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  • शैलेंद्र: एक किताब के बहाने याद

    पिछले साल आवाज़ की दुनिया के जाने-माने नाम यूनुस ख़ान की किताब आई थी ‘उम्मीदों के गीतकार शैलेंद्र’। राजकमल से प्रकाशित इस किताब पर यह टिप्पणी लिखी है प्रसिद्ध लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने। आज गीतकार शैलेंद्र की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर पढ़िए- मॉडरेटर

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    हाय ग़ज़ब कहीं तारा टूटा

    “मिट्टी की सोंधी ख़ुशबू को अगर लफ़्ज़ों में ढाला जाए तो वो शैलेन्द्र के गीत बन जाएँगे। मौसम के आज़ाद परिन्दों की परछाईं से स्याही उधार माँगकर कोई नाम लिखा जाए तो वो नाम गीतकार शैलेन्द्र का होगा।” इरशाद कामिल।

    कयास लगाइए जिस किताब की प्रस्तावना इरशाद कामिल लिखेंगे वो किसकी होगी?

    आगे वे यह भी लिखते हैं — “ शैलेन्द्र ने गीतकारी को आसानियाँ बख़्शी हैं और आसानियाँ बख़्शना बहुत मुश्किल काम होता है। इस आसानियों के लहजे की नर्मी को, उन्स को, रंगत को, तासीर को और नमी को यूनुस भाई ने तरतीब देकर ‘आग के फूल’ नाम का तोहफ़ा हमें दे दिया। शैलेन्द्र ने जो गीत लिखे, वे केवल संगीत या शब्दों के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज की गहरी भावनाओं और संघर्षों का प्रतिबिंब बने। लेकिन वे गीत वजूद में कैसे आए, उन फ़िल्मों की पर्दे पर और पर्दे के पीछे की कहानियाँ जो इन गीतों को हम तक लाईं, शैलेन्द्र का अपना जीवन और उस दौर के हिन्दी सिनेमा का अनूठा माहौल; यह किताब हमें इस बारे में भी एक साथी की तरह पास बैठकर बताती है।”

    इस बार पुस्तक मेले में कई कथेतर किताबें आईं, उनमें सबसे अधिक जिस किताब ने आकर्षित किया वह किताब थी ‘उम्मीदों के गीतकार – शैलेन्द्र’। जिन्होंने भी इस किताब के लेखक यूनुस खान को रेडियो पर, मंच पर, दोस्तों के बीच सुना है सब जानते हैं वे फिल्म जगत की जानकारियों का एनसायक्लोपीड़िया हैं, कितनी-कितनी कहानियाँ, किस्से, संदर्भ उन्हें याद हैं। मगर यह किताब उन किस्सागोइयों से काफी आगे जाती है और पाठकों को गहरे संदर्भों में उतार गीतकार शैलेन्द्र पर केंद्रित होती है। शैलेन्द्र जिनके लिए हमेशा लगता है कि वे कवि बड़े थे कि गीतकार? उनके गीत जनमानस में अतिलोकप्रिय होकर भी कितनी गहरी कविताई अपने भीतर लिए रहे। मुझे जो गीत बचपन से प्रिय था – तू ज़िंदा है तो …..ज़िंदगी की जीत पर यकीन‌ कर….. मगर इस किताब पढ़कर इस गीत के मायने और ज्यादा मौजूं लगने लगते हैं। राजकपूर यूं ही तो नहीं उन्हें ‘पुश्किन’ या ‘कविराज’ कहते थे।

    यह किताब शैलेन्द्र के गीतों में उतर कर अपने भीतर की नमी टटोलने को विवश करती है। यह किताब कहती है शैलेन्द्र विशुद्ध तौर पर भारतीय जन-मानस के कवि थे। मजलूमों, मजदूरों, किसानों, ग्रामीणों….निम्न मध्यमवर्गीय तबकों के मन के भाव सहज हिंदी शब्दों फिल्मी गीतों में ढालने वाला एक ही गीतकार हुआ है – शैलेन्द्र। वह शैलेन्द्र जो दो-तीन फिल्मों के गीत लिख कर गीतकार बन जाने के बाद भी दिनों-दिन रेलवे वर्कशॉप में फोरमैन बना रहा, जमीनी ज़िंदगी से उसे बहुत प्रेम था। बस इसी ग्रीस-भरे, अँधियारे गलियारों, गलियों….अभाव के अनुभव ने बरसों-बरस हर भारतीय की ज़बान पर रहने वाले गीत रचवा लिए।

