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  • शंख एकांत का शिल्प: जोशना बैनर्जी आडवानी

    बांग्ला भाषा के प्रसिद्ध कवि शंख घोष का रचनाकर्म पर यह लेख लिखा है जोशना बैनर्जी आडवानी ने। यह लेख कुछ साल पहले उन्होंने रज़ा न्यास द्वारा आयोजित ‘युवा’ में पढ़ा था। अब आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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    “बुझे हुए चूल्हे में माँ,
    थोड़ा अंगार दे।
    थोड़ा समय बांच सकूँ
    बचने के आनंद में,
    पंख फैलाये कबूतर सब
    पिंजड़े में कैद हैं,
    दो एक मुठ्ठी भात मिलने पर
    उड़ने का मन बना लेंगे।
    ओह रे, तुझे भात दूँ मैं कैसे
    ओह, भात दूँ मैं कैसे ?”

    यह शंख घोष की बांग्ला कविता ‘जमुनाबोती’ की कुछ पँक्तियाँ हैं, जो १९५१ में लिखी गयी थी। जमुनाबोती १६ साल की एक लड़की थी, जिसकी, खाद्य आंदोलन, कोलकाता में पुलिस फायरिंग में मृत्यु हो गयी थी। यह आंदोलन काँग्रेस के खिलाफ़ कोलकाता में हुआ था, जब लोगों को अन्न नहीं मिल पा रहा था। यह कविता बहुत प्रसिद्ध हुई थी परंतु इसी कविता को १९५३ में कोलकाता के एक साहित्यिक कॉन्फ्रेंस में कवि बुद्धोदेब बासु ने शामिल करने से यह कहकर मना कर दिया था कि वह कविता नहीं ‘tormented howl’ है।
    इसी प्रकार एक किताब ‘कविता का मुहूर्त’, में कवि ने अपना दुःख लिखा जब उन्हें पता चला कि एक छोटी लड़की जिसने उत्तर प्रदेश के किसी ग्राम में मजबूरीवश आत्महत्या कर ली थी। एक अन्य समय जब उनके कई विद्यार्थी जो नक्सल आंदोलन में मारे गये, वह दुःख भी कवि ने लिखा, इस बात की परवाह न करते हुए कि किसकी सरकार है। वे द्रवित तब होते थे जब कभी देखते कि समाज का एक महत्वपूर्ण हिस्सा किस प्रकार क्रूर हो जाता है गरीबों के प्रति, गंभीर चीज़ों के प्रति अपना कंठ ऊँचा करना अवश्य ही जानते थे, परंतु किसी राजनीतिक पार्टी का हिस्सा हुए बिना ही उन्होंने यह काम किया और अगर देखते थे कि उस जगह पर कोई राजनैतिक दल जगह ले रहा है, तो वह जगह छोड़ देते थे। वह अगर अन्याय होते हुए देखते थे, तो उस परिस्थिति के खिलाफ खड़े होते थे, लिख देते थे इसलिए ही उन्हें बंगाल में ‘बंगाल का विवेक’ कहा जाता है।

    कवि होने से पहले शंख घोष स्वयं को एक छात्र मानते थे। तब भी, जब वे छात्र थे, तब भी जब वे एक शिक्षक थे और तब भी जब वे कविता लिखते थे, वे जहाँ से भी, जिस मनुष्य, पुष्प, परिस्थिति, आलय, जहाँ से भी वे अनुभव पाते थे, उसी जगह अथवा मनुष्य का स्वयं को छात्र समझते थे। उनकी कविता जो जगह बनाती थी, उन जगहों पर उनका ही नहीं, लिखने वाले अन्य कवियों का भी आधिपत्य होता था, वहाँ से चार और कवि निकलते थे और उन चार कवियों के ज़रिए आठ कविताएँ और निकलती थीं। इसलिए, उन्हें मात्र पाठकों के लिए ही कवि नहीं कहा जाता वरन् कवियों के लिए भी कवि कहा जाता है। उन्होनें कविता में अलग अलग तरीकों से प्रयोग भी किया, यही उनकी प्रकृति थी, हालांकि इस विषय में कुछ लोगों ने आपत्ति भी की। उनकी कविता में एक जगह पर अगर आप समग्रता देखेंगे तो किसी अन्य जगह पर अनिश्चितता भी देखेंगे। पूर्वो बांग्ला में जो उनका जीवन बीता, जो वर्तमान में बांग्लादेश में है, यह १९४७ से पहले की बात है, तब वे मात्र पंद्रह साल के थे, तो उस समय की जो अभिज्ञता और स्मृतियाँ हैं, वे सभी उनके मन में अंत तक रहीं। उनका यहाँ भारत आना, उनके अपने लोगों का बिछड़ जाना, उनके दादा, दादी का वहीं रह जाना, यह सब। उन्होंने इन्हीं स्मृतियों में अपना जीवन यापन किया, आगे बढ़े, उन सभी स्मृतियों से कभी बाहर नहीं निकल सके और हम इस बात को समझते हैं कि उनकी कविताओं में उन स्मृतियों ने अपने लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया है। वे सोचते थे कि उनकी तरह जो अन्य लोग हैं, जिन्होंने स्थानांतरण के समय स्वयं को किस तरह से एक देश से दूसरे देश में धकेला, यह द्वंद का जो अस्तित्व है, यह उनके भीतर एक शिल्पदृष्टि की तरह काम करता रहा। उनका दृष्टिकोण, उनकी मानसिकता उनके लेखन में उतरती रही परंतु इसमें उनकी शिल्पनीति और प्रच्छन्ननीति में एकरूपता जैसी कोई बात नहीं दिखती थी। उदाहरण के तौर पर आप ये देखिए कि उनकी एक कविता है ‘अंजलि’ (छन्द के भीतर इतना अँधकार) जिसमें वे लिखते हैं ,’बाढ़ ने जमा ली है सत्ता/ घरहीन, पथहीन, प्रियहीन, परिचितहीन/ और तुमने अकेले इतने छोटे दोनों हाथों को स्तब्ध कर/ महा-समय के शून्यतल में थाम रखा है खप्पर।” इस कविता की शिल्पनीति से हम जान पा रहे हैं कि वह समय जिसे उन्होंने एक जीवनमूल्य गतिमान की तरह अपने ऊपर आते देखा, वह समय उनके बाद के समय में भी अनेक वर्षों तक हावी रहा।
    अब देखिए एक अन्य कविता ‘वृष्टि’ (मेघ जैसा मनुष्य) में वे लिखते हैं कि ‘जल भरे खेत सुख से फिर से/ दुःख धान भरे फिर एक बार/ ऐसी वर्षा के दिन लगता है/ नहीं जन्म का मेरे कोई अन्त नहीं।’
    तो यह मनबात प्रच्छन्नता को दर्शाती है। कवियों में तो इतनी शक्ति नहीं कि वे स्वयं को सुख और पीड़ा से काटकर अलग कर लें, हाँ, कवियों में इतनी शक्ति तो है कि उसी पीड़ा में पकते हुए, स्वयं को गलाते हुए, उस सांघातिक अव्यवस्था में भी लिख सकने जितनी भर धन्यता का अनुभव करते हैं। शंख घोष की कविता में छूट जाने की, गहनतम अँधेरे की पीड़ा की इमेजिस आती हैं। जो दृश्य में दिखा, उन्हीं परिस्थितियों में लिपटी आत्माभिव्यक्ति, उसी अल्प में सौन्दर्य निर्मिति गृहीत हो सकने का प्रयोजन या यूँ कहें कि किन्हीं जटिल परिस्थितियों में फँसा मनुष्य भीतरी रास्ता खोजता हुआ किस तरह से साभिप्राय एक अलिखित संकेत से इतना मचल उठा हो कि स्वयं को सशरीर कागज़ पर गिरा ले। शंख घोष एक कम्फर्ट ज़ोन के कवि नहीं थे।

    वे प्रतिबद्धताओं के प्रति सजग थे। समय के साथ प्रतिबद्धता, लेखन और समाज के साथ प्रतिबद्धता के प्रति सचेत रहते थे। एक समय समाज में हो रहे अन्याय के विरूद्ध जब शंख घोष ने लिखा तो उनके लिए यह कहा गया कि वे भी तो हममें से एक हैं। हममें से एक मतलब, हम नेताओं जैसे ही। तब उन्होंने उस समय एक टिप्पणी लिखी थी कि – “नहीं, मैं तुम में से कोई भी नहीं हूँ, मैं तुम जैसा नहीं हूँ, मैं किसी अन्य को बोलते सुनकर नहीं लिखता। मैं, मैं ही हूँ। जो देखता हूँ, वही लिखता हूँ।”

    वे दिशा दिखाने वाले कवि थे। वे फुल टाईम रबीद्रनाथ टैगोर स्कॉलर थे। वे रवींद्रनाथ टैगोर को पढ़ते थे परंतु उनकी कविता में आपको टैगोर नहीं मिलेंगे, इसलिए वे टैगोरियन पोएट नहीं कहलायेंगे। उन्होंने टैगोर की साहित्यिक विरासत को अंत तक आगे बढ़ाया। वे राजनैतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपना पक्ष रखते थे। वे स्वयं मृदुभाषी थे परंतु असहिष्णुता के खिलाफ सदैव आवाज़ उठाते थे। उनकी एक विशिष्ट धारा थी। एक शुद्ध अखंडता के कवि, जो होने और कुछ न हो सकने के मध्य जैसे इस्तीफा दे रहे हों कि नहीं इस तरह से मध्य में मैं नहीं रहूँगा, मैं रहूँगा तो होने में रहूँगा वह कहते हुए जो न्यायोचित है और कुछ नहीं हो सकने में ऐसे रहूँगा कि हो रहे अन्याय पर लिखना नहीं छोड़ते हुए सब लिख दूँगा। उनका कविकर्म पीड़ा की कविताओं में भी एक संतुष्टि भर देता था कि मानो पीड़ा के लिए भी सुंदर जगहें हो, पीड़ाओं को कोई देह न खोजनी पड़े, मनुष्यों को पीड़ाओं के लिए भी स्थान बना लेनी चाहिए। एक कविता है ‘नहीं’ (मेघ जैसा मनुष्य) जिसमें कवि लिखते हैं कि,
    ” तुम कहतीं थीं घर होगा – घर हुआ
    इसके बाद?
    तुम कहतीं थीं प्रेम फलेगा – फला
    फिर?
    प्रेम कहाँ तक ले जायेगा? अन्धकार भी जान सका कब, उससे भी ज़्यादा ताकतवर, कोई मेरे भीतर?

    शंख घोष की कविताओं में हमने स्वयं को खड़ा पाया, अपना जीवन देखा, कवि के साथ साथ स्वयं को जूझते देखा। भुला दिए गये लोगों के प्रति, पक्षपात से सहमे लोगों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को हमने समय समय पर अलग अलग जगहों पर पढ़ा। जादवपुर के एक सेमिनार में बांग्ला लिटरेचर की प्रोफेसर शंपा सेन ने अपने विद्यार्थियों से हमेशा कहा कि, “जब जब समाज में यातनाओं का अँधकार बढ़ जाये, मशाल पाने के लिए शंख घोष की कविता पढ़ना।” मनुष्यता इनका मुद्दा रहा और कविता सत्य कहने का माध्यम। जो मार्ग उन्होंने स्वयं के लिए चुना, उस मार्ग से उन्हें किसी प्रकार की राजनीति डिगा नहीं सकी। १९५० में कवि का जो एक सचेत दृश्य बना था बंगाल में, वह दृश्य बहुत विराट है। जन आंदोलन में होते हुए भी वे राजनैतिक दलों से दूर रहे और उनकी कविताएँ लोगों की व्यक्तिगत कविताएँ कहलाईं।
    खण्डित चीज़ों में सौंदर्यमयी ओज भरने जितना दुरूह कार्य कविता में इस प्रकार दर्शाना ताकि उन चीज़ों की आकुलता और आबद्धता दरारों के रूप में दिखती रहे और पढ़ते समय कतई ऐसा न लगे कि इसपर बनावटीपन से रंगरोगन किया गया हो। उन्हें बंगाल का भविष्यवक्ता भी कहा जाता रहा और यह भी कि जो शंख घोष आज देख रहे हैं, वह बंगाल सालों बाद देख सकेगा।
    २०१८ में जब बंगाल की राजनीतिक दुनिया पंचायत चुनाव में बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के बाद सदमे में थी, और उस समय की मुख्यमंत्री के करीबी अनुब्रत मंडल ने दावा किया कि ‘देखो जनता देखो! विकास सड़कों पर खड़ा है।’, शंख घोष ने सत्ताधारी दल का अहंकार केवल तीन पंक्तियों में लिखकर तोड़ा कि “अपनी तीनों आँखें खोलें और देखें, सड़क पर एक बलि की तलवार के साथ विकास खड़ा है यानि की पहने बलिदान दो फिर विकास देखो। ऐसे विकास का क्या ही लाभ जो पहले मृत्यु दे।

    उनकी संवेदना में हम सभी हैं। कहीं न कहीं मैं, आप, नदी किनारे बैठा कोई श्वान, भूखा बच्चा, वह वृद्ध जिसका घर बाढ़ में बह गया, हम सभी मिलेंगे।
    साधारण में असाधारण की बहुमुखता और संहति की भावना लिए उनकी सटीकता, उनकी उपस्थिति और उनकी चिंता हमें यह बताती है कि उनकी पाक्षिकता ही उनकी दैनिकता है।

    उन्हें पार्किंसन्स बीमारी हुई, पर वे नहीं रुके। वे तब भी श्रुतलेख करवते रहे। ‘तुमी दियेछिले भार, आमी ताई निर्जोन राखाल’, अर्थात ‘तुमने मुझे ज़िम्मेदारी दी, इसलिए मैं एक अकेला चरवाहा हूँ’ अर्थात जो ज़िम्मेदारी उन्हें लेखनी से मिली, जो ज़िम्मेदारी वे अपने कवि होने के प्रति देखते थे, पाठकों के प्रति सोचते हुए लिखते थे, यहाँ उसी ज़िम्मेदारी के प्रति यह लिखा गया है।

    कवि के अनुसार जो मनुष्य ज़रूरतमंद के लिए आवाज़ नहीं उठाता, वह तुच्छता से जीवन यापन करता है। जब वाम मोर्चे का मध्याह्न सूर्य तप रहा था ‘प्रताप अंधता’ नामक वक्तव्य में कवि ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि, “प्रताप मत्तता या प्रताप अंधता किसी भी सरकार के लिए सर्वनाशकारी है… मनुष्य के सामान्य क्षोभ और प्रतिवाद के प्रकाश को ही शत्रुता मान लिया जाता है। जाने-अनजाने हमें हिंसक समाज विरोधी झुंड के सामने फेंक दिया गया है।”

    एक समय था जब शंख घोष की कविता को पत्रिकाओं में प्रकाशित होने से रोक दिया गया था। ‘देश’ पत्रिका के संपादक सागरमय घोष ने कवि से कुछ कविताएँ माँगीं थीं परंतु उनमें से कुछ कविताएँ नहीं छपीं। कवि के घर में टेलीफोन नहीं था। पड़ोस से सागर दा को फोन किया तो उत्तर मिला, “संकोच में तुमसे नहीं कह पाया । हाँ, ऐसा हुआ है। दो कविताओं को उन्होंने अलग करके पैकेट में पैक करके रख दिया है और उस पर लिख दिया है, “नॉट टू बी प्रिंटिंड”, आप कोई अन्य दो कविताएँ भेजें।”
    शंख घोष ने कहा, “आजकल तो इसी प्रकार की कविताएँ लिख रहा हूँ। अब कोई और नहीं भिजवा रहा।”

    एक दोपहर पाक्षी में एक तालाब में नहाते समय शंख घोष तालाब में डूब गये थे, तब उनके चाचा की बेटी ने उनके बाल पकड़कर बाहर खींचा। एक डॉक्यूमेंट्री में कवि ने इस बात का ज़िक्र करते हुए कहा है कि, “जब मैं डूब रहा था तब मुझे तल तक जाने का डर मार रहा था। यह स्मृति मेरे अंदर से जाती नहीं, इसलिए ही मेरी कविताओं में जल अपनी जगह बना लेता है। उस दिन पता नहीं पानी मुझे काट काट कर कहाँ पहुँचा देना चाहता था। बाद में, मुझे बांग्लादेश ने हाथ में उठाकर कुछ भी नहीं दिया परंतु मैं बांग्लादेश को अपने मन में एक शिशु की तरह रखता हूँ। पुराने घर में जहाँ ऊपर की ओर लाल, नीले, नारंगी, पीले काँचों को लगाया गया था, वह चीज़ें भी मेरी कविताओं में आती हैं। पिता मेरी कविता से दूर रहे, माँ के कारण ही मैंने कविता लिखना शुरू किया। मेरा जो मूल स्थान है, वह मेरा नहीं हुआ, इस कारण से मैं अव्यवस्थित रहा। कलकत्ता में मैं रहता हूँ परंतु यह मेरा तो नहीं, मनुष्यों के मध्य अजनबी बनकर खड़ा होता हूँ। देशभाग के समय से ही यह सुनता चला आ रहा हूँ कि ये कौन लोग आ गये यहाँ, इन्होंने अपनी गंदगी से कलकत्ता की सुंदरता को नष्ट किया। मैं एक आउटसाइडर हूँ, ऐसा सुनता आ रहा हूँ। भीड़ में चलता हूँ तो भीड़ कहती है, श्रिंक होकर चलो, आँखों से क्या दिखता नहीं, छोटे हो के चलो, झुक कर चलो। और कितना छोटा हो जाऊँ? ईश्वर, सूर्य, संसार, हाट, बाज़ार से तो छोटा ही हूँ। सुहास मुखर्जी से जान पहचान और बातचीत हुई। वे मुझसे स्नेह करते थे। १९५४ में एक यूथ फेस्टिवल हुआ था, उस समय मुझसे पूछा उन्होंने क्या मैंने कोई पार्टी जॉयन किया है और मैं पार्टी मेंबरशिप लेना चाहता हूँ। मैं मुस्कुराता हुआ अंत तक मना करता रहा। पार्टी की एक राजनीति है, इसके साथ एक साहित्यनीति भी है, जिसने कभी मुझे आकर्षित नहीं किया। मेरी कविताओं में राजनैतिक चिह्न है। यही मेरी स्वतंत्रनीति है कि मैंने राजनीति कभी नहीं की। विश्वयुद्ध के समय से हम फ़ासिज़्म के विरूद्ध बात करते हैं परंतु फ़ासिज़्म सिर्फ एक विशिष्ट मतवाद ही नहीं अपितु एक दृष्टिभंग है। जो दिखाते हैं कि वे मार्क्सवादी हैं, वे भी सर्वनाश ला सकते हैं। मैं किसी भी दल के साथ कभी घनिष्ठ नहीं हो पाया। प्रेम में मेरा प्रबल विश्वास है परंतु प्रेम तक मैं अप्रेम के रास्ते ही पहुँचता हूँ। हम अपने आस पास चीज़ का सही सही मूल्य लगा नहीं पाते।”
    शंख घोष रहते कोलकाता में थे परंतु वे सदा उत्सुक रहते थे कि बांग्लादेश में क्या-क्या लिखा जा रहा है? एक बार बांग्लादेश के राष्ट्रपति ‘इरशाद ने उन्हें स्टेट गेस्ट के रूप में आमंत्रित किया था, परंतु कवि ने वह आमंत्रण ठुकरा दिया। बाद के दिनों में भी तबियत खराब होने के बावजूद उन्हें अगर ये लगता था कि अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठानी है, तो प्रोटेस्ट मार्च में उपस्थित रहते थे।
    शंख घोष विनम्र व्यक्तित्व के धनी थे। दर्प अथवा असभ्यता उनके शब्दकोश में नहीं था। उनके पास शिक्षण की एक बेदाग शैली थी जिसने निस्संदेह बांग्ला विद्वानों की भाषा और पीढ़ियों को समृद्ध किया। विभाग में संगोष्ठियों, कार्यशालाओं और प्रदर्शनियों के लिए वे प्रमुख व्यक्ति रहे जो कि विचार और ऊर्जा से परिपूर्ण थे। वे जानते थे उन्हें अपने शिष्यों को रचनात्मक कार्यों के लिए कैसे प्रेरित करना है।
    यह बात १९५० की है, जब शंख घोष प्रेसिडेंसी कॉलेज, कोलकाता में पढ़ते थे। वे उन दिनों भी कविताएँ लिखते थे परंतु उस समय में नितान्त अनाम कवि थे, उनके दो मित्र थे, हीरेंद्रनाथ चक्रवर्ती और प्रद्युम्न भट्टाचार्य। एक बार कॉलेज के कुछ छात्रों ने मिलकर तय किया कि कॉलेज में एक साहित्यिक कार्यक्रम करवाते हैं, जिसमें उस समय के बड़े-बड़े साहित्यकारों को आमंत्रण देंगे जैसे नोनी भौमिक और हीरेंद्र भट्टाचार्य। फिर यह तय हुआ कि मानिक बंदोपाध्याय को भी आमंत्रित किया जायेगा, वे अपने समय के प्रतिनिधि साहित्यकार थे। इन्होंने अपने २८ वर्ष की साहित्यिक यात्रा में ३८ उपन्यास लिखे थे। बात यहाँ पर आकर रुक गई कि मानिक बंदोपाध्याय को आमंत्रण देने कौन जाएगा क्योंकि वे साहित्यिक कार्यक्रमों में बहुत कम जाते थे। उनकी तबियत ठीक नहीं रहती थी। उन्हें मिर्गी के दौरे पड़़ते थे। फिर यह तय हुआ कि शंख घोष जाएंगे।
    अगली सुबह शंख घोष बस से मानिक बंदोपाध्याय के घर पहुंचे। छोटी गली से गुज़रते हुए एक बहुत छोटे से घर का दरवाज़ा खटखटाने पर उनकी पत्नी बाहर आईं और पूछने पर बोली कि, “वे तो सब्ज़ी लाने गए हैं। आप मुझे बताइए क्या काम है?” शंख घोष ने कहा, “मैं बाहर प्रतीक्षा करता हूँ, उन्हीं से कहूँगा।” यह कहकर सोचने लगे कि साहित्यकार भी क्या सब्ज़ी लेने बाज़ार जाते हैं! आधा घंटा प्रतीक्षा करने के बाद शंख घोष देखते हैं कि धोती पहने एक आदमी हाथों में दो झोले लटकाए दरवाज़े पर आकर खड़े हो गए हैं।
    उन्होंने उठकर प्रणाम किया, मानिक बंदोपाध्याय उन्हें घर के अंदर ले आए, घर के अंदर एक ही कमरा था जिसमें एक पलंग, एक मेज़ जिसपर कोई भी कागज़, कलम या कोई किताब नहीं थी और एक कुर्सी रखी थी। मानिक बंदोपाध्याय ने कहा, “क्या देख रहे हो भाई? यही न कि लेखक का घर कैसा है? क्या करूँ, प्रकाशक ने अभी तक कुछ पैसे दिए नहीं और पाठक तो पैसे क्या ही देंगे। ऐसे ही होते हैं लेखक। तुम क्या कोई पत्रकार हो, क्या मेरी कोई कहानी लेने आए हो, क्या मेरी कोई किताब खरीद कर पढ़ी तुमने?” शंख घोष ने बड़े ही धीमे स्वर में उत्तर दिया, “मैं तो विद्यार्थी हूँ, पुस्तकालय से लेकर ही पुस्तक पढ़ता हूँ, अभी खरीद नहीं सकूँगा, आपको एक कार्यक्रम की सूचना देने आया हूँ कि अमुक तिथि पर यह कार्यक्रम होगा और आप को मैं सादर आमंत्रित करता हूँ, आप आयेंगे तो हम सब का मान बढ़ेगा।” मानिक बंदोपाध्याय ने बात दे दी कि वे समय पर पहुँच जायेंगे। शंख घोष चरण स्पर्श करके वापस लौट आए। वापस पैदल ही कॉलेज तक गए क्योंकि उनके पास बससे वापसी के पैसे नहीं बचे थे। उतना रास्ता चलकर उन्होंने पार किया। उस दिन उन्हें लग रहा था कि वे उड़ रहे थे क्योंकि वह अपने समय के महान साहित्यकार से मिलकर लौटे थे, वह उस दिन की बहुत बड़ी बात थी। कार्यक्रम से ठीक एक दिन पहले शंख घोष को घर पर एक पोस्टकार्ड मिला जिसमें लिखा था, ‘तबीयत खराब होने के कारण कार्यक्रम में पहुँच नहीं सकूँगा। लज्जित हूँ। मानिक बंदोपाध्याय।’ पढ़कर शंख घोष को लगा कि एक महान साहित्यकार को नहीं सुन पाऊँगा, बीस वर्ष पीछे चला जाऊँगा, भरपाई कैसे करूँगा। अभी भी शंख घोष के घर वह पोस्टकार्ड सुरक्षित रखा है।
    अंत समय में भी उन्होंने अश्वेत अमेरिकी कवियों द्वारा लिखी गई कुछ कविताओं का अनुवाद किया और वे प्रकाशित हुईं। वे अपने अंतिम दिनों में उन्हें पुनः प्राप्त करने का प्रयास कर रहे थे और एक संक्षिप्त संकलन की योजना बना रहे थे। लेकिन उन्हें कार्य समाप्त करने का अवसर नहीं मिला। जितना कार्य हो सका, वह ५ फरवरी २०२२ को प्रकाशित हुआ। कवि की निष्कम्प प्रतिबद्धता ने, पद्य और गद्य, दोनों में ही उनकी कर्मठता और शैली को जिलाये रखा है। वे कंठ ऊँचा किए बिना ही अपनी आवाज़ बुलंद करना जानते थे।

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