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  • संतोष सिंह की कुछ कविताएँ

    इण्डियन एक्सप्रेस के वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह बिहार पर लिखी अपनी किताबों ‘Ruled or Misruled’, ‘JP to BJP’, ‘The Jannayak Karpoori Thakur: The Voice of Voiceless’ के लिए भी जाने जाते हैं, जिनके हिन्दी अनुवाद ‘कितना राज कितना काज’, ‘जननायक: बेजुबानों की आवाज’, ‘जेपी से बीजेपी: सौ साल के आईने में बिहार’ भी खूब पढ़े जाते रहे हैं। यह कम लोग जानते हैं कि वे मूलतः कवि हैं और बिहार को लिखी उनकी कुछ कविताएँ बहुत सराही भी गई हैं। आज प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएँ, साल की अंतिम कविताओं के रूप में जानकी पुल की भेंट- मॉडरेटर

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    1
    मैं बिहार हूँ

    मैं ही सीता की धरा हूँ,
    विदेह जनक की देह हूँ,
    मैं ही रश्मिरथी कर्ण हूँ,
    गौतम ऋषि का आश्रम हूँ,
    अहल्या का कायाकल्प हूँ,
    मैं मंदार पर्वत हूँ,
    जो गवाह है समुद्र मंथन का,
    मुझे अमृत-विष का अंतर पता है,
    मैं लोकतंत्र की जननी वैशाली हूँ,
    मैं ही चंद्रगुप्त मौर्य हूँ,
    चाणक्य की कुटिल प्रज्ञा हूँ,
    मैं आर्यभट्ट भी हूँ,
    मैं ही तारेगना हूँ,
    मैं मगध भी हूँ,
    मैं कुसुमपुर, पुष्पपुर और अजीमाबाद हूं,
    मैं पाटलीग्राम, पाटलिपुत्र हूँ,
    मैं नालंदा हूँ,
    मैं विक्रमशिला भी हूँ।

    मैं ही मैथिल कोकिल विद्यापति हूं,
    विश्व साहित्य की संपत्ति हूं,
    मैं शेरशाह सूरी हूँ,
    संरचनात्मक विकास की धुरी हूँ,
    गुरु गोविंद सिंह का जो बोले सो निहाल हूं,
    मैं ही सत श्री अकाल हूं,
    मैं तीरविजय तिलका मांझी हूँ,
    आजादी के क्रांति की पहली झांकी हूं,
    मैं मंडन मिश्र का शास्त्रार्थ हूँ,
    सारे दर्शन का निहितार्थ हूं,
    मैं कुँवर सिंह की तलवार हूँ,
    आजादी की क्रांति का यलगार हूं।

    मैं भिखारी ठाकुर, महेन्द्र मिसिर हूँ,
    विंध्यवासिनी देवी के गायन की तासीर हूं,
    मैं शाद अज़ीमाबादी हूँ,
    देश प्रेम में अतिवादी हूं,
    खुदीराम बोस की क्रांतिकारी तरुणाई हूँ,
    बिस्मिल्लाह खान की शहनाई हूँ,
    गांधी का चंपारण सत्याग्रह हूँ,
    मोहनदास से महात्मा बनने का आग्रह हूँ
    मैं रामधारी सिंह दिनकर का ओज हूँ,
    बाबा नागार्जुन, जानकी बल्लभ का तेज हूं,
    मैं फणीश्वरनाथ रेणु का धवल आंचल हूं,
    मैं थोड़ा उदिग्न हूं पर अविकल हूं,
    मैं दशरथ मांझी का दृढ़ संकल्प हूँ,
    मैं पहाड़ के रास्ता हो जाने का विकल्प हूं।

    पर मैं क्या सर्फ एक भव्य इतिहास हूँ?
    मेरा वर्तमान क्या है?
    मैं राजेन्द्र प्रसाद भी हूँ,
    जय प्रकाश नारायण हूँ,
    रामनंदन मिश्र भी हूँ,
    मैं श्रीकृष्ण सिंह हूँ,
    अनुग्रह नारायण हूँ,
    मैं जननायक कर्पूरी भी हूँ,
    मैं कांग्रेस का भग्न किला हूँ,
    समाजवाद की गीली जमीन हूँ,
    साम्यवाद की उलझन हूँ,
    नक्सलवाद का लहू हूँ,
    अतरंगी राजनीतिक गठबंधन हूँ,
    समाजवाद की बिखरी धारा हूँ,
    गेरुए-हरे का मिलन हूँ।

    थोड़ा लालू प्रसाद भी हूँ,
    गरीब गुरबा की आवाज हूं,
    अवरुद्ध विकास का अवसाद भी हूं,
    उनका राजनीतिक प्रमाद भी हूँ,
    नीतीश कुमार तो हूँ ही,
    बिहार का थोड़ा कायाकल्प हूं,
    विकास का नया संकल्प भी हूं,
    उनकी राजनीति का तिलस्म हूँ,
    उनका ‘व्यावहारिक समाजवाद’ हूँ,
    बहार और बनाव का अंतर्द्वंद्व हूँ,
    पर मैं सरदार पटेल भवन भी हूँ,
    बिहार म्यूजियम और ग्लास ब्रिज हूं
    बापू सभागार, सभ्यता द्वार हूं।

    पर मैं एक कसक भी हूँ, बनिहारी भी हूं,
    बिहार से बाहर ‘अबे बिहारी’ भी हूं,
    पलायित छात्र हूँ, दिहाड़ी मजदूर हूं,
    चाहकर भी घर न लौटने को मजबूर हूं,
    पर मैं रायसीना में सिविल सेवा का बड़ा अधिकारी भी हूँ,
    देश के विकास में बड़ी भागीदारी भी हूँ।

    मुझमें कोई कमी नही है,
    कौन कहता है मेरी जमीं नहीं है,
    मैं कितना उर्वर हूँ,
    मैं आत्मनिर्भर हूँ,
    मैं बस लिट्टी-चोखा नही हूँ,
    एक व्यंजन से पहचान का धोखा नही हूँ,
    मैं चंपारण का अहुना हूँ,
    एक स्वागत योग्य पहुना हूँ,
    मैं दरभंगा का मखाना हूँ,
    उत्तर बिहार के लीची का खजाना हूँ,
    मैं हाजीपुर का केला हूँ,
    मैं बिहार हूँ, अलबेला हूँ,
    मैं अंग का रेशम हूँ, परेब का पीतल हूँ,
    मुझमें बहुत आग है फिर भी शीतल हूं,
    मैं उदवंतनगर का खुरमा, बेलग्रामी हूँ,
    इतना सब कुछ है तो थोड़ा अभिमानी हूं,
    मैं पिपरा, सिलाव का खाजा हूँ,
    मनेर का लड्डू हूं, मिठास का राजा हूं,
    दीघा का मालदह आम हूं,
    तुम झूठे बेर खिला दो तो राम हूं,
    मैं गया का तिलकुट हूँ,
    सीमांचल का अक्खड़ जुट हूं
    धनुरूआ, बाढ़ का लाई हूँ,
    रुन्नीसैदपुर का बालूशाही हूँ,
    रोहतास के चावल का कटोरा हूँ,
    कोसी, पूर्णिया के मक्का का चितेरा हूं,
    भागलपुर का जरदालु, कतरनी हूँ,
    दिल से पुकारो तो वैतरणी हूँ,
    मिथिला के छप्पन व्यंजन का थाल हूँ,
    बंगाल का संस्कृति द्वार, भाल हूं,
    मैं भुला दी गयी मंजूषा, पटना कलम हूं,
    इतिहास को जो भूलो तो मैं अलम हूं,
    मैं मिथिला की अद्भुत चित्रकला हूँ,
    मधुबनी से मैनहैटन तक पहुंचनेवाली बला हूं,
    शारदा सिन्हा के छठ गीत का आचमन हूँ,
    अस्ताचलगामी सूर्य को भी नमन हूँ |