    छोटे से घर में ग़रीब का बेटा

     मैं भी हूँ माँ के नसीब का बेटा

    रंजो-ग़म बचपन के साथी

    आँधियों में जली जीवन-बाती

    भूख ने है बड़े प्यार से पाला

    दिल का हाल सुने दिलवाला

    सीधी-सी बात न मिर्च-मसाला

     शैलेंद्र के विविध भावों के गीतों की एक एक पंक्ति को विश्लेषित करते हुए यूनुस इंगित करते हैं  देखिए इससे बड़ी जनसरोकार की कविता कौनसी हो सकती है? यहां निराशा नहीं, महज  कोरा जोश नहीं, कांटों पर उगी ताज़ा हरियल उम्मीदें भी हैं, तभी तो शैलेन्द्र उम्मीदों के गीतकार हैं।

    यह किताब छापी भी खूबसूरती से गई है, शैलेन्द्र की हस्तलिपी में लिखे गीत, फिल्मों के पोस्टर और् अन्य छवियाँ। इस किताब में शीर्षक के नीचे लिखा है – ‘सिनेमा में रचे गाने/ ज़िंदगी में बसे गाने’ यह कमाल की मानीखेज़ टैग लाइन है।  हर अध्याय – उस हर फिल्म/गीतों का इतिहास है जिन्हें शैलेंद्र की कलम ने रचा, फिल्मों ने जिन्हें अमर कर दिया। मसलन ‘मौसम बीता जाए’ ‘दो बीघा जमीन’ फिल्म के बनने का इतिहास तो है ही, गीतों के लिखे जाने का इतिहास भी है। इसमें गीतों के टुकड़ों का ऐसा मार्मिक विश्लेषण है कि आपका तुरंत यू-ट्यूब पर फिल्म देखने का मन कर जाएगा। ‘तेरी आँखों में ये दुनियादारी ना थी’ जैसे अध्यायों के ये शीर्षक शैलेन्द्र के सरल-संवेदनशील व्यक्तित्व का आईना हैं। यह अध्याय फिल्म ‘आवारा’ के कहानी से फिल्म में ढलने की शुरुआत को समर्पित है, जब राजकपूर  रेलवे-वर्कशॉप में काम कर रहे शैलेन्द्र से मिलने जाते हैं और उन्हें अपनी गाड़ी में बिठा कर ख्वाजा अहमद अब्बास के घर ले जाते हैं। वहाँ जब ‘आवारा’ फिल्म की कहानी सुनी-सुनाई गई और राजकपूर ने शैलेन्द्र से पूछा –

    “क्यों कविराज क्या समझ आया?”

    “ आवारा था

    या गर्दिश में था

    आसमान का तारा था।”

    बस यही उन दोनों के गाढ़े रिश्ते की नींव थी । ऐसे ऐतिहासिक पलों से भरी हुई है यह किताब। जब यूनुस अपने इन तमाम एक से एक रोचक अध्यायों में गीतों के गहरे तलों में छिपी सीपियों से अर्थ निकाल कर लाते हैं तो आप ठहर कर सोचते हैं इस गीत को हमने ऐसे, इन अर्थों के साथ क्यों नहीं सुना। यहां तक कि जब यूनुस शैलेन्द्र के स्त्री मन के भावों को पकड़ते गीतों का महीन विश्लेषण करते हैं, गीतकार शैलेन्द्र के मन में छिपा संवेदना भरा कवि उभर कर आता है।

