ऋतम्भरा : उपनिषद् आख्यायिका मञ्जरी उपनिषदों पर आधारित नौ कहानियाँ का सङ्कलन है। यह प्रचण्ड प्रवीर का बहुप्रतीक्षित कहानी सङ्ग्रह है, जिसे २०१९ से कई पत्रिकाओं में देखा जा रहा था। इस वर्ष के पुस्तक मेले में इसकी पुस्तक रूप में परिणति हिन्दी साहित्य के गहरे औत्सुक्य का विषय है, क्योँकि इसमेँ माण्डूक्य, ऐतरेय और श्वेताश्वतर जैसे अप्रकाशित कहानियाँ भी हैं। प्रचण्ड प्रवीर की कहानियोँ ने जाना नहीँ दिल से दूर से जो उड़ान ली, उसने उत्तरायण और दक्षिणायन में नये प्रयोगों से अलहदा रास्ता चुन लिया। क्या ये कहानियाँ राशि-नामोँ की तरह उपनिषदोँ के नाम-मात्र का सहारा लेती हैँ? लेखक व कवि नवनीत नीरव के शब्दों में — “प्रचण्ड प्रवीर का रचना-संसार उस संधि-स्थल पर खड़ा है, जहाँ परंपरा का सातत्य आधुनिक बोध की चुनौतियों से साक्षात्कार करता है। उन्होंने हिन्दी गद्य को केवल तत्सम शब्दावली से अलंकृत नहीं किया, बल्कि उसे उस शास्त्रीय ओज से दीप्त किया है जो समकालीन जीवन की विसंगतियों के बीच एक आवश्यक संतुलन की खोज करता है।
वे मात्र एक कथाशिल्पी नहीं, बल्कि एक सजग अन्वेषक हैं—एक ऐसे लेखक, जो भारतीय मनीषा के शाश्वत सूत्रों को वैश्विक क्षितिज पर पुनः परिभाषित करने के लिये निरन्तर सचेष्ट हैं। उनका नया कहानी संग्रह ‘ऋतम्भरा’ इसी अन्वेषण की एक महती उपलब्धि है। यहाँ उपनिषद् की ऋचाएँ और वेदान्त की दार्शनिक प्रगाढ़ता कोई अतीत की वस्तुएँ नहीं रह जातीं, बल्कि वे आधुनिक मनुष्य के अपराध-बोध, उसके रहस्य और उसके अस्तित्वगत संघर्षों की व्याख्या करने वाले जीवंत माध्यम बन गये हैं। इस संग्रह की कहानियाँ पाठक को न केवल कथा रस की अनुभूति करवाती हैं, बल्कि उसे एक गम्भीर आत्म-मंथन के लिये विवश भी करती हैं।”
ऋतम्भरा : उपनिषद् आख्यायिका मञ्जरी अपनी बुनावट में ही कई चुनौतियाँ तय कर लेता है। अब देखना है कि यह पुस्तक पाठकों के लिये ग्राह्य भी होती है या नहीं। बहरहाल, इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना की भूमिका उद्भट विद्वान श्री वागीश शुक्ल ने लिखी है। आप भी पढ़िये – मॉडरेटर
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उपनिषदों का आरण्य
[१]
कुछ युवा हिन्दी लेखकों ने इधर महाभारत और रामायण आदि पढ़ना शुरू किया है किन्तु मेरी जानकारी में प्रचण्ड प्रवीर हिदी लेखकों में अकेले हैं जिन्होंने उपनिषदों को गम्भीरता से पढ़ने में रुचि दिखायी और उनके बहाने कुछ रचने का भी साहस किया। प्रस्तुत पुस्तक ऋतम्भरा उनकी नौ कहानियों का संग्रह है जो उन्होंने प्रसिद्ध ग्यारह उपनिषदों में से छान्दोग्य और बृहदारण्यक को छोड़ कर शेष नौ में भटकते हुए लिखी हैं — इन दो पर भी वे आगे चल कर लिखेंगे, यह मुझे मअलूम है।
‘भटकते हुए’ मैंने जानबूझ कर इस्तिअमाल किया। उपनिषद्-साहित्य वैदिक वाङ्ग्मय के अन्तर्गत ‘आरण्यक’-भाग के भीतर आता है। मोटे तौर पर ‘संहिता‘-भाग ब्रह्मचर्य और गार्हस्थ्य आश्रमों में वर्तमान लोगों के पढ़ने-गुनने-बरतने की चीज़ है, ‘ब्राह्मण’-भाग उसका व्याख्यान है, ‘आरण्यक’-भाग वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करने के बाद अध्ययन और मनन के लिए है और ‘उपनिषद्’-भाग गुरु के पास बैठ कर रहस्योपदेश सीखने के लिए है। इस प्रकार यह यात्रा स्थूल से सूक्ष्म की ओर है किन्तु ये वर्गीकरण बहुत कठोर नहीं हैं — उदाहरणार्थ ईशावास्योपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद का चालीसवाँ अध्याय है और इस प्रकार संहिता-भाग का ही अङ्ग हुआ।
[२]
इन कहानियों की रचनाशैली का अनुमान इस तरह लग सकता है कि पहली कहानी — जो ईशावास्योपनिषद् पर है — के दूसरे पैराग्राफ में आये इस अंश पर ध्यान दिया जाय:
इसलिए जो पुनरावृत्ति की आशा में ऐतिहासिकता पर महत्त्व देते हैं दरअसल वह अँधेरे में भटक रहे होते हैं। मेरे शिक्षक जो धीर पुरुष थे, उन्होंने यह भी कहा कि किन्तु आश्चर्य है कि जो इतिहास को अनदेखा कर जीते हैं वह और भी गहरे अँधेरे में विचर रहे होते हैँ।
इन दो वाक्यों में एक तरफ़ तो मार्क्स की प्रसिद्ध उक्ति “इतिहास अपने को दुहराता है …” का सन्दर्भ है और दूसरी तरफ़ ईशावास्योपनिषद् के नवें मन्त्र का — “जो अविद्या की उपासना करते हैं वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं और जो विद्या में ही रत हैं वे मानो उससे भी अधिक अन्धकार में प्रवेश करते हैं।“ आगे तुरन्त ही गुणसूत्र (=chromosome) से सम्बन्धित बातें आती हैं। ये बातें केवल शिल्प की जटिलताएँ ही नहीं हैं, ये कथ्य के कङ्काल की मज्जा हैं।
कथा आगे विज्ञानकथा की तर्ज़ पर बढ़ती है और मृत्यु, हत्या, आत्महत्या, अजरता, अमरता के सवालों से जूझती-उलझती प्रेमकथा दो विपरीतलिङ्गियों की अतिमानवीयताओं के असमञ्जस में खो जाती है। काल भविष्यत् है, समस्याएँ शाश्वत हैं, समाधान अस्थिर, अविश्वसनीय और नयी समस्याओं को उपजाने वाले हैं।
[३]
दूसरी कहानी केनोपनिषद् के ‘केन= किसके द्वारा’ से उड़ान लेती है और एक ‘हूडनिट’ के रूप मे॑ लिखी गयी है — एक होटल में एक स्त्री की मृत्यु होती है और वह आत्महत्या है या फिर हत्या ही है इस ऊहापोह के बीच ‘हत्यारा कौन?’ की खोजबीन में कथा-क्रम आगे बढ़ता है। इस कहानी के आँकड़ों में एक सत्य घटना की भी झलक मिल सकती है जिसकी कुछ चर्चा कभी अख़बारों में रही थी लेकिन कहानी इस झलक से नहीं बनती, उस शीशे से बनती है जिसमें अख़बार कभीकभार कौंध कर ग़ाइब हो जाता है। इस कहानी में भी कुछ ‘विज्ञान-कथा’ आ घुसी है — मक़तूला दमयन्ती अरविन्द की एक ३-डी होलोग्राफिक छवि बनायी जा रही है। यह कोशिश उसके वर्तमान आकर्षक स्वरूप को समय के आक्रमणों से बचाते हुए यथावत् सुरक्षित रखने का प्रयास है — एक प्रेमी पति द्वारा अपने रसमय वर्तमान को ‘फ़्रीज़’ कर लेने का प्रयास। तत्त्वतः यह उसी कोशिश का विस्तार है जो किसी के रूप को पोर्ट्रेट में — फिर फोटोग्राफ में फिर विडियो में क़ैद कर बचा लेने की लालसा में उभरती है।
इस कहानी में ‘इन्द्र मघवन्’, ‘यक्ष’ और ‘यक्ष-प्रश्न’ के उल्लेख इसे केनोपनिषद् और महाभारत तक ले जाते हैं और फ़िक्र के एक नये रास्ते की तरफ़ मोड़ते हैं।
ठीक इसी प्रकार कठ कहानी के ‘नचिकेता’ और ‘धर्मराज’ कठोपनिषद् के पात्र हैं किन्तु अग्नि-चयन का उपदेश धर्मराज के जलते हुए शरीर में बदल गया है, यद्यपि वे अपने नामों से बँट कर कई देहों में वर्तमान हैं। उलटा लटका अश्वत्थ सज़ायाफ़्ता नचिकेता से पूछताछ के दौरान नज़र आता है। बीच में Brute Force Algorithm की भी आमद है। क्रिप्टोकरेन्सी, यूनीकोड कैरेक्टर और हैकिंग जैसी संज्ञाओं से नचिकेता को प्राप्त वरों का पुनर्लेखन होता है।
तैत्तिरीयोपनिषद् पर लिखी कहानी जैसी एकाध में वैज्ञानिक कल्पनाएँ नहीं हैं किन्तु दार्शनिक उड़ानें और कहानियों की ही तरह मौजूद हैं। हर कहानी की पुरातात्त्विकी ( = Archaeology) बखानना अनावश्यक और अलाभकर है — संक्षेप में इतना ही कि विज्ञान, भारतीय दर्शन, सिनेमा, प्रेम और वैर, इन सबके घोल से तैयार वाक्य-समूहों को एक कथा में पिरोने की यह तकनीक हिन्दी कथा-लेखन में सर्वथा नवीन है।
[४]
यह तकनीक प्रचण्ड प्रवीर पहले भी अपने कहानी-संग्रहों — उत्तरायण और दक्षिणायन — में अपना चुके हैं और उनकी जो भूमिका मैंने लिखी थी उसमें कही बातों को दुहराने का कोई ख़ास मतलब यहाँ है नहीं। लेकिन यद्यपि इधर हिन्दी में कुछ पुस्तकों के छपने-बिकने को ले कर कुछ प्रकाशकों ने ऐसे दावे किये हैं जिन्हें सुन कर हिन्दी के लेखक दाँतों तले उँगली दबाने से ले कर दाँतों तले उँगली चबाने मे॑ मशग़ूल हैं, २०१९ में छपी इन दो पुस्तकों का २०२५ में दूसरा संस्करण निकलना यह बताता है कि प्रचण्ड प्रवीर के इस कथा-शिल्प को पसन्द करने वाले हिन्दी में काफ़ी हैं।
हिन्दी कथालेखन उस ज़माने से बहुत आगे निकल आया है जब यह माना जाता था कि हिन्दी के अनपढ़ पाठक को उसके ‘आसपास की दुनिया’ के अतिरिक्त किसी चीज़ में दिलचस्पी नहीं है। यद्यपि हिन्दी कथा-शिल्प का आकल्पन अभी भी मुमकिना वारदातों के खूँटे से बँधा हुआ है और विचरण की वह स्वतन्त्रता अपनाने से डरता है जो ‘रोमान्स-लेखकों’ को हासिल थी, प्रचण्ड प्रवीर का कथाशिल्प इस आकल्पन को स्वायत्त करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण बढ़त ले चुका है। मुझे भरोसा है कि इस सङ्कलन की कहानियाँ पाठकों को न केवल पसन्द आयेंगी, अपितु उन्हें उपनिषदों की ओर आकृष्ट भी करेंगी और यह सोचने के लिए भी विवश करेंगी कि ज्ञान का ‘क्या और कैसे’ जिस तरह आज पूछा जा रहा है वह किस गर्भनाल से उस भाषा से जुड़ा हुआ है जिसमें यह पहले पूछा जाता था।
मुझे भरोसा है कि यह संग्रह हिन्दी में आस्वाद और जिज्ञासा का एक नया संगम उपस्थित करेगा जो अजीब है लेकिन ग़रीब (= परदेसी) नहीं।
वागीश शुक्ल
पौष कृष्ण चतुर्दशी, संवत् २०८२
बस्ती

