• फिल्म समीक्षा
  • जुगनुमा : रूपक और अग्नि की राजनीति

    आज पढ़िए फ़िल्म जुगनुमा पर जानी-मानी संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी टिक्कू की यह सारगर्भित टिप्पणी- मॉडरेटर

    =============================

    राम रेड्डी की नई फ़िल्म जुगनुमा: द फेबल, जिसमें मनोज बाजपेयी का संयत और मर्मस्पर्शी अभिनय है, हमारे समय के सबसे गहरे प्रश्नों से टकराती है। यह फ़िल्म मिथक को प्रतिरोध में बदल देती है और बाग़ानों को एक युद्धभूमि बना देती है। इसकी ख़ामोशियों, लोककथाओं और धधकती लपटों के बीच विशेषाधिकार, जलवायु संकट और ‘अपनापन’ की राजनीति पर पैनी चोट छिपी है।

    भारतीय सिनेमा हमेशा से दो धाराओं के बीच झूलता रहा है। एक ओर वह चकाचौंध भरे तमाशे में डूबा रहता है — गीत, नृत्य, रंग और नाटकीयता का ऐसा ज्वार जो दर्शक को बहा ले जाए। दूसरी ओर वह मौन की ओर झुकता है — वह परंपरा जो allegory और फेबल में उतरकर हमारे अस्तित्व के गहरे प्रश्न पूछती है। जुगनुमा इस दूसरी धारा का प्रतिनिधि है — वह फ़िल्म जो चुप्पियों से बोलती है, और जिसके प्रतीकों में समाज की सच्चाई जलती दिखाई देती है।

    आग : केवल आपदा नहीं, एक रूपक

    हिमालय की तराई में देव अपने सेब के बाग़ों की देखभाल करता है, जबकि जंगल की आग नज़दीक आती जाती है। गाँव की हवाओं में अफ़वाहें तैरती हैं, खानाबदोशों पर शंका होती है, और देव अपने सपनों के पंख गढ़ने में डूबा है। पर आग यहाँ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि बेचैनी और टूटन का रूपक है। हमारे समय की सच्चाई यह है कि जंगल की हर आग जलवायु परिवर्तन की गवाही है। उत्तराखंड से हिमाचल तक भड़कते धधकते वन हमें यह बताते हैं कि अस्थिर विकास और नाज़ुक पारिस्थितिकी मिलकर कैसी त्रासदी रचते हैं। पर रेड्डी आग को रिपोर्ट की तरह नहीं दिखाते — वह इसे एक सामाजिक मानसिकता में बदल देते हैं: भय, अविश्वास और पलायन की चाह।

    मिथक : स्मृति और प्रतिरोध

    फ़िल्म के दृश्य किसी लोककथा जैसे हैं — धुएँ के बीच चमकते जुगनू, राधा द्वारा सुनाई जाती चेतावनी भरी कहानियाँ, और देव के उड़ान भरने की विफल चेष्टा। ये सब हमें बताते हैं कि मिथक केवल सजावट नहीं, बल्कि अस्तित्व का सहारा है। जब आँकड़े हमारी संवेदनाओं को सुन्न कर देते हैं और तथ्य राख हो जाते हैं, तब लोककथा और स्मृति ही हमें जीवित रखती है। भारत के हाशिये के समुदाय — चाहे वे बाउल हों या भाट — अपनी पहचान और संघर्षों को गीतों और कथाओं में बचाए रखते हैं। जुगनुमा इन्हीं परंपराओं की प्रतिध्वनि है, जहाँ कथा प्रतिरोध बन जाती है।

    बाग़ान : ज़मीन और संघर्ष

    फ़िल्म का सबसे बड़ा रूपक है बाग़ान। यह रोज़ी-रोटी है, वंश परंपरा है और विवादित भूमि भी। भारत में ज़मीन कभी निष्पक्ष नहीं रही — वह जातिगत सत्ता, विस्थापन और असमानताओं से भरी हुई रही है। देव का बाग़ जलता है, और इसी में हमारी राजनीति की असली सच्चाई छिपी है। ज़मीन केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की धुरी और पहचान है। किसान आंदोलन ने हमें यह याद दिलाया था, और जुगनुमा उसे रूपक में सामने लाती है। देव के सपनों के पंख उस वर्ग का प्रतीक हैं, जो ज़िम्मेदारी से भागकर ऊपर उड़ जाना चाहता है, जबकि नीचे समाज जल रहा है।

    मनोज बाजपेयी : मौन का सौंदर्य

    मनोज बाजपेयी इस फ़िल्म में शब्दों से नहीं, बल्कि चुप्पियों से अभिनय करते हैं। उनकी आँखों में अधूरे भाव हैं, हावभावों में हिचकिचाहट है, और खामोशियों में गहरी बेचैनी। यही ख़ामोशियाँ फ़िल्म का राजनीतिक बयान बन जाती हैं। निराशा यहाँ निष्क्रिय नहीं है। यह सक्रिय शक्ति है — जो रिश्तों को तोड़ती है, सपनों को बिखेरती है और पलायन को टकराव से अधिक आकर्षक बना देती है। देव हमारे समय का आईना है: दुविधाग्रस्त, सहभागी और बेचैन।

    सिनेमा जो फुसफुसाता है

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सिनेमा अक्सर दो ध्रुवों में देखा जाता है — या तो बॉलीवुड की भव्यता, या सत्यजीत रे की मानवीय यथार्थवाद। जुगनुमा इन दोनों से अलग खड़ा है। यह टारकोव्स्की और अपिचाटपोंग जैसे फिल्मकारों की परंपरा में है, जो स्वप्न और मिथक के माध्यम से बेचैन करने वाले प्रश्न पूछते हैं।

    यह फ़िल्म एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है। ऐसे समय में जब कहानियाँ केवल फ़ॉर्मूलों और भव्य तमाशों पर टिकी हों, जुगनुमा सिनेमा की ख़ामोशी पर भरोसा करती है। यह हमें बताती है कि सिनेमा को प्रखर होने के लिए चिल्लाना नहीं पड़ता — वह फुसफुसाकर भी ज़ख़्म पहुँचा सकता है।

    क्यों ज़रूरी है यह कथा

    2025 के इस समय में जुगनुमा हमें क्या देती है? यह हमारे जलते परिदृश्यों का दर्पण है, हमारे विखंडित होते समुदायों की चेतावनी है, और हमारी स्मृतियों की राजनीति की पुकार है। यह हमें दिखाती है कि विशेषाधिकार और ज़िम्मेदारी का रिश्ता कितना नाज़ुक है। यह हमें यह सोचने को मजबूर करती है कि आग में अंततः कौन झुलसता है: ज़मींदार, मज़दूर या खानाबदोश? यह फ़िल्म कोई समाधान नहीं देती। यह केवल हमें धुएँ, ख़ामोशी और जुगनुओं के बीच बैठा देती है। और यहीं इसकी ताक़त है — यह कहानियों को पलायन नहीं, बल्कि प्रतिरोध का हथियार बना देती है।

    भारतीय सिनेमा के लिए यह एक असाधारण उपलब्धि है। भारतीय समाज के लिए यह एक चेतावनी है, जिसे अनसुना करना अब संभव नहीं।

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins