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  • पानी की स्मृति और भविष्य की प्यास : कुमारी रोहिणी

    हमारे समय में पानी का संकट दरअसल पानी का संकट नहीं बल्कि उसकी ‘स्मृति के खो जाने का संकट है। जिस समाज में तालाब और बावड़ियाँ केवल इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का नमूना थीं, वहाँ आज पानी बोतलों में बंद पैसों से मिलता है। विश्व पर्यावरण दिवस के बहाने कुमारी रोहिणी का यह लेख हमें विकास की अंधी दौड़ के बीच दो पल ठहरकर अपनी जड़ों की ओर देखने का न्योता देता है। पानी पर अनुपम मिश्र के काम और समकालीन कवियों की लिखी कविताओं के विमर्श के साथ यह लेख पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच एक ज़रूरी संवाद की तरह दिखाई पड़ता है। – मॉडरेटर

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    पानी की स्मृति और भविष्य की प्यास

    कभी-कभी लगता है कि हमारे समय का सबसे बड़ा संकट पानी का संकट नहीं, दरअसल स्मृति का संकट है।

    आधुनिकता के इस कंक्रीट समय में हमारे मनुष्य ने पानी से अपना रिश्ता बहुत छोटा और पेशेवर कर लिया है। हम सुबह उठकर नल खोलते हैं और पानी मिल जाता है। प्यास लगती है, तो जेब से कुछ सिक्के निकालकर या UPI पेमेंट करके प्लास्टिक की बोतलों में बंद पानी खरीद लेते हैं। बहुत हुआ तो एक फोन कॉल पर टैंकर हमारे दरवाजे पर आकर खड़ा हो जाता है। हमारे लिए पानी अब एक ‘सर्विस’ है, एक सुविधा, बाजार में बिकने वाली एक चीज़। लेकिन वास्तव में पानी की भूमिका और महत्ता को जानने के लिए इतिहास के पन्नों को बहुत पीछे तक पलटने की जरूरत नहीं है।

    कुछ दशक पहले तक पानी के साथ हमारा रिश्ता इतना मशीनी नहीं था। वह सीधा, आत्मीय और बेहद जीवंत था। तब किसी गांव का तालाब सूख जाना केवल जल संकट नहीं होता था, उसे पूरे समुदाय की चेतना पर लगे एक गहरे आघात की तरह देखा जाता था।

    हर साल जब जून का महीना आता है, तो वैश्विक विमर्शों की सुगबुगाहट के बीच हम ‘पर्यावरण दिवस’ की रस्म अदायगी करने लगते हैं। हम पेड़ लगाने के कुछ त्वरित संकल्प लेते हैं, प्लास्टिक को ना कहने की सामूहिक कसमें खाते हैं और एयर-कंडीशनर कमरों में बैठकर ‘क्लाइमेट चेंज’ की वैश्विक चिंताओं पर अकादमिक बहसें करते हैं।

    यह सब अपनी जगह जरूरी हो सकता है, लेकिन इस दिखावटी उत्सवधर्मिता के बीच कभी यह सवाल मन में कौंधता है कि क्या पर्यावरण की रक्षा सचमुच हमारे लिए कोई आधुनिक खोज है? या फिर यह उसी पारंपरिक बोध को एक अंग्रेजी नाम देने की कोशिश है, जिसे हमारे पुरखों ने सदियों पहले अपनी जीवनशैली में रच-बसा लिया था?

    आज पश्चिम की अकादमिक दुनिया जिस नए मुहावरे को नेचरबेस्ड सॉल्यूशन्स यानी प्रकृति-आधारित समाधान कहकर प्रचारित कर रही है। उसका मूल दर्शन यही है कि पर्यावरणीय समस्याओं का हल प्रकृति को जीतकर नहीं, बल्कि उसके साथ एक मूक समझौता करके ही निकाला जा सकता है। वर्षाजल को उसके गिरने के स्थान पर ही रोक लेना, दलदली जमीनों (आर्द्रभूमियों) को बचाना और स्थानीय जंगलों को पुनर्जीवित करना, ये सब उसी सोच के तकनीकी नाम हैं।

    लेकिन भारतीय समाज के लिए यह विचार कभी पराया नहीं रहा। बहुत पहले, जब सतत विकास (Sustainable Development) या पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) जैसे भारी-भरकम शब्दों का जन्म भी नहीं हुआ था, तब भी यहाँ के लोक-मानस ने पानी, मिट्टी, जंगल और मनुष्य के बीच संतुलन की एक मूक भाषा सीख ली थी। यही कारण है कि हमारी पारंपरिक जल संरचनाएं केवल इंजीनियरिंग की बेजान तकनीकें नहीं थीं, वे एक समूची सभ्यता की पर्यावरणीय संवेदनशीलता की जीवंत अभिव्यक्तियां थीं।

    जब पानी रिसोर्स यानी संसाधन नहीं था

    हमारे पुरखों के शब्दकोश में पानी कभी केवल एक ‘संसाधन’ या उपयोग की वस्तु नहीं रहा। वह जीवन का आदि-स्रोत था, इसलिए उसके प्रति समाज का व्यवहार भी निर्मल था।

    हिमाचल और उत्तराखंड के किसी सुदूर पहाड़ी गांव में उम्र के लगभग आख़िरी पड़ाव पर पहुँच चुके बुजुर्गों से बात करिए तो वे बताते हैं कि कैसे उनके बचपन में गाँव के ‘नौले’ (पारंपरिक जल-स्रोत) से पानी छूने से पहले हाथ-पैर धोना और जूते उतारना एक अनकहा सामाजिक नियम था। यह कोई अंधविश्वास नहीं था, बल्कि जल की पवित्रता और स्वच्छता को बनाए रखने का एक सामुदायिक अनुशासन था। गाँवों में कुएँ, तालाब, बावड़ियाँ और नौले केवल पानी भरने के ठिकाने नहीं थे, वे सामाजिक संवाद और मेल-मिलाप के जीवंत केंद्र थे।

    उनके संरक्षण के नियम राज्य की किसी फाइल से तय नहीं होते थे। उन्हें समाज और समुदाय खुद तय करता था। पीने के पानी के लिए अलग घाट थे, तो मवेशियों को नहलाने और कपड़े धोने के लिए अलग सीमाएं तय की हुई थीं। बरसात के आने से ठीक पहले, जेठ की तपती दुपहरी में पूरे गांव का मिलकर तालाबों की गाद निकालना और उनकी मरम्मत करना किसी सरकारी योजना या बजट का हिस्सा नहीं था। इसके लिए कोई ‘प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ नहीं बनती थी। समाज अपनी सहज बुद्धि से जानता था कि जल स्रोतों की मर्यादा की रक्षा करना दरअसल अपने ही भविष्य को सुरक्षित करना है।

    आज जब हम पर्यावरण संरक्षण की पूरी जिम्मेदारी सरकारों, कानूनों और एनजीओ के पाले में डाल चुके हैं, तब यह सोचना जरूरी हो जाता है कि पानी के प्रति वह साझी सामुदायिक जिम्मेदारी कहाँ ग़ायब हो गई, जो कभी हमारे अस्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा हुआ करती थी?

    भूगोल के साथ संवाद: विविधता का वितान

    भारत की भौगोलिक और भाषाई विविधता ने जल संरक्षण के भी उतने ही विस्मयकारी रूप गढ़े थे। राजस्थान के धोरों में जहाँ ‘जोहड़’ और ‘कुंड’ बने, वहीं गुजरात और पश्चिमी भारत की मरुभूमि में ‘बावड़ियों’ ने जल संचयन को स्थापत्य कला के शिखर पर पहुँचा दिया। बिहार की आहर-पइन प्रणाली ने नदी और बाढ़ के अंतर्संबंधों को संभाला, तो दक्षिण भारत में तालाबों का एक ऐसा नेटवर्क बुना गया जो एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।

    इन प्रणालियों के चेहरे अलग थे, लेकिन उनकी आत्मा एक ही थी, वर्षा की हर एक बूंद को स्थानीय स्तर पर रोकना, उसे धीरे-धीरे रिसने देना और धरती के भीतर के खाली हो चुके जल-बैंक को समृद्ध करना।

