• स्मरण
  • बशीर बद्र: मेरी यादों, मेरी ज़बान और मेरी साँसों में!

    आज बशीर बद्र जो, उनकी शायरी को याद कर रहे हैं सुहैब अहमद फ़ारूक़ी। पेशे से पुलिस अफ़सर हैं, मिज़ाज से शायर हैं। आज फ़ारूक़ी साहब के लिखे बशीर बद्र को पढ़िए- मॉडरेटर 

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    “हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
    जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा…”

    पूरे पाँच मर्तबा यह शेर दुहराने के बाद मैंने ज़ैनुल से पूछा—“अच्छा बेटा, दरिया का मतलब बताओ?”

    उन्होंने अपनी पूरी क़ाबिलियत और पूरे एतमाद से जवाब दिया—

    “मामूदान… चटाई।”

    उस जवाब पर जो हँसी छूटी, वह आज भी याद है।

    सन 2002 में मेरे भांजे ज़ैनुल हक़ की उम्र उस वक़्त क़रीब तीन बरस से कुछ ऊपर होगी। तब तक उन्हें दौड़ने में पूरी महारत और बोलने में आधी आ चुकी थी। उन दिनों वह “ज” को “द” बोलते थे। मैं पिछली पीढ़ी से मुझ पर चढ़े अदबी फ़र्ज़ का क़र्ज़ भांजे को शेर याद कराकर उतार रहा था। यह अलग बात है कि मेरी तालीम जहाँ बचपन में सिर्फ़ बड़ों की शाबाशी तक महदूद रही थी, वहीं ज़ैनुल भाई फ़ी शेर पाँच रुपये इनाम की दर पर अशआर हिफ़्ज़ कर रहे थे। ख़ैर, बड़ी मुश्किल से ज़ैनुल भाई को “दरिया” का मतलब उनके गाँव के जोहड़ और तालाब के हवाले से समझाया गया।

    “जमी है गर्द आँखों में, बहुत दिन हो गए रोए
    चलो फिर आज माज़ी में उतर कर देख लेते हैं…” (कश्फ़)

    हज़रात,

    हमारे दौर के अज़ीम उर्दू शायर जनाब बशीर बद्र साहब के 28 मई, बकरीद के दिन हुए देहावसान के बाद से ही दिल अजीब बेचैनी में है। लेखक होने से कहीं ज़्यादा उनका मद्दाह होने की एक अलग अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर महसूस कर रहा हूँ। किसी बड़ी शख़्सियत के इंतक़ाल पर आजकल सोशल मीडिया पर इतना कुछ लिखा, कहा और सुना जाता है कि आदमी के अपने ख़याल ख़त्म तो नहीं होते, मगर परतों के नीचे दबे हुए ज़रूर महसूस होने लगते हैं।

    कई अहबाब—शायर, अहल-ए-अदब और मेरे संस्मरण पढ़ने वाले दोस्तों—का इसरार रहा कि बशीर बद्र साहब पर मैं अपने अंदाज़ में कुछ लिखूँ; वैसा, जैसा पहले राहत इंदौरी और ताहिर फ़राज़ साहिबान के जाने पर लिखा था। तब से ईद के दिन से अब तक ज़ेहन को लगातार कुरेद रहा हूँ कि मेरे भीतर नक़्श बशीर बद्र का पहला शेर कौन-सा है, और कब से सब्त है। अब तक नाकाम हूँ।

    भूल शायद बहुत बड़ी कर ली
    हम ने दुनिया से दोस्ती कर ली

    तुम मोहब्बत को खेल कहते हो
    हम ने बर्बाद ज़िंदगी कर ली

    शायद वजह यही है कि जितनी मेरी ज़िंदगी है, लगभग उतनी ही इस लेजेंड की शायरी भी मेरी रूह के आसपास मौजूद रही है। साँसों का हिसाब कैसे रखा जाए—पहली कौन-सी थी और दूसरी कौन-सी?