    यह किताब छोटे कलेवर में बहुत बड़ी किताब है। आपने जो गीत बरसों बरस सुने, उनसे जुड़े अनजाने संदर्भ, घटनाएं जब आप पढ़ते हैं, चौंके बिना नहीं रहते जब लेखक इन गीतों का, मुखड़ों का, अंतरों का इतिहास बताते चलते हैं। दिल छू लेने वाले पल, हंसा देने वाले पल, बहसें, असहमतियाँ, रोचक जुड़ाव भावनाएं…. क्या नहीं होता किसी गीत के बनने के इतिहास में।

    “ अच्छे गानों का सफर अपनी पटकथा और फिल्म से पड़े चला जाता है और वे हमारे जीवन में दाखिल हो जाते हैं।” इसी किताब से, ‘तेरी आँखों में ये दुनियादारी न थी’ शीर्षक वाले अध्याय में लेखक ‘रमैय्या वास्ता वय्या’ गीत का जब विस्तार से जिक्र करते हैं, इस जिक्र में जीवन के प्रतीक केवल ‘राज’, ‘विद्या’, ‘माया’ नहीं हैं बल्कि वे मनुष्य के तौर पर समूची मानवता रेखांकित करते हैं। गाँव, कच्ची-बस्तियां, भूख के बरक्स चमक-दमक, धरती और मनुष्य के मूल्य दोनों को नेस्तनाबूद करती धन-पशुओं की दुनिया और अंतत: मनुष्य की कराहती आत्मा….।  फिर ये गाना केवल अंत्याक्षरी में ‘र’ से गाया जाने वाला गाना नहीं रह जाता जीवन का दर्पण बन जाता है। यह तो एक उदाहरण है जब यूनुस गाने की पंक्ति और फिल्म के दृश्यों का विश्लेषण कर शैलेन्द्र की मंशा खोलते हैं, ऐसे अनेक मारक उदाहरण हैं। ‘ज़िंदगी ख्वाब है’ अध्याय कपूर परिवार और ख्वाजा अहमद अब्बास के संबंध और आवारा, बूटपॉलिश, श्री चार सौ बीस जैसी अनूठी फिल्मों और उनके गीतों के फलसफे पर लिखा गया है। ‘ज़िन्दगी का अजब फ़साना है’ – हिन्दी सिनेमा के लेजेंड एक्टर मोतीलाल की अपनी बनाई फिल्म ‘छोटी-छोटी बातें’ पर आधारित है। यह अध्याय इस तरह लिखा गया है मोतीलाल के फिल्म बनाने के इस ‘श्वेत-श्याम सपने’ पर कि मुझे यह आलेख लिखना छोड़ कर फिल्म देखनी पड़ी। उस जमाने में समय से आगे सोचने वाले मोतीलाल की फिल्म, फिल्म के रीलीज़ से पहले मोतीलाल की मृत्यु और शैलेन्द्र के लिखे और मुकेश के गाए इन गानों का इतिहास है यह अध्याय। फिल्म तो कमाल ही है। शैलेन्द्र को शैलेन्द्र बनना ही था वजह यही कि लीक से हट कर सोचने वाले ही शैलेन्द्र के आस-पास थे। उनमें एक मोतीलाल भी थे। वे यूंही तो नहीं कहलवाते ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर से कि – महुआ घटवारिन की कहानी सुननी है तो लीक छोड़नी होगी।

    ‘भेद ये गहरा बात जरा सी’ अध्याय का शीर्षक ही इतना पारदर्शी है। इसके तल से झाँकता है गीत और उसके पीछे की कथा। कैसा ज़माना और कैसे-कैसे लोग।

    “बिमल रॉय की बेटी रिंकी भट्टाचार्य ने अपनी पुस्तक ‘Bimal Roy’s MADHUMATI, Untold stories from behind the scenes’ में लिखा है कि जब ऋत्विक घटक ने बिमल रॉय को यह कहानी सुनाई तो उन्होंने तीन सौ रुपये की बड़ी रकम देकर उन्हें साइन कर लिया। मोहन स्टूडियो में जहाँ बिमल रॉय प्रोडक्शन का ऑफ़िस था, यूनिट के दूसरे लोगों के साथ बैठकर ऋत्विक मजे से बीड़ी पी रहे थे और लोगों से कह रहे थे- “मैंने कैपिटलिस्ट बिमल रॉय के लिए भूत की ऐसी कहानी लिखी है कि इस पर फ़िल्म बनाने में वो बर्बाद हो जाएगा।” यह बात मज़ाक में कही गई थी कि गंभीरता से यह एक रहस्य है।”

