आपका कभी ऐसा मन हुआ कि अपनी नौकरी और ऐसे तमाम काम छोड़कर आप किताब की दुकान खोल लें। एक ऐसी दुकान जहां लोग केवल किताब ख़रीदने के लिए नहीं बल्कि जीवन की आपाधापी से कुछ पल का ब्रेक लेने के लिए आएं और बैठकर सोच सकें कि वे जो कर रहे हैं क्या वही करना चाहते हैं या फिर कुछ और ही इच्छा है उनके मन में। सच बताऊँ तो मेरा तो रोज़ ही मन करता है कि काश ऐसा कुछ कर पाऊँ।
ख़ैर, मैं ऐसा कर सकूँगी या नहीं, नहीं पता लेकिन दक्षिण कोरियाई लेखक ह्वांग बो रम की चर्चित किताब वेलकम टू दी ह्यूनाम–दोंग बुकशॉप (उपन्यास का कोरिया नाम ह्यूनाम–दोंग सजम/휴남동 서점) की मुख्य पात्र यंग–जू ने तो ऐसा कर लिया। वह अपने पुराने जीवन को पीछे छोड़, अपने शानदार करियर का मोह त्याग, अपने पति से तलाक़ ले लेती है और फिर राजधानी सियोल के एक शांत इलाक़े में किताबों की एक दुकान खोलती है। और फिर उन्हीं किताबों से घिरे रहकर उसे अपने जीवन के नए मायने मिलते हैं।
दरअसल दक्षिण कोरिया में लोगों के लिए करियर बर्न–आउट अब कोई नया शब्द और विचार नहीं रह गया है और लोग अपनी पुरानी नौकरी को छोड़कर मन का काम करने के फ़ैसले को तरजीह देने लगे हैं। कोरियाई काम की संस्कृति को थोड़ा बहुत भी जानने–समझने वाले इस बात से सहमत होंगे कि इस देश में करियर बर्न–आउट अब एक एहसास भर नहीं बल्कि गंभीर समस्या बन चुका है और कई लोग काम छोड़ देते हैं या फिर काम से छुट्टी ले लेते हैं या फिर ऐसा कोई काम शुरू करना चाहते हैं जिसमें जानलेवा स्तर का मानसिक दबाव न हो। लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि काम से लंबी छुट्टी या ब्रेक के बाद इंसान एक बार फिर से खड़ा भी होना चाहता है, नई ऊर्जा के साथ काम करना चाहता है और कई बार तो बिलकुल नया काम, और तब पड़ाव आता है करियर चेंज का। और यंग जू ने भी यही किया – अपना करियर ही बदल लिया।
बेहद सरल भाषा और रोज़मर्रा की बातचीत वाली शैली में लिखे गए इस उपन्यास को कोरियाई पाठकों ने हाथों–हाथ लिया क्योंकि कोरियाई समाज वास्तव में बर्न–आउट के फ़ेज से गुजर रहा है, जहां लोग काम और अपेक्षाओं के बोझ से दोहरे होते जा रहे हैं। ऐसे में यह किताब उन्हें सुकून और शांति देता हुआ लगता है और उन्हें ख़ुद के जीवन को भी बदलने की एक आशा दिखने लगती है। सहज भाषा में जीवन की छोटी–छोटी ख़ुशियों की तरफ़ ध्यान दिलवाने, उन पलों में छुपे जीवन के गहरे अर्थ को सरलता से समझा देने का काम करती है यह किताब।
उपन्यास का मुख्य आकर्षण इसके पात्र का नया काम या अपने मन का काम शुरू कर देना भर नहीं है, बल्कि इसे पढ़ते हुए लगता है कि यह किताब हमें इस बिंदु पर सोचने को मजबूर करती है कि जगह बदलने या काम बदलने से जीवन नहीं बदल जाता है बल्कि जीवन को बदलने के लिए ज़रूरी होता है अपने नज़रिए को बदलना। नई शुरुआत का मतलब नई जगह, नए लोग या नया जीवन नहीं होता है, नई शुरुआत का मतलब होता है उन्हीं पुरानी चीजों को अलग अन्दाज़ में देखना शुरू करना।