    बशीर साहब मेरे जैसे उन लोगों के लिए, जो उर्दू शायरी की ख़ुराक पर जीते हैं, सिर्फ़ एक शायर नहीं; लहू में घुली ऑक्सीजन की तरह हैं—बेनज़र, मगर हर लम्हा मौजूद।

    वो चले गए हैं, लेकिन सच यह है कि उनकी ग़ज़लें कहीं नहीं जातीं। वे हमारी बातचीत में रहती हैं, हमारी तन्हाइयों में, हमारी यादों में… और कभी-कभी एकदम बेआवाज़ हमारी साँसों में भी।

    कुछ बड़े लोगों से हमारी पहचान तब शुरू होती है जब हम शऊर की उम्र में दाख़िल हो रहे होते हैं। फिर धीरे-धीरे उनसे दिलबस्तगी पैदा होती है और देखते-देखते वे हमारे लिए मिसाल बन जाते हैं। शौक़-शौक़ में उनके बारे में छोटी-बड़ी इत्तिलाआत ज़ेहन के किसी लाशऊरी गोशे में जमा होती रहती हैं। हम अपनी ज़िंदगी के मरहले एक-एक करके तय करते चले जाते हैं, मगर वे लोग हमारे भीतर कहीं साथ-साथ चलते रहते हैं।

    जब तक ख़ाकसार उर्दू अदब में बाक़ायदा दाख़िल हुआ—यानी मेरी ज़ाती हैसियत “यह सुहैब फ़ारूक़ी हैं; पुलिस में हैं और अच्छे शेर भी कहते हैं”—वाली बनी, तब तक बशीर बद्र साहब बीमारी और याददाश्त की कमज़ोरी के सबब उर्दू शायरी की आलमी महफ़िल से लगभग ख़ामोश हो चुके थे। यह मेरी निजी अदबी बदक़िस्मती रही कि जिनके अशआर बचपन से ज़ेहन में गूँजते रहे, जिनकी आवाज़ पर वाह-वाह करना सीखा, उनसे कभी रूबरू मुलाक़ात न हो सकी। फिर अचानक एक दिन उनकी वफ़ात की ख़बर आती है… और दिल में एक टीस उठती है।

    मुझे याद पड़ता है कि सन अस्सी के आसपास, देहरादून प्रवास के दौरान, पापा के साथ बचपन में एक मुशायरा देखा था। “देखा” इसलिए लिख रहा हूँ कि उस वक़्त मुशायरा सुनने और समझने लायक उम्र या शऊर कहाँ था।

    वहीं पहली बार आलम-ए-उर्दू के नामवर शुअरा-ए-कराम के दीदार हुए। शायरी की बारीकियाँ समझ में नहीं आई थीं, मगर इतना साफ़ याद है कि दो शायरों पर सबसे ज़्यादा वाह-वाह हुई थी—बशीर बद्र और राहत इंदौरी।

    उनकी मक़बूलियत, महफ़िल पर उनकी गिरफ़्त और लोगों का बेइख़्तियार दाद देखकर मेरे भीतर उसी वक़्त एक ख़याल उठा था—मैं भी “बड़ा” होकर शायर बनूँगा।

    और शायद उसी मुशायरे की किसी शाम, परेड ग्राउंड की उस भीड़, उन आवाज़ों और उन वाह-वाहों के बीच… मैंने भी उर्दू और उर्दू शायरी को अपनी हैसियत के हिसाब से पढ़ना, सुनना और थोड़ा-थोड़ा समझना शुरू किया। और शायद उसी के साथ… बड़ा होना भी।

    बशीर साहब की याद मेरे भीतर सिर्फ़ देहरादून तक महदूद नहीं है। इटावा, जो मेरी ननिहाल है, वहाँ सालाना नुमाइश के मौक़े पर होने वाले मुशायरों में पूरी रात अम्मी के साथ बैठकर उनका इंतज़ार करना आज भी याद है। नींद से भरी आँखें, मूँगफलियाँ, पिसे नमक की चुटकी… और बशीर बद्र के नाम पर अचानक उठती हुई “वाह-वाह”, जो मुझे नींद से जगा देती थी।

    फिर अगले मुशायरे तक उनका कलाम ऑडियो कैसेट में पूरे वॉल्यूम के साथ सुनना—यह भी हमारी घरेलू रवायत का हिस्सा था।

    स्योहारा आने के बाद 1984 में, मेरे अल्मा मेटर एम.क्यू. इंटर कॉलेज के मैदान में “स्योहारा बज़्म-ए-अदब” के बैनर तले हुआ वह शानदार मुशायरा आज भी यादों में उसी आब-ओ-ताब के साथ रौशन है। निज़ामत मंज़ूर मलिकज़ादा साहब कर रहे थे। बशीर बद्र, राहत इंदौरी, मेराज फ़ैज़ाबादी, अज़हर इनायती समेत उस दौर के कई नामवर शायर एक ही स्टेज पर थे। ज़ाती क़ुर्बत की बुनियाद पर कुछ शोअरा जन्नत-मकानी हिलाल स्योहारवी साहब के यहाँ ठहरे थे और बाक़ी एम.क्यू. इंटर कॉलेज में।

    हिलाल साहब हमारे इलाके की अदबी पहचान ही नहीं, उर्दू शायरी की एक मुकम्मल रवायत थे। स्योहारा में अदब का ज़िक्र उनके बिना अधूरा है। इस मुशायरे के हवाले से मेरे सीनियर और स्योहारा बज़्म-ए-अदब के सदस्य राशिद अर्शी भाई ने याद दिलाया कि उसी मुशायरे में स्थानीय अदबी सियासत के सिलसिले में हिलाल साहब पर कसा गया एक हल्का-सा व्यंग्य मंज़ूर मलिकज़ादा साहब ने अपनी नफ़ासत और ज़ेहानत से इस ख़ूबसूरती से सँभाला कि बात भी रह गई और महफ़िल की शाइस्तगी भी। उस मुशायरे की ख़ुमारी बहुत अरसे तक रही—बल्कि सच कहूँ तो आज तक है।

    इसके बाद ज़िंदगी अपने मामूल पर चलती रही। पढ़ाई के मराहिल आए, फिर रोज़गार के। अदब से रिश्ता टूटा नहीं, मगर उसकी बाक़ायदगी ज़रूर कम होती चली गई। उसी कैफ़ियत को शायद फ़ैज़ साहब ने बहुत पहले कह दिया था—

    “दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया,
    तुझसे भी दिलफ़रेब हैं ग़म रोज़गार के।”

    मगर यह भी सच है कि रोज़गार ने चाहे जितना उलझाए रखा हो—

    “उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
    न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए…”

    मेरे ज़ेहन और मेरी ज़बान से कभी ओझल नहीं हुए।

    हमारे घर में उर्दू रिसाले और मैगज़ीनें बाक़ायदा आया करती थीं। उनमें दूसरे फ़नकारों के साथ बशीर बद्र की ग़ज़लें भी होती थीं। उनकी शायरी की सबसे बड़ी ताक़त यही थी कि उसे समझने के लिए ज़ेहन पर कोई ज़ोर नहीं लगाना पड़ता था। वह सीधे दिल में उतर जाती थी।

    भटक रही है पुरानी दुलाइयाँ ओढ़े
    हवेलियों में मिरे ख़ानदान की ख़ुशबू

    वो इत्र-दान सा लहजा मिरे बुज़ुर्गों का
    रची-बसी हुई उर्दू ज़बान की ख़ुशबू

    हम किताबें कम खरीद पाते थे। जेब इजाज़त नहीं देती थी। सो डायरियों में उनके शेर लिख लिया करते थे। वही शेर बाद में दोस्तों के प्रेमपत्रों में, जिनके लिखने की ज़िम्मेदारी ख़ाकसार पर थी, काम आते थे। यह कार-ए-ख़ैर भी किसी सवाब-ए-दारेन से कम नहीं लगता था।

    हमारे रुहेलखंड में उर्दू सिर्फ़ पढ़े-लिखों की ज़बान नहीं है। उर्दू आम ज़बान है—रिक्शे पर, बाज़ार में, खेत में, चाय की दुकान पर—हर जगह। वह हमारे भीतर ऑक्सीजन की तरह घुली रहती है।

    मैं यह कहना चाहूँगा कि जिस काम का श्रेय कभी तूतिय-ए-हिंद अमीर ख़ुसरो को दिया जाता है—यानी शाही दरबारों की फ़ारसी और तुर्की ज़बानों की रवायत को स्थानीय ब्रज और हिन्दवी की ज़मीन में पिरोकर एक नई लोक-भाषायी संवेदना पैदा करना—उर्दू ग़ज़ल के हवाले से कुछ वैसा ही काम, मेरी नज़र में, बशीर बद्र साहब ने किया।

    बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को हर तरह के एलीटिस्ट दायरों से निकालकर अवाम तक पहुँचाया। मेरी मुराद सिर्फ़ ज़बान से नहीं, उस पूरे मिज़ाज से है जिसमें शायरी कभी प्रगतिवाद, कभी क्रांतिवाद, कभी छायावाद और कभी तयशुदा मौज़ूआत की गिरफ़्त में महदूद हो जाती है। बशीर बद्र साहब इन तमाम ख़ानों से आज़ाद थे। उन्होंने अपनी शायरी ऐसी ज़बान में कही जो न सिर्फ़ अदबी हल्कों में समझी जाए बल्कि रिक्शावाले, सब्ज़ीवाले, दुकानदार—हर आम आदमी की ज़बान पर भी वैसे ही चढ़ जाए।

    और मेरी नज़र में बशीर बद्र का सबसे बड़ा कमाल यही है कि उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को महफ़िलों और अदबी दायरों से निकालकर अवाम की ज़बान बना दिया। ग़ज़ल को आम आदमी की ज़िंदगी, उसकी बोलचाल और उसके जज़्बात तक पहुँचा दिया।

    बशीर बद्र सचमुच उस मोड़ का नाम हैं जहाँ रिवायत और जदीदियत एक-दूसरे से गले मिलते दिखाई देते हैं। उनकी शायरी में क्लासिकी ग़ज़ल की नफ़ासत भी है और रोज़मर्रा की ज़िंदगी की गर्द भी। शायद यही वजह है कि उनका शेर किताब में भी अपना असर रखता है और बातचीत में भी।

    उनकी मक़बूलियत का सबसे बड़ा सबूत यही है कि उन्हें सिर्फ़ पढ़ा नहीं गया—उन्हें याद रखा गया, दोहराया गया, जिया गया।

    बहुत से शायर अच्छे अशआर कहते हैं, लेकिन बहुत कम ऐसे होते हैं जिनके अशआर ख़ास लोगों के साथ-साथ आम लोगों की भी रोज़मर्रा की गुफ़्तगू का हिस्सा बन जाएँ। बशीर साहब उन्हीं ख़ुशनसीबों में थे।

    “ये ज़ाफ़रानी पुलओवर उसी का हिस्सा है,
    कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे…”

    यह शेर न जाने कितने जवान दिलों ने याद रखा होगा—कभी मोहब्बत में, कभी जुदाई में… और कई बार तब भी, जब शादियाँ किसी और से हो चुकी थीं।

    मुझमें दम नहीं कि उनके फ़न और शख़्सियत दोनों को उतनी ही आसान ख़ूबसूरती से समेट सकूँ जितनी आसान उनकी शायरी है।

    बस इतना कह सकता हूँ कि बशीर बद्र साहब को इसलिए याद किया जाएगा कि उन्होंने सचमुच उर्दू को अवाम की ज़बान बना दिया—सादा, दिलनशीं और सीधे दिल में उतर जाने वाली।

    और यही उनकी असल विरासत है—

    हर दौर में कोई न कोई एक लड़का, एक लड़की, एक दिल…

    उन्हें पढ़ता रहेगा।

    और शायद अपनी किसी तन्हाई में, बेआवाज़… उन्हें दोहराता भी रहेगा।

    और आख़िर में—

    ‘जनाज़े में सिर्फ़ बीस लोग आए’ जैसी बातों पर शायद बशीर साहब का यह शेर बहुत कुछ कह देता है—

    “बाज़ार का नक़ीब समझ कर मुझे न छेड़
    ख़ामोश रहने दे, मैं तेरे घर की बात हूँ।”

    बशीर बद्र साहब की मौत और उनका जनाज़ा उनका और उनके घरवालों का निजी मामला है। इसकी नुमाइश ऐसी नहीं होनी चाहिए—न किसी फ़िल्म स्टार की तरह, न किसी सियासी क़ाइद की तरह।

    एक मदाह की हैसियत से उनके ही शेर पर बात ख़त्म करना चाहूँगा—

    “मैं चुप रहा तो और ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ीं
    वो भी सुना है उसने जो मैंने कहा नहीं।”

    दुआओं में याद रखिएगा।

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