    यूनुस आगे लिखते हैं – “कौन नहीं जानता कि मधुमती बिमल रॉय की सबसे कामयाब फिल्म रही और गीतकार चुने गए शैलेन्द्र।” यकीन ही नहीं होता कि सलिल चौधरी की पहले से रची धुनों पर शैलेन्द्र ने गीत लिखे। ‘सुहाना सफर और ये मौसम हसीं’ की ‘हुर्र-हुर्र’ हो कि ‘चढ़ गयो पापी बिछुआ हो’ दोनों कि जोड़ी ने बेजोड़ गीत रच कर इतिहास बना दिया था। यूनुस ही खोज कर ला सकते हैं कि शैलेन्द्र के गीतों में खाँटी भारतीय स्त्री के जटिल मनोभाव कैसे खुल कर आते हैं।

    “शैलेन्द्र की गीतकारी की पूरी यात्रा देखें तो आप पाएँगे कि वो एक स्त्री के मनोभावों, उसकी खुशियों, उसके दुखों, उसकी उलझनों और उसके संत्रास को बड़ी संवेदनशीलता से व्यक्त करते रहे हैं। उनकी ये नाजुकी स्त्री-मनोभावों को उकेरने में उन्हें कामयाब बनाती रही है। 1966 में आई फ़िल्म ‘आम्रपाली’ में उन्होंने एक स्त्री के प्रेम के भाव को अनूठे शब्दों में व्यक्त किया-

    “बिरहा की इस चिता से तुम ही मुझे निकालो

    जो तुम न आ सको तो मुझे स्वप्न में बुला लो

     मुझे ऐसे मत जलाओ, मेरी प्रीत है कुँवारी

    तुम ले गए अपने संग नींद भी हमारी ॥

    न केवल ‘आम्रपालि’ बल्कि ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के गीत हों कि ‘अनुराधा’ या बंदिनी के, उनके गीतों की स्त्री एक भावुक सम्पूर्ण समर्पिता होकर भी अपने अस्तित्व को लेकर सजग है। उसका आत्म प्रेम में डूब कर भी अपने अस्तित्व के साथ है, जीने की अगाध चाह के साथ।

    “बन के पत्थर हम पड़े थे सूनी – सूनी राह में

    जी उठे हम जब से तेरी बांह आई बांह में”

    लेखक इस गीत को डीकोड करता चलता है कि यह प्रतीक अहिल्या से लिया गया है। आगे वह कहता है — “इस गीत में ना जा रे ना जा के बाद जो ‘रोको कोई’ की विकल पुकार है वह एक स्त्री की बेबसी को कितनी बारीकी से उभारती है।”

    यूनुस शैलेन्द्र के मानस में उतर कर मानो गीतों के रहस्य खोज कर लाते हैं, जब वे गीतों पर पंक्ति पर पंक्ति बात करते हैं। अनुराधा फिल्म के गीत ‘ हाय रे वो दिन क्यों ना आए’ के संदर्भ में लिखते हैं – “शैलेन्द्र के गानों की जड़ें अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट में कितने गहरे धँसी होती थीं, इसकी चमकीली मिसाल है यह गीत।” इसी अध्याय में लीला नायडू के अभिनेत्री बनने का रोचक संयोग भी एक लंबे पैरा में लिखा है।