    अलवर के शुष्क अंचल में तरुण भारत संघ जैसी संस्थाओं के नेतृत्व में जब जोहड़ों का पुनरुद्धार हुआ, तो उसने ‘अरवरी’ जैसी सूखी और मृतप्राय हो चुकी नदियों को फिर से बारहमासी बना दिया। यह आधुनिक जलविज्ञान की किताबों से बाहर लोक-ज्ञान की उस ताकत का सबूत थी, जिसे हमने अनपढ़ मानकर बिसरा दिया था।

    बावड़ियों की स्थापत्य कला आज भले ही केवल पर्यटकों के कैमरों और रील बनाने के काम आ रही हो, लेकिन कभी वे जल सुरक्षा के साथ-साथ एक अद्भुत ‘क्लाइमेट-रेजिलिएंट’ सार्वजनिक जगहें थीं। जमीन के भीतर कई मंजिलों तक उतरती हुई ये सीढ़ियाँ न केवल वाष्पीकरण को रोकती थीं, बल्कि अपने आसपास के तापमान को भी पांच से छह डिग्री तक कम रखती थीं।

    वहीं, दक्षिण बिहार की आहर-पइन व्यवस्था यह बताती है कि वहाँ का समाज नदियों के स्वभाव और उनकी लहरों की गति को कितनी गहराई से पहचानता था। बाढ़ के अलावा पानी को पइन (नहरों) के जरिए आहर (जलाशयों) तक ले जाना और सूखे के महीनों में उसी पानी से खेतों को सींचना। यह प्रकृति से कोई युद्ध नहीं था, बल्कि भूगोल के साथ किया गया एक बेहद आत्मीय संवाद था।

    आस्था की ओट में पनपते और फैलते जंगल 

    भारतीय उपद्वीप में पर्यावरण संरक्षण की सबसे मुकम्मल कहानियाँ केवल पानी की संरचनाओं तक सीमित नहीं हैं, वे जंगलों से होकर भी गुजरती हैं। लेकिन इन जंगलों को बचाने के पीछे की मूल प्रेरणा भी अंततः पानी और जीवन को ही सहेजना था।

    राजस्थान के ‘ओरण’, झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिम अंचलों में ‘सरना स्थल’, पश्चिमी घाट की हरी-भरी ‘देवराइयाँ’ और उत्तर-पूर्व के ‘पवित्र उपवन’ (Sacred Groves) – ये सब प्रकृति को बचाने के वे ठिकाने हैं जिन्हें समाज ने आस्था की ओट देकर सुरक्षित रखा। किसी लोक-देवता या ग्राम-देवी की छत्रछाया से जोड़कर इन जंगलों में पेड़ काटना, टहनी तोड़ना या शिकार करना सामाजिक रूप से एक टैबू बना दिया गया।

    आम नजर से देखने वालों को यह महज एक धार्मिक कर्मकांड या आदिम ढर्रा लग सकता है, लेकिन अगर हम इसके भीतर छिपे पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को देखें, तो यह संरक्षण का सबसे टिकाऊ मॉडल था। पश्चिमी घाट की देवराइयों पर हुए कई वैज्ञानिक अध्ययनों ने यह साबित किया है कि ये पवित्र उपवन अपने भीतर प्राकृतिक झरनों और छोटी जलधाराओं के उद्गम स्थल को सहेजे हुए हैं।

    घने वनों की सघन छाँव के कारण यहाँ की मिट्टी में नमी बनी रहती है, जिससे भूजल का स्तर कभी कम नहीं होता। आदिवासियों और ग्रामीणों ने अपने साझा अनुभवों से यह जान लिया था कि यदि ये जंगल कटे, तो उनके जीवन की प्यास बुझाने वाले सोते भी हमेशा के लिए सो जाएंगे। आस्था ने यहाँ पर्यावरण प्रहरी की भूमिका निभाई और धर्म ने जल सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त किया।

