आज पढ़िए यह गद्य अभिषेक कुमार अंबर का लिखा हुआ। अभिषेक पिछले महीने आज ही के दिन पटना गये थे। मौक़ा था जानकी पुल शशिभूषण द्विवेदी स्मृति सम्मान का। अभिषेक वहाँ पटना को लेकर शायराना प्रस्तुति करने गये थे। वे स्वयं अच्छे शायर हैं। लेकिन वे गद्य भी उतना ही मोहक लिखते हैं। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर
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सर्दियों की शामें कितनी अजीब होती हैं ना! अपने साथ सिर्फ़ अँधेरा लेकर नहीं आतीं, उदासी का आँचल भी फ़ज़ाओं में लहरा जाती हैं। सुबह से भागते-दौड़ते लोगों को कुछ ठहराव दे जाती हैं। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के एक प्लेटफार्म पर बैठा महसूस कर रहा हूँ कि दिल्ली में सर्दियों का आगमन हो चुका है। हो भी क्यों ना आज दिसम्बर का पाँचवाँ दिन है। मेरे सामने ट्रेक पर रंग-बिरंगी तेजस एक्सप्रेस खड़ी है, जो मुझे आज पटना लेकर जाने वाली है।
ज़िन्दगी में आज पहली बार पटना जा रहा हूँ। जो महसूस कर रहा हूँ कैसे बताऊँ, कुछ-कुछ रोमाचंक तो कुछ-कुछ आकर्षक। रोमांचक इसलिए क्योंकि पटना पुस्तक मेले में आयोजित जानकीपुल शशिभूषण द्विवेदी स्मृति सम्मान के अवसर पर मुझे भी पटना पर एक शाइरा प्रस्तुति देनी है और पटना जैसे ऐतिहासिक शहर को देखने का आकर्षण भी कुछ कम नहीं।
रात का सफ़र था। न ठीक से जागा और न ही नींद आई, एक बे-ख़बरी, एक ग़फ़लत- सी तारी रही। अज़ीमाबाद के शाइरों के क़िस्से-कहानियाँ बारी-बारी से ज़हन में घूमते रहे। कभी ‘शाद’ अज़ीमाबादी का कोई शेर दोहराता तो कभी ‘फ़ुगाँ’, दाग़ देहलवी तो ख़ैर दिल्ली से दिल में बसे आ ही रहे थे।
सुबह पाँच बजे पटना जंक्शन पर उतरा तो कुहरा लगा था। अल-सुबह भी ग़ज़ब की चहल-पहल थी, दिल्ली की तरह यह शहर भी शायद रात भर नहीं सोता। ख़ैर होटल जाकर आराम किया। दिन में पटना घूमा। कदीम शहर है अपने साथ एक बे-मिसाल तारीख़ समेटे। लोगों से सुनकर जैसी छवि पटना की बनी थी वैसा कुछ भी नहीं था। शहर भी एकदम शांत और लोग भी मिलनसार।
पटना के प्रसिद्ध गांधी मैदान में पुस्तक मेला लगा था। काफ़ी तादाद में लोग मेले में उपस्थित थे। क्या छोटे क्या बड़े, क्या बच्चे, क्या बूढ़े। जो बात ख़ुशी देने वाली थी वो यह कि सिर्फ़ शहर का बड़ा तबका ही पुस्तक मेले में नज़र नहीं आ रहा था। दूर-दराज़ के छोटे गाँवों से भी लोग थे। इससे पता चलता है कि पुस्तक पढ़ने का चलन अभी इतना भी ख़त्म नहीं हुआ जितना कह-कह कर हमको डराया जाता है। इस बात का दूसरा सबूत बड़ी संख्या में लगे बुक-स्टॉल भी थे। सिर्फ़ पटना के ही नहीं, दिल्ली तक के प्रकाशकों के भव्य स्टॉल लगे थे।
पटना की गुनगुनी धूप में मेले में एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियाँ दी जा रही थीं। यह पहला मौक़ा था और जानकीपुल का दूसरा शशिभूषण द्विवेदी स्मृति सम्मान जो आज मिथलेश प्रियदर्शी को उनके कथा संग्रह ‘लोहे का बक्सा और बंदूक’ के लिए दिया जाने वाला था। यह हिन्दी के उन चुनिंदा पुरस्कारों में से है जिसके चयन में ट्रस्ट का कोई हस्तक्षेप नहीं होता। निर्णायक मंडल द्वारा ही पुरस्कार की सम्पूर्ण चयन प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है। इस बार निर्णायक मंडल में अनुकृति उपाध्याय, आशुतोष भारद्वाज एवं गिरिराज किराडू थे।
पटना पुस्तक मेले में पुरस्कार प्रदान करने हेतु प्रख्यात कथाकार ऋषिकेश शुलभ, प्रत्यक्षा एवं गिरिराज किराडू आदि आमंत्रित थे और संचालन नरेंद्र कुमार कर रहे थे। प्रभात रंजन ने सभी अतिथियों को मंच पर आमंत्रित किया। मिथिलेश प्रियदर्शी सादगी भरे अंदाज़ में थे। उन्होंने पुरस्कार ग्रहण कर अपना संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित वक्तव्य दिया उनके पश्चात सभी आमंत्रित अतिथियों ने अपनी बात रक्खी। मिथलेश प्रियदर्शी की कहानियों पर बात करने के साथ-साथ सभी वक्ताओं ने शशिभूषण द्विवेदी पर भी बात की। उनके साथ की अपनी स्मृतियाँ साझा कीं। यह भव्य कार्यक्रम बड़ी ही सादगी के साथ संपन्न हुआ।
सम्मान समारोह के पश्चात स्थानीय कलाकारों द्वारा कबीर गायन किया गया। एक प्रकार से शशिभूषण द्विवेदी के साथ-साथ अपने पुरखे कवि कबीर को भी याद किया गया। कलाकारों द्वारा कबीर के भजनों का चयन भी बहुत अच्छा किया गया था। अजीब विडंबना है कि हिन्दू-मुस्लिम का मुद्दा कबीर के जाने के सैंकड़ों सालों बाद भी ज्यूँ का त्यूँ बना हुआ है। हिन्दू-मुस्लिम पर आधारित कबीर के इस सबद से गायन का प्रारंभ हुआ।
साधो, देखो जग बौराना।
साँची कहौ तो मारन धावै झूँठे जग पतियाना।
हिंदू कहत है राम हमारा मुसलमान रहमाना।
आपस में दोउ लड़े मरतु हैं मरम कोई नहिं जाना।
एक के बाद एक कबीर के भजनों की प्रस्तुति ने श्रोताओं के मन को मोह लिया। लोग झूम कर भजन सुन रहे थे। कबीर गायन के बाद मुझे अज़ीमाबाद यानी पटना के शाइरों पर शाइराना प्रस्तुति देने का मौक़ा मिला। अज़ीमाबाद में उर्दू शाइरी की एक महान परम्परा रही है। बड़े-बड़े शाइर इस मिट्टी से उठ कर दुनिया भर पर छा गए। वहाँ लोगों को क़िस्से सुनाए यहाँ आपको भी कुछ शेर और क़िस्से सुना देता हूँ।
1803 में मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के पोते अज़ीमुश्शान जब पटना के गवर्नर बनकर आइए तो उन्होंने सबसे पहला काम शहर का नाम बदलने का ही किया और उस रोज़ से पटना अज़ीमाबाद हो गया। अज़ीमाबाद में उर्दू शाइरी फलने-फूलने लगी। राम नरायण मौज़ूँ और राजा शिताब ने इसमें अहम योगदान दिया। पटना के महत्वपूर्ण शाइरों में शाद अज़ीमाबादी, अशरफ़ अली ‘फ़ुगाँ’, बिस्मिल अज़ीमाबादी, मुबारक अज़ीमाबादी, रासिख़ अज़ीमाबादी एवं कलीम आजिज़ आदि प्रमुख हैं। राम नरायण मौज़ूँ पटना के गवर्नर थे और उर्दू शाइरी का भी शौक़ रखते थे। वह अपने इस शेर के लिए उर्दू अदब में जाने जाते हैं।
ग़ज़ाला तुम तो वाक़िफ़ हो कहो मजनूँ के मरने की
दिवाना मर गया आख़िर को वीराने पे क्या गुज़री
इस शेर के पीछे भी एक मशहूर क़िस्सा है जिसे कम लोग ही जानते हैं। प्लासी के युद्ध में जब अंग्रेज रोबर्ट क्लाइव ने नवाब सिराजुद्दौला पर फ़तह हासिल की, तो उनकी याद में उपरोक्त शेर राम नरायण मौज़ूँ ने कहा था।
