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  • दिवाली के दिन ही क्यों होती है लक्ष्मी पूजा?

    लक्ष्मी पूजा के कितने रूप हैं, क्या दिवाली की रात में पूरे भारत में लक्ष्मी की पूजा होती है? लक्ष्मी की पूजा होती है तो कहीं-कहीं काली की पूजा भी होती है। इन बातों को लेकर यह लेख लिखा है बीएचयू के शोधार्थी अविनाश राय ने। वे बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास,संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में शोध कर रहे हैं। आप उनका यह लेख पढ़िए। लेख के साथ जो तस्वीर है वह रामकृष्ण आश्रम वाराणसी में लक्ष्मी पूजा का दृश्य है- मॉडरेटर

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    शरद पूर्णिमा के दिन उत्तर भारत में ऐसी मान्यता है कि आकाश से अमृत बरसता है। इस अमृत से व्यक्ति अछूता न रहे इसलिए वह खीर बनाकर उसे खुले आकाश में रखता है। जब अमृत की वर्षा होगी तो उसकी कुछ बूंदे तो इस खीर में आ जाए। वहीं,भगवान कृष्ण ने 16 हजार गोपियों से इसी दिन रास रचाया था। बल्कि कथा तो यह भी मिलती है कि भगवान शंकर स्वयं इस रास को देखने की इच्छा से वृन्दावन पहुंचे थे। लेकिन रास में पुरुषों का प्रवेश वर्जित था। भगवान शंकर को इस रास से इतना लगाव था कि उन्होंने गोपी का रूप धारण कर लिया। भगवान शिव का यही रूप गोपेश्वर कहलाया। रास के इस प्रसंग पर सूरदास की कविता भी मिलती है

    आजु हरि अद्भुत रास उपायौ ।

    एकहिं सुर सब मोहित कीन्हे, मुरली नाद सुनायौ॥

    अचल चले, चल थकित भए, सब मुनिजन ध्यान भुलायौ।

    चंचल पवन थक्यौ नहिं डोलत, जमुना उलटि बहायौ॥

    थकित भयौ चंद्रमा सहित-मृग, सुधा-समुद्र बढ़ायौ।

    सूर स्याम गोपिनि सुखदायक, लायक दरस दिखायौ॥

    इसके अतिरिक्त इस दिन माँ लक्ष्मी की भी पूजा होती है। लेकिन लक्ष्मी की यह पूजा उत्तर भारत में नहीं होती है। उत्तर भारत में तो लक्ष्मी पूजा दीपावली के दिन होती है। आगे इस लेख में हम यही जानने की कोशिश करेंगे …

    ‘काशी का इतिहास ‘लिखकर जगत प्रसिद्ध हुए मोतीचंद्र धर्मयुग में ‘सौंदर्य और ऐश्वर्य की देवी’ में लिखते है:हिन्दुओं की सर्वप्रिय देवी है, लक्ष्मी जी है। शायद ही कोई घर होगा, जहां किसी भी रूप में लक्ष्मी पूजन न होता हो। उत्तर भारत में दिवाली के अवसर पर घर घर में लक्ष्मी पूजा होती है। भक्त पूजकों का विश्वास है कि इस पूजा के फलस्वरूप वर्ष भर सर्वांगीण उन्नति और समृद्धि सुनिश्चित है। यह जनकथा सर्वत्र प्रचलित है कि दिवाली के दिन लक्ष्मी देवी प्रत्येक के घर जाती हैं और जहां उनकी आवभगत के लिए दीपदान और जागरण होता रहता है, वहीं वे बस जाती हैं।

    बनारस में लक्ष्मी पूजन का पर्व सोलह दिन चलता है। मंदिर में भक्त लोगों की अपार भीड़ लग जाती है। कुछ बनारसी गृहस्थ तो घिसे चंदन से गज लक्ष्मी की मूर्ति आंककर उसे अपने अपने कोषागार में स्थापित करते हैं और दिवाली के बाद इस चंदन मिश्रित जल को घोलकर सर्वत्र छिड़क लेते है। साल भर के लिए लक्ष्मी जी का निवास निश्चित हो जाता है।”

    प्रत्यक्ष लक्ष्मी पूजन देखने का संयोग इसी बनारस में लक्सा स्थित रामकृष्ण आश्रम में बना। जहां लक्ष्मी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा के साथ विधि विधान से लक्ष्मी पूजन शुरू हुआ था। जहां रात को भोग लक्ष्मी के समक्ष छोड़ दिया जाता है क्योंकि इस दिन लक्ष्मी रात भर जागरण करती है। लक्ष्मी पूजन अगले दिन दधिकर्मा के भोग के पश्चात समाप्त होता है। दधिकर्मा सामान्यतः चूरा गुड़ का प्रसाद रहता है जिसमें कपूर मिश्रित नारियल गुड़ भी रहता है। इस भोग की मान्यता ऐसी है कि विसर्जन से पहले देवी को शीतल भोग अर्पित किया जाये। इस भोग के दूसरे पक्ष भी हो सकते है जिन से हम परिचित नहीं है। ठीक वैसे ही कि इस आश्रम में दीपावली के दिन काली पूजा होती है। जबकि सारा उत्तर भारत लक्ष्मी पूजन कर रहा होता हैं।