    सच है मैं कोसी का टूटता कछार हूँ,
    बाढ़ का बरबस प्रहार हूँ,
    पर मैं गंगा का उद्गार भी हूँ,
    मैं अब भी बुद्ध, महावीर का विचार हूँ,
    क्योकि मैं बिहार हूँ।

    2. विचारधारा

    बने रहने से बड़ी कोई
    विचारधारा नही है,
    तने रहना और टूट जाना
    कमजोर विचारधारा है,

    सारे सिद्धांत भीरू और असहाय लोगों के लिए होते हैं,
    ताकतवर लोग तो खुद ही एक विचारधारा हैं,
    सत्ता और सिद्धांत में बिल्कुल मेल नहीं होता है,
    स्वार्थ से बड़ी कोई विचारधारा नहीं होती है,
    सिद्धांत तब काम आता जब कोई तर्क नहीं बचता हैं,
    और कुर्सी ने कब से सिद्धांत माना हैं,
    उसका एकमात्र सिद्धांत कायम रहना है,
    विचारधारा छिपने के लिए बनाए जाते है,
    विचाराधारा से बड़ा अभिनय कुछ भी नही है,
    सांप और नेवले तो जंगल में लड़ा करते हैं,
    हमारी दुनिया में तो मिलकर राजनीति करते हैं।

    3.
    सीक पहिया

    वो थोड़ा भारी लोहे वाला,
    छोटा किन्तु संतुलित पहिया,
    वो थोड़ा पतला और बड़ा वाला,
    अल्हड़, मस्त और डगमगाने वाला,
    बचपन वाला सीक पहिया,
    गांव के मिट्टी वाली सड़क पर,
    बहुत तेज दौड़ता था ये पहिया,
    सीक का मुड़ा निचला भाग,
    संचालित करता था उसे बखूबी,
    सीक पहिया वाले बच्चे राजा से कम न थे,
    पगडंडियों से होकर धान की खेतों तक,
    कभी कभी दूसरे टीला तक रंग जमाने,
    पहुंचता था ग्राम्य खेल का अमीर पहिया।

    अब गांव की सड़क कंक्रीट हो गई है,
    इसपर सरपट दौड़ सकता है सीक पहिया,
    लेकिन वह अब लगभग गुम हो गया है,
    इनमें से कुछ होगा अभी भी किसी कोने में,
    बहुतेरे गलकर फिर लोहा हो गया होगा,
    पर चक्र तो घूमने के लिए होता है,
    अब पहियों के स्वरूप बदल गए हैं,
    तेज भागते पहिए हमें ले आए है,
    पगडंडी से महानगर की दुर्दांत सड़क पर,
    अब पहियों से खेलने की लिए नहीं,
    उनसे कुचले जाने से बचने की जद्दोजहद है।

    4

    गांधी मैदान

    हजारों रैलियों,
    भाषणों, आश्वासनों के उपरांत,
    गांधी मैदान निर्वाक,
    शांत चित्त खड़ा है,
    इसके वक्ष पर लाखों पैर चले है,
    और चलते ही जा रहे हैं,
    आजादी की क्रांति से,
    कांग्रेसवाद से समाजवाद तक,
    वामपंथ से दक्षिणपंथ तक,
    गांधी से लेकर जेपी, लोहिया तक।

    गांधी मैदान को पता है,
    नए लोग भी आयेंगे,
    मैदान को भीड़ से फिक्र नहीं है,
    उसे चिंता है बहलाकर लाए गए लोगों की,
    जो पूरी और जलेबी के लिए आ जाते है,
    और यूं ही उसे रौंद कर लौट जाते हैं,
    लेकिन मैदान को जब भी,
    गंध मिलती है जनवाद की,
    वह फिर से अनुप्राणित हो जाती है,
    अगली रैलियों के लिए,
    नई संभावनाओं के लिए,
    एक सुदूर कोने से,
    बापू की विशाल प्रस्तर प्रतिमा,
    अपनी नजर टिकाए हुए है,
    उस भीड़ में वो शायद लोग ढूंढ रहे है।

    5

    अधजली रोटी

    रात के अंधेरे में जो झोपड़ियों जलाई गई,
    साजिश की रत्ती भर भी सबूत नहीं मिला था,
    बस गीली मिट्टी पर पांव के कुछ निशान थे,
    पर प्रशाशन के लिए इतना काफी नहीं था,
    टूटी झोपडी के आगे कुछ अधजली रोटियां भी थी,
    एल्यूमिनियम की चौड़ी वाली थाली में,
    मिट्टी के चूल्हे के पास,
    जिसे उसने सेका था बड़े जतन से पिछली रात,
    अपनी आग और पेट की आग मिलाकर,
    पर घर जो जला तो रोटी कौन खाता,
    सुबह की ओस से रोटी अकड़ गई थी,
    उसकी सिलवटें दादी की झुर्रियों जैसी थी,
    दादी बस रोटी ही देखे जा रही थी,
    उसकी भूख कब की मर गई थी,
    उधर सरकारी चूडा और गुड बांटा जा रहा था,
    पर दादी अब भी अपनी मृत रोटी के साथ थी,
    आखिर रोटी का भी एक घर जला था,
    उधर चूल्हा उदास बैठा था,
    आखिर, चूल्हे का सबसे बड़ा दर्द है,
    उसकी राख का ठंडा होना।

    6. एकवारी

    सोन के पार सहार से थोड़ी दूर
    भोजपुर जिले में है एक गांव एकवारी
    कहते हैं चलती थी यहां बस गोलियां
    बंद रहते थे स्कूल महीनों के महीनों
    एक ही बात होती थी
    किस तरफ से कितना मरा
    कोई खेत जोतते मारा जाता
    कोई फसल कटाई के वक्त
    कोई घर में सोते वक्त
    बच्चे, बूढ़े नवविवाहिता गर्भवती औरतें
    सब एक समान होते थे बंदूकों के निशाने पर
    आखिर, बंदूकों के निशाने होते हैं
    आंखें नहीं।
    ये उस बिहार की बात है
    जब एक नारा दिया गया
    “सोना बेचो, लोहा खरीदो”
    फिर खरीदी जाती थी लोहे की बंदूकें
    यह जाति युद्ध का लाल दौर था
    लंबे शोषण और उत्पीड़न
    सामंतवाद से उपजा वर्ग संघर्ष
    खूनी क्रांति में तब्दील हो गया था
    शाहाबाद और मगध ने झेला
    सबसे अधिक दंश जाति युद्ध का
    समाजवाद का नारा देते वाली जमीन
    अपना उसूल भूल गई थी।
    जगदीश मास्टर का क्या जुर्म था
    उसी एकवारी का था वह पढ़ा लिखा नौजवान
    जो वोट देना चाहता था
    अपने मातहत समाज को जागरूक करने में लगा था
    दबंगई और अधिकार में ठन गई
    मालिक और काश्तकार भिड़ गए
    खेतों में धान के बदले
    बोए जाने लगे इंसानों के सर
    फिर बरसों तक जमीन
    उगलती रही खून और विद्वेष।
    एकवारी अब भी शोकाकुल लगता है
    एक तरफ कुर्की जब्ती की याद दिलाते
    टूटे छज्जे वाले अगड़ों के पक्के मकान
    दूसरी तरफ खूनी संघर्ष की दास्तां बया करते
    जगदीश मास्टर का गुमनाम स्मारक
    कुछ घरों की दीवारों पर गोलियों के दाग
    अब भी हैं
    इस वर्ग संघर्ष का क्या हासिल था
    सुखिया पासवान मरा हो या संग्राम सिंह
    लहू का क्या हासिल था।

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