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  • कोरियाई उपन्यास ‘इन ऑर्डर टू लिव’ पर एक टिप्पणी

    कोरियाई भाषा के चर्चित उपन्यास ‘In Order to Live: A North Korean Girl’s Journey to Freedom पर यह टिप्पणी लिखी है कुमारी रोहिणी ने, जो कोरियाई भाषा और साहित्य की विशेषज्ञ हैं- मॉडरेटर

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    कुछ किताबें हमें किसी देश के बारे में बताती हैं, कुछ किसी ऐतिहासिक दौर के बारे में, तो वहीं कुछ किताबें किसी एक इंसान के भीतर चल रही लड़ाई की तस्वीर हमारे सामने लाकर रख देती हैं। मूलतः उत्तर कोरियाई लेखक पार्क योनमी का उपन्यास In Order to Live:A North Korean Girl’s Journey to Freedom (2015 में अंग्रेज़ी में प्रकाशित, बाद में कोरियाई में ‘살기 위하여: 자유를 향한 북한 여성의/सालगी वी-हाय ) मेरे लिए इसी तीसरे खाँचे में आने वाली किताब है।

    यह कहानी केवल एक ऐसे राष्ट्र की नहीं है जहाँ तंत्र के नाम पर तानाशाही है। बल्कि इस उपन्यास की पटकथा दूसरे इंसान के प्रति सहानुभूति के अभाव और ग़रीबी से पैदा होने वाली उस दरार की ओर इशारा करती है जो इंसानी स्वभाव का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है। और यह दरार आदमी को आदमी की तरह देखने की हमारी क्षमता को कुंद कर देती है।

    सालगी वी-हाय एक आत्मकथात्मक उपन्यास है जिसकी लेखक पार्क योनमी का जन्म उत्तर कोरिया में हुआ था। हाँ वही उत्तर कोरिया, जहाँ भूख, डर और सत्ता द्वारा की जाने वाली चौबीसो घंटे की निगरानी असाधारण बात नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा हैं। 

    इस किताब के शुरुआती हिस्से में उन्होंने अपने बचपन को केंद्र में रखा है, जो किसी एक बड़ी त्रासदी से नहीं, जीवन में लगातार बने रहने वाले अभाव से आकार लेता है। खाना न मिलने की अनिश्चितता, सत्ता-शासन का डर के साथ ही अचानक और बिना किसी स्पष्ट वजह के पिता की हुई गिरफ़्तारी, यह सब कुछ एक बच्ची की आँखों से इतने साधारण ढंग से दर्ज होता है कि पढ़ने वाले को किसी बड़े आरोप या इमोशनल बैकिंग की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

    दरअसल, लिखने का यह नज़रिया कोरियाई साहित्य की उस परंपरा से जुड़ता है जिसमें भूख और अभाव केवल आर्थिक स्थिति से जुड़े मसले नहीं होते, बल्कि वे नैतिक और भावनात्मक अनुभव का रूप ले लेते हैं। यही कारण है कि योनमी पार्क ने अपना बचपन बिना शोर और आरोप के, लेकिन उस सच्चाई के साथ लिखा है जो आपके भीतर तक उतरती है। ह्वांग सुक-योंग और चो से-हुई जैसे लेखकों की रचनाओं में भी भूख किसी घटना की तरह नहीं, बल्कि जीवन की स्थायी अवस्था की तरह आती है।

    कोरियाई भाषा और साहित्य पढ़ते हुए उत्तर कोरिया अक्सर एक कठोर, बंद और भय से संचालित व्यवस्था के रूप में सामने आता है। लेकिन इस आत्मकथा में उस समाज की कुछ मानवीय परतें भी देखने को मिलती हैं, जिन पर अक्सर बाहर वालों का ध्यान नहीं जाता। परिवारों के बीच आपसी सौहार्द, सामूहिकता की भावना, संगीत और शिक्षा के प्रति सम्मान, और कठिन परिस्थितियों में भी सामान्य जीवन को थामे रखने की कोशिश, ये सभी पहलू उपन्यास को एकतरफ़ा होने से बचाते हैं।

    योनमी ने उत्तर कोरिया को पूरी तरह अमानवीय या अँधेरे में डूबे देश के रूप में नहीं दिखाया है। उनका लेखन उस संतुलन को बनाए रखता है जो कोरियाई साहित्य की पहचान है। कांग छल-ह्वान और कोरियाई संस्कृति और साहित्य के विद्वान किम सुक-यंग जैसे पलायन कर चुके उत्तर कोरियाई लेखकों में भी यही द्वन्द दिखता है। वे भी शासन की आलोचना और समाज के भीतर बचे मानवीय स्पर्श, दोनों को एक साथ अपनी रचनाओं में समेटते हैं।

    उत्तर कोरिया की सीमा को पार कर लेने को योनमी किसी जीत की तरह नहीं देखती हैं। न ही उनके लिए इसका मतलब एक आज़ाद जीवन की शुरुआत ही है , बल्कि अगर कुछ है तो वह है एक असुरक्षित संसार से दूसरी अनिश्चित और ज़्यादा असुरक्षित दुनिया में प्रवेश।