दबिस्तान-ए-अज़ीमाबाद के एक शाइर को मीर तक़ी मीर का शागिर्द होने का गौरव हासिल था। नाम था रासिख़ अज़ीमाबादी। उनका यह शेर आपने ज़रूर सुना होगा।
शागिर्द हैं हम मीर से उस्ताद के ‘रासिख़’
उस्तादों का उस्ताद है उस्ताद हमारा
रासिख का मीर की शागिर्दी इख़्तियार करने का क़िस्सा भी बड़ा दिलचस्प है हुआ यूँ कि शोअरा-ए-दिल्ली से मिलने के लिए रासिख़ अज़ीमाबाद से दिल्ली तशरीफ़ लाए। लेकिन तब तक दिल्ली के दिन फिर चुके थे। मीर और सौदा जैसे शाइर दिल्ली छोड़ कर लखनऊ जा बसे थे। रासिख़ भी मीर से मिलने के लिए लखनऊ पहुँच गए। लेकिन उस ज़माने तक मीर साहब गोशा-गीर हो चुके थे। रासिख़ घंटों दरवाज़े पर खड़े रहे। जब नौकरानी सौदा-सुल्फ़ लेन के लिए निकली तो वेशभूषा देख समझ गई कि कोई परदेसी आया है। उसने आने का कारण पूछा और कारण जान लेने के बाद यह कहती हुई चली गयी कि सरकार अब किसी से नहीं मिलते हैं। रासिख़ खड़े हुए कुछ देर सोचते रहे, जब वो नौकरानी वापस आयी और घर में जाने लगी तो रासिख़ ने एक मतला लिख कर उसे दिया और फरमाया की यह पुर्ज़ा मीर साहब को दे दीजिएगा। मीर साहब पढ़ते ही बाहर चले आये और कहने लगे कि आपने क्यों ज़हमत उठाई है और फ़क़ीर को क्यों याद किया। वह मतला यूँ था।
ख़ाक हूँ पर तूतिया हूँ चश्मे-महर-ओ-माह का
आँख वाला रुतबा समझे मुझ ग़ुबारे-राह का
यूँ तो दाग़ देहलवी का भी अज़ीमाबाद से रिश्ता रहा है। तक़रीबन डेढ़ सौ साल पहले अपनी कलकत्ता यात्रा में दाग़ देलहवी काफ़ी अरसा अज़ीमाबाद में ठहरे थे। उस वक़्त अज़ीमाबाद में गर्मी का मौसम था दाग़ ने एक शेर कहा।
कोई छींटा पड़े तो दाग़ कलकत्ता चले जाएँ
अज़ीमाबाद में हम मुन्तज़िर सावन के बैठे हैं
दाग़ की अज़ीमाबाद यात्रा से याद आया कि अगर दाग़ देहलवी इस समय अज़ीमाबाद की यात्रा करते तो वह राजेन्द्र नगर टर्मिनल पर उतरते ही दिल्ली की वापसी की टिकट कटा लेते। ऐसा इसलिए राजेन्द्र नगर टर्मिनल पर मैंने देखा कि स्टेशन का नाम उर्दू में प्लेटफॉर्म पर ग़लत लिखा है। पहले तो राजेन्द्र को ‘राजनद्र’ कर दिया गया है फिर उस के ‘द’ (दाल) को ‘ल’ (लाम) में बदल दिया गया है और नगर के ‘र’ (रे) को ‘ह’ (हमज़ा) में तब्दील कर दिया गया है। इतना ही नहीं टर्मिनल के बाहर बड़े बड़े अल्फ़ाज़ में लिखे टर्मिनल के नाम में से नुक्ते किसी भ्रष्टाचारी के सस्ते मैटीरियल इस्तेमाल करने के कारण अपने हर्फ़ों से बिछड़ गए है। और राजेन्द्र बाबू का नाम ‘राहदर’ हो कर रह गया है। देख कर दुख तो हुआ लेकिन हम भी दिल्ली की गाड़ी पकड़ने के सिवा कर भी क्या सकते थे।
कार्यक्रम सफल रहा। रात के साथ-साथ बढ़ती सर्दी के बावजूद भी अंत तक दर्शक हमारे साथ बने हुए थे। आख़िर में जानकीपुल ट्रस्ट की डॉ. कुमारी रोहिणी के धन्यवाद ज्ञापन से कार्यक्रम का समापन हुआ। कार्यक्रम की दिलचस्प बात यह थी कि ट्रस्ट के सदस्य कार्यक्रम के दौरान एक-दो मौक़ों को छोड़ कर मंच से दूर ही रहे और बोलने का भरपूर समय वक्ताओं को ही दिया गया।