    दरअसल असम व बंगाल में लक्ष्मी पूजा आश्विन पूर्णिमा की रात्रि में ही होता है। यह पूर्णिमा वहां कोजगारी पूर्णिमा कहलाती है। ऐसा क्यों होता है? इसे समझने के लिए एक निबंध पढ़ा जिसका शीर्षक ‘अमावस्या के हृदय में लक्ष्मी’ में जिसके लेखक ‘कुबेरनाथ राय’ है। वे अपने इस निबंध में लिखते है:पूर्णिमा के समय लक्ष्मी पूजन ज्यादा समीचीन लगती है। क्वार की शारदीय पूर्णिमा रात्रि को आकाश का चेहरा कोमलकान्त और सौम्य रहता है। दिशाएं आकाश से झरते दूध में स्नान करके निर्मल और प्रसन्न रहती हैं। लगता है कि दिन की दारुण आतप व्यथा का कोई अपहरण कर रहा है और चारों ओर अनुग्रह, प्रीति, अनुकम्पा और आशीर्वाद छाया हुआ है। ऐसे में लक्ष्मी का आवाहन सर्वथा समीचीन है। आखिर लक्ष्मी तो सोमशक्ति है, सोम सहोदरा है और विष्णु से जुड़ी है। उसके शुभागम के लिए ऐसा ही समय उपयुक्त हो सकता है। लक्ष्मीपूजन का दूसरा उपयुक्त समय है बसन्त पंचमी। इसे उत्तर भारत में श्रीपंचमी कहा जाता है। उस दिन उत्तर भारत में गृहस्थ संध्या को खीर और नवान्न की आहुति देकर लक्ष्मी पूजन करते हैं और नवान्न ग्रहण करते हैं। यह शस्य लक्ष्मी का उत्सव है और आनेवाले मधु माधव की आगमनी का उत्सव है।”

    यही नहीं बिहार में मैथिल लोगों में नव विवाहित वधु को लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है। भारत में लक्ष्मी पूजन प्राचीन काल से होता आ रहा है। जो सिंधु सरस्वती सभ्यता से शुरू होता है। मोतीचंद्र अपने लेख में लिखते है, ‘सिन्धु सभ्यता से कुछ ऐसे पाषाण प्रतीक प्राप्त हुए हैं जिनको पुरातत्ववेत्ता जनेंद्रियों की स्थूल आकृति कहते हैं। साथ ही हड़प्पा में एक ऐसी मृण्मुद्रा मिली है जिसमें एक नारी के गर्भ से वृक्षोत्पत्ति और साथ ही नरबलि प्रदर्शित है।

    बहुत सी अत्यधिक मेखला परिवृत नारी मृण्मूर्तियां भी मिली हैं ,अत: ऐसा प्रतीत होता है कि सिन्धु सभ्यता के धार्मिक विश्वासों में धन धान्य और सनातन समृद्धि की कामना के साथ मातृ पूजा का सामंजस्य कर लिया गया था।आगे वैदिक साहित्य में श्री और विष्णु का कोई संबंध नहीं मिलता। लेकिन तैत्तरीय संहिता में अदिति की विष्णु पत्नी के रूप में स्तुति की गई है। विशेषत: यहां मातृत्व प्रधानता है, पृथ्वी को अदिति का पर्याय बताया गया है। अदिति और श्री में पूर्ण समानता तो नहीं की गई, परन्तु परवर्ती काल में “श्री मारदेवता”(मोरहुत शिल्प) की वंदना भी हुई है। महाभारत और पौराणिक युग में श्री लक्ष्मी की प्रधानता वैसी हो गई है जैसी कि शिल्पकलाओं में मिलती है। उनका जन्म समुद्र मंथन के फलस्वरूप हुआ और उन्हें कामदेव की माँ कहा गया है। उनको कुबेर और इंद्र के साथ भी जोड़ा गया है। उन्हें भाग्य लक्ष्मी भी माना गया।

    यह सिर्फ हिन्दू धर्म में ही नहीं बल्किल बौद्धों के जातक कथाओं में श्री, ही और ली का तादात्म्य लक्ष्मी से ही जुड़ता है। वहीं जैन साहित्य के कल्पसूत्र में श्री को देवी मानकर वंदना और पद्मा असुर गज के साहचर्य का विवरण आता है। यही नहीं सांची के स्तूप में भी लक्ष्मी का अंकन मिलता है।लक्ष्मी की मूर्ति मथुरा कला में भी प्राप्त होती है।और गुप्तों के अभिलेखों में भी श्री का वर्णन मिलता है।

    लेकिन इस लक्ष्मी को उत्तर भारत में अमावस्या को क्यों पूजा जाता है।इसका उत्तर कुबेरनाथ राय के निबंध में मिलता है। वह लिखते है कार्तिक की घोर मूढ़ अमावस्या रात्रि यह तो तांत्रिकों सिद्धियों की वेला है, महारात्रि  है। शास्त्र चाहे जो कहें, इसकी आकृति प्रकृति से लक्ष्मी नहीं, महाकालिका ही मेल खाती है और असम बंगाल में तो यह रात्रि कालीपूजन की रात्रि ही मानी जाती है। लेकिन उत्तर भारत में अमावस्या को लक्ष्मी पूजन होता है तो कोई न कोई कारण रहा होगा। इसमें पूर्णिमा और अमावस्या दोनों सहोदरा हैं अथवा यों कहे तो ठीक होगा कि एक ही कालशक्ति  के दो चेहरे हैं। एक है उसका स्वयं उद्घाटित रूप त्रिपुसुंदरी रूप, दूसरा है रहस्यमय बीजरूप, अव्यक्त रूप कालिका। एक का प्रतिनिधित्व करती है पूर्णिमा रात्रि ,दूसरे का काली अमावस्या।

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