    यूं इस किताब का हर अध्याय उल्लेखनीय है, क्या छोड़ो और क्या उठा लो? कुछ पाठक के सरप्राइज़ के लिए छोड़ देते हैं। मगर ‘हाय गजब कहीं तारा टूटा’ अध्याय जरूर रेखांकित होना चाहिए जो एक बड़े सपने को देखने के साहस और उसके निर्वाह की दुश्वारियों का अध्याय है। शैलेन्द्र की अपनी बनाई फिल्म – तीसरी कसम, जो भले आज कल्ट फिल्म है। लेकिन इसका अपना रोचक और दारुण इतिहास है जो इस अध्याय में कुछ अंशों में दर्ज है। कि कैसे फिल्मी जगत ने ही उनकी सादादिली का फायदा उठाया। कैसे फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई।

    “सम्भवतः ‘परख’ की शूटिंग चल रही थी । इस फ़िल्म के संवाद भी शैलेंद्र ने लिखे थे और गीत भी । एकमात्र फ़िल्म जिसके संवाद उन्होंने लिखे। शूटिंग के दौरान ख़ाली वक्त में बिमल रॉय की यूनिट के तमाम लोग जैसे नबेन्दु घोष बासु भट्टाचार्य , बी.आर.इशारा , रघुनाथ झालानी वग़ैरह जमा होते और गप्पें करते। 1958 का यही वो दौर था जब मोहन राकेश ने ‘पाँच लम्बी कहानियाँ ‘ नामक एक बुक का सम्पादन किया था, किताब राजकमल प्रकाशन से छपी थी । और इसमें शामिल थी फणीश्वर रेणु की कहानी ‘तीसरी क़सम उर्फ़ मारे गए ग़ुलफ़ाम ‘ ।

    बासु भट्टाचार्य ख़ाली समय में अक्सर ही ये कहानी -संग्रह पढ़ते पाए जाते । पूरी यूनिट इस बात के लिए उनका मज़ाक भी उड़ाया करती थी। एक दिन शैलेंद्र ने देखा तों पूछा, ‘बासु, तुम ये क्या पढ़ रहे हो! ‘ बासु ने शैलेंद्र को किताब थमा दी और उनसे कहा, ‘ आप इस पुस्तक में फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘मारे गए ग़ुलफ़ाम ‘ पढ़िए । मेरी नज़र में यह अब तक की सबसे अच्छी कहानी है। ‘ शैलेन्द्र ने जब कहानी पढ़ी तो उनके मन में धुन सवार हो गई कि उन्हें इस कहानी पर फ़िल्म बनानी है। उन्होंने 23 अक्टूबर, 1960 तों फणीश्वरनाथ रेणु को एक पत्र लिखा –

    बंधुवर फणीश्वरनाथ, सप्रेम नमस्कार। आपकी कहानी मुझे बहुत पसन्द आई। फ़िल्म के लिए इसका उपयोग कर लेने की अच्छी सम्भावनाएँ हैं । आपका क्या विचार हैं?

    रेणु उन दिनों आकाशवाणी पटना में काम कर रहे थे। उन्होंने इस चिट्ठी के जवाब में शैलेंद्र को एक पत्र लिखा , जिसमें अपनी स्वीकृति दे दी । इसके बाद रेणु को मुम्बई बुलवाया गया । सारी योजनाएँ तैयार की गईं । नबेन्दु घोष से पटकथा लिखवाई गईं । संवाद ख़ुद ‘रेणु’ ने ही लिखे। ‘तीसरी क़सम’ का मुहूर्त पूर्णिया में किया गया था। 14 जनवरी,1961 को फ़िल्म की शूटिंग शुरू हो गई। तब किसी को अन्दाज़ा तक नहीं था कि इसके निर्माण की राहों पर काँटे ही काँटे बिखरे हैं और यह फ़िल्म शैलेन्द्र के लिए आत्महन्ता बन जाएगी। बहुत सारी कहानियाँ हैं ‘तीसरी क़सम ‘ के निर्माण से जुड़ी हुई पर यहाँ हम सिर्फ़ गीतों की ही बात करेंगे।”

    और हम सब जानते हैं इस फिल्म के एक से एक उम्दा और सुरीले गीतों का जादू! इनका विश्लेषण यूनुस बड़ी आत्मीयता से करते हैं। चाहे वह ‘सजन रे झूठ मत बोलो’ हो या लोक-परंपरा में पगे गीत – ‘लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया’ और ‘चलत मुसाफिर हो’….या के ‘पान खाए सैंया हमारो’।