    साहित्य और लोक में पानी की अनुगूँज

    शायद यही वजह है कि पानी भारतीय साहित्य और लोक-चेतना में कभी केवल एक निर्जीव रासायनिक तत्व या भौगोलिक इकाई बनकर नहीं आया। वह हमारी स्मृतियों, हमारे दुखों और हमारी साझी संस्कृति की धड़कन बनकर उपस्थित होता रहा है।

    फणीश्वरनाथ रेणु जब ‘मैला आंचल’ या अपनी कहानियों में पूर्णिया के आंचलिक जल-संसार को रचते हैं, तो कोसी और उसकी सहायक धाराओं का पानी लोकजीवन के सुख-दुख और उसकी नियति के साथ बहता है। राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘आधा गाँव’ में गंगा केवल एक नदी नहीं है, वह इतिहास, समय और साझी संस्कृति की ऐसी वाहक है जो धर्म और मजहब की दीवारों को बहा ले जाती है।

    निर्मल वर्मा की कहानियों की पहाड़ी दुनिया में झरनों की मद्धम आवाज और जलधाराओं का रिसाव मनुष्य के भीतर के अकेलेपन और प्रकृति के बीच के उस सूक्ष्म, अदृश्य धागे को उजागर करता है जिसे आधुनिक विकास तोड़ चुका है।

    इसी साहित्यिक निरंतरता में जब युवा कवि अमृत रंजन अपनी कविता पानी लिखते हैं, तो वे पानी के इसी स्मृति-लोप और आधुनिक मनुष्य की संवेदनहीनता पर तीखा प्रहार करते हैं। उनकी कविता बताती है कि कैसे आज का मनुष्य पानी के मूल स्रोत और उसके भीतर छिपे आदिम संघर्ष से पूरी तरह कट चुका है। कैसे वह पानी से संवाद कर उसके दुख को शब्दों में पिरोते हैं। यह कविता पानी को केवल एक बहते हुए तरल पदार्थ के रूप में नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता के मूक गवाह और एक नैतिक कसौटी के रूप में स्थापित करती है। यह पढ़ने वालों को आज के इस कंक्रीट समय में ठहरकर सोचने पर विवश करती है।

    साहित्य की इसी गहरी और भीतर बहने वाली संवेदना को जमीन पर उतारने का सबसे अनूठा काम हमारे समय के पानी के नायक कहे जाने वाले अनुपम मिश्र ने किया। उन्होंने ‘आज भी खरे हैं तालाब’ और ‘राजस्थान की रजत बूँदें’ जैसी कालजयी रचनाओं के माध्यम से पानी के पूरे विमर्श को एक बेजोड़ सौंदर्यशास्त्र और शास्त्रार्थ से जोड़ा है।

    अनुपम जी ने पर्यावरण को नीरस आंकड़ों और अकादमिक तकनीकी शब्दावलियों की कैद से बाहर निकालकर लोक-भाषा की सहजता में पिरोने का काम किया है। उन्होंने समाज को याद दिलाया कि ये तालाब और बावड़ियां अक्षम या अकुशल लोगों की बनाई संरचनाएं नहीं थीं, बल्कि एक विचारहीन आधुनिकता द्वारा हाशिए पर धकेल दिए गए समाज की संचित और सचेत बुद्धिमानी का प्रमाण थी।

    अनुपम जी का पूरा जीवन और काम इसी बात का जीवंत दस्तावेज है कि जब तक समाज पानी को अपनी ‘स्मृति’ और ‘साझा संपत्ति’ (Commons) नहीं मानेगा, तब तक कोई भी आधुनिक तकनीक हमारी प्यास नहीं बुझा सकती।

    लोक-साहित्य में भी पानी की जड़ें उतनी ही गहरी हैं। पनघट और कुओं पर गाए जाने वाले कजरी के गीत, सावन की पहली फुहार के स्वागत में गाए जाने वाले मल्हार, और तालाबों की प्रतिष्ठा से जुड़ी लोककथाएं, ये सब चीख-चीखकर कहती हैं कि पानी हमारे लिए कभी तकनीकी प्रश्न नहीं था, वह एक गहरा भावनात्मक और सांस्कृतिक सरोकार था।