अपने पात्रों के ज़रिए लेखक ने भाग–दौड़ वाले जीवन में बढ़ रहे अकेलेपन, ख़ुद को जानने यानी हम क्या चाहते हैं और हमारे लिए क्या महत्त्वपूर्ण है, के साथ ही इंसानी संबंधों और किताबों के माध्यम से होने वाली दोस्ती के बारे में बताने की कोशिश की है। यह सब कुछ इस अन्दाज़ में लिखा गया है कि पढ़ते हुए आप कब इस तिलस्मी दुनिया में समा जाते हैं आपको पता भी नहीं चलता और आपको लगता है कि आपकी भी वही दुनिया है और आप भी उसी का हिस्सा हैं।
इस कहानी में आपको न तो कोई बड़ा मोड़ मिलेगा न ही कोई सस्पेंस या क्लाइमेक्स, सब कुछ शांत और सहज है और अपनी धीमी और ईमानदार गति से आप पर अपनी छाप छोड़ती है।
इस किताब के विषय पर ऐसी पकड़ का एक मुख्य कारण यह भी है कि इसकी लेखक ह्वांग बो रम ख़ुद भी एक आईटी प्रोफेशनल थीं और लंबे समय तक बड़ी–बड़ी कंपनियों में काम करने के बाद अब साहित्य को ही अपना जीवन बनाने का फ़ैसला ले लिया है।
सबसे अंतिम बात यह उपन्यास पहले ब्रंच नामक वेबसाइट पर धारावाहिक रूप में आई और फिर ईबुक में और बाद में 2022 में मुख्य रूप से प्रकाशित हुई। इस उपन्यास का अंग्रेज़ी, जापानी, चीनी, वियतनामी, रूसी सहित कई अन्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। मूल कोरियाई भाषा से हिन्दी अनुवाद किया है कोरियाई भाषा की अध्यापिका कुमारी रोहिणी ने- मॉडरेटर
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किताबों की दुकान के बाहर एक आदमी घूम रहा था। थोड़ा झुककर उसने अपनी आँखों पर हाथ से छाँह की और खिड़की से अंदर झाँका। उसने दुकान खुलने का समय ग़लत समझा था और बहुत जल्दी आ गया था। किताबों की दुकान की ओर बढ़ते हुए यंग–जू ने पीछे से उस आदमी को पहचान लिया। वह अक्सर आने वाला ग्राहक था जो हफ़्ते में दो–तीन बार शाम के समय बिज़नेस सूट पहनकर आता था।
‘नमस्ते।’
चौंककर उस आदमी ने तेज़ी से अपना सिर घुमाया। यंग–जू को देखते ही उसने झट से अपने हाथ नीचे कर लिए और शर्माते हुए मुस्कुराकर सीधा खड़ा हो गया।
‘मैं आमतौर पर शाम को आता हूँ। पहली बार मैं इस समय आया हूँ,’ उसने कहा।
यंग–जू मुस्कुराने लगी।
‘खैर, बाकी बातों का तो पता नहीं, लेकिन मुझे इस बात से ज़रूर जलन हो रही है कि तुम लोग दोपहर के भोजन के समय काम शुरू करती हो’, उसने मज़ाक किया।
वह हँसी। ‘मुझसे ऐसा अक्सर हो जाता है।’
कीपैड पर पासकोड की बीप की आवाज़ सुनकर, उस आदमी ने नज़रें फेर लीं और दरवाज़े के क्लिक की आवाज़ पर ही वापस मुड़ा। दरार से अंदर का नज़ारा देखकर उसका चेहरा शांत हो गया।
दरवाज़ा पूरी तरह से खोलते हुए, वह उसकी ओर मुड़ी।
‘यहाँ आपको एक गंध आएगी, दरअसल वह रात की हवा और किताबों की मिलीजुली गंध है। अगर आपको इससे कोई दिक़्क़त न हो, तो आप अंदर आ सकते हैं आपका स्वागत है।
वह आदमी हथेलियाँ हिलाते हुए पीछे हट गया। ‘नहीं, नहीं। मैं ठीक हूँ। मैं आपको बिलकुल परेशान नहीं करना चाहता, मुझे अच्छा नहीं लगता है आपको परेशान करना, वो भी काम के समय के पहले। मैं फिर आऊँगा। वैसे भी आज तो गर्मी नहीं है?’
