• रपट
  • विश्व पुस्तक मेला में वाणी प्रकाशन

    कल यानी दिनांक 10 जनवरी को दिल्ली के प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले की शुरुआत हुई। मेले के पहले दिन खूब कार्यक्रम हुए। प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन द्वारा आयोजित कार्यक्रमों पर एक रपट- जानकी पुल 

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    1. ‘वाणी ओपन माइक कविता कुम्भ’ कार्यक्रम
    2. पुस्तक लोकार्पण – ‘हिन्दी साहित्य : तथ्यों के आलोक में’
    3. पुस्तक लोकार्पण व परिचर्चा – ‘अलकनंदा सुत’
    • वाणी प्रकाशन ग्रुप द्वारा विश्व पुस्तक मेले के ‘साहित्य-घर’ में दिनांक 10-01-2026 को तीन कार्यक्रम आयोजित किये गये।
    • सर्वप्रथम वाणी प्रकाशन के वाणी ‘साहित्य-घर’ में ‘वाणी ओपन माइक कविता कुम्भ’ कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसके माध्यम से साहित्य और कला का एक अनूठा संगम देखने को मिला। आज आयोजित इस कार्यक्रम में विभिन्न आयु वर्गों—युवा और वरिष्ठ—के कुल 16 प्रतिभागियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से मानवीय भावनाओं के विभिन्न रंगों को उकेरा। कार्यक्रम में प्रतिभागी अनीता चौधरी, यश पाठक एवं हर्ष राज की कविताओं को श्रोताओं द्वारा सर्वाधिक सराहा गया।
    • भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी डॉ. निशान्त जैन और परास्नातक प्रोफ़ेसर डॉ. प्रशान्त कुमार सिंह की पुस्तक ‘हिन्दी साहित्य : तथ्यों के आलोक में’ पर और साहित्य के अंतर्संबंधों पर एक गंभीर चर्चा आयोजित की गई। “प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए साहित्य का मर्म आवश्यक: डॉ. निशांत जैन।” दिन के मुख्य सत्र में भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी डॉ. निशांत जैन, परास्नातक प्रोफ़ेसर डॉ. प्रशांत कुमार सिंह और वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने शिरकत की। प्रतीक शर्मा के सफल संचालन में आयोजित इस पुस्तक परिचर्चा में प्रतियोगी परीक्षाओं और साहित्यिक समझ पर गहन संवाद हुआ। चर्चा के दौरान संचालक द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब में लेखकों ने कई महत्वपूर्ण बिंदु साझा किए: डॉ. प्रशांत कुमार सिंह ने पुस्तक की विशेषता बताते हुए कहा कि “यह किताब एक अत्यंत रुचिकर शैली में लिखी गई है। इसमें काव्य, निबंध, गद्य और पत्र—सब कुछ एक ही स्थान पर समाहित है, जो इसे पाठकों के लिए बोझिल होने के बजाय रोचक बनाता है।”

    डॉ. निशांत जैन ने प्रतियोगी परीक्षाओं और साहित्य की समझ पर प्रकाश डालते हुए कहा, “तैयारी के दौरान हम केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं पढ़ते, बल्कि पढ़ते-पढ़ते उस विषय की समझ स्वतः विकसित होने लगती है।” उन्होंने यह भी कहा कि कोई पुस्तक तब तक जीवित रहती है, जब तक उसमें समय के साथ होने वाले ‘लय परिवर्तन’ समाहित न हो जाएं। उन्होंने बताया कि इस किताब को बदलते हुए परीक्षा पैटर्न और तथ्यों की बारीकियों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। अरुण माहेश्वरी (प्रबंध निदेशक, वाणी प्रकाशन) ने प्रकाशन की भूमिका स्पष्ट करते हुए कहा कि एक प्रकाशक का कर्तव्य विविधता बनाए रखना है। वाणी प्रकाशन समय के साथ खुद को ढालते हुए विविध विषयों पर श्रेष्ठ सामग्री पाठकों तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध है।

    • आज का तीसरा कार्यक्रम प्रवासी लेखिका अर्चना पैन्यूली के नवीनतम उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ पर एक विचारोत्तेजक परिचर्चा रही। इस सत्र में लेखिका अर्चना पैन्यूली के साथ सुप्रसिद्ध लेखिका सुधा थपलियाल और डॉ. बी.आर. अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. महेंद्र प्रजापति बतौर संचालक शामिल हुए। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. महेंद्र प्रजापति ने किया।अलकनंदा सुत पुस्तक की व्याख्या करते हुए सुधा थपलियाल ने कहा कि इस कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मुख्य पात्र ‘शिवानंद’ को उनके बच्चों की दृष्टि से प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा, “लेखिका ने शिवानंद को एक अत्यंत कर्मठ और स्वाभिमानी व्यक्ति के रूप में चित्रित किया है। उपन्यास की खूबी इसकी सादगी है; लेखिका ने किसी भी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के बजाय वास्तविकता के करीब रखा है और कई पात्रों को एक साथ कुशलता से पिरोया है।” संचालक डॉ. महेंद्र प्रजापति ने लेखिका के रचनाकर्म की सराहना करते हुए कहा कि अर्चना जी जब भी भारत आती हैं, तो वे यहाँ की मिट्टी से शब्द चुनती हैं। उन्होंने एक मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा, “कहानी भले ही आप सुनाते हैं, लेकिन अंततः कथा आपको गढ़ती है।” चर्चा के दौरान लेखिका अर्चना पैन्यूली ने इस पुस्तक को अपने लिए गौरव का विषय बताया। उन्होंने साझा किया, “मैं भले ही वर्षों से डेनमार्क में रह रही हूँ, लेकिन मेरा मूल और मेरी संवेदनाएं आज भी उत्तराखंड से जुड़ी हैं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पुस्तक उनके परिवार से प्रेरित अवश्य है, लेकिन यह कोई जीवनी नहीं बल्कि एक उपन्यास है।

    अर्चना जी ने बताया कि अक्सर उन्हें महिला विषयों पर लिखने वाली लेखिका माना जाता है, इसलिए इस बार उन्होंने जानबूझकर एक पुरुष पात्र ‘शिवानंद’ को केंद्र में रखकर यह उपन्यास लिखा। उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री आदरणीय रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ जी का पुस्तक की भूमिका लिखने के लिए और वाणी प्रकाशन का इस आयोजन के लिए आभार व्यक्त किया। अतीत और जड़ों का संगम कार्यक्रम में उपस्थित लेखिका की परिजन अलका पंत ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि इस कहानी ने उन्हें अपनी जड़ों से दोबारा जोड़ने का काम किया है। यह किताब पाठकों को उनके अतीत की स्मृतियों में ले जाने की क्षमता रखती है। इस अवसर पर लेखिका के परिवारजन, शोधार्थी और बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे।

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