    हमने जो खो दिया

    परिवर्तन प्रकृति का नियम है, लेकिन पिछली एक सदी में भारत के जल-परिदृश्य में जो बदलाव आया है, वह परिवर्तन नहीं, बल्कि एक विस्थापन है।

    नलकूपों की बेतहाशा आमद, पाइपलाइनों के कंक्रीट जाल और बड़े बांधों के अभिमान ने हमारे घरों तक पानी तो आसानी से पहुँचा दिया, लेकिन इस आसानी की कीमत हमने पानी के साथ अपने आत्मीय रिश्ते को दांव पर लगाकर चुकाई। सरकारी रिपोर्टों के माध्यम से भी  बहुत पहले ही चेतावनी दी जा चुकी है कि भारत के दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर जैसे शहर भयंकर भूजल संकट के मुहाने पर खड़े हैं। यह संकट सिर्फ आबादी बढ़ने का नहीं है, यह उन पारंपरिक प्रणालियों के मलबे में तब्दील होने का संकट है जो कभी चुपचाप धरती का पेट भरने का काम करती थीं।

    आज जब हम बेंगलुरु की सूखती झीलों को देखते हैं, चेन्नई और दिल्ली में मानसून की चंद घंटों की बारिश में आए अर्बन फ़्लड का मंजर भुगतते हैं, या गर्मियों में पचास डिग्री को छूते पारे से झुलसते हैं, तब समझ आता है कि जिन तालाबों और पानी के प्राकृतिक रास्तों को हमने विकास की राह का रोड़ा समझकर पाट दिया था, वे दरअसल हमारे शहरों के सुरक्षा कवच थे।

    विडंबना देखिए, हमने केवल तालाब या बावड़ियाँ नहीं खोई हैं। हमने पानी को समझने का वह सामुदायिक बोध और पीढ़ियों की वह संचित समझ भी खो दी है जो हमें प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व सिखाती थी।

    अतीत से भविष्य की ओर

    विश्व पर्यावरण के इस दौर में अक्सर यह कहा जाता है कि हमें नए संकटों से निपटने के लिए बिल्कुल ‘नए और अत्याधुनिक’ समाधान खोजने होंगे। यह स्थापना आंशिक रूप से सही हो सकती है, लेकिन उतनी ही महत्वपूर्ण यह जिद भी है कि हम उन समाधानों की पहचान करें और उन पर वापस लौटकर देखें, जिन्हें हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में पीछे छोड़ आए हैं।

    कुएँ, तालाब, बावड़ियाँ, जोहड़, आहर-पइन, नौले और पवित्र उपवन केवल इतिहास के मलबे या नॉस्टैलज़िया नहीं हैं। वे इस बात के जीते-जागते गवाह हैं कि एक पूरी सभ्यता ने प्रकृति को गुलाम बनाने की जिद के बिना, उसके साथ मिलकर जीने की एक मुकम्मल और टिकाऊ व्यवस्था बनाई थी। और वह भी बिना किसी मशीनी या तकनीकी मदद के।

    भविष्य की स्थायी और जलवायु-अनुकूल दुनिया केवल नई तकनीकों, सेंसरों और कॉर्पोरेट की फाइल से नहीं बचेगी। वह तब मिलेगी जब हम आधुनिक विज्ञान की तार्किकता और हमारे पारंपरिक ज्ञान की तरलता के बीच एक ईमानदार संवाद स्थापित कर पाएंगे।

    और शायद, जब हम भविष्य के संकटों से घबराकर समाधान खोजने बैठेंगे, तब हमारे ये पुराने सूखे तालाब, उपेक्षित बावड़ियाँ और गाँव के छोर पर चुपचाप खड़ा वह पवित्र पेड़ ही हमारे सबसे आत्मीय शिक्षक साबित होंगे।

    वे हमें याद दिलाएंगे कि धरती को बीमार किए बिना भी जिया जा सकता है। क्योंकि कभी-कभी भविष्य की सही राह एकदम आगे अंधी दौड़ दौड़ने से नहीं, बल्कि थोड़ा ठहरकर, अपनी ही जड़ों की तरफ पीछे मुड़कर देखने से दिखाई देती है।

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