथा समाज रूढ़ियों में जकड़ जाता है। सवालों की गर्दनें दबा देने से नस्लें जाहिल पैदा होंगी। महेश का कबीर की भांति शास्त्र का विरोध और लोक ज्ञान का समर्थन करना उसके आलोचनात्मक और विद्रोही तेवर को दर्शाता है। वह कहता है “इतने सीधे और बने-बनाए जवाब तो आपको किताबों में मिल सकते हैं और कितनी झूठी होती हैं किताबों की दुनिया… फार्स! हमें गांव की ज़िंदगी के बारे में कुछ बने-बनाए नतीजे निकालकर थमा दिए… हम उन्हीं से सिर फोड़ते रहे हैं… समझते रहे कि हम गांव जान रहे हैं, हमने गांव जान लिया! लेकिन गांव की असलियत… बिना पूरी तरह जुड़े कोई जान सकता है गांव की असलियत?” यहाँ वीरेन डंगवाल याद आते हैं- “पोथी-पतरा-ज्ञान-कपट से बहुत बड़ा है मानव!” यह महेश का सत्य की खोज है।
समाज सुधारकों को पागल और आवारा की संज्ञा या हत्या कर देना समाज की फ़ितरत है। हर युग का इतिहास यही है। ईसा, सरमद और गांधी इसके बड़े उदाहरण हैं। परिवर्तन को समाज जल्दी स्वीकार नहीं करता, इसे हेय दृष्टि से देखता है जबकि यही शाश्वत है। एसपी सक्सेना द्वारा बिसू के संबंध में पूछे जाने पर कि “कैसा लड़का था बिसू?” इसके प्रत्युत्तर में जोगेसर साहू कहता है “अरे एकदम सिरफिरा, साहेब! सारे गांव के लिए बलाय था ससुरा…!” दरअसल, समाज सत्य से भयभीत होता है। साथ ही, अपनी कायरता को सही सिद्ध करने का हठ करता है। व्यक्ति जिसके लिए संघर्ष करता है, वही बाद में उसे अपराधी सिद्ध करने पर आमादा रहता है।
मित्रता और उसके संबंध पर हमारे समाज की यह धारणा काम करती है कि जितनी पुरानी दोस्ती उतना पुराना संबंध। लेकिन यह अंतिम सत्य नहीं है। यही सक्सेना भी बिंदा से पूछता है “अच्छा! तुम्हारी और बिंदा की दोस्ती तो कुल आठ महीने पुरानी थी। फिर इतनी आत्मीयता… इतनी निकटता कैसे?” तब बिंदा दोस्ती के लिए परिचय की उम्र की बाध्यता को नकारता है और विचार सर्वोपरि बताता है। सक्सेना का यह सवाल दरअसल बिसू और बिंदा की पत्नी रुकमा की मित्रता पर संदेह करना था। सामाजिक मर्यादाओं के तहत एक लड़का और लड़की की दोस्ती को वैधता प्रदान नहीं की जाती है। अपवित्र समझा जाता है। संदेह के घेरे में रखा जाता है। इसी रूढ़िवादी विचार का दुष्परिणाम होता है कि बिसू की हत्या को प्रेम प्रसंग में हुई हत्या का मामला बनाकर बिंदा को सलाखों के पीछे ढ़केल दिया जाता है।
‘महाभोज’ में ‘डिपार्टमेंटल’ अंतर्कलह को भी दिखाया गया है। यह अंतर्कलह वर्चस्व स्थापना की लड़ाई है जहां जूनियर द्वारा सीनियर अधिकारी को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाता है। एसपी सक्सेना जब निष्पक्षता से जांच करता है तो थानेदार द्वारा जांच में असहयोग और बाधा पहुंचाने का प्रयास होता है। थानेदार एसपी को धरातलीय स्थिति से अनभिज्ञ रखता है और स्थानीय अपराधियों से गठजोड़ कर जांच के मध्य थाना के गेट पर एसपी और पुलिस के विरुद्ध नारेबाज़ी कराता है। थानेदार “ससुरा बयान लेने आया है कि आरती उतारने आया है इनकी! बड़ा परेम फूट रहा गांव वालों के लिए ***** के। जब से लगा रखी है— इन्हें घुड़को मत। मैं ज़रा-सा भी बोलूं तो सऊरा डंडा से अइसा दाग डेत है कि जीभ तालू से चिपक के रहि जात। लौंडों से नारे लगवाओ।… ज़ोर-ज़ोर से।” दूसरा, हनक देखिए “ई ससुरा तो पुट्ठन पर हाथ ही न धरन देत। सारे गांव में बेइज़्ज़ती करा रहा है मेरी… ये तो दो दिन में चलता बनेगा, थानेदारी तो मुझे करनी पड़ेगी इनके सिर पे। हीरा को बुला।” सरकारी कर्मचारियों को उसके फ़र्ज़ के प्रति सचेत एवं ईमानदार करना, उसे स्वयं की बेइज़्ज़ती महसूस होती है। ऐसे ही अधिकारी व्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहे हैं। हालांकि सक्सेना की तरह ईमानदार पुलिस अधिकारी भी हैं।
नाटक अपने अंतिम 11वें दृश्य में अन्याय, अत्याचार और अंधकार के अनैतिक गठजोड़ को दिखाते हुए समापन की ओर बढ़ता है। क़ानून के साथ खिलवाड़ और दुरूपयोग का दुस्साहस यहां तक आते-आते जम के बैठ जाता है। जिसके हाथ में लोकतंत्र, संविधान और नागरिकों की सुरक्षा का दायित्व है वही उसे आघात पहुंचा रहा है। सत्ता का क्रूर और हिंसात्मक छवि ज़ाहिर होती है। इस दृश्य में एक तरफ़ शासन, प्रशासन और मीडिया का भोग-विलास है, जहां ‘महाभोज अर्थात बड़ी दावत’ के रूप में जश्न का वातावरण है। वहीं दूसरी तरफ़ पीड़ित, शोषित और असहाय जनता पर ज़ुल्म का पहाड़ लाद दिया गया है। महाभोज का प्रबंध डी. आई. जी. सिन्हा अपने पदोन्नति के उपलक्ष्य में करता है। इस पर लेखिका ने अतिथि पात्र के माध्यम से व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य किया है। बेदी का वाक्य है “हेल्लो माई स्वीट लिटिल रैबिट सिन्हा! कांग्रेचुलेशंस! बड़ी रौनकें लगा रखी है भई! लगता है, बिना डिज़र्व किये डी. आई. जी. से आई. जी. बन गए हो!” इस व्यवस्था में चाटुकारिता करने पर पदोन्नति और फ़र्ज़ का पालन करने पर तबादला या निलंबन की परंपरा बढ़ चली है। इस दृश्य में एक साथ कई स्थानों को दिखाया गया है। थाने में बिंदा की निर्ममता से पिटाई हो रही है। बिंदा ज़ोर-ज़ोर से चीख़ता है। चीख़ सुनकर महेश अंदर जाने की कोशिश करता है जिस पर सक्सेना रोकता है और तरीक़े की बात करता है तो महेश कहता है “आपको बिंदा की चीख़ें नहीं सुनाई दे रही हैं, सर?… जो कुछ हो रहा है वह बहुत तरीक़े से हो रहा है? यह तो सरासर ज़ुल्म है, सर! अब इसे और बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।” सक्सेना को ढ़केलकर महेश अंदर चला जाता है। वहां बिंदा ज़मीन पर छटपटा रहा होता है। इतने में ग़ुस्से से तमतमाया हुआ महेश थाना से बाहर आ जाता है। सूत्रधार की भूमिका में कुछ कहना चाहता है लेकिन कह नहीं पाता। जैसे अब स्थिति कहने-सुनने के परे चली गई हो। यह नाटक इस तरह से अमीर और ग़रीब के मध्य धरातल पर क़ानून की असमानताएं और भेदभाव को भी बेबाकी से सामने रखता है।
महिला लेखिकाओं पर अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि वे राजनीति और साम्प्रदायिकता आदि विषयों पर लेखन नहीं करती हैं। लेकिन मुझे इस बात पर आपत्ति है। मेरे इस बात का प्रमाण ‘महाभोज’ नाटक स्वयं है। मन्नू भंडारी ने सत्ता की राजनीति और चुनावी प्रबंधन जैसे अतिपरिचित विषयों को ‘महाभोज’ में इतनी सुंदरता से पिरोया है कि वह व्यक्ति को क़ायल कर जाता है। इस नाटक के संबंध में राजेंद्र पॉल लिखते हैं “मन्नू भंडारी को इसका श्रेय जाना चाहिए कि अतिपरिचित परिस्थितियों के, इतने व्यापक फलक को, बिना किसी प्रचलित मुहावरों का शिकार हुए, समेटे लिया है। इसी नाम से उनके चर्चित उपन्यास का यह नौ-दृश्यीय नाट्यान्तरण अत्यंत यथार्थपरक और तर्कसंगत है। इस नाटक में हम समाज में सक्रिय अनेक ताक़तों और ग़रीबों के जीवन पर उनके प्रभाव परिणतियों को दृश्य-दर-दृश्य खुलते देखते हैं।” मन्नू भंडारी जी ने चुनावी प्रबंधन पर नाटक में सटीक उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। चुनावी माहौल में सरकार और पार्टी के भीतर अंतर्कलह को तथा कमज़ोर प्रत्याशी उतारने के जोखिम को देखिए, भवानी कहता है “वैसे भी सुकुल बाबू के मुक़ाबले में लखन को खड़ा करके संकट तो खड़ा कर ही लिया है दा साहेब ने अपने लिए!… उनके अपने ही मंत्रिमंडल के लोग असंतुष्ट हैं इस बात से। देखना, इतने दंड पेलने पड़ेंगे दा साहेब को इस चुनाव में छठी का दूध याद आ जाएगा।” कभी-कभी कमज़ोर प्रत्याशी के चयन के पीछे अपने ही पार्टी के भीतर प्रतिस्पर्धा को साइडलाइन करने और विरोधी पार्टी में अपने समर्थक को विजय दिलाने के मक़सद से भी किया जाता है। नाटक में एक सीट के लिए चुनाव का ज़िक्र है। संभवतः उपचुनाव। उपचुनाव आम चुनाव से अधिक कठिन होता है। सरकार और मुख्यमंत्री की साख का चुनाव होता है यह। सत्ताधीश के समक्ष पार्टी अध्यक्ष के कठपुतली स्वरुप का चित्रण मिलता है नाटक में। पांडेजी और सीएम का संवाद है “सो तो है लेकिन लखन को खड़ा करने से अप्पा साहेब भी तो बहुत ख़ुश नहीं हैं, साब!” भारतीय राजनीति में भी चाहे नरेंद्र मोदी का यह दौर हो या इंदिरा जी का दौर रहा हो, परिस्थिति कमोबेश यही रही है। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह का समय अपवाद है। चुनाव के दौरान दा साहेब का जनता के बीच ज़बरदस्त आक्रोश है लेकिन बड़े नेता के आगमन मात्र से विरोध किस तरह समर्थन में बदल जाता है उसका प्रभाव देखना चाहिए। दा साहेब की भाषा है “बिसू का सुना, बहुत अफ़सोस हुआ। (हीरा सुबकने लगता है, धोती की कोर से आंसू पोछता है। उसकी पीठ पर हाथ रखकर) धीरज से काम लो हीरा, हौसला रखो।… सुना, आगज़नी में बर्बाद हुए परिवार के लिए बहुत दुखी था बिसू—हम सभी हैं। लेकिन जो हुआ उसे अनहुआ तो नहीं किया जा सकता। अब तो बिसू के अधूरे कामों को हमें पूरा करना है। आगज़नी में जिन लोगों को नुक़सान हुआ, उन्हें पाँच-पाँच हज़ार रुपये की मदद करने का फ़ैसला किया है सरकार ने। यह रुपया तुम अपने हाथों से दोगे, आज ही। इस योजना का उद्घाटन भी तुम्हीं करोगे।… बिसू की आत्मा को शांति मिलेगी इससे, चलो…!” इसे चुनावी घोषणा या चुनावी जुमला का भी नाम दिया जाता है। यह नेताओं का राजनैतिक रोटी सेकने वाला कुकृत्य भी हो सकता है। दलितों और सवर्णों के बीच पोलिंग क्षमता के भेद को भी लेखिका ने स्पष्ट दिखाया है। सवर्णों का जहाँ संगठित और अत्यधिक पोलिंग क्षमता है, वहीं दलितों में पोलिंग क्षमता सुस्त है। कशी कहता है “चुनाव में पचास-साठ प्रतिसत से ज्यादा वोट तो पड़ने नहीं, लेकिन तुम्हारे पैंतीस प्रतिसत एकदम पक्के… एक नहीं टूटता है इनमें से।” दलितों के कम पोलिंग क्षमता के एक-दो प्रमुख कारण हैं। पहला, वोट को लेकर जागरूकता का अभाव। दूसरा, सामन्तों द्वारा ‘बूथ कैप्चरिंग’। एक स्थान पर ज़ोरावर कहता है “मारो गोली सुकुल बाबू के आदमियों को! सुकुल बाबू को वोट देने वाले हरिजन कौन से हैं, हम जानते हैं, हम! बूथ पर पहुँच तो जाए उनमें से ससुरा एक भी! अरे जोरावर के राज में वही वोट दे सकेंगे, जिन्हें जोरावर चाहेगा।” जनता नेताओं के हर क़दम पर पैनी निगाह रखती है। उसके सभी चाल को अच्छे से जानती है। वह बख़ूबी समझती है कि जांच के नाम पर फुसलाने का काम किया जा रहा है। जनता का यह अविश्वास अकारण नहीं है। नेताओं और व्यवस्था द्वारा निरंतर छले जाने का अनुभव है। बिंदा कहता है “आने को तो बड़ी-बड़ी हस्तियां आ रही हैं। सुकुल बाबूओ आए… अपना पैसा लगाकर बिसू का मुकदमा लड़ने के खातिर। दा साहेब आए आँसू बहाते हुए मातमपुर्सी के खातिर। आज आप सबकी सतरंज में बिसू की मौत का मोहरा फिट बइठ रहा है ई वास्ते इत्ता हंगामा मच रहा है… फिर से तहक़ीक़ात हो रही है… पर होना-हवाना कुच्छ नहीं।” लेकिन इतने के बाद दिल्ली पर भरोसा है। दिल्ली पर भरोसा, लोकतंत्र पर जनता की क़ायम आस्था को इंगित करता है। बिंदा कहता है “दिल्ली चलने की खातिर, चार-पाँच दिन पहले आगजनी के कुछ ठोस परमान जुटा लिए थे उसने। बस तबसे पागलों की तरह पीछे पड़ा हुआ था—दिल्ली चलो… दिल्ली चलो।” और दा साहेब प्रदर्शन को लोकतंत्र का ख़ुराक़ बताते हुए कहते हैं “प्रजातंत्र में प्रदर्शन पर पाबन्दी लगाई जाए… अनुचित है यह।”
सत्ता के गलियारों में पियादों का किस तरह इस्तेमाल किया जाता है, उसे भी लेखिका ने नाटक में दर्ज किया है। पांडेजी जी दा साहेब को ज़ोरावर के सम्बन्ध में कहता है “नहीं साहेब, इतनी पैंतरेबाज़ी उसके बस की नहीं। जाट आदमी है, जिधर चाहो चाभी घुमा दो।” यहाँ जातीय श्रेष्ठता बोध भी समझ में आता है। नाटक में मोटे तौर पर जाति और अर्थ की सत्ता के विरुद्ध संघर्ष है। यानी शोषितों का शोषकों के विरुद्ध संघर्ष। सत्ता को चुनौती देने का ही परिणाम होता है कि बिसू को जान गंवानी पड़ती है और बाद में बिंदा को भी गिरफ़्तार कर लिया जाता है। इस तरह यह नाटक मुख्य रूप से सत्ता की राजनीति और सत्य की राजनीति के बीच जंग की तरह उपस्थित लगता है।