उसकी इस चिंता पर वह मुस्कुराने लगी और फिर आगे ज़िद नहीं की। ‘अभी जून ही तो है और धरती अभी से तप रही है,’ उसने कहा, सूरज की किरणें उसकी बाँहों को जला रही थीं।
किताबों की दुकान में जाने से पहले यंग–जू दरवाज़े के पीछे ओट में खड़ी होकर उसे जाते हुए देखती रही। अंदर कदम रखते ही वह निश्चिंत हो गई, मानो उसका शरीर और इंद्रियाँ अपने वर्क प्लेस पर लौटने के सुकून में डूबी हों। पहले, वह जुनून और इच्छाशक्ति जैसे मंत्रों से जीती थी, जैसे ये शब्द उसके जीवन में अर्थ भर देते हों। फिर एक दिन उसे एहसास हुआ कि वह खुद को दरकिनार करती जा रही है, और उसने संकल्प लिया कि वह उन शब्दों को फिर कभी अपने जीवन पर हावी नहीं होने देगी। इसके बजाय, उसने अपने शरीर, अपनी भावनाओं को सुनना और खुश रहना सीखा। वह खुद से यह सवाल पूछती: क्या इस जगह पर मुझे सकारात्मक महसूस होता है? क्या मैं सचमुच समग्रता में और बिना किसी तरह का समझौता किए जीवन जी सकती हूँ? “क्या इस जगह पर रहते हुए मुझे अपने आप से प्यार रहता है और क्या खुद को संजोकर और सहेजकर रखने की कोशिश करती हूँ? यंग–जू की किताबों की दुकान ने उसकी ये सभी कसौटियाँ पूरी कर दीं।
वाकई उमस भरा दिन था, लेकिन एयर–कंडीशनर चालू करने से पहले, उसे कल की बासी हवा को बाहर निकालकर ताज़ी हवा अंदर आने देनी थी। मैं कब अतीत से बच पाऊँगी, या यह एक बेकार काम है? एक न बदल सकने वाली आदत, नकारात्मकता ने एक बार फिर से उसे अपनी तरफ़ खींचने के लिए अपना भद्दा सिर उठाया, लेकिन उसने जल्दी से ख़ुशनुमा विचारों के साथ उसे पीछे धकेल दिया।
उसने एक–एक करके खिड़कियाँ खोलीं तो गर्म और नम हवा अंदर आने लगी। हाथ से पंखा झलते हुए, किताबों से भारी अपनी इस दुकान का जायज़ा लिया। उसका मन कई तरह के सवालों से घिरा हुआ था। अगर वह यहाँ पहली बार आई होती, तो क्या उसे यहाँ काम करने वाले लोगों के रेकॉमेंडेशन पर भरोसा होता? किताबों की दुकान विश्वास कैसे जीतती है? एक अच्छी किताबों की दुकान क्या होती है?
“उसने पहली बार अंदर आने की कल्पना की। शायद मैं वहाँ की दीवार को देखकर दंग रह गई थी, उसने सोचा। फर्श से छत तक फैली अलमारियाँ उपन्यासों से भरी थीं। नहीं, रुको। उसने खुद को समय रहते संभाल लिया। हर कोई, चाहे वह किताबों का प्रेमी ही क्यों न हो, उपन्यासों का आनंद नहीं लेता। यह कुछ ऐसा था जो उसने ह्यूनाम–दोंग बुकशॉप शुरू करने के बाद ही सीखा। जिन लोगों को यह शैली पसंद नहीं थी, वे शायद दीवार से दूर ही रहेंगे, उसने सोचा।
किताबों से भरी इस दुकान का उपन्यासों वाला हिस्सा उसके बचपन के सपने को पूरा करने का एक तरीका था। प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाली छोटी सी यंग–जू अपने पिता से अपने कमरे की दीवारों पर टंगी अलमारियों में कहानियों की किताबें रखने के लिए कहती थी। हर बार, उसके पिता उसे डाँटते थे और कहते कि किताबों के मामले में भी इतना लालची होना ठीक नहीं है। वह जानती थी कि वह नाराज़ नहीं होते थे और बस अपनी मनचाही चीज़ पाने के लिए नखरे दिखाने की उसकी आदत छुड़ाने की कोशिश कर रहे होते थे। फिर भी, वह उनके सख्त बर्ताव पर फूट–फूट कर रो पड़ती और बाद में, थक कर रोते हुए उनकी गोद में सिमट कर सो जाती।
किताबों की जिस अलमारी पर वह टिकी हुई थी, उससे अपना वज़न हटाते हुए, यंग–जू खिड़कियों के पास गई और उन्हें एक–एक करके बंद करने लगी, हमेशा की तरह अपने सबसे दाहिनी तरफ़ खिड़की से शुरू करते हुए। आख़िरी खिड़की को अच्छी तरह बंद करके, उसने एयर–कंडीशनर चालू किया और अपना पसंदीदा एल्बम – कीन्स होप्स एंड फियर्स – लगा दिया। यह एल्बम 2004 में रिलीज़ हुआ था, लेकिन उसने इस ब्रिटिश बैंड को पिछले साल ही देखा था। पहली बार सुनते ही उसे प्यार हो गया था। तब से, वह इसे लगभग हर दिन सुनती है। ह्यूनाम–दोंग बुकशॉप में एक नए दिन की शुरुआत होते ही उस अलसाई और स्वप्निल आवाज़ ने वहाँ की आबो हवा को अपने घेरे में ले लिया।