    वे लिखते हैं – “इस गाने से जुड़ी दिलचस्प बात यह है कि सचिन देव बर्मन चूँकि सफ़ेद कुर्ता और धोती पहनते थे और लगातार पान खाने की आदत की वजह से हमेशा उस पर लाल छींटे पड़े होते थे, शैलेन्द्र ने कभी यह गीत उन्हीं पर रचा था लेकिन हर गाने की अपनी क्रिस्मत होती है। इस गाने को सचिन देव बर्मन के संगीत वाली किसी फ़िल्म में नहीं बल्कि ‘तीसरी क़सम’ में ही होना था-

    बगिया गुन-गुन, पायल छुन-छुन,

    चुपके-से आई है रुत मतवाली

    खिल गईं कलियाँ दुनिया जाने,

    लेकिन न जाने बगिया का माली

    पान खाए सैयाँ हमारो ॥

    इस तरह अपनी किताब के तमाम अध्यायों में शैलेन्द्र के गीतों को डीकोड करते हुए यूनुस उस दौर को भी रेखांकित करते चलते हैं जब सिनेमा के गीत महज तुकबंदी नहीं थे, उनमें कविताई में निबद्ध गहरा जीवन-दर्शन, प्रेम, रोजमर्रा के संघर्ष, त्याग के मूल्य थे। शैलेन्द्र उस दौर की ऐसे ही सूफी गीतकार थे जिनके लिए गीत लिखना एक साधना थी, धन और यश की लालसा से कहीं ऊपर। एक एक शब्द पर काम करना कि लय भी साथ रहे शब्द में छिपे अर्थ भी सधे रहें और उनकी तरंग पर फिल्म की कहानी भी दौड़ पड़े। हर अध्याय के लिए किया गया होमवर्क लेखक के श्रम को दर्शाता है। गीतों का चुनाव तो ऐसा है कि आप किताब पढ़ते हुए एलेक्सा से अनुरोध करते चलते हैं – जरा यह गाना चला दो।

    गीतकार शैलेन्द्र तो हम सबके प्रिय हैं ही मगर बतौर लेखक यूनुस ने जिस तरतीब और सलीके से इस किताब को रचा है, इस किताब को निश्चित तौर पर लोकप्रिय होना ही था। बतौर विविध भारती, ऑल इंडिया रेडियो के अनाउंसर, प्रस्तोता यूनुस का अनुभव इन गीतों के बोलों, इनकी धुनों, साज़ों के टुकड़ों के साथ रहा है, उस अनुभव का निचोड़  इस किताब में मिलता है, बाकी उनकी फिल्मी दुनिया के दिलचस्प किस्सों में रुचि और सैंकड़ों साक्षात्कारों का अनुभव और शोध तो है ही। वे जिस गहराई से शैलेन्द्र के गीतों की सरल से सरल पंक्ति की जिस तरह व्याख्या करते हैं आपको हर गीत से दुबारा प्रेम होने लगता है। उन गीतों के रचे जाने के पीछे के रोचक और अनजाने संदर्भ और उनका हम सबके जीवन से जुड़ कर हमारे नोस्टैल्जिया को जगा जाना, यह किताब हर तरह से एक विस्तृत वितान रचती है। हमें उन गीतों की तरफ दुबारा मोड़ती है, जो रचे दुख के पानी से गए हों, पके संघर्ष की आग के फूलों पर हों मगर स्वाद हमेशा जिन्होंने उम्मीद का ही दिया हो।

    इस किताब को एक बार नहीं किसी संदर्भ-ग्रंथ की तरह बार-बार पढ़ा और सहेजा जाना चाहिए।

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    पुस्तक शीर्षक  – उम्मीदों के गीतकार शैलेन्द्र

    लेखक – यूनुस खान

    प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन

     पृष्ठ संख्या – 272

    मूल्य – 350 /

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