    इस उपन्यास को पढ़कर आप स्पष्ट रूप से जान पाते हैं कि चीन और उत्तर कोरिया की सीमा से जुड़े इलाक़ों में शरणार्थियों को अक्सर इंसान नहीं, बल्कि सस्ते मज़दूर या ‘संसाधन’ की तरह देखा जाता है। योनमी खुद कई बार रात में छिपकर नदी पार करती हैं। इन परिस्थितियों में बाल शोषण, यौन हिंसा और मानव अधिकारों के उल्लंघन जैसे खतरे लगातार बने रहते हैं।

    लेकिन योनमी के लिखे में ये सभी अत्याचार सनसनीखेज़ खुलासे की तरह नहीं आते। बल्कि वह इशारों में ही यह स्पष्ट करती हैं कि राष्ट्रीय-क्षेत्रीय और सामाजिक पहचान और कानूनी हैसियत छिन जाने के बाद इंसान ऐसी स्थिति में आ जाता है कि वह कभी भी किसी भी तरह की हिंसा का शिकार हो सकता है।

    योनमी की यह कहानी केवल उत्तर कोरिया तक सीमित नहीं है। यह पूरे कोरिया के डायस्पोरा लिट्रेचर से जुड़ती है, जहाँ पहचान का संकट, देह से जुड़ी असुरक्षा और चुप्पी अनुभव के केंद्र में होते हैं। इस उपन्यास में कोरियाई ‘हान’ की अवधारणा – दबी हुई पीड़ा और अधूरे न्याय की स्मृति – यहाँ किसी सिद्धांत की तरह नहीं, बल्कि भोगे हुए यथार्थ के रूप में सामने आती है।

    योनमी बताती हैं कि दक्षिण कोरिया पहुंचने के बाद भी उत्तर कोरियाई शरणार्थियों का जीवन आसान नहीं होता। वहाँ उन्हें अक्सर दूसरे दर्जे का नागरिक माना जाता है। योनमी का मानना है कि इंसानों के बीच की यह दूरी राजनीतिक न होकर सामाजिक और मानसिक है, और शायद इसलिए ज़्यादा गहरी है।

    बावजूद इसके उनकी कहानी में केवल त्रासदी नहीं है। उन्होंने दक्षिण कोरिया में रहते हुए GED (स्कूली पढ़ाई करने और आगे नौकरी आदि की योग्यता हासिल करने की वैकल्पिक व्यवस्था) पूरी की, कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पढ़ाई का अवसर पाया। किताब में दर्ज यह अनुभव दिखाता है कि साहस भरी जद्दोज़हद केवल अस्तित्व तक सीमित नहीं रह जाते, बल्कि शिक्षा और आत्मनिर्भरता भी इसकी चपेट में होते हैं।

    उपन्यास के बाद के हिस्सों में योनमी ने अपने अमेरिकी जीवन के अनुभव दर्ज किए हैं जिन्हें पढ़कर यह बात साफ़ होती है कि यह आत्मकथा केवल पीड़ा का रिकॉर्ड भर नहीं है। यह एक शरणार्थी के सोचने और सवाल करने की क्षमता का नतीजा भी है।

    लेखन के नज़रिए से देखा जाए तो आलोचक पार्क योनमी को संस्मरण और टेस्टीमोनियल-राइटिंग की परंपरा में रखते हैं। उनके लेखन में कल्पना नहीं, स्मृति और अनुभव के सहारे दर्ज की गई सच्चाई होती है। निर्विकार अवस्था में रहते हुए भी लेखन की भाषा बिना शोर के गंभीर से गंभीर बातों को सहजता से कह गुजरती है। पढ़ने वालों को भावुक करने का प्रयास न करके ईमानदारी से अपनी बात पहुँचाने की कोशिश करती है और उसमें सफल भी है।

    कोरियाई टेस्टीमोनियल राइटिंग की भाषा शांत, सरल और लगभग सपाट होती है। इसमें भावनाओं को ज़ोर देकर नहीं दिखाया जाता, बल्कि नियंत्रित रखा जाता है, ताकि पढ़ने वाला खुद उस ख़ालीपन और डर को महसूस कर सके जो रचना के केंद्र में है। योनमी पार्क का लेखन इस परंपरा में खड़ा उतरता है।

    इस आत्मकथात्मक उपन्यास की सबसे अनोखी बात यह है कि इससे हमें उत्तर कोरिया को किसी दूर की, रहस्यमय राजनीतिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय अनुभव के स्तर पर समझने का मौक़ा मिलता है। 

    ऐसे उपन्यास इसलिए पढ़े जाने चाहिए क्योंकि यह बताते हैं कि जब व्यवस्था अमानवीय हो, तब इंसान बने रहने की जद्दोज़हद कितनी मुश्किल होती है। और इंसानी अनुभव की यही ताक़त है जो हमें केवल जीवित रहने तक सीमित न रखकर अपनी पहचान, गरिमा और आत्मसम्मान बनाए रखने के लिए लगातार प्रेरित और प्रोत्साहित करती है।
    शायद यही कारण है कि अपने पहले प्रकाशन के लगभग एक दशक बाद भी दुनिया भर के पाठकों की रीडिंग लिस्ट में यह किताब लगातार बनी हुई है। ध्यान देने की बात है कि यह उपन्यास पहले अंग्रेज़ी में आया और बाद में कोरियाई